गोस्वामी तुलसीदास जी की दोहावली भाग 1 — श्रीराम ध्यान, रामनाम महिमा | छंद 1–48 अर्थ सहित
श्री तुलसी दोहावली — भाग 1
श्रीराम-ध्यान, रामनाम महिमा और अनन्य प्रेम
संत-काव्य की अनुपम धारा में गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे भक्ति, नीति और आत्मचिंतन के अमूल्य सूत्र हैं। इस प्रथम भाग में प्रारंभिक ध्यान से रामनाम के प्रकाश और प्रेमपूर्ण शरणागति तक की यात्रा पढ़ें।
तुलसीदास जी की दोहावली क्या है?
दोहावली गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रमुख काव्य-रचनाओं में गिनी जाती है। इसमें रामनाम का स्मरण, प्रभु के प्रति प्रेम, गुरु की महत्ता, मनुष्य के आचरण और आत्म-विवेक जैसे विषय मिलते हैं। दोहे के साथ कुछ स्थानों पर सोरठा छंद भी आते हैं। यहाँ गीताप्रेस के ५७३ क्रमांकित छंदों वाली प्रचलित पाठ-परंपरा का क्रम अपनाया गया है; अलग पुस्तकों में वर्तनी या पाठांतर मिल सकते हैं।
यह भाग छंद १–४८ का पूर्ण पाठ देता है। प्रत्येक के नीचे मूल अवधी/ब्रज रूपों को समझने हेतु कठिन शब्दार्थ, फिर सरल अर्थ और स्वतंत्र भावार्थ दिया गया है। यह किसी आधुनिक प्रकाशित व्याख्या की शब्दशः प्रतिलिपि नहीं है।
पाठ-संपादकीय टिप्पणी: छंद ४३–४७ सोरठे हैं; क्रमांकन उन्हें भी शामिल करता है। पुराने छंदों में अतिशयोक्ति, रूपक और ऐतिहासिक मान्यताएँ आती हैं; अर्थ पढ़ते समय उन्हें साहित्यिक-सांस्कृतिक संदर्भ में समझें।
📖 भाग १ की विषय-सूची
सीधे दोहा/सोरठा क्रमांक पर जाएँ
खंड १ · श्रीसीताराम का मंगलमय ध्यान
श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण का ध्यान—भक्ति की शुरुआत एक करुणामय और मर्यादापूर्ण स्वरूप से।
दोहा १ दोहा
जानकी = माता सीता; बाम दिसि = बाईं ओर; सुरतरु = कल्पवृक्ष
तुलसीदास श्रीराम के बाईं ओर सीता और दाईं ओर लक्ष्मण का ध्यान करते हैं। यह पारिवारिक, करुणामय स्वरूप भक्त के लिए परम मंगल का आश्रय है।
काव्य में कल्पवृक्ष इच्छापूर्ति का प्रतीक है। यहाँ केंद्रीय शिक्षा केवल वर माँगना नहीं, प्रेम, मर्यादा और सेवा को एक साथ देखना है। राम, सीता और लक्ष्मण के ध्यान में आदर्श जीवन की संगति प्रकट होती है।
दोहा २ दोहा
सुमन = पुष्प; सगुन = साकार दिव्य स्वरूप; सुमंगल बास = कल्याण का निवास
सीता और लक्ष्मण सहित प्रभु राम की शोभा देखकर देवता प्रसन्न होकर पुष्प-वर्षा करते हैं। तुलसी के लिए ऐसा सगुण ध्यान शुभता का केंद्र है।
बाहरी देव-वर्षा मन के आनंद का भी रूपक है। भक्त को ईश्वर दूर की अमूर्त कल्पना ही नहीं, सुंदर और स्नेहमय साकार संबंध के रूप में अनुभव होते हैं।
दोहा ३ दोहा
पंचबटी = रामवनवास का स्थल; बट बिटप = वटवृक्ष; सकल = सभी
पंचवटी में वटवृक्ष के नीचे सीता और लक्ष्मण संग बैठे राम का स्मरण सभी प्रकार के मंगल का स्मरण है।
यह चित्र राजमहल का नहीं, वनवास का है। साधनहीन वातावरण में भी धर्म, प्रेम और पारिवारिक साहचर्य जीवन को गरिमामय बना सकते हैं—यही दृश्य का भाव है।
खंड २ · रामनाम जप का प्रकाश और भरोसा
चित्रकूट से मनिदीप तक: नाम-स्मरण की सहजता, उपयोगिता और भक्त की आंतरिक साधना।
दोहा ४ दोहा
चित्रकूट = रामकथा से जुड़ा पावन स्थल; जापकहि = नाम जपने वाले को; अभिमत = मनचाहा
