श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 54 — परशुरामजी का आगमन और राम-लक्ष्मण संवाद

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 54

परशुरामजी का आगमन और राम-लक्ष्मण संवाद

इस भाग का प्रसंग: परशुरामजी का आगमन और राम-लक्ष्मण संवाद।

पाठ-सीमा: दोहा 268 के बाद से 273 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 269 से पहले
देखत भृगुपति बेषु कराला । उठे सकल भय बिकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड प्रनामा ॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लै गई सयानीं ॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई । पद सरोज मेले दोउ भाई ॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन ॥

सरल भावार्थ: परशुरामजी को देखकर राजा भयभीत होकर अपना तथा पिता का नाम बताते हुए प्रणाम करते हैं। जनकजी भी प्रणाम करके सीताजी से आशीर्वाद दिलाते हैं। सखियाँ उन्हें लौटाती हैं। विश्वामित्रजी श्रीराम-लक्ष्मण का परिचय देते हैं; परशुरामजी आशीर्वाद देकर श्रीराम की अनुपम छवि को अपलक देखते हैं।

दोहा 269
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर ॥
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर ॥२६९॥

सरल अर्थ: फिर वे जनकजी से पूछते हैं कि इतनी भीड़ किसलिए है। बात जानते हुए भी अनजान की तरह पूछते हैं और उनका शरीर क्रोध से भर जाता है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 270 से पहले
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए ॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चापखंड महि डारे ॥
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू ॥
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं ॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी ॥सोचहिं सकल त्रास उर भारी ॥
मन पछिताति सीय महतारी । बिधि अब सँवरी बात बिगारी ॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध निमेष कलप सम बीता ॥

सरल भावार्थ: जनकजी स्वयंवर का समाचार सुनाते हैं। परशुरामजी टूटे धनुष को देखकर कठोर वाणी में पूछते हैं कि इसे किसने तोड़ा। वे अपराधी को दिखाने की माँग और राज्य उलट देने की धमकी देते हैं। जनक भय से उत्तर नहीं दे पाते; दुष्ट राजा खुश होते हैं। नगर और सभा चिंतित हैं। सीताजी तथा उनकी माता को फिर संकट दिखाई देता है।

दोहा 270
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु ॥२७०॥

सरल अर्थ: लोगों का भय और जानकीजी की चिंता देखकर श्रीराम हर्ष या विषाद के बिना शांत भाव से बोलते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 271 से पहले
नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ॥
आयसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई । अरि करनी करि करिअ लराई ॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा । न त मारे जैहहिं सब राजा ॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने । बोले परसुधरहि अपमाने ॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं ॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई सेवक होगा; मुझे आज्ञा दीजिए। परशुरामजी कहते हैं कि सेवक सेवा करता है, शत्रु जैसा काम नहीं। धनुष तोड़ने वाला सहस्रबाहु जैसा उनका शत्रु है। लक्ष्मणजी मुस्कुराकर पूछते हैं कि बचपन में कई धनुष तोड़े, तब ऐसा क्रोध नहीं हुआ; इस धनुष से विशेष ममता क्यों है? परशुरामजी क्रोधित होते हैं।

दोहा 271
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार ॥
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार ॥२७१॥

सरल अर्थ: परशुरामजी कहते हैं—राजपुत्र, तुम्हें बोलने का विचार नहीं! संसार जानता है कि शिवधनुष साधारण धनुष जैसा नहीं है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 272 से पहले
लखन कहा हँसि हमरें जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥
का छति लाभु जून धनु तौरें । देखा राम नयन के भोरें ॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
बोले चितइ परसु की ओरा । रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही । केवल मुनि जड़ जानहि मोही ॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही ॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा ॥

सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी कहते हैं कि उन्हें सब धनुष समान लगते हैं; पुराना धनुष टूटने से क्या हानि-लाभ? छूते ही टूट गया, इसलिए श्रीराम का दोष नहीं। परशुरामजी अपना फरसा दिखाकर बालब्रह्मचारी, अत्यंत क्रोधी और क्षत्रिय-विरोधी होने का परिचय देते हैं। वे बार-बार पृथ्वी राजाओं से रहित कर ब्राह्मणों को देने और सहस्रबाहु की भुजाएँ काटने का प्रताप बताते हैं।

दोहा 272
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥२७२॥

सरल अर्थ: वे राजकुमार को चेताते हैं कि माता-पिता को शोक में न डालो। उनका घोर फरसा गर्भस्थ शिशुओं तक के विनाश का कारण बना है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 273 से पहले
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महा भटमानी ॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई ॥
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥

सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी कहते हैं कि यहाँ कोई ऐसा कमजोर नहीं जो उँगली के संकेत से डर जाए। अस्त्र देखकर उन्होंने वीरतापूर्ण वचन कहे, पर यज्ञोपवीत और भृगुवंश का सम्मान करके क्रोध रोकते हैं। रघुकुल देवता, ब्राह्मण, भक्त और गाय पर वीरता नहीं दिखाता। वे कहते हैं कि मुनि के वचन ही करोड़ों वज्र समान हैं, फिर अस्त्र क्यों?

दोहा 273
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर ॥२७३॥

सरल अर्थ: लक्ष्मणजी विनोदपूर्ण ढंग से कहते हैं—हे धीर महामुनि, यदि अस्त्र देखकर कुछ अनुचित कहा तो क्षमा करें। परशुरामजी और क्रोधित होकर गंभीर वाणी बोलते हैं।

॥ श्री सीताराम ॥
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