श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 5 | श्रीराम नाम की महिमा और नाम-रूप रहस्य अर्थ सहित
॥ श्री सीताराम ॥
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श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड
भाग 5 — श्रीराम नाम की महिमा और नाम-रूप का रहस्य
मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ
भाग 5 का प्रसंग
पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने माता सीता और भगवान श्रीराम को वाणी और अर्थ के समान अभिन्न बताते हुए उनकी वंदना की थी। अब बालकाण्ड का अत्यंत प्रसिद्ध श्रीराम नाम की महिमा वाला प्रसंग आरंभ होता है।
इस प्रसंग में तुलसीदासजी बताते हैं कि रामनाम वेदों का प्राण, शिवजी का महामंत्र, भक्तों का आधार और कलियुग में जीवों के कल्याण का सरल साधन है। आगे नाम और रूप के संबंध, निर्गुण-सगुण ब्रह्म तथा विभिन्न युगों में नाम के प्रभाव का गहरा वर्णन किया गया है।
पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने माता सीता और भगवान श्रीराम को वाणी और अर्थ के समान अभिन्न बताते हुए उनकी वंदना की थी। अब बालकाण्ड का अत्यंत प्रसिद्ध श्रीराम नाम की महिमा वाला प्रसंग आरंभ होता है।
इस प्रसंग में तुलसीदासजी बताते हैं कि रामनाम वेदों का प्राण, शिवजी का महामंत्र, भक्तों का आधार और कलियुग में जीवों के कल्याण का सरल साधन है। आगे नाम और रूप के संबंध, निर्गुण-सगुण ब्रह्म तथा विभिन्न युगों में नाम के प्रभाव का गहरा वर्णन किया गया है।
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श्रीराम नाम की वंदना
चौपाई
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी श्रीरघुनाथजी के “राम” नाम की वंदना करते हैं।
रामनाम के अक्षरों को अग्नि, सूर्य और चंद्रमा के मूल कारण के रूप में
चित्रित किया गया है। यह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवमय,
वेदों का प्राण, निर्गुण होते हुए भी अनुपम गुणों का भंडार है।
चौपाई
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
सरल अर्थ:
यही वह महामंत्र है जिसका जप भगवान शिव करते हैं और जिसका
उपदेश काशी में मुक्ति का साधन माना गया है।
श्रीगणेशजी भी रामनाम की महिमा जानते हैं और तुलसीदासजी
उनके प्रथम पूज्य होने में भी नाम के प्रभाव का संकेत करते हैं।
चौपाई
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥
सरल अर्थ:
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने रामनाम का प्रताप जाना।
परंपरा में उनके उलटे नाम-जप से शुद्ध होने की कथा प्रसिद्ध है।
माता पार्वती ने भी भगवान शिव से रामनाम को सहस्र नामों के
समान महिमामय सुनकर श्रद्धापूर्वक उसका जप किया।
चौपाई
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥
सरल अर्थ:
माता पार्वती का रामनाम के प्रति प्रेम देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए।
शिवजी नाम की शक्ति को भलीभाँति जानते हैं।
तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी प्रभाव से कालकूट विष भी
उनके लिए अमृत के समान फल देने वाला बना।
दोहा 19
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥१९॥
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥१९॥
सरल अर्थ:
श्रीरघुनाथजी की भक्ति वर्षा ऋतु के समान है और श्रेष्ठ भक्त
धान की फसल के समान हैं। “राम” नाम के दोनों प्रमुख वर्ण
सावन और भादों के महीनों की तरह भक्तिरूपी फसल को पुष्ट करते हैं।
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“राम” नाम के अक्षरों की महिमा
चौपाई
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
सरल अर्थ:
रामनाम के दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं।
वे भक्तों के हृदय के नेत्र के समान हैं।
उनका स्मरण सरल है, सबको सुख देने वाला है और
इस लोक तथा परलोक दोनों में कल्याणकारी है।
चौपाई
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥
सरल अर्थ:
रामनाम कहना, सुनना और स्मरण करना अत्यंत सुंदर है।
ये अक्षर तुलसीदासजी को श्रीराम और लक्ष्मण की तरह प्रिय हैं।
दोनों का संबंध ब्रह्म और जीव के सहज संबंध की तरह गहरा बताया गया है।
चौपाई
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥
सरल अर्थ:
रामनाम के अक्षरों को नर-नारायण जैसे सुंदर भाइयों,
जगत के पालनकर्ता और भक्तों के रक्षक के रूप में उपमा दी गई है।
वे भक्तिरूपी सुंदरी के कानों के आभूषण और संसार के हित के लिए
निर्मल चंद्रमा तथा सूर्य के समान हैं।
