श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 35 — प्रतापभानु का धर्मराज्य, वन में आखेट और कपटी मुनि का षड्यंत्र
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 35
प्रतापभानु का धर्मराज्य • वन में आखेट • कपटी मुनि • षड्यंत्र
भाग 34 में “भूप प्रतापभानु बल पाई…” से “धरमसील सुंदर नर नारी…” तक आ चुका है। यह संशोधित लंबा भाग उसके ठीक बाद “सचिव धरमरुचि…” से शुरू होकर दोहा 168 तक जाता है। इस संस्करण में हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड और अलग सरल अर्थ रखा गया है।
चौपाई
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥
सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥
सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए॥
सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 155
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग॥१५५॥
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग॥१५५॥
सरल अर्थ: राजा ने श्रुति-पुराणों में बताए गए यज्ञों को बड़े अनुराग से बार-बार सम्पन्न किया।
चौपाई
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥
सरल अर्थ: राजा निष्काम भाव से धर्म करता था। एक दिन आखेट करते हुए उसने विंध्याचल के वन में एक अत्यंत विशाल और विकराल वराह देखा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥
सरल अर्थ: राजा निष्काम भाव से धर्म करता था। एक दिन आखेट करते हुए उसने विंध्याचल के वन में एक अत्यंत विशाल और विकराल वराह देखा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं॥
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं॥
सरल अर्थ: राजा निष्काम भाव से धर्म करता था। एक दिन आखेट करते हुए उसने विंध्याचल के वन में एक अत्यंत विशाल और विकराल वराह देखा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥
सरल अर्थ: राजा निष्काम भाव से धर्म करता था। एक दिन आखेट करते हुए उसने विंध्याचल के वन में एक अत्यंत विशाल और विकराल वराह देखा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 156
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥१५६॥
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥१५६॥
सरल अर्थ: विशाल वराह को देखकर राजा ने घोड़ा तेजी से दौड़ाया और उसका पीछा करने लगा।
चौपाई
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥
सरल अर्थ: वराह छलपूर्वक बाणों से बचता हुआ दुर्गम वन में भागा और अंततः गहरी गुफा में घुस गया। उसका पीछा करते-करते राजा रास्ता भूल गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा॥
सरल अर्थ: वराह छलपूर्वक बाणों से बचता हुआ दुर्गम वन में भागा और अंततः गहरी गुफा में घुस गया। उसका पीछा करते-करते राजा रास्ता भूल गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥
सरल अर्थ: वराह छलपूर्वक बाणों से बचता हुआ दुर्गम वन में भागा और अंततः गहरी गुफा में घुस गया। उसका पीछा करते-करते राजा रास्ता भूल गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥
सरल अर्थ: वराह छलपूर्वक बाणों से बचता हुआ दुर्गम वन में भागा और अंततः गहरी गुफा में घुस गया। उसका पीछा करते-करते राजा रास्ता भूल गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 157
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥१५७॥
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥१५७॥
सरल अर्थ: थका, भूखा और प्यासा राजा घोड़े सहित जल खोजते-खोजते अत्यंत व्याकुल हो गया।
चौपाई
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥
सरल अर्थ: वन में राजा ऐसे शत्रु-राजा के आश्रम पहुँचा जो पराजित होकर मुनि-वेश में छिपा था। कपटी ने प्रतापभानु को पहचान लिया, पर प्यासा राजा उसे महामुनि समझ बैठा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥
सरल अर्थ: वन में राजा ऐसे शत्रु-राजा के आश्रम पहुँचा जो पराजित होकर मुनि-वेश में छिपा था। कपटी ने प्रतापभानु को पहचान लिया, पर प्यासा राजा उसे महामुनि समझ बैठा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥
सरल अर्थ: वन में राजा ऐसे शत्रु-राजा के आश्रम पहुँचा जो पराजित होकर मुनि-वेश में छिपा था। कपटी ने प्रतापभानु को पहचान लिया, पर प्यासा राजा उसे महामुनि समझ बैठा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥
सरल अर्थ: वन में राजा ऐसे शत्रु-राजा के आश्रम पहुँचा जो पराजित होकर मुनि-वेश में छिपा था। कपटी ने प्रतापभानु को पहचान लिया, पर प्यासा राजा उसे महामुनि समझ बैठा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 158
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥१५८॥
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥१५८॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने प्यासे राजा को सरोवर दिखाया; राजा ने घोड़े सहित जलपान और स्नान किया।
चौपाई
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने मीठी वाणी से परिचय पूछा। राजा ने अपनी पहचान छिपाकर स्वयं को प्रतापभानु का मंत्री बताया। मुनि ने रात होने का बहाना कर उसे रोक लिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने मीठी वाणी से परिचय पूछा। राजा ने अपनी पहचान छिपाकर स्वयं को प्रतापभानु का मंत्री बताया। मुनि ने रात होने का बहाना कर उसे रोक लिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़े भाग देखउँ पद आई॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़े भाग देखउँ पद आई॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने मीठी वाणी से परिचय पूछा। राजा ने अपनी पहचान छिपाकर स्वयं को प्रतापभानु का मंत्री बताया। मुनि ने रात होने का बहाना कर उसे रोक लिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥
कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥
कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने मीठी वाणी से परिचय पूछा। राजा ने अपनी पहचान छिपाकर स्वयं को प्रतापभानु का मंत्री बताया। मुनि ने रात होने का बहाना कर उसे रोक लिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 159 (क)
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥१५९ (क)॥
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥१५९ (क)॥
सरल अर्थ: मुनि ने कहा कि रात में वन का मार्ग कठिन है, इसलिए आज यहीं रहकर प्रातः जाना उचित है।
सोरठा 159 (ख)
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥१५९ (ख)॥
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥१५९ (ख)॥
सरल अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि जैसी होनहार होती है, वैसी ही सहायता मिलती है और परिस्थिति मनुष्य को उसी ओर ले जाती है।
चौपाई
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भाति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥
नृप बहु भाति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥
सरल अर्थ: राजा ने मुनि पर विश्वास किया और उसका नाम पूछा। दूसरी ओर कपटी अपने पुराने वैर को याद कर राजा की सरलता का लाभ उठाने लगा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥
मोहि मुनिस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥
मोहि मुनिस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥
सरल अर्थ: राजा ने मुनि पर विश्वास किया और उसका नाम पूछा। दूसरी ओर कपटी अपने पुराने वैर को याद कर राजा की सरलता का लाभ उठाने लगा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥
सरल अर्थ: राजा ने मुनि पर विश्वास किया और उसका नाम पूछा। दूसरी ओर कपटी अपने पुराने वैर को याद कर राजा की सरलता का लाभ उठाने लगा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥
सरल अर्थ: राजा ने मुनि पर विश्वास किया और उसका नाम पूछा। दूसरी ओर कपटी अपने पुराने वैर को याद कर राजा की सरलता का लाभ उठाने लगा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 160
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति॥१६०॥
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति॥१६०॥
सरल अर्थ: कपटी ने बड़ी चतुराई से स्वयं को निर्धन, गृहहीन 'भिखारी' बताया।
चौपाई
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥
सरल अर्थ: राजा उसके दिखावटी वैराग्य से प्रभावित हुआ। कपटी ने राजा का विश्वास देखकर स्नेह का अभिनय और बढ़ा दिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥
सरल अर्थ: राजा उसके दिखावटी वैराग्य से प्रभावित हुआ। कपटी ने राजा का विश्वास देखकर स्नेह का अभिनय और बढ़ा दिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥
सरल अर्थ: राजा उसके दिखावटी वैराग्य से प्रभावित हुआ। कपटी ने राजा का विश्वास देखकर स्नेह का अभिनय और बढ़ा दिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥
सरल अर्थ: राजा उसके दिखावटी वैराग्य से प्रभावित हुआ। कपटी ने राजा का विश्वास देखकर स्नेह का अभिनय और बढ़ा दिया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 161 (क)
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥१६१ (क)॥
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥१६१ (क)॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने कहा कि लोक-प्रतिष्ठा तप को नष्ट करती है, इसलिए वह स्वयं को किसी पर प्रकट नहीं करता।
सोरठा 161 (ख)
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥१६१ (ख)॥
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥१६१ (ख)॥
सरल अर्थ: सुंदर बाहरी वेश देखकर बुद्धिमान भी धोखा खा सकते हैं; बाहरी रूप सच्चे स्वभाव की गारंटी नहीं है।
चौपाई
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥
सरल अर्थ: कपटमुनि वैराग्य की बातें करता गया और राजा का विश्वास बढ़ता गया। अंत में उसने अपना नाम 'एकतनु' बताया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥
सरल अर्थ: कपटमुनि वैराग्य की बातें करता गया और राजा का विश्वास बढ़ता गया। अंत में उसने अपना नाम 'एकतनु' बताया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि वैराग्य की बातें करता गया और राजा का विश्वास बढ़ता गया। अंत में उसने अपना नाम 'एकतनु' बताया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि वैराग्य की बातें करता गया और राजा का विश्वास बढ़ता गया। अंत में उसने अपना नाम 'एकतनु' बताया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 162
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥१६२॥
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥१६२॥
सरल अर्थ: उसने झूठा दावा किया कि वह आदिसृष्टि के समय उत्पन्न हुआ और फिर दूसरी देह नहीं धारण की।
चौपाई
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥
तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥
तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने तप, धर्म और सृष्टि की कथाएँ सुनाकर अपनी सिद्धि का भ्रम पैदा किया। राजा उसके प्रभाव में आ गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने तप, धर्म और सृष्टि की कथाएँ सुनाकर अपनी सिद्धि का भ्रम पैदा किया। राजा उसके प्रभाव में आ गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने तप, धर्म और सृष्टि की कथाएँ सुनाकर अपनी सिद्धि का भ्रम पैदा किया। राजा उसके प्रभाव में आ गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ॥
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने तप, धर्म और सृष्टि की कथाएँ सुनाकर अपनी सिद्धि का भ्रम पैदा किया। राजा उसके प्रभाव में आ गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
