श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 57 — परशुरामजी को प्रभु की पहचान और विवाह की तैयारी
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 57
परशुरामजी को प्रभु की पहचान और विवाह की तैयारी
इस भाग का प्रसंग: परशुरामजी को प्रभु की पहचान और विवाह की तैयारी।
पाठ-सीमा: दोहा 283 के बाद से 288 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
जौं रन हमहि पचारै कोऊ । लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावँर आना ॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई ॥
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के । उघरे पटल परसुधर मति के ॥
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ ॥
सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं कि देव, दानव, राजा या काल भी युद्ध की चुनौती दें तो रघुवंशी निर्भय लड़ते हैं। युद्ध से डरना क्षत्रिय के लिए कलंक है। ब्राह्मण का प्रभाव ऐसा है कि उसका भय मानने वाला निर्भय होता है। इन गूढ़ मधुर वचनों से परशुरामजी का विवेक खुलता है। वे विष्णु का धनुष खींचने को देते हैं; धनुष स्वयं श्रीराम के पास चला जाता है।
जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात ॥२८४॥
सरल अर्थ: श्रीराम का प्रभाव पहचानकर परशुरामजी का शरीर पुलकित होता है। हाथ जोड़कर बोलते हैं, पर हृदय में अपार प्रेम समाता नहीं।
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी ॥
बिनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ॥
सेवक सुखद सुभग सब अंगा । जय सरीर छबि कोटि अनंगा ॥
करौं काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा ॥
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता । छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता ॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू ॥
अपभयँ कुटिल महीप डेराने । जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने ॥
सरल भावार्थ: परशुरामजी श्रीराम को रघुवंश का सूर्य, दानवों का संहारक, देव-ब्राह्मण-गाय का हितकारी तथा मद, मोह, क्रोध और भ्रम का नाशक कहते हैं। वे विनय, शील, करुणा और अनुपम सौंदर्य की स्तुति करते हैं। अज्ञान से कहे कठोर वचन क्षमा करने की प्रार्थना कर जय कहते हुए तप के लिए वन चले जाते हैं। दुष्ट राजा अपने भय से भागते हैं।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल ॥२८५॥
सरल अर्थ: देवता दुंदुभियाँ बजाते और प्रभु पर फूल बरसाते हैं। नगर के स्त्री-पुरुष आनंदित होते हैं; मोह और भय का दुख मिट जाता है।
जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं । करहिं गान कल कोकिलबयनी ॥
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई । जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई ॥
गत त्रास भइ सीय सुखारी । जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी ॥
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा । प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा ॥
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं । अब जो उचित सो कहिअ गोसाई ॥
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना । रहा बिबाहु चाप आधीना ॥
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू । सुर नर नाग बिदित सब काहु ॥
सरल भावार्थ: मंगलवाद्य और मधुर गीत गूँजते हैं। जनकजी का आनंद मानो जन्म से निर्धन व्यक्ति को निधि मिलना है; सीताजी का भय मिट जाता है। जनकजी विश्वामित्रजी को प्रणाम कर कहते हैं कि उनकी कृपा से दोनों भाइयों ने उन्हें कृतार्थ किया। मुनि कहते हैं कि विवाह धनुष पर निर्भर था, अतः धनुष टूटते ही संबंध सिद्ध हो गया।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु ॥२८६॥
सरल अर्थ: फिर भी मुनि कुल की परंपरा और वेदसम्मत संस्कार करने को कहते हैं। ब्राह्मण, कुलवृद्ध और गुरु से पूछकर उचित आचार पूरा करें।
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला । पठए दूत बोलि तेहि काला ॥
बहुरि महाजन सकल बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिर नाए ॥
हाट बाट मंदिर सुरबासा । नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा ॥
हरषि चले निज निज गृह आए । पुनि परिचारक बोलि पठाए ॥
रचहु बिचित्र बितान बनाई । सिर धरि बचन चले सचु पाई ॥
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना । जे बितान बिधि कुसल सुजाना ॥
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा । बिरचे कनक कदलि के खंभा ॥
सरल भावार्थ: विश्वामित्रजी अवध में दूत भेजकर दशरथजी को बुलाने की सलाह देते हैं। जनकजी दूत भेजते और नगर के प्रतिष्ठित लोगों को बाजार, मार्ग, मंदिर तथा घर सजाने का आदेश देते हैं। कुशल शिल्पी विवाह-मंडप बनाते हैं; स्वर्ण के केले जैसे खंभे रचे जाते हैं।
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल ॥२८७॥
सरल अर्थ: हरित मणियों के पत्ते-फल और पद्मराग के फूल इतने सुंदर बनाए गए कि रचना देखकर स्वयं ब्रह्मा का मन भी मोहित हो जाए।
कनक कलित अहिबेल बनाई । लखि नहि परइ सपरन सुहाई ॥
तेहि के रचि पचि बंध बनाए । बिच बिच मुकता दाम सुहाए ॥
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा । चीरि कोरि पचि रचे सरोजा ॥
किए भृंग बहुरंग बिहंगा । गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा ॥
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी । मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी ॥
चौंकें भाँति अनेक पुराईं । सिंधुर मनिमय सहज सुहाई ॥
सरल भावार्थ: मणियों से बाँस, स्वर्ण से लताएँ और मोतियों से बंधन बनाए जाते हैं। माणिक्य, पन्ना, हीरा और फिरोजा तराशकर कमल, भौंरे तथा पक्षी रचे हैं; हवा चलने पर मानो वे गूँजते और बोलते हैं। खंभों पर देवप्रतिमाएँ मंगलद्रव्य लिए हैं। सुंदर रंगों और मणियों से चौक सजते हैं।
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि ॥२८८॥
सरल अर्थ: नीलम से सुंदर आम्रपल्लव, स्वर्ण से बौर और पन्ने से फलों के गुच्छे बने हैं; रेशमी डोरियों पर वे झिलमिलाते हैं।

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