श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 36 — प्रतापभानु का अंत, रावणादि जन्म, वरदान और लंका

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 36

प्रतापभानु का अंत • ब्राह्मण-शाप • रावणादि जन्म • वरदान • लंका

भाग 35 दोहा 168 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद “एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें…” से आरंभ होकर दोहा 180 तक जाता है। हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड तथा उसी के नीचे अलग सरल अर्थ रखा गया है।
चौपाई
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि राजा को समझाता है कि इस उपाय से ब्राह्मण उसके वश में हो जाएँगे और उनके यज्ञ-हवन के प्रभाव से देवताओं पर भी उसका प्रभाव हो जाएगा।
चौपाई
और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥
सरल अर्थ: वह अपनी योजना का अगला चरण बताता है—वह इसी वेश में नहीं आएगा, बल्कि राजा के पुरोहित को माया से हटाकर उसका रूप धारण करेगा।
चौपाई
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि कहता है कि असली पुरोहित को एक वर्ष छिपाकर वह स्वयं उसका रूप लेकर राजा का काम सिद्ध करेगा।
चौपाई
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता॥
सरल अर्थ: रात अधिक बीतने पर वह राजा को सोने को कहता है और भरोसा देता है कि उसे घोड़े सहित घर पहुँचा देगा तथा तीसरे दिन फिर मिलेगा।
दोहा 169
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥१६९॥
सरल अर्थ: वह संकेत देता है कि पुरोहित का वेश धारण कर जब वह एकांत में पूरी बात दोहराए, तभी राजा उसे पहचान ले।
चौपाई
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥
सरल अर्थ: राजा आज्ञा मानकर सो गया, पर छल में निपुण कपटी मुनि जागता रहा और अपने षड्यंत्र के अगले चरण पर विचार करने लगा।
चौपाई
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥
सरल अर्थ: वहीं कालकेतु राक्षस आया, जिसने वराह बनकर राजा को भटकाया था। वह कपटी तपस्वी का घनिष्ठ मित्र और छल-कपट में निपुण था।
चौपाई
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥
प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥
सरल अर्थ: कालकेतु के पुत्र और भाई प्रतापभानु से युद्ध में मारे जा चुके थे; इसी कारण उसके मन में राजा के प्रति गहरा वैर था।
चौपाई
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥
जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥
सरल अर्थ: पुराने वैर को याद कर कालकेतु और कपटी तपस्वी ने मिलकर प्रतापभानु के विनाश की योजना बनाई, जबकि राजा इस षड्यंत्र से अनजान रहा।
दोहा 170
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥१७०॥
सरल अर्थ: तेजस्वी शत्रु को छोटा नहीं समझना चाहिए; राहु का केवल सिर शेष होने पर भी वह सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाता है—इसी उदाहरण से सावधानी की शिक्षा दी गई है।
चौपाई
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥
सरल अर्थ: कपटी तपस्वी ने कालकेतु को पूरी घटना बताई। योजना सफल होती देखकर दोनों प्रसन्न हुए।
चौपाई
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥
सरल अर्थ: कालकेतु कहता है कि अब शत्रु लगभग जाल में आ चुका है; तपस्वी को चिंता छोड़कर योजना के परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
चौपाई
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥
सरल अर्थ: कालकेतु प्रतापभानु के पूरे कुल का नाश करने का निश्चय करके चौथे दिन लौटने की बात कहता है और वहाँ से चला जाता है।
चौपाई
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥
सरल अर्थ: कालकेतु अपनी माया से प्रतापभानु को घोड़े सहित उसके महल पहुँचा देता है और सब कुछ इस प्रकार रखता है कि किसी को घटना का पता न चले।
दोहा 171
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥१७१॥
सरल अर्थ: इसके बाद वह असली राजपुरोहित को उठा ले जाता है और माया से भ्रमित करके पर्वत की गुफा में छिपा देता है।
चौपाई
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥
सरल अर्थ: कालकेतु पुरोहित का रूप धारण कर उसकी जगह ले लेता है। प्रतापभानु जागकर स्वयं को महल में देखकर आश्चर्यचकित होता है।
चौपाई
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥
सरल अर्थ: राजा इसे मुनि की सिद्धि मानता है और घटना को गुप्त रखते हुए चुपचाप उसी घोड़े से वन की ओर निकल जाता है।
चौपाई
गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा॥
सरल अर्थ: कुछ समय बाद राजा वापस आता है। पुरोहित के रूप में कालकेतु को देखकर उसे कपटमुनि से हुई गुप्त बातचीत याद आती है।
चौपाई
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥
समय जान उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥
सरल अर्थ: राजा को तीन दिन बहुत लंबे लगते हैं। निश्चित समय पर नकली पुरोहित आकर वही गुप्त योजना दोहराता है और राजा का विश्वास पक्का हो जाता है।
