श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड भाग 1 | श्रीराम राज्याभिषेक और कैकेयी के दो वरदान | दोहा 1–30 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ · भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस
अयोध्याकाण्ड — भाग १

श्रीराम का राज्याभिषेक, मंथरा की चाल और कैकेयी के दो वरदान

मंगलाचरण • दोहा १–३० • मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ

अयोध्याकाण्ड का परिचय

गोस्वामी तुलसीदासजी की श्रीरामचरितमानस के दूसरे सोपान में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी, कैकेयी द्वारा माँगे गए वरदान, चौदह वर्ष का वनवास और आगे चलकर भरतजी की अनन्य भक्ति जैसे पावन प्रसंग आते हैं। इस पहले विस्तृत भाग में दोहा १ से ३० तक का क्रम रखा गया है। हर मूल चौपाई के नीचे सरल भावार्थ दिया गया है।

मंगलाचरण एवं प्रारम्भिक चौपाइयाँ

सर्वप्रथम शिव-वंदना, श्रीराम-वंदना और गुरु-स्मरण द्वारा इस पावन कथा का आरम्भ होता है।

वंदना श्लोक १
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके। भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्॥ सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा। शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥१॥
सरल हिंदी अर्थ: जिनकी गोद में पार्वतीजी, मस्तक पर गंगा, ललाट पर चंद्रमा, कंठ में विष और वक्ष पर नागराज शोभित हैं, वे भगवान शिव हमारी रक्षा करें।
वंदना श्लोक २
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः। मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा॥२॥
सरल हिंदी अर्थ: राज्याभिषेक की सूचना से जिनका मुख न अधिक प्रसन्न हुआ, न वनवास से म्लान—श्रीराम के उस समभाव से पूर्ण सुंदर मुख का मंगल सदा बना रहे।
वंदना श्लोक ३
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्॥३॥
सरल हिंदी अर्थ: नील कमल के समान श्याम, सीताजी को वाम भाग में धारण करने वाले और हाथ में धनुष-बाण रखने वाले रघुवंशनाथ श्रीराम को प्रणाम।
दोहा मंगलाचरण
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरुचरणों की रज से मन रूपी दर्पण को निर्मल करके श्रीरघुवीर के पवित्र यश का स्मरण किया गया है।
प्रारम्भिक चौपाई 1
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥ भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीराम के विवाह के बाद अयोध्या में प्रतिदिन नए उत्सव और मंगल होने लगे।
प्रारम्भिक चौपाई 2
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥ मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥
सरल हिंदी अर्थ: समृद्धि और शुभता मानो नदियों की तरह अयोध्या में उमड़ पड़ी; नगर के नागरिक सुंदर और उत्तम स्वभाव वाले थे।
प्रारम्भिक चौपाई 3
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥ सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥
सरल हिंदी अर्थ: नगर की समृद्धि अवर्णनीय थी, सब लोग श्रीराम के चंद्रमा जैसे मुख को देखकर सुखी थे।
प्रारम्भिक चौपाई 4
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥ राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: माताएँ, सखियाँ और राजा दशरथ श्रीराम के गुण, सौंदर्य और शील से अत्यंत आनंदित थे।
दोहा १ से ३० — संपूर्ण क्रम
प्रसंग 01 · राज्याभिषेक का शुभ संकल्प
चौपाई 1
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥ सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥
सरल हिंदी अर्थ: दशरथजी सभा में बैठे रामजी का यश सुनकर बहुत प्रसन्न हुए।
चौपाई 2
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥ तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा दशरथ का सौभाग्य अतुलनीय था; अन्य राजा भी उनका आदर करते थे।
चौपाई 3
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सबु तासू॥ रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा को राम के पिता होने का गर्व था; वे दर्पण में अपने मुख और मुकुट को देखने लगे।
चौपाई 4
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥ नृप जुबराजु राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥
सरल हिंदी अर्थ: कानों के पास सफेद बाल देखकर उन्हें लगा कि अब राम को युवराज बनाना चाहिए।
दोहा 1
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी चाहते थे कि राजा दशरथ स्वयं जीवित रहते श्रीराम का युवराज-अभिषेक करें।
प्रसंग 02 · गुरु वशिष्ठ से परामर्श
चौपाई 1
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥ सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥
सरल हिंदी अर्थ: दशरथजी ने गुरु वशिष्ठ से कहा कि श्रीराम सभी दृष्टियों से योग्य हैं।
चौपाई 2
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥ बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं॥
