श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 55 — लक्ष्मण-परशुराम संवाद और श्रीराम की विनय
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 55
लक्ष्मण-परशुराम संवाद और श्रीराम की विनय
इस भाग का प्रसंग: लक्ष्मण-परशुराम संवाद और श्रीराम की विनय।
पाठ-सीमा: दोहा 273 के बाद से 278 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥
काल कवलु होइहि छन माहीं । कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा । कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा । तुम्हहि अछत को बरनै पारा ॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी । बार अनेक भाँति बहु बरनी ॥
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ॥
सरल भावार्थ: परशुरामजी विश्वामित्रजी से कहते हैं कि यह उद्दंड बालक अपने कुल का विनाश करेगा; उसे रोककर उनका प्रताप समझाएँ। लक्ष्मणजी उत्तर देते हैं कि आपके रहते आपका यश कौन कह सकेगा, क्योंकि आपने स्वयं बार-बार अपना बल बताया है। यदि संतोष न हो तो और कह लें, पर वीर और धीर पुरुष को गाली देना शोभा नहीं देता।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥२७४॥
सरल अर्थ: सच्चे वीर रण में कर्म करके दिखाते हैं, स्वयं अपनी बड़ाई नहीं कहते। सामने शत्रु पाकर अपना प्रताप बखानना कायर का स्वभाव है।
सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू । कटुबादी बालकु बधजोगू ॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यहु मरनिहार भा साँचा ॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू ॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगें अपराधी गुरुद्रोही ॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी के कटु वचन सुनकर परशुरामजी फरसा सँभालते हैं और कहते हैं कि अब बालक को बचाना कठिन है। विश्वामित्रजी बालक का अपराध क्षमा करने को कहते हैं, क्योंकि संत उसके दोष नहीं गिनते। परशुरामजी कहते हैं कि केवल विश्वामित्रजी के शील के कारण रोक रहे हैं, अन्यथा गुरु के अपमान का बदला लेते।
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥२७५॥
सरल अर्थ: विश्वामित्रजी मन में मुस्कुराते हैं कि मुनि इन्हें साधारण कोमल बालक समझ रहे हैं। यह गन्ने की नहीं, लोहे की तलवार जैसी कठोर शक्ति है, जिसे वे पहचान नहीं पाए।
माता पितहि उरिन भए नीकें । गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें ॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा ॥
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ॥
भृगुबर परसु देखावहु मोही । बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही ॥
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े । द्विज देवता घरहि के बाढ़े ॥
अनुचित कहि सब लोग पुकारे । रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे ॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी गुरु-ऋण चुकाने की बात पर व्यंग्य करते हैं। फरसा उठते ही सभा हाय-हाय करती है। वे कहते हैं कि ब्राह्मण जानकर सम्मान कर रहे हैं; युद्ध के वीरों से सामना हुआ होता तो ऐसा गर्व न होता। लोग वचन अनुचित बताते हैं और श्रीराम संकेत से लक्ष्मणजी को रोकते हैं।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥२७६॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी के उत्तर आहुति और परशुरामजी का क्रोध अग्नि जैसा है। अग्नि बढ़ती देखकर श्रीराम जल के समान शांत करने वाले वचन बोलते हैं।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं । गुर पितु मातु मोद मन भरहीं ॥
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने ॥
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी । राम तोर भ्राता बड़ पापी ॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं । कालकूटमुख पयमुख नाहीं ॥
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही । नीचु मीचु सम देख न मौहीं ॥
सरल भावार्थ: श्रीराम मुनि से बालक पर दया करने और उसके अज्ञान को क्षमा करने की विनती करते हैं। वे कहते हैं कि बालकों की चंचलता पर गुरु तथा माता-पिता आनंदित होते हैं। इससे परशुरामजी कुछ शांत होते हैं, पर लक्ष्मणजी को मुस्कुराता देखकर फिर क्रोधित होकर उन्हें कपटी तथा विषमय कहते हैं।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥२७७॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी हँसकर कहते हैं—मुनि, क्रोध पाप की जड़ है। उसके वश होकर मनुष्य अनुचित कर्म करता और संसार के प्रतिकूल चलने लगता है।
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने । बैठिअ होइहिं पाय पिराने ॥
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई । जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई ॥
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं ॥
थर थर कापहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी ॥
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होइ बल हानी ॥
बोले रामहि देइ निहोरा । बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा ॥
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें । बिष रस भरा कनक घटु जैसैं ॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी स्वयं को सेवक बताकर दया माँगते हैं, फिर विनोद करते हैं कि क्रोध से धनुष जुड़ेगा नहीं; किसी कुशल व्यक्ति को बुलाकर जोड़वा लें। जनकजी उन्हें चुप रहने को कहते हैं। परशुरामजी निर्भय उत्तर सुनकर और जलते हैं और श्रीराम से कहते हैं कि छोटे भाई समझकर छोड़ रहे हैं; उसका सुंदर शरीर मानो विष भरा स्वर्णघट है।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम ॥२७८॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी फिर हँसते हैं। श्रीराम कठोर दृष्टि से संकेत करते हैं तो वे संकोचपूर्वक गुरु के पास जाकर कटु वचन छोड़ देते हैं।

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