श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 28 — नारद तपस्या, कामदेव की हार, अभिमान और विष्णु-माया
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 28
नारद तपस्या • कामदेव की हार • अभिमान • विष्णुमाया की भूमिका
भाग 27 में नारद-श्राप की भूमिका आई थी। अब शिवजी उस कथा को विस्तार देते हैं—नारदजी की हिमालय में समाधि, इन्द्र और कामदेव का प्रयास, कामदेव की हार, नारदजी के भीतर उपजा अभिमान, शिवजी की हितकारी चेतावनी और भगवान विष्णु द्वारा भक्त के कल्याण के लिए माया को प्रेरित करने तक का प्रसंग यहाँ है।
चौपाई
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥
सरल अर्थ: हिमालय की एक अत्यंत पवित्र गुफा के पास गंगाजी बहती थीं। उस सुंदर और पवित्र स्थान को देखकर देवर्षि नारदजी का मन प्रसन्न हो गया।
चौपाई
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥
सरल अर्थ: पर्वत, नदी और वन की सुंदरता देखकर नारदजी का भगवान विष्णु के चरणों में प्रेम बढ़ा और उनका निर्मल मन समाधि में लग गया।
चौपाई
सुनि गति देवरिषि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥
सरल अर्थ: नारदजी की गहरी तपस्या का समाचार पाकर इन्द्र भयभीत हुए और उन्होंने कामदेव को सहायकों सहित उनकी समाधि भंग करने भेजा।
चौपाई
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥
सरल अर्थ: इन्द्र को आशंका हुई कि नारदजी कहीं उनका पद न चाहते हों। तुलसीदासजी लोभ और आसक्ति से उत्पन्न भय की ओर संकेत करते हैं।
दोहा 125
सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥१२५॥
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥१२५॥
सरल अर्थ: जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और समझे कि सिंह उसे छीन लेगा, वैसे ही इन्द्र अपने पद को लेकर भयभीत हुए।
चौपाई
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥
सरल अर्थ: कामदेव ने आश्रम में अपनी माया से वसंत ऋतु का वातावरण रच दिया—वृक्ष फूलों से भर गए, कोयलें कूकने और भौंरे गुंजार करने लगे।
चौपाई
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥
रंभादिक सुर नारि नवीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥
रंभादिक सुर नारि नवीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥
सरल अर्थ: मंद-सुगंधित वायु चली और रंभा आदि देवांगनाएँ भी कामदेव के प्रयास में सम्मिलित हुईं।
चौपाई
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥
सरल अर्थ: संगीत, नृत्य और अनेक आकर्षक उपाय किए गए; अपने सहायकों को देखकर कामदेव ने और भी कई मायावी प्रयत्न किए।
चौपाई
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥
सरल अर्थ: किन्तु नारदजी पर कामदेव का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जिनके रक्षक स्वयं भगवान हों, उनकी मर्यादा को कोई दबा नहीं सकता।
दोहा 126
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥१२६॥
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥१२६॥
सरल अर्थ: कामदेव ने अपनी हार स्वीकार की और भयभीत होकर सहायकों सहित नारदजी के चरणों में जाकर क्षमा माँगी।
चौपाई
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥
सरल अर्थ: नारदजी क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने प्रेमपूर्वक कामदेव को संतुष्ट किया और आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकों सहित लौट गया।
चौपाई
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥
सरल अर्थ: कामदेव ने इन्द्रसभा में नारदजी की विनम्रता और अपनी पूरी घटना सुनाई। सभी ने नारदजी की प्रशंसा की और भगवान को प्रणाम किया।
चौपाई
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥
मार चरित संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥
मार चरित संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥
सरल अर्थ: इसके बाद नारदजी शिवजी के पास गए। मन में कामदेव को जीतने का अभिमान आने लगा और उन्होंने पूरी घटना शिवजी को सुनाई।
चौपाई
बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥
सरल अर्थ: शिवजी हितकारी शिक्षा देते हैं कि यह विजय-कथा भगवान विष्णु से न कहना; प्रसंग आने पर भी इसे छिपाए रखना।
दोहा 127
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥१२७॥
भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥१२७॥
सरल अर्थ: शिवजी का हितकारी उपदेश नारदजी को अच्छा नहीं लगा। कथा संकेत करती है कि आगे भगवान की लीला और माया अपना प्रभाव दिखाएगी।
चौपाई
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥
सरल अर्थ: प्रभु की इच्छा ही अंततः पूर्ण होती है। नारदजी शिवजी की सीख न मानकर ब्रह्मलोक की ओर चले गए।
चौपाई
एक बार करतल बर बीना। गावत हरिगुन गान प्रबीना॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहाँ बसत श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहाँ बसत श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥
सरल अर्थ: नारदजी वीणा बजाते और हरिगुण गाते हुए क्षीरसागर पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु निवास करते हैं।
चौपाई
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥
सरल अर्थ: भगवान विष्णु नारदजी से प्रसन्नतापूर्वक मिले, उन्हें आसन दिया और प्रेम से उनका स्वागत किया।
चौपाई
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥
सरल अर्थ: शिवजी की चेतावनी के बावजूद नारदजी ने कामदेव पर विजय की पूरी कथा भगवान को सुना दी। यहीं से विष्णुमाया की लीला आगे बढ़ती है।
दोहा 128
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥१२८॥
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥१२८॥
सरल अर्थ: भगवान ने गंभीर मुख से कोमल वचन कहे कि नारदजी के स्मरण से ही मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं—इन वचनों में आगे की लीला का संकेत छिपा है।
चौपाई
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥
सरल अर्थ: भगवान कहते हैं कि मोह उसी के मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य न हो; नारद जैसे धीर ब्रह्मचारी को कामदेव कैसे विचलित कर सकता है।
चौपाई
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥
सरल अर्थ: नारदजी इसे भगवान की कृपा कहते हैं, किंतु उनके भीतर अभिमान का अंकुर बढ़ चुका था। भगवान उनके वास्तविक हित का विचार करते हैं।
चौपाई
बेगि सो मै डारिहुँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई॥
सरल अर्थ: भगवान मन में निश्चय करते हैं कि भक्त के हित के लिए इस अभिमान को जड़ से दूर करना आवश्यक है और वे एक लीला की योजना बनाते हैं।
चौपाई
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥
सरल अर्थ: नारदजी भगवान को प्रणाम करके चले, लेकिन उनके हृदय में अभिमान और बढ़ गया। तब भगवान ने अपनी माया को प्रेरित किया—यहीं से अगले प्रसंग का आरंभ होता है।
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