श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 22 — शिव-पार्वती विवाह, कन्यादान, विदाई और कैलास गमन

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 22

शिव-पार्वती विवाह • कन्यादान • पाणिग्रहण • विदाई • कैलास गमन

भाग 21 दोहा 99 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—वेद-विधान से शिव-पार्वती विवाह, कन्यादान और पाणिग्रहण, मैना की भावपूर्ण विदाई, कैलास गमन तथा कार्तिकेय जन्म के संक्षिप्त प्रसंग तक।
चौपाई
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥
सरल अर्थ: विवाह का समय आने पर सभी देवताओं को आदरपूर्वक बुलाया गया। वेद-विधान से वेदी सजाई गई और स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं।
चौपाई
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥
सरल अर्थ: दिव्य सिंहासन पर बैठने से पहले शिवजी ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं और अपने हृदय में श्रीराम का स्मरण करते हैं।
चौपाई
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं॥
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥
सरल अर्थ: मुनियों ने पार्वतीजी को बुलाया। सखियाँ उनका श्रृंगार करके मंडप में लाईं; उनके दिव्य रूप को देखकर देवता भी मोहित हो गए।
चौपाई
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥
सरल अर्थ: देवताओं ने उन्हें जगदंबा और शिवजी की अर्धांगिनी जानकर मन ही मन प्रणाम किया। उनकी शोभा वर्णन से परे है।
छंद
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।
सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसीकहा॥
छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि जगज्जननी की शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी नहीं हो सकता। भवानी संकोच सहित विवाह-मंडप में शिवजी के समीप आती हैं।
दोहा 100
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥१००॥
सरल अर्थ: मुनियों की आज्ञा से शिव-पार्वती ने गणपति का पूजन किया। तुलसीदासजी देवताओं को अनादि मानकर इस प्रसंग में शंका न करने का संकेत देते हैं।
चौपाई
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥
सरल अर्थ: वेदों में कही गई विवाह-विधि के अनुसार सभी संस्कार हुए। हिमवान ने कुश और कन्या का हाथ लेकर पार्वतीजी को शिवजी को समर्पित किया।
चौपाई
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥
बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥
सरल अर्थ: शिवजी द्वारा पार्वतीजी का पाणिग्रहण करते ही सभी देवता हर्षित हो उठे। मुनियों ने वेदमंत्र पढ़े और देवताओं ने जयघोष किया।
चौपाई
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥
सरल अर्थ: अनेक वाद्य बजने लगे और आकाश से पुष्पवर्षा हुई। शिव-पार्वती विवाह से समस्त लोक आनंद से भर गए।
चौपाई
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥
अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥
सरल अर्थ: हिमवान ने विवाह के अवसर पर दास-दासी, वाहन, गायें, वस्त्र, रत्न, अन्न और अनेक सामग्री सम्मानपूर्वक प्रदान की।
छंद
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥
सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
सरल अर्थ: हिमवान विनम्र होकर कहते हैं कि पूर्णकाम शिवजी को वे भला क्या दे सकते हैं। शिवजी उन्हें संतोष देते हैं और प्रेम से भरी मैना उनके चरण पकड़ती हैं।
दोहा 101
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।
छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥१०१॥
सरल अर्थ: मैना शिवजी से विनती करती हैं कि उमा उन्हें प्राणों के समान प्रिय हैं; वे पार्वतीजी पर सदा कृपा रखें और उनके अपराध क्षमा करें।
चौपाई
बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥
सरल अर्थ: शिवजी मैना को अनेक प्रकार से समझाकर सांत्वना देते हैं। बाद में माता पार्वतीजी को गोद में बैठाकर विदाई की सीख देती हैं।
चौपाई
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥
सरल अर्थ: मैना पार्वतीजी को दांपत्य-जीवन की पारंपरिक सीख देती हैं। पुत्री की विदाई का विचार आते ही उनकी आँखों में आँसू भर जाते हैं।
चौपाई
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥
सरल अर्थ: माता पुत्री-वियोग में भावुक होकर स्त्री-जीवन की पराधीनता पर दुःख व्यक्त करती हैं, फिर विदाई का समय समझकर स्वयं को संभालती हैं।
चौपाई
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥
सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥
सरल अर्थ: मैना और पार्वतीजी का विदाई-प्रेम अत्यंत मार्मिक है। भवानी सभी स्त्रियों से मिलकर फिर माता के हृदय से लिपट जाती हैं।
छंद
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥
जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
सरल अर्थ: सबका आशीर्वाद लेकर पार्वतीजी शिवजी के पास जाती हैं। शिवजी याचकों को संतुष्ट कर उमा सहित कैलास की ओर प्रस्थान करते हैं और देवता पुष्पवर्षा करते हैं।
दोहा 102
चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।
बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥१०२॥
सरल अर्थ: हिमवान प्रेमवश कुछ दूर तक साथ जाते हैं। शिवजी उन्हें अनेक प्रकार से संतोष देकर सम्मानपूर्वक विदा करते हैं।
चौपाई
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥
आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥
सरल अर्थ: हिमवान घर लौटकर विवाह में आए पर्वतों और अन्य अतिथियों को आदर, दान और सम्मान सहित विदा करते हैं।
चौपाई
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥
सरल अर्थ: शिव-पार्वती कैलास पहुँचते हैं और देवता अपने-अपने लोक लौट जाते हैं। तुलसीदासजी उन्हें जगत के माता-पिता कहकर आदरपूर्वक वर्णन सीमित रखते हैं।
चौपाई
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥
सरल अर्थ: शिव-पार्वती अपने गणों सहित कैलास पर निवास करते हैं और समय आनंदपूर्वक बीतता है।
चौपाई
जब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥
सरल अर्थ: आगे षडानन कार्तिकेय का जन्म होता है, जो युद्ध में तारकासुर का वध करते हैं। यह कथा शास्त्रों और पुराणों में प्रसिद्ध बताई गई है।
छंद
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी कार्तिकेय के प्रसिद्ध चरित्र को संक्षेप में कहते हैं और शिव-पार्वती विवाह कथा के मंगलमय फल का वर्णन करते हैं।
दोहा 103
चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।
बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥१०३॥
सरल अर्थ: शिवजी का चरित्र समुद्र के समान अथाह है; जब वेद भी उसका पार नहीं पा सकते, तब तुलसीदासजी विनयपूर्वक अपनी सीमित सामर्थ्य बताते हैं।

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