श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 29 — मायानगरी, विश्वमोहिनी, नारद का मोह और स्वयंवर

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 29

मायानगरी • विश्वमोहिनी • नारद का मोह • स्वयंवर

भाग 28 भगवान द्वारा अपनी माया को प्रेरित करने पर समाप्त हुआ था। अब वही माया मार्ग में अद्भुत नगर और विश्वमोहिनी का प्रसंग रचती है। नारदजी उसके रूप पर मोहित होकर भगवान से सुंदर रूप माँगते हैं और कथा स्वयंवर-सभा तक पहुँचती है।
दोहा 129
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥१२९॥
सरल अर्थ: भगवान की माया ने नारदजी के मार्ग में सौ योजन विस्तार वाला अद्भुत नगर रचा, जिसकी रचना वैकुण्ठ से भी अधिक मनोहर दिखाई देती थी।
चौपाई
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी॥
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा॥
सरल अर्थ: उस मायानगरी के स्त्री-पुरुष अत्यंत सुंदर थे। वहाँ शीलनिधि नामक राजा रहता था, जिसके पास विशाल सेना और वैभव था।
चौपाई
सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥
बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जासु रूप निहारी॥
सरल अर्थ: राजा का वैभव इन्द्र के समान था। उसकी पुत्री विश्वमोहिनी अत्यंत सुंदर थी।
चौपाई
सोइ हरि माया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥
करइ स्वयंवर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला॥
सरल अर्थ: यह सब भगवान की माया की लीला थी। विश्वमोहिनी का स्वयंवर होने वाला था और अनेक राजा वहाँ पहुँचे थे।
चौपाई
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए॥
सरल अर्थ: नारदजी नगर में पहुँचे और समाचार जानकर राजा के महल गए, जहाँ उनका आदर-सत्कार हुआ।
दोहा 130
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि॥१३०॥
सरल अर्थ: राजा ने पुत्री को दिखाकर नारदजी से उसके गुण-दोष और भविष्य के विषय में विचार बताने का अनुरोध किया।
चौपाई
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥
सरल अर्थ: राजकुमारी का रूप देखकर नारदजी का वैराग्य डगमगा गया और उसके शुभ लक्षण देखकर वे भीतर से प्रसन्न हुए।
चौपाई
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥
सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥
सरल अर्थ: नारदजी ने उसके लक्षणों से समझा कि जिसे वह वरण करेगी वह अत्यंत यशस्वी और अजेय होगा।
चौपाई
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे॥
सुत सुलच्छन कहि नृप पहिं आए। ते नारद निज पंथ सिधाए॥
सरल अर्थ: नारदजी ने वास्तविक संकेत मन में रखकर राजा से कन्या के शुभ लक्षण बताए और वहाँ से चले।
चौपाई
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला॥
सरल अर्थ: नारदजी सोचने लगे कि ऐसा क्या किया जाए जिससे राजकुमारी उन्हीं को वरण करे।
दोहा 131
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥१३१॥
सरल अर्थ: वे सोचते हैं कि ऐसा सुंदर रूप चाहिए जिसे देखकर राजकुमारी उनके गले में जयमाला डाल दे।
चौपाई
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरुअति भाई॥
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥
सरल अर्थ: नारदजी भगवान विष्णु से सुंदर रूप माँगने का निश्चय करते हैं।
चौपाई
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने॥
सरल अर्थ: प्रार्थना पर भगवान प्रकट हुए और नारदजी को विश्वास हुआ कि उनका काम बन जाएगा।
चौपाई
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥
आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही॥
सरल अर्थ: नारदजी भगवान से अपना सुंदर रूप देने की प्रार्थना करते हैं।
चौपाई
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला॥
सरल अर्थ: वे प्रभु से अपने हित का उपाय करने को कहते हैं; भगवान मन ही मन मुस्कराते हैं।
दोहा 132
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥१३२॥
सरल अर्थ: भगवान कहते हैं कि वे वही करेंगे जिसमें नारदजी का परम हित होगा।
चौपाई
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥
सरल अर्थ: भगवान वैद्य का उदाहरण देकर बताते हैं कि वास्तविक हित हमेशा माँगी हुई वस्तु देने में नहीं होता और अंतर्धान हो जाते हैं।
चौपाई
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा॥
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंवर भूमि बनाई॥
सरल अर्थ: माया के प्रभाव में नारदजी भगवान के गूढ़ वचन नहीं समझे और स्वयंवर-स्थल पहुँचे।
चौपाई
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें॥
सरल अर्थ: अनेक राजा सभा में बैठे थे और नारदजी अपने रूप को सुंदर मानकर आश्वस्त थे।
चौपाई
मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा॥
सरल अर्थ: भगवान ने भक्तहित के लिए ऐसी लीला की जिसका रहस्य सभा में कोई न समझ पाया।
दोहा 133
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥१३३॥
सरल अर्थ: शिवजी के दो गण ब्राह्मण-वेश में वहाँ उपस्थित थे और लीला का रहस्य जानते हुए सब देख रहे थे।

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