सरल हिंदी अर्थ: राम पिता, परिवार और प्रजा सबको समान रूप से प्रिय हैं।
चौपाई 3
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥ मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा गुरु चरणों के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा प्रकट करते हैं।
चौपाई 4
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥ मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥
सरल हिंदी अर्थ: वे गुरु से अपनी एक इच्छा पूरी करने की कृपा माँगते हैं।
दोहा 2
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥
सरल हिंदी अर्थ: उचित अवसर देखकर राजा दशरथ प्रेमपूर्वक गुरु वशिष्ठ के पास अपनी इच्छा प्रकट करने गए।
प्रसंग 03 · गुरु की शुभ सहमति
चौपाई 1
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥ नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने गुरु से श्रीराम का युवराज-अभिषेक कराने की अनुमति माँगी।
चौपाई 2
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥ प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥
सरल हिंदी अर्थ: उनकी एक ही चाह थी कि यह मंगलोत्सव उनके सामने हो।
चौपाई 3
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥ सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्हें किसी बात का पछतावा नहीं रहेगा।
चौपाई 4
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥ भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु ने राम के ईश्वरीय स्वरूप और उनकी प्रेममय महिमा का वर्णन किया।
दोहा 3
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु ने राजा को शुभाशीष दी और उनकी इच्छा सफल होने की बात कही।
प्रसंग 04 · मंत्रियों से विचार-विमर्श
चौपाई 1
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥ कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥
सरल हिंदी अर्थ: प्रसन्न राजा ने सुमंत्र और मंत्रियों को बुलाकर अपना विचार बताया।
चौपाई 2
जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने मंत्रिमंडल की सहमति से राम को राजतिलक देने का प्रस्ताव रखा।
चौपाई 3
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी॥ बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: मंत्रियों ने हर्षित होकर राजा को आशीर्वाद दिया।
चौपाई 4
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥ नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी ने बिना देर किए मंगलकार्य आरंभ करने का आग्रह किया।
दोहा 4
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु ने कहा कि राम को युवराज बनाने में तनिक भी विलंब न किया जाए।
प्रसंग 05 · शुभ अभिषेक सामग्री
चौपाई 1
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥ औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥
सरल हिंदी अर्थ: वशिष्ठजी ने अभिषेक के लिए तीर्थजल और शुभ पूजन सामग्री मँगाने को कहा।
चौपाई 2
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥ मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥
सरल हिंदी अर्थ: अभिषेक के लिए वस्त्र, चँवर और बहुमूल्य मंगल वस्तुओं का प्रबंध होने लगा।
चौपाई 3
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥ सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥
सरल हिंदी अर्थ: वैदिक विधि से मंडप सजाने और गलियों में मंगलवृक्ष लगाने का निर्देश दिया गया।
चौपाई 4
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥ पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥
सरल हिंदी अर्थ: चौक, बाजार, गणपति, गुरु, कुलदेवता और ब्राह्मणों के सम्मान की व्यवस्था हुई।
दोहा 5
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने कहा कि गुरु की हर आज्ञा को श्रीराम के राज्याभिषेक हेतु तुरंत पूरा किया जाए।
प्रसंग 06 · अयोध्या में उल्लास
चौपाई 1
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥ बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु के निर्देश पाकर सभी लोग अपनी सेवाओं में लग गए।
चौपाई 2
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥ राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥
सरल हिंदी अर्थ: अयोध्या में बधावे बजने लगे और श्रीराम-सीता को शुभ शकुन अनुभव हुए।
चौपाई 3
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥ भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥
सरल हिंदी अर्थ: दोनों ने शुभ संकेतों को भरत के शीघ्र आगमन का संकेत समझा।
चौपाई 4
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥ रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदय जेहि भाँती॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीराम का हृदय भरत के प्रति निरंतर स्नेह से भरा था।
दोहा 6