दोहा 172
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥१७२॥
सरल अर्थ: राजा भ्रमवश उसे वही सिद्ध मुनि समझकर प्रसन्न होता है और तत्काल एक लाख ब्राह्मणों को परिवार सहित भोजन के लिए आमंत्रित करता है।
चौपाई
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥
सरल अर्थ: नकली पुरोहित अनेक प्रकार के व्यंजन और छह रसों से युक्त विशाल भोज तैयार करता है, पर पूरी रसोई उसके छल और माया का हिस्सा है।
चौपाई
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥
सरल अर्थ: षड्यंत्रकारी भोजन को अपवित्र करने की योजना रचता है और आमंत्रित ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक बैठाया जाता है, ताकि राजा पर दोष आए।
चौपाई
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥
सरल अर्थ: राजा जैसे ही भोजन परोसने लगता है, आकाशवाणी ब्राह्मणों को भोजन न करने और तुरंत लौट जाने की चेतावनी देती है।
चौपाई
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥
सरल अर्थ: चेतावनी सुनकर ब्राह्मण उठ जाते हैं। प्रतापभानु स्तब्ध और व्याकुल रह जाता है; वह समझ नहीं पाता कि उसके विरुद्ध कितना बड़ा छल रचा गया है।
दोहा 173
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥१७३॥
सरल अर्थ: क्रोधित ब्राह्मण बिना पूरे षड्यंत्र को जाने राजा को परिवार सहित राक्षस होने का शाप दे देते हैं।
चौपाई
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥
ईश्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥
सरल अर्थ: ब्राह्मण मानते हैं कि राजा ने उन्हें नष्ट करने के लिए बुलाया था और कहते हैं कि ईश्वर ने उनके धर्म की रक्षा की है।
चौपाई
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥
सरल अर्थ: वे एक वर्ष के भीतर पूरे कुल के नाश का शाप देते हैं। राजा भय से व्याकुल हो जाता है, तभी फिर आकाशवाणी होती है।
चौपाई
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥
सरल अर्थ: आकाशवाणी स्पष्ट करती है कि राजा ने जानबूझकर अपराध नहीं किया। यह सुनकर ब्राह्मण चकित होते हैं और राजा रसोई की सच्चाई देखने जाता है।
चौपाई
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥
सरल अर्थ: रसोई में न भोजन मिलता है, न वह नकली पुरोहित। राजा पूरा प्रसंग सुनाकर भय और दुःख से धरती पर गिर पड़ता है।
दोहा 174
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
किएँ अन्यथा दोइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥१७४॥
सरल अर्थ: राजा निर्दोष होते हुए भी होनहार और दिए जा चुके शाप के परिणाम से बच नहीं पाता; कथा नियति की प्रबलता दिखाती है।
चौपाई
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किए जेहीं॥
सरल अर्थ: ब्राह्मण चले जाते हैं। नगर के लोग घटना सुनकर दुखी होते हैं और भाग्य को दोष देते हैं कि इतने धर्मशील राजा पर ऐसा संकट आया।
चौपाई
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥
सरल अर्थ: कालकेतु असली पुरोहित को वापस पहुँचा देता है और कपटी तपस्वी को सफलता की सूचना देता है। फिर शत्रु राजाओं को युद्ध के लिए बुलाया जाता है।
चौपाई
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥
सरल अर्थ: शत्रु सेनाएँ नगर को घेर लेती हैं। घोर युद्ध में प्रतापभानु के वीर लड़ते हुए मारे जाते हैं और राजा भी अपने भाई सहित युद्धभूमि में गिरता है।
चौपाई
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥
सरल अर्थ: सत्यकेतु का वंश समाप्त हो जाता है और ब्राह्मणों का शाप फलित होता है। विजयी शत्रु राजा नगर की व्यवस्था कर अपने-अपने राज्य लौट जाते हैं।
दोहा 175
भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥१७५॥
सरल अर्थ: याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं कि जब भाग्य प्रतिकूल होता है, तब साधारण वस्तुएँ और अपने लोग भी बड़ी बाधा जैसे प्रतीत होने लगते हैं।
चौपाई
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥
सरल अर्थ: समय आने पर वही प्रतापभानु अपने समाज सहित राक्षस योनि में जन्म लेता है और दस सिर तथा बीस भुजाओं वाला रावण कहलाता है।
चौपाई
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥
सरल अर्थ: प्रतापभानु का भाई अरिमर्दन कुंभकर्ण और मंत्री धर्मरुचि उसके छोटे सौतेले भाई के रूप में जन्म लेते हैं।
चौपाई
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥
सरल अर्थ: धर्मरुचि विभीषण के रूप में प्रसिद्ध होता है और विष्णुभक्त रहता है; राजा के अन्य पुत्र-सेवक अनेक राक्षसों के रूप में जन्म लेते हैं।
चौपाई
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥
सरल अर्थ: उनमें अनेक मायावी, हिंसक और विवेकहीन राक्षस होते हैं, जो संसार को पीड़ा देने वाले बनते हैं।
दोहा 176
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥१७६॥
