श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 8 — मानस की महिमा, रामकथा-सरयू और याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 8
मानस की महिमा, रामकथा-सरयू और याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद की भूमिका
भाग 7 के दोहा 37 के ठीक बाद से यह भाग आगे बढ़ता है। यहाँ मानस-सरोवर में प्रवेश की पात्रता, सत्संग की महिमा, रामकथा रूपी सरयू और रामचरित के विविध प्रसंगों का ऋतु-रूपक आता है। अंत में कथा याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद के द्वार तक पहुँचती है।
चौपाई
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥१॥
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥१॥
सरल अर्थ: केवल बाहरी प्रयास पर्याप्त नहीं है। यदि भीतर श्रद्धा और जागरूकता न हो, तो आलस्य और जड़ता साधक को मानस के वास्तविक रस में उतरने नहीं देते।
चौपाई
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥२॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥२॥
सरल अर्थ: जो स्वयं कथा का रस ग्रहण नहीं कर पाता, वह कई बार अपनी कमी देखने के बजाय कथा को ही दोष देने लगता है। तुलसीदास यहाँ अभिमान से सावधान करते हैं।
चौपाई
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥
सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥३॥
सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥३॥
सरल अर्थ: श्रीराम की कृपा जिस पर होती है, उसके लिए बाधाएँ हल्की हो जाती हैं। श्रद्धापूर्वक रामकथा में डूबने से जीवन के अनेक प्रकार के ताप शांत होते हैं।
चौपाई
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ॥
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥४॥
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥४॥
सरल अर्थ: जिनके हृदय में श्रीराम के चरणों का प्रेम है, वे मानस से दूर नहीं होते। इस पवित्र सरोवर में स्नान का मार्ग मन लगाकर किया गया सत्संग है।
चौपाई
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥५॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥५॥
सरल अर्थ: हृदय की दृष्टि से मानस का दर्शन करने पर कवि की बुद्धि निर्मल होती है और भीतर प्रेम, आनंद तथा उत्साह का प्रवाह जाग उठता है।
चौपाई
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरित सो॥
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥६॥
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥६॥
सरल अर्थ: अब मानस-सरोवर से सुंदर कविता-नदी प्रवाहित होती है। उसका जल श्रीराम का निर्मल यश है और लोकमत तथा वेदमत उसके दोनों सुंदर तट हैं।
चौपाई
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥७॥
सरल अर्थ: यह रामकथा-सरयू मानस की पवित्र पुत्री के समान है, जो कलियुग के छोटे-बड़े पापरूपी तृण और वृक्षों को जड़ से उखाड़ने वाली है।
दोहा ३९
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल॥३९॥
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल॥३९॥
सरल अर्थ: तीनों प्रकार के श्रोताओं के समुदाय इस कथा-नदी के दोनों तटों पर बसे नगर और ग्राम हैं; संतों की सभा मंगलमयी अयोध्या के समान है।
चौपाई
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥१॥
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥१॥
सरल अर्थ: रामभक्ति रूपी गंगा में रामकीर्ति रूपी सरयू मिलती है और लक्ष्मण सहित श्रीराम के युद्ध का पवित्र यश सोन नदी के समान उसमें आ मिलता है।
चौपाई
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरूप सिंधु समुहानी॥२॥
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरूप सिंधु समुहानी॥२॥
सरल अर्थ: भक्ति की गंगा ज्ञान और वैराग्य के साथ शोभित है। इन धाराओं का संगम तीनों तापों को हरते हुए रामस्वरूप रूपी समुद्र की ओर बढ़ता है।
चौपाई
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥३॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥३॥
सरल अर्थ: इस कथा-सरयू का मूल मानस है। इसके विविध प्रसंग नदी किनारे के वन-बागों की तरह कथा को रमणीय बनाते और श्रोता के मन को पवित्र करते हैं।
चौपाई
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥
रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥४॥
रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥४॥
सरल अर्थ: शिव-पार्वती विवाह के बराती अनेक जलचरों के समान हैं और श्रीराम जन्म की आनंद-बधाइयाँ नदी की सुंदर भँवर और तरंगें हैं।
दोहा ४०
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग॥४०॥
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग॥४०॥
सरल अर्थ: चारों भाइयों के बालचरित रंग-बिरंगे कमलों के समान हैं और दशरथजी, रानियों तथा परिवार के पुण्य भ्रमरों और जलपक्षियों की शोभा जैसे हैं।
चौपाई
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥१॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥१॥