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु के वचनों के अनुसार ध्वज, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सजने लगे।
प्रसंग 07 · माताओं की मंगल तैयारी
चौपाई 1
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥ प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥
सरल हिंदी अर्थ: समाचार सुनाने वाली स्त्रियों को वस्त्र और आभूषण भेंट हुए, शुभ कलश सजने लगे।
चौपाई 2
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी॥ आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥
सरल हिंदी अर्थ: सुमित्राजी ने चौक सजाए और कौसल्याजी ने दान दिया।
चौपाई 3
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥
सरल हिंदी अर्थ: राजमहल में देवताओं की पूजा करके श्रीराम के कल्याण की प्रार्थना की गई।
चौपाई 4
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥
सरल हिंदी अर्थ: नगर की स्त्रियाँ मंगलगीत गा रही थीं।
दोहा 7
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु॥
सरल हिंदी अर्थ: राजमहल का अंतःपुर रामाभिषेक की सूचना से अत्यंत आनंदित हो उठा।
प्रसंग 08 · वशिष्ठजी श्रीराम के घर
चौपाई 1
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥ गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥
सरल हिंदी अर्थ: वशिष्ठजी श्रीराम को उपदेश देने पहुँचे, राम ने द्वार पर उनका स्वागत किया।
चौपाई 2
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीराम और सीताजी ने गुरु का चरण-वंदन और पूजन किया।
चौपाई 3
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती॥
सरल हिंदी अर्थ: राम ने कहा कि स्वामी का सेवक के घर आना कल्याणकारी है।
चौपाई 4
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं। सेवकु लइह स्वामि सेवकाईं॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने आदरपूर्वक गुरु की सेवा और आज्ञापालन की इच्छा कही।
दोहा 8
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी नर-नारी हर्ष के साथ राज्याभिषेक की तैयारी करने लगे।
प्रसंग 09 · श्रीराम का भ्रातृप्रेम
चौपाई 1
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥ भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु ने राम के गुणों की प्रशंसा की और राजतिलक की योजना सुनाई।
चौपाई 2
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥ गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने नियमानुसार संयम रखने का निर्देश दिया और लौट गए।
चौपाई 3
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥
सरल हिंदी अर्थ: राम ने सोचा कि चारों भाइयों के संस्कार और सुख साथ-साथ हुए हैं।
चौपाई 4
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥
सरल हिंदी अर्थ: केवल बड़े भाई का अभिषेक होना उन्हें भाई-प्रेम की दृष्टि से उचित नहीं लगा।
दोहा 9
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस॥
सरल हिंदी अर्थ: गुरु ने श्रीराम की विनम्रता से प्रसन्न होकर उनकी सराहना की।
प्रसंग 10 · देवताओं की चिंता
चौपाई 1
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥ भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥
सरल हिंदी अर्थ: अयोध्या में उत्सव था और लोग भरत के शीघ्र आने की कामना कर रहे थे।
चौपाई 2
हाट बाट घर गलीं अथाईं। कहहिं परसपर लोग लोगाईं॥ कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥
सरल हिंदी अर्थ: नगर के लोग अगले दिन के अभिषेक के विषय में उत्सुकता से बातें कर रहे थे।
चौपाई 3
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥ सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥
सरल हिंदी अर्थ: लोग राम-सीता को राजसिंहासन पर देखने के लिए आतुर थे; देवताओं को दूसरी चिंता थी।
चौपाई 4
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥ सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥
सरल हिंदी अर्थ: देवता सरस्वतीजी से अपनी समस्या का उपाय करने का अनुरोध करने लगे।
दोहा 10
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद॥
सरल हिंदी अर्थ: उसी समय लक्ष्मणजी आए और श्रीराम ने उन्हें स्नेह से सम्मान दिया।
प्रसंग 11 · देवताओं की प्रार्थना
चौपाई 1
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: देवताओं की प्रार्थना सुनकर सरस्वतीजी को उसका कठोर फल सोचकर खेद हुआ।
चौपाई 2
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥ जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी॥
सरल हिंदी अर्थ: देवताओं ने निवेदन किया कि श्रीराम की लीला लोककल्याण के लिए वन जाने से जुड़ी है।
चौपाई 3
बार बार गहि चरन सँकोची। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥
सरल हिंदी अर्थ: सरस्वतीजी चिंतित हुईं कि देवता दूसरे का सुख देखकर विचलित क्यों हो रहे हैं।
चौपाई 4
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥ हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥
सरल हिंदी अर्थ: भविष्य की गति को ध्यान में रखकर वे अयोध्या पहुँचीं।
दोहा 11
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥
सरल हिंदी अर्थ: देवताओं ने अपने कार्य के लिए श्रीराम का राज्य छोड़कर वन जाने का मार्ग चाहा।
प्रसंग 12 · मंथरा का प्रवेश
चौपाई 1
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥ पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने सजती अयोध्या देखकर पूछा; राम के राजतिलक का समाचार सुनकर उसके मन में ईर्ष्या उत्पन्न हुई।
चौपाई 2
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥ देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने उत्सव रोकने के लिए छल-कपट की योजना सोची।
चौपाई 3
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥ ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥
सरल हिंदी अर्थ: वह कैकेयी के पास बनावटी दुख और आँसुओं के साथ पहुँची।
चौपाई 4
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥ तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी की पूछताछ पर भी मंथरा रोषपूर्ण मौन और भारी साँसें भरती रही।
दोहा 12
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि॥
सरल हिंदी अर्थ: सरस्वती ने मंथरा की बुद्धि फेर दी; वह कैकेयी को बहकाने का माध्यम बन गई।
प्रसंग 13 · अफवाहों से भ्रम फैलाना
चौपाई 1
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥ रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने राम के युवराज बनने को संकट बताकर बात शुरू की।
चौपाई 2
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥ देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने कैकेयी के मन में कौशल्या के प्रति निराधार संदेह जगाया।
चौपाई 3
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥ नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने भरत की अनुपस्थिति और राजा के व्यवहार को षड्यंत्र की तरह प्रस्तुत किया।
चौपाई 4
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥ पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने मंथरा को घर तोड़ने वाली बातें करने से रोका।
दोहा 13
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने परिवार की कुशलता पूछी, किंतु मंथरा और क्रोध से भर गई।
प्रसंग 14 · कैकेयी का रामप्रेम
चौपाई 1
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥ सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने मंथरा को समझाया कि श्रीराम का अभिषेक शुभ समाचार है।
चौपाई 2
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥ राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने बताया कि रघुवंश में ज्येष्ठ पुत्र को अधिकार देना स्वाभाविक परंपरा है।
चौपाई 3
कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥ मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी को विश्वास था कि राम सभी माताओं को समान प्रेम देते हैं।
चौपाई 4
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥ प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने श्रीराम के प्रति अपना मातृस्नेह प्रकट किया।
दोहा 14
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी को आरंभ में मंथरा के आरोप अनुचित लगे।
प्रसंग 15 · मंथरा का विश्वास अर्जन
चौपाई 1
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥ फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने अपना दुःख दिखाकर कैकेयी को बात सुनने के लिए मजबूर किया।
चौपाई 2
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥ हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने बताया कि वह अब किसी की चापलूसी नहीं करेगी।
चौपाई 3
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥ कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥
सरल हिंदी अर्थ: अपने दासी होने का हवाला देकर उसने राजा के बदलने से अपना नुकसान न होने की बात कही।
चौपाई 4
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥ तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने स्वयं को कैकेयी का सच्चा हितैषी बताकर विश्वास जीतना चाहा।
दोहा 15
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने भरत की शपथ देकर मंथरा से सत्य कारण पूछा।
प्रसंग 16 · मंथरा की कुटिल चाल
चौपाई 1
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥ तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने कैकेयी को भय और भ्रम की स्थिति में पहुँचा दिया।
चौपाई 2
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ॥ सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने मनगढ़ंत संकटों की बातें सुनाकर भरोसा पैदा किया।
चौपाई 3