सोरठा 163
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥१६३॥
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥१६३॥
सरल अर्थ: उसने राजा की पहचान छिपाने की चतुराई की प्रशंसा करके उसका विश्वास और गहरा किया।
चौपाई
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने प्रतापभानु की वास्तविक पहचान बताकर स्वयं को सिद्ध साबित किया और मनचाहा वर माँगने को कहा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥
उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने प्रतापभानु की वास्तविक पहचान बताकर स्वयं को सिद्ध साबित किया और मनचाहा वर माँगने को कहा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने प्रतापभानु की वास्तविक पहचान बताकर स्वयं को सिद्ध साबित किया और मनचाहा वर माँगने को कहा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने प्रतापभानु की वास्तविक पहचान बताकर स्वयं को सिद्ध साबित किया और मनचाहा वर माँगने को कहा। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 164
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥१६४॥
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥१६४॥
सरल अर्थ: राजा ने वृद्धावस्था और मृत्यु से रहित शरीर, युद्ध में अजेयता तथा दीर्घकालीन निष्कंटक राज्य माँगा।
चौपाई
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने ब्राह्मणों के शाप का भय दिखाकर राजा को ऐसी दिशा में मोड़ा जहाँ से उसके विनाश का षड्यंत्र पूरा हो सके। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने ब्राह्मणों के शाप का भय दिखाकर राजा को ऐसी दिशा में मोड़ा जहाँ से उसके विनाश का षड्यंत्र पूरा हो सके। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने ब्राह्मणों के शाप का भय दिखाकर राजा को ऐसी दिशा में मोड़ा जहाँ से उसके विनाश का षड्यंत्र पूरा हो सके। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने ब्राह्मणों के शाप का भय दिखाकर राजा को ऐसी दिशा में मोड़ा जहाँ से उसके विनाश का षड्यंत्र पूरा हो सके। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 165
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥१६५॥
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥१६५॥
सरल अर्थ: उसने वर का आश्वासन देकर इस भेंट और रास्ता भूलने की घटना को गुप्त रखने को कहा।
चौपाई
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥
सरल अर्थ: राजा के मन में ब्राह्मण-शाप का भय गहरा गया और वह कपटमुनि की सलाह पर निर्भर होता गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥
सरल अर्थ: राजा के मन में ब्राह्मण-शाप का भय गहरा गया और वह कपटमुनि की सलाह पर निर्भर होता गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥
सरल अर्थ: राजा के मन में ब्राह्मण-शाप का भय गहरा गया और वह कपटमुनि की सलाह पर निर्भर होता गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥
सरल अर्थ: राजा के मन में ब्राह्मण-शाप का भय गहरा गया और वह कपटमुनि की सलाह पर निर्भर होता गया। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 166
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ॥१६६॥
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ॥१६६॥
सरल अर्थ: राजा ने ब्राह्मणों को वश में करने का उपाय पूछा और कपटमुनि को अपना सबसे बड़ा हितैषी मान लिया।
चौपाई
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने एक कथित सरल उपाय की बात कही, पर नगर जाने में अपनी झूठी कठिनाई बताकर राजा से और विनती करवायी। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने एक कथित सरल उपाय की बात कही, पर नगर जाने में अपनी झूठी कठिनाई बताकर राजा से और विनती करवायी। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने एक कथित सरल उपाय की बात कही, पर नगर जाने में अपनी झूठी कठिनाई बताकर राजा से और विनती करवायी। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने एक कथित सरल उपाय की बात कही, पर नगर जाने में अपनी झूठी कठिनाई बताकर राजा से और विनती करवायी। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 167
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥१६७॥
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥१६७॥
सरल अर्थ: राजा ने चरण पकड़कर मुनि से अपने लिए यह कष्ट उठाने की प्रार्थना की।
चौपाई
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने गुप्त रसोई और विशाल ब्राह्मण-भोज की योजना बताई तथा झूठा विश्वास दिलाया कि भोजन करने वाले राजा के वश में हो जाएँगे। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने गुप्त रसोई और विशाल ब्राह्मण-भोज की योजना बताई तथा झूठा विश्वास दिलाया कि भोजन करने वाले राजा के वश में हो जाएँगे। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने गुप्त रसोई और विशाल ब्राह्मण-भोज की योजना बताई तथा झूठा विश्वास दिलाया कि भोजन करने वाले राजा के वश में हो जाएँगे। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
चौपाई
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥
सरल अर्थ: कपटमुनि ने गुप्त रसोई और विशाल ब्राह्मण-भोज की योजना बताई तथा झूठा विश्वास दिलाया कि भोजन करने वाले राजा के वश में हो जाएँगे। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है।
दोहा 168
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करिब जेवनार॥१६८॥
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करिब जेवनार॥१६८॥
सरल अर्थ: उसने प्रतिदिन नए ब्राह्मण परिवारों को बुलाने और एक वर्ष तक भोजन बनवाने की योजना रखी। यहीं इस भाग का समापन है।
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