चौपाई
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥
सरल अर्थ:
रामनाम के अक्षर मोक्षरूपी अमृत के स्वाद और संतोष के समान,
पृथ्वी के आधार कच्छप और शेष के समान तथा भक्तों के
हृदयरूपी कमल को पुष्ट करने वाले माने गए हैं।
जिह्वारूपी यशोदा के लिए वे श्रीकृष्ण और बलराम के समान प्रिय हैं।
दोहा 20
एक छत्र एक मुकुट मनि सब बरनन्हि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥२०॥
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥२०॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी कहते हैं कि रामनाम के दोनों अक्षर
वर्णमाला के ऊपर ऐसे शोभित होते हैं जैसे एक छत्र और एक मुकुट-मणि।
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नाम और रूप का रहस्य
चौपाई
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥
सरल अर्थ:
नाम और नामी अर्थात रामनाम और श्रीराम को समझने पर दोनों का
अत्यंत गहरा संबंध दिखाई देता है।
नाम और रूप ईश्वर को जानने के दो माध्यम हैं।
उनका रहस्य अनादि और वर्णन से परे है, जिसे विवेक से समझा जाता है।
चौपाई
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी कहते हैं कि नाम और रूप में कौन बड़ा या छोटा है,
ऐसा सीधे कहना उचित नहीं।
सज्जन उनके गुणों के अंतर को समझेंगे।
किसी रूप की पहचान भी उसके नाम के सहारे ही होती है।
चौपाई
रूप बिसेष नाम बिनु जाने। करतल गत न परहिं पहिचाने॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखे। आवत हृदयँ सनेह बिसेषे॥
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखे। आवत हृदयँ सनेह बिसेषे॥
सरल अर्थ:
कोई रूप सामने होते हुए भी यदि उसका नाम न जाना जाए तो
उसकी पूर्ण पहचान नहीं होती।
इसके विपरीत रूप को देखे बिना भी नाम का स्मरण करने से
हृदय में उसके प्रति विशेष प्रेम जाग सकता है।
चौपाई
नाम रूप गुन अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥
सरल अर्थ:
नाम और रूप के गुणों की कथा इतनी गहरी है कि उसे पूरी तरह
कहा नहीं जा सकता। रामनाम निर्गुण और सगुण ब्रह्म के बीच
सुंदर साक्षी और दोनों को समझाने वाले दुभाषिये के समान है।
दोहा 21
राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥२१॥
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥२१॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी कहते हैं—यदि अपने भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश
चाहते हो तो जिह्वारूपी द्वार की देहरी पर रामनामरूपी
मणि का दीपक रखो।
“राम नाम मणि दीप” का भाव
यह रामचरितमानस की अत्यंत प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक है।
जिह्वा को द्वार और रामनाम को दीपक कहा गया है।
भाव यह है कि जब वाणी में पवित्र नाम का स्मरण रहता है,
तो वह मन के भीतर भी प्रकाश उत्पन्न करता है और आचरण को भी
सही दिशा देने में सहायक बनता है।
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सभी प्रकार के भक्तों का आधार रामनाम
चौपाई
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥
ब्रह्म सुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥
ब्रह्म सुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥
सरल अर्थ:
योगी रामनाम का जप करते हुए संसार के मोह से विरक्त होकर
उस ब्रह्मानंद का अनुभव करते हैं जो वर्णन से परे,
निर्दोष और नाम-रूप की सीमाओं से परे है।
चौपाई
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥
सरल अर्थ:
जो साधक परम सत्य की गहरी गति समझना चाहते हैं,
वे नाम-जप के द्वारा उसकी अनुभूति की ओर बढ़ते हैं।
एकाग्र होकर नाम जपने वाले साधकों के लिए आध्यात्मिक सिद्धियों
का भी वर्णन किया गया है।
चौपाई
जपहिं नाम जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥
सरल अर्थ:
दुःखी व्यक्ति रामनाम का जप करके अपने संकटों में धैर्य और आश्रय पाता है।
तुलसीदासजी चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख करते हैं और
सभी को पुण्यवान तथा उदार बताते हैं।
चौपाई
चहूँ चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥
चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥
सरल अर्थ:
चारों प्रकार के भक्तों के लिए रामनाम आधार है।
ज्ञानी भक्त भगवान को विशेष प्रिय बताया गया है।
वेदों में सभी युगों में नाम की महिमा कही गई है,
पर कलियुग में इसकी विशेष उपयोगिता बताई गई है।
दोहा 22
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन॥२२॥