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥ रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते॥
सरल हिंदी अर्थ: वह बोली कि समय बदल जाने पर प्रेमी भी विरोधी बन सकते हैं।
चौपाई 4
भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा॥ जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने कौशल्या को लेकर राजा और परिवार के प्रति संदेह उकसाया।
दोहा 16
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि॥
सरल हिंदी अर्थ: मीठे शब्दों में छिपे छल से कैकेयी मंथरा को शुभचिंतक मान बैठीं।
प्रसंग 17 · निराधार आरोप
चौपाई 1
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी॥ पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने भरत के ननिहाल जाने को कौशल्या की चाल बताया।
चौपाई 2
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें॥ सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने कैकेयी के सम्मान को चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया।
चौपाई 3
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥ रची प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥
सरल हिंदी अर्थ: वह राजतिलक का निर्णय कौशल्या की योजना बताने लगी।
चौपाई 4
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥ आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही॥
सरल हिंदी अर्थ: राजतिलक की प्रथा को उचित कहते हुए भी उसने काल्पनिक भविष्य का भय दिखाया।
दोहा 17
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने दावा किया कि राजा के मीठे वचनों के पीछे छिपे इरादे हैं।
प्रसंग 18 · कैकेयी के मन में संशय
चौपाई 1
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई॥ का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी के मन में अब असत्य संदेह बैठ चुका था।
चौपाई 2
भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥ खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने अभिषेक की तैयारियों को छिपाई गई योजना बताया।
चौपाई 3
जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई॥ रामहि तिलक कालि जौं भयउ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने स्वयं को सत्यवादी बताकर भय और गहरा किया।
चौपाई 4
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी॥ जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने कैकेयी को कल्पना में भविष्य की दासी होने तक की आशंका दिखाई।
दोहा 18
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने तरह-तरह की कपटी बातों से कैकेयी के मन में द्वेष बढ़ा दिया।
प्रसंग 19 · कैकेयी का भय
चौपाई 1
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥ तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा की कठोर भविष्यवाणियाँ सुनकर कैकेयी काँपने लगीं।
चौपाई 2
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥ फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने फिर छलपूर्ण ढंग से उन्हें सांत्वना दी।
चौपाई 3
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥ दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने डरते हुए अशुभ सपनों और शकुनों की बात कही।
चौपाई 4
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: रानी ने अपनी सरलता और असमंजस स्वीकार किया।
दोहा 19
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने कौशल्या और कैकेयी के बीच काल्पनिक बैर का चित्र खींचा।
प्रसंग 20 · कुविचार के दुष्परिणाम
चौपाई 1
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई॥ अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी क्रोध में किसी अन्य के अधीन रहने की बात असह्य मानती हैं।
चौपाई 2
दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी॥ अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने उन्हें और प्रोत्साहित कर अपना षड्यंत्र बढ़ाया।
चौपाई 3
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका॥ जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने कहा कि वह रानी के हित में लगातार चिंतित है।
चौपाई 4
पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥ भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने भरत के राज्य पाने की बात कहकर अपना उपाय सुनाने का प्रस्ताव रखा।
दोहा 20
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी अपने सामने आए कथित संकट को अनुचित भाग्य का फल मानकर दुखी हुईं।
प्रसंग 21 · दो वरदान की चाल
चौपाई 1
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई॥ लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा की बातों से कैकेयी का विश्वास इतना बढ़ गया कि वे आसन्न संकट न पहचान सकीं।
चौपाई 2
सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी॥ कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने मधुर शब्दों में कठोर और कपटपूर्ण सलाह दी।