सरल अर्थ: पवित्र पुलस्त्य कुल में जन्म लेने पर भी ब्राह्मण-शाप के प्रभाव से वे अधर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं।
चौपाई
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥
सरल अर्थ: रावण, कुंभकर्ण और विभीषण कठोर तप करते हैं। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा वर माँगने को कहते हैं।
चौपाई
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥
सरल अर्थ: रावण देव आदि से अवध्य होने का वर माँगता है और मनुष्य तथा वानर को तुच्छ समझकर उनसे सुरक्षा नहीं माँगता।
चौपाई
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥
सरल अर्थ: रावण को वर मिलता है। इसके बाद ब्रह्मा कुंभकर्ण के पास जाते हैं और उसके विशाल प्रभाव को देखकर विचार करते हैं।
चौपाई
जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥
सरल अर्थ: कुंभकर्ण की अपार शक्ति से संसार की रक्षा हेतु सरस्वती उसकी बुद्धि फेर देती हैं और वह छह महीने की निद्रा का वर माँग बैठता है।
दोहा 177
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥१७७॥
सरल अर्थ: विभीषण सांसारिक शक्ति के बजाय भगवान के चरणों में निर्मल और अटल प्रेम का वर माँगता है।
चौपाई
तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥
सरल अर्थ: वरदान देकर ब्रह्मा चले जाते हैं। आगे कथा मंदोदरी का परिचय देती है, जो मय दानव की अत्यंत सुंदर पुत्री थी।
चौपाई
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥
सरल अर्थ: मय अपनी पुत्री मंदोदरी का विवाह रावण से करता है। रावण प्रसन्न होकर अपने दोनों भाइयों का भी विवाह कराता है।
चौपाई
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा॥
सरल अर्थ: समुद्र के बीच त्रिकूट पर्वत पर स्थित दुर्गम नगरी को मय दानव ने स्वर्ण और मणियों के भव्य भवनों से सजाया था।
चौपाई
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥
सरल अर्थ: यह नगरी भोगावती और अमरावती जैसी दिव्य नगरियों से भी अत्यंत रमणीय बताई गई है और संसार में लंका नाम से प्रसिद्ध हुई।
दोहा 178 (क)
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥१७८ (क)॥
सरल अर्थ: चारों ओर समुद्र उसकी गहरी खाई जैसा था और मणियों से जड़ा स्वर्ण-परकोटा लंका को अत्यंत सुरक्षित और भव्य बनाता था।
दोहा 178 (ख)
हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥१७८ (ख)॥
सरल अर्थ: कथा बताती है कि भगवान की प्रेरणा से प्रत्येक कल्प में जो शक्तिशाली राक्षसराज होता है, वह अपनी सेना सहित इस नगरी में निवास करता है।
चौपाई
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥
सरल अर्थ: पहले वहाँ राक्षस योद्धा रहते थे; उनके मारे जाने के बाद इंद्र की प्रेरणा से कुबेर के असंख्य यक्ष रक्षक वहाँ रहने लगे।
चौपाई
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥
सरल अर्थ: रावण को लंका की सूचना मिलती है। वह सेना लेकर दुर्ग को घेरता है और उसकी विशाल शक्ति देखकर यक्ष वहाँ से चले जाते हैं।
चौपाई
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥
सरल अर्थ: रावण पूरी नगरी देखकर उसकी सुंदरता और दुर्गमता से प्रसन्न होता है और लंका को अपनी राजधानी बना लेता है।
चौपाई
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हें॥
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥
सरल अर्थ: वह राक्षसों को योग्यतानुसार भवन देता है और बाद में कुबेर पर आक्रमण करके पुष्पक विमान छीन लाता है।
दोहा 179
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥१७९॥
सरल अर्थ: अपनी शक्ति के अभिमान में रावण कैलास पर्वत तक उठाने का प्रयास करता है, मानो वह अपने बाहुबल को परख रहा हो।
चौपाई
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥
सरल अर्थ: रावण की संपत्ति, सेना, शक्ति और प्रभाव लगातार बढ़ते जाते हैं; तुलसीदास इसकी तुलना लाभ के साथ बढ़ते लोभ से करते हैं।
चौपाई
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥
सरल अर्थ: कुंभकर्ण अनुपम बलवान था। वह छह महीने सोता और जागने पर उसके विशाल बल से तीनों लोकों में भय फैल जाता था।
चौपाई
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥
सरल अर्थ: कुंभकर्ण की भूख और शक्ति का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हुए कथा उसके समान अनेक बलवान राक्षस योद्धाओं का उल्लेख करती है।
चौपाई
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥
सरल अर्थ: रावण का ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद महान योद्धा था; युद्ध में उसके सामने टिकना कठिन था और देवताओं में भी उसका भय था।
दोहा 180
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥१८०॥
सरल अर्थ: दुर्मुख, अकंपन, वज्रदंत, धूमकेतु और अतिकाय जैसे अनेक प्रबल योद्धाओं का वर्णन आता है, जिनकी शक्ति अत्यंत बड़ी बताई गई है।

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