सरल अर्थ: सीता स्वयंवर की कथा इस नदी की मनोहर छवि है। सुंदर प्रश्न नावों के समान और विवेकपूर्ण उत्तर उन्हें पार लगाने वाले कुशल केवट हैं।
चौपाई
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥२॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥२॥
सरल अर्थ: कथा सुनकर होने वाली सत्संग-चर्चाएँ यात्रियों के समूह जैसी हैं। परशुरामजी का क्रोध तीव्र धारा और श्रीराम के श्रेष्ठ वचन सुबद्ध घाटों के समान हैं।
चौपाई
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥३॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥३॥
सरल अर्थ: भाइयों सहित श्रीराम के विवाह का उत्साह कल्याणकारी बाढ़ जैसा है। जो इसे कहते-सुनते हर्षित और पुलकित होते हैं, वे मानो प्रसन्न मन से कथा-नदी में स्नान करते हैं।
चौपाई
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥४॥
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥४॥
सरल अर्थ: रामतिलक की मंगल तैयारी तीर्थ-पर्व की भीड़ जैसी है, जबकि कैकेयी की कुबुद्धि काई के समान है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी विपत्ति आती है।
दोहा ४१
समन अमित उतपात सब भरत चरित जपजाग।
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥४१॥
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥४१॥
सरल अर्थ: भरतजी का चरित्र अनेक संकटों को शांत करने वाले जप-यज्ञ के समान है। कलियुग के पाप और दुष्टों के अवगुण नदी के मैल, बगुले और कौओं के समान बताए गए हैं।
चौपाई
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥१॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥१॥
सरल अर्थ: रामकीर्ति की यह नदी हर ऋतु में सुंदर और पवित्र है। शिव-पार्वती विवाह हेमंत और श्रीराम जन्मोत्सव सुखद शिशिर ऋतु के समान है।
चौपाई
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥२॥
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥२॥
सरल अर्थ: रामविवाह का वर्णन आनंदमय वसंत है, जबकि राम का वनगमन कठिन ग्रीष्म और वनमार्ग की कथा उसकी तीखी धूप तथा गर्म हवा के समान है।
चौपाई
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥३॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥३॥
सरल अर्थ: राक्षसों से युद्ध वर्षा ऋतु है जो देवताओं रूपी धान के लिए हितकारी है; रामराज्य का सुख, विनय और महिमा निर्मल शरद ऋतु जैसी है।
चौपाई
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥४॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥४॥
सरल अर्थ: सीताजी के गुण इस कथा-जल की निर्मलता हैं और भरतजी का स्वभाव उसकी अविचल शीतलता है, जिसका पूरा वर्णन करना कठिन है।
दोहा ४२
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥४२॥
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥४२॥
सरल अर्थ: चारों भाइयों का परस्पर देखना, बोलना, मिलना, प्रेम और हँसी इस पवित्र जल की मधुरता और सुगंध के समान है।
चौपाई
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥१॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥१॥
सरल अर्थ: कवि की विनय और दीनता इस जल की सहजता है। यह कथा सुनते ही मन पर प्रभाव डालती है, तृष्णा और मन के मैल को कम करती है।
चौपाई
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥२॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥२॥
सरल अर्थ: यह कथा-जल श्रीराम के प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के पाप और ग्लानि को हरता है तथा संसार की थकान, दुःख, दरिद्रता और दोषों को शांत करने वाला है।
चौपाई
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥३॥
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥३॥
सरल अर्थ: रामकथा काम, क्रोध, मद और मोह को घटाकर निर्मल विवेक और वैराग्य को बढ़ाती है। श्रद्धापूर्वक इसका सेवन हृदय के पाप और संताप को मिटाने वाला है।
चौपाई
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥४॥
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥४॥
सरल अर्थ: जो अपने मन को रामयश रूपी जल से शुद्ध नहीं करते, वे संसार की मृगतृष्णाओं में भटकते हुए प्यासे हिरन की तरह दुख पाते रहते हैं।
दोहा ४३ (क)
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥४३ (क)॥
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥४३ (क)॥
सरल अर्थ: कवि अपनी बुद्धि के अनुसार इस पवित्र कथा-जल के गुणों का चिंतन करके मन को उसमें स्नान कराता है और भवानी-शंकर का स्मरण कर आगे की सुंदर कथा कहता है।
दोहा ४३ (ख)
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥४३ (ख)॥
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥४३ (ख)॥
सरल अर्थ: अब श्रीराम के चरणकमलों को हृदय में धारण कर तुलसीदास याज्ञवल्क्य और भरद्वाज मुनि के सुंदर मिलन-संवाद की ओर कथा को आगे बढ़ाते हैं।
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