श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 58 — मिथिला का विवाह-मंडप और अवध में शुभ समाचार

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 58

मिथिला का विवाह-मंडप और अवध में शुभ समाचार

इस भाग का प्रसंग: मिथिला का विवाह-मंडप और अवध में शुभ समाचार।

पाठ-सीमा: दोहा 288 के बाद से 293 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 289 से पहले
रचे रुचिर बर बंदनिबारे । मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे ॥
मंगल कलस अनेक बनाए । ध्वज पताक पट चमर सुहाए ॥
दीप मनोहर मनिमय नाना । जाइ न बरनि बिचित्र बिताना ॥
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही । सो बरनै असि मति कबि केही ॥
दूलहु रामु रूप गुन सागर । सो बितानु तिहुँ लोक उजागर ॥
जनक भवन कै सौभा जैसी । गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी ॥
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी । तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी ॥
जो संपदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥

सरल भावार्थ: तोरण, मंगलकलश, ध्वज, पताका, वस्त्र, चँवर और मणिमय दीप मंडप को सजाते हैं। जहाँ सीता दुलहन और रूप-गुण के सागर श्रीराम दूल्हे हों, उसका वर्णन कौन कर सकता है? जनकजी के भवन जैसी शोभा नगर के घर-घर में दिखाई देती है। उस समय मिथिला देखकर अन्य लोक छोटे लगते हैं।

दोहा 289
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु ॥
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु ॥२८९॥

सरल अर्थ: जिस नगर में लक्ष्मीजी स्वयं सुंदर नारी का रूप धारण करके रहती हैं, उसकी शोभा कहने में सरस्वती और शेष भी संकोच करते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 290 से पहले
पहुँचे दूत राम पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई । दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥
बारि बिलोचन बाचत पाँती । पुलक गात आई भरि छाती ॥
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ॥
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची । हरषी सभा बात सुनि साँची ॥
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई । आए भरतु सहित हित भाई ॥
पूछत अति सनेहँ सकुचाई । तात कहाँ तें पाती आई ॥

सरल भावार्थ: दूत अयोध्या पहुँचकर दशरथजी को पत्र देते हैं। पढ़ते हुए उनके नेत्र भरते, शरीर पुलकित होता और हृदय स्नेह से भर जाता है। धैर्य रखकर पत्र पढ़ते हैं तो सभा आनंदित होती है। समाचार सुनकर भरत और शत्रुघ्न आते हैं और स्नेहपूर्वक पत्र का स्थान पूछते हैं।

दोहा 290
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस ॥२९०॥

सरल अर्थ: वे पूछते हैं—हमारे प्राणप्रिय दोनों भाई किस देश में हैं और कुशल से हैं? प्रेमभरे वचन सुनकर दशरथजी फिर पत्र पढ़ते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 291 से पहले
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता । अधिक सनेहु समात न गाता ॥
प्रीति पुनीत भरत कै देखी । सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी ॥
तब नृप दूत निकट बैठारे । मधुर मनोहर बचन उचारे ॥
भैया कहहु कुसल दोउ बारे । तुम्ह नीकें निज नयन निहारे ॥
स्यामल गौर धरें धनु भाथा । बय किसोर कौसिक मुनि साथा ॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ । प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ ॥
जा दिन तें मुनि गए लवाई । तब तें आजु साँचि सुधि पाई ॥
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने । सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने ॥

सरल भावार्थ: पत्र सुनकर भरत-शत्रुघ्न पुलकित हो जाते हैं; भरतजी का पवित्र प्रेम देखकर सभा प्रसन्न होती है। दशरथजी दूतों को पास बैठाकर बार-बार पूछते हैं कि क्या उन्होंने श्याम और गौर, धनुष-तरकसधारी दोनों किशोरों को देखा और पहचाना? मुनि के साथ जाने के बाद आज सच्चा समाचार मिला है। दूत मुस्कुराते हैं।

दोहा 291
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ ॥२९१॥

सरल अर्थ: दूत कहते हैं—हे राजाओं के मुकुटमणि, आपसे अधिक धन्य कोई नहीं; श्रीराम और लक्ष्मण जैसे विश्व के आभूषण आपके पुत्र हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 292 से पहले
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे । पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे ॥
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे । ससि मलीन रबि सीतल लागे ॥
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे । देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे ॥
सीय स्वयंबर भूप अनेका । समिटे सुभट एक तें एका ॥
संभु सरासनु काहुँ न टारा । हारे सकल बीर बरिआरा ॥
तीनि लोक महँ जे भटमानी । सभ कै सकति संभु धनु भानी ॥
सकइ उठाइ सरासुर मेरू । सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू ॥
जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा । सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा ॥

सरल भावार्थ: दूत कहते हैं कि तीनों लोकों को प्रकाशित करने वाले आपके पुत्रों को पहचानने के लिए पूछना कैसा, जैसे सूर्य देखने को दीपक की आवश्यकता नहीं। स्वयंवर में बड़े-बड़े वीर आए, पर किसी ने शिवधनुष नहीं हिलाया। मेरु उठाने वाले और कैलास उठाने का बल रखने वाले भी पराजित लौटे।

दोहा 292
तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल ॥२९२॥

सरल अर्थ: उसी सभा में रघुवंशमणि श्रीराम ने बिना प्रयास धनुष तोड़ दिया, जैसे हाथी कमलनाल तोड़ता है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 293 से पहले
सुनि सरोष भृगुनायकु आए । बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए ॥
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा । करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा ॥
राजन रामु अतुलबल जैसें । तेज निधान लखनु पुनि तैसें ॥
कंपहि भूप बिलोकत जाकें । जिमि गज हरि किसोर के ताकें ॥
देव देखि तव बालक दोऊ । अब न आँखि तर आवत कोऊ ॥
दूत बचन रचना प्रिय लागी । प्रेम प्रताप बीर रस पागी ॥
सभा समेत राउ अनुरागे । दूतन्ह देन निछावरि लागे ॥
कहि अनीति ते मूदहिं काना । धरमु बिचारि सबहिं सुख माना ॥

सरल भावार्थ: दूत परशुरामजी के आगमन, क्रोध और फिर श्रीराम का प्रभाव जानकर अपना धनुष देकर वन जाने का वर्णन करते हैं। वे लक्ष्मणजी के तेज की भी प्रशंसा करते हैं, जिनकी दृष्टि से राजा वैसे काँपते हैं जैसे हाथी सिंह के बच्चे से। दशरथजी प्रसन्न होकर दूतों को उपहार देना चाहते हैं; वे कन्यापक्ष के दूत होने की मर्यादा से लेने से मना करते हैं।

दोहा 293
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ ॥२९३॥

सरल अर्थ: दशरथजी उठकर गुरु वसिष्ठजी को पत्र देते और दूतों को बुलाकर सारी कथा आदरपूर्वक सुनाते हैं।

॥ श्री सीताराम ॥
भक्ति भावना • भक्ति • ज्ञान • संस्कृति

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है | राम भजन लिरिक्स | Bhakti Bhavna

श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित

नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का | प्रेरक भजन एवं जीवन संदेश