चौपाई 3
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती॥ सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने दो पुराने वरदानों में भरत का राज्य और राम का वनवास माँगने को कहा।
चौपाई 4
भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई॥ होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने राजा से पहले राम की शपथ दिलवाकर वरदान माँगने की चाल सिखाई।
दोहा 21
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने मंथरा से कहा कि उसकी सलाह मानने के लिए वे अत्यंत कठिन कदम उठाने को भी तैयार हैं।
प्रसंग 22 · कोपभवन की तैयारी
चौपाई 1
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥ तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने मंथरा को अपना प्रियतम हितैषी मान लिया।
चौपाई 2
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली॥ बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने उसको आदर देकर स्वयं कोपभवन का रास्ता लिया।
चौपाई 3
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी॥ पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥
सरल हिंदी अर्थ: कवि ने मंथरा को विपत्ति का बीज और कैकेयी की कुमति को उसकी भूमि बताया है।
चौपाई 4
कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई॥ राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥
सरल हिंदी अर्थ: राजधानी उत्सवमग्न थी, जबकि यह गुप्त षड्यंत्र किसी को नहीं मालूम था।
दोहा 22
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु। काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु॥
सरल हिंदी अर्थ: मंथरा ने कैकेयी को कोपभवन जाकर हठपूर्वक अपनी माँग रखने की सलाह दी।
प्रसंग 23 · उत्सव और षड्यंत्र का विरोध
चौपाई 1
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥ प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥
सरल हिंदी अर्थ: बालमित्र बधाई देने राम के पास आते और राम उन्हें प्रेम से सम्मानित करते।
चौपाई 2
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥ को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा॥
सरल हिंदी अर्थ: सब रामजी के शील और स्नेह की सराहना करते थे।
चौपाई 3
जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥ सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू॥
सरल हिंदी अर्थ: नागरिक चाहते थे कि उनका जन्म-जन्मांतर में राम से सेवक-स्वामी का नाता बना रहे।
चौपाई 4
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदयँ अति दाहू॥ को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥
सरल हिंदी अर्थ: सब आनंद में थे, पर कैकेयी का मन कुसंग से व्याकुल हो गया था।
दोहा 23
प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥
सरल हिंदी अर्थ: राजमहल में आने-जाने वालों की भीड़ थी, अयोध्या राज्याभिषेक के उत्सव की तैयारी में थी।
प्रसंग 24 · दशरथ का कोपभवन आगमन
चौपाई 1
कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥ सुरपति बसइ बाहँबल जाकें। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥
सरल हिंदी अर्थ: कोपभवन का समाचार पाकर महान सम्राट भी सहम गए।
चौपाई 2
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥ सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥
सरल हिंदी अर्थ: रानी की नाराजगी से राजा दशरथ का साहस डगमगा गया।
चौपाई 3
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥ भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने कैकेयी को अलंकार त्यागकर भूमि पर पड़ा देखा और दुखी हुए।
चौपाई 4
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी॥ जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने प्रेमपूर्वक रानी के रोष का कारण पूछा।
दोहा 24
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥
सरल हिंदी अर्थ: प्रसन्न मन से राजा कैकेयी के भवन पहुँचे, पर वहाँ उनका सामना कठोर परिस्थिति से हुआ।
प्रसंग 25 · दशरथ का आश्वासन
चौपाई 1
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥ कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने कहा कि जिसने कैकेयी को दुख दिया है उसे वे उचित दंड देंगे।
चौपाई 2
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने पत्नी के प्रति अपने गहरे मोह और प्रेम की बात कही।
चौपाई 3
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥ जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने राम की शपथ देकर सत्यनिष्ठा का आश्वासन दिया।
चौपाई 4
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने रानी से इच्छित वरदान माँगने और क्रोध छोड़ने को कहा।
छंद विशेष
केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा दशरथ कैकेयी का हाथ छूकर उसे समझाना चाहते हैं, लेकिन रानी क्रोध में हाथ झटक देती हैं। कवि इस प्रसंग में आने वाली विपत्ति का संकेत देते हैं।
सोरठा 25
बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥
सरल हिंदी अर्थ: यह सोरठा है: राजा दशरथ बार-बार कैकेयी से उसके क्रोध का कारण पूछते हैं।
प्रसंग 26 · छिपी हुई माँग
चौपाई 1
पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने बताया कि नगर में राम के अभिषेक की तैयारी है।
चौपाई 2
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥ दलकि उठेउ सुनि हृदय कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥
सरल हिंदी अर्थ: राम के युवराज बनने का समाचार कैकेयी को अप्रिय लगा।
चौपाई 3
ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने अपने आंतरिक रोष को राजा से छिपाए रखा।
चौपाई 4
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥ कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: कपटपूर्ण प्रेम दिखाकर कैकेयी ने दो वरदान की बात छेड़ी।
दोहा 26
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥
सरल हिंदी अर्थ: राम की शपथ सुनकर कैकेयी को लगा कि अब उसकी माँग पूरी हो सकती है।
प्रसंग 27 · रघुकुल की वचनपालन परंपरा
चौपाई 1
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥ थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥
सरल हिंदी अर्थ: दशरथ ने पुराने वरदानों को स्मरण कर सहज भाव से उन्हें देने का वचन दिया।
चौपाई 2
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
सरल हिंदी अर्थ: उन्होंने रघुवंश की सत्यप्रतिज्ञा का आदर्श बताया।
चौपाई 3
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने असत्य को सबसे बड़ा दोष मानते हुए वचनपालन की महिमा कही।
चौपाई 4
तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥ बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥
सरल हिंदी अर्थ: राम की शपथ लेकर वचन पक्का करने पर कैकेयी ने अपनी माँग बताने की तैयारी की।
दोहा 27
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने राजा से पहले कहे गए दो वरदानों को पूरा करने का आग्रह किया।
प्रसंग 28 · दो वरदान: राज्य और वनवास
चौपाई 1
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने पहले भरत के राज्याभिषेक का वर माँगा।
चौपाई 2
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥
सरल हिंदी अर्थ: दूसरे वर में श्रीराम के चौदह वर्ष के वनवास की माँग रखी, जिसे सुनकर राजा विचलित हो उठे।
चौपाई 3
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥
सरल हिंदी अर्थ: दशरथजी इस समाचार से स्तब्ध हो गए।
चौपाई 4
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा का मन मानो जीवनभर की आशा टूट जाने से शोक में डूब गया।
चौपाई 5
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं॥
सरल हिंदी अर्थ: इस घटना से अयोध्या पर संकट के बादल छाने लगे।
दोहा 28
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी के कठोर वरदान राजा के सुखद स्वप्न को समाप्त करने लगे।
प्रसंग 29 · दशरथ की विवशता
चौपाई 1
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥ भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥
सरल हिंदी अर्थ: दशरथजी मन में दुखी थे, कैकेयी ने उन पर उत्तर देने का दबाव डाला।
चौपाई 2
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे॥ देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥
सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी ने पूछा कि राजा सत्यप्रतिज्ञा निभाएँगे या नहीं।
चौपाई 3
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥
सरल हिंदी अर्थ: उसने उपहास किया कि वर देने का वादा अब क्यों बदला जा रहा है।
चौपाई 4
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥
सरल हिंदी अर्थ: वचनपालन के महापुरुषों के उदाहरण देकर उसने राजा को और असहाय किया।
दोहा 29
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा ने अनुभव किया कि सबसे अधिक विश्वास किए गए क्षण में कठोर संकट आ गया है।
प्रसंग 30 · दशरथजी की व्यथा
दोहा 30
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥
सरल हिंदी अर्थ: राजा दशरथ ने गहरे दुख के बीच आँखें खोलीं और लंबी साँस लेकर अनुभव किया कि यह अत्यंत असमय का आघात है।

इस भाग से क्या सीखें?

श्रीराम का भ्रातृप्रेम, गुरु के प्रति विनम्रता, सत्य और वचनपालन की मर्यादा तथा कुसंगति से उत्पन्न भ्रम इस प्रसंग की मुख्य शिक्षाएँ हैं। राजमहल में उत्सव की तैयारी थी, किंतु एक कुटिल सलाह ने सबकी दिशा बदल दी। इसलिए विवेक, विश्वास और संयम का साथ न छोड़ें।

अगले भाग में: राजा दशरथ की विनती, श्रीराम को वनवास का समाचार, माता कौशल्या-सीताजी और लक्ष्मणजी के साथ आगामी संवाद—दोहा ३१ से आगे।

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