नाम सुप्रेम पियूष हृद तिन्हहुँ किए मन मीन॥२२॥
सरल अर्थ:
जो सभी सांसारिक कामनाओं से रहित होकर रामभक्ति के रस में
लीन हो चुके हैं, वे भी रामनामरूपी प्रेम-अमृत में अपने मन को
मछली के समान डुबोए रखते हैं।
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निर्गुण-सगुण और रामनाम
चौपाई
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥
सरल अर्थ:
निर्गुण और सगुण—दोनों ब्रह्म के स्वरूप हैं।
दोनों अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं।
तुलसीदासजी अपने भक्तिभाव के अनुसार कहते हैं कि नाम दोनों को
जानने और अनुभव करने का सरल माध्यम बनता है।
चौपाई
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी सज्जनों से कहते हैं कि इसे मेरा अभिमान न समझें।
मैं अपने हृदय का विश्वास और प्रेम कह रहा हूँ।
जिस प्रकार अग्नि लकड़ी में अदृश्य भी रहती है और प्रकट होने पर
दिखाई भी देती है, वैसे ही निर्गुण और सगुण ब्रह्म को समझाया गया है।
चौपाई
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥
ब्यापक एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनंद रासी॥
ब्यापक एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनंद रासी॥
सरल अर्थ:
निर्गुण और सगुण दोनों का पूर्ण अनुभव कठिन है,
पर रामनाम के माध्यम से भक्त उनके निकट पहुँच सकता है।
ब्रह्म सर्वव्यापक, अविनाशी, सत्य, चेतन और आनंदस्वरूप है।
चौपाई
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
सरल अर्थ:
परमात्मा प्रत्येक हृदय में विद्यमान हैं, फिर भी जीव अज्ञान के कारण
दुःख अनुभव करता है। नाम का स्मरण और चिंतन उस भीतर स्थित
परम सत्य को अनुभव करने का माध्यम बनता है।
दोहा 23
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥२३॥
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥२३॥
सरल अर्थ:
तुलसीदासजी अपने भक्तिभाव के अनुसार रामनाम के प्रभाव को
अत्यंत व्यापक बताते हैं और अब सगुण श्रीराम की लीलाओं के
साथ नाम की महिमा की तुलना करके उसका वर्णन करते हैं।
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श्रीराम की लीला और रामनाम का प्रभाव
चौपाई
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥
सरल अर्थ:
श्रीराम ने भक्तों के कल्याण के लिए मनुष्य रूप धारण किया और
स्वयं अनेक कठिनाइयाँ सहकर साधुओं को सुख दिया।
रामनाम को प्रेम से जपने वाले भक्त भी सहज ही आनंद और मंगल
की अनुभूति करते हैं।
चौपाई
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
सरल अर्थ:
श्रीराम ने अहल्या का उद्धार किया,
जबकि तुलसीदासजी नाम के प्रभाव को असंख्य दुष्ट बुद्धियों को
सुधारने वाला बताते हैं।
श्रीराम ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिए ताड़का और उसके
राक्षसी दल का विनाश किया।
चौपाई
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
सरल अर्थ:
रामनाम भक्त के दोष, दुःख और बुरी आशाओं को वैसे मिटाता है
जैसे सूर्य रात्रि के अंधकार को।
श्रीराम ने शिवधनुष तोड़ा, जबकि रामनाम का प्रताप
संसार के भय को तोड़ने वाला बताया गया है।
चौपाई
दंडक बन प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥
सरल अर्थ:
श्रीराम ने दंडक वन को अपने चरणों से पवित्र और सुहावना बनाया,
जबकि रामनाम ने असंख्य भक्तों के मन को पवित्र किया।
श्रीराम ने राक्षसों का नाश किया और नाम को कलियुग के
पापों का नाश करने वाला बताया गया है।
दोहा 24
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥२४॥
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥२४॥
सरल अर्थ:
श्रीरघुनाथजी ने शबरी, जटायु आदि अपने भक्तों को उत्तम गति दी।
तुलसीदासजी कहते हैं कि रामनाम ने असंख्य पतित जीवों का कल्याण किया,
जिसकी महिमा वेदों और संत-परंपरा में वर्णित है।
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भवसागर से पार कराने वाला नाम
चौपाई
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
सरल अर्थ:
श्रीराम ने सुग्रीव और विभीषण को अपनी शरण दी।
रामनाम ने असंख्य दीन और शरणागत जीवों को आश्रय दिया—
नाम का यह करुणामय यश लोक और वेद में प्रसिद्ध है।
चौपाई
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
सरल अर्थ:
श्रीराम ने भालू-वानरों की सेना एकत्र की और समुद्र पर सेतु
बनाने के लिए बड़ा प्रयास किया।
तुलसीदासजी कहते हैं कि रामनाम का आश्रय लेने पर
संसाररूपी समुद्र को पार करने का मार्ग सरल हो ज
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