तुलसी कहते हैं कि चित्रकूट में सीता-लक्ष्मण संग विराजने वाले प्रभु राम श्रद्धापूर्वक रामनाम जपने वाले के अभिलषित कल्याण के आधार हैं।
स्थान का स्मरण और नाम का जप एक ही श्रद्धा को पोषित करते हैं। यहाँ ‘अभिमत’ को केवल भौतिक इच्छा नहीं, साधक के लिए उपयुक्त शुभ परिणाम भी समझा जा सकता है।
दोहा ५ दोहा
पय = दूध; षट मास = छह महीने; करतल = हथेली
यह छंद पुराने तपस्वी संदर्भ में दीर्घकालीन अनुशासन के साथ रामनाम-जप की प्रशंसा करता है और सभी मंगलों को निकट बताता है।
इसमें कठोर आहार-व्रत का ऐतिहासिक उल्लेख है, आधुनिक आहार-सलाह नहीं। इसकी अनुकरणीय शिक्षा नाम-स्मरण में धैर्य और नियमितता है; लंबे समय तक सीमित आहार अपनाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
दोहा ६ दोहा
मनिदीप = मणि-जैसा प्रकाशमान दीप; जीह = जीभ; देहरी = चौखट; उजिआर = प्रकाश
जैसे चौखट पर रखा दीप घर के भीतर-बाहर प्रकाश फैलाता है, वैसे ही जीभ से रामनाम लेना व्यक्ति के मन और व्यवहार को उजाला दे सकता है।
यह दोहावली का अत्यंत प्रसिद्ध प्रतीक है। नाम-स्मरण केवल निजी अनुभव नहीं; उससे वाणी में संयम, दूसरों से व्यवहार में शांति और जीवन के निर्णयों में विवेक भी विकसित होना चाहिए।
दोहा ७ दोहा
हियँ = हृदय में; निर्गुन = गुण-आकार से परे ब्रह्म; सगुन = रूपयुक्त ईश्वर; पुरट संपुट = स्वर्ण का डिब्बा
हृदय में निराकार सत्य का ध्यान, नेत्रों के सामने साकार श्रीराम का सुंदर रूप और जीभ पर रामनाम—ये तीनों मिलकर साधना की शोभा बढ़ाते हैं।
तुलसी यहाँ निर्गुण और सगुण को विरोध में नहीं रखते। अंतःचिंतन, दृष्टि और वाणी का समन्वय एक संगठित आध्यात्मिक जीवन बनाता है।
दोहा ८ दोहा
सगुन ध्यान = साकार रूप का चिंतन; सजीवन मूरि = जीवनदायिनी औषधि
यदि साकार ध्यान में मन न लग रहा हो और निर्गुण का चिंतन कठिन लगे, तो रामनाम के स्मरण को सुलभ सहारा बनाओ।
यह साधना में असफलता की निंदा नहीं, सरल विकल्प है। किसी जटिल विधि से मन न जुड़े तो श्रद्धा और सजगता के साथ नाम-स्मरण से आरंभ करना तुलसी की व्यावहारिक सलाह है।
दोहा ९ दोहा
छत्रु = छत्र; मुकुटमनि = मुकुट का रत्न; बरननि = वर्णों पर; दोउ = दोनों
तुलसी ‘राम’ नाम के दो अक्षरों को ऐसे श्रेष्ठ बताते हैं मानो एक समस्त अक्षरों पर छत्र और दूसरा मुकुटमणि बनकर सुशोभित हो।
यहाँ अक्षर-बिंब भाषिक सौंदर्य का उपकरण है। जिस नाम से कवि की पूरी भक्ति जुड़ी है, उसके दो वर्ण भी उन्हें परम सम्माननीय प्रतीत होते हैं।
दोहा १० दोहा
अंक = संख्या का सार्थक अंक; सून = शून्य; दस गून = दस गुना
रामनाम को सार्थक अंक और बाकी साधनाओं को शून्य कहकर तुलसी नाम-स्मरण की मूलभूत भूमिका बताते हैं।
गणित का रूपक अर्थ देता है: श्रद्धा के बिना अभ्यास केवल बाहरी क्रिया बन सकता है; श्रद्धा जुड़े तो वही क्रिया अर्थवान होती है। अन्य साधनाओं के प्रति अपमान नहीं, नाम की प्राथमिकता है।
दोहा ११ दोहा
कलपतरु = इच्छापूर्ति का दिव्य वृक्ष; कलि = कलियुग; भाँग = साधारण या तुच्छ वस्तु का रूपक
तुलसी कहते हैं कि कलियुग में रामनाम कल्याण देने वाला कल्पवृक्ष है; इसी स्मरण ने उनके अपने जीवन को परिवर्तित किया।
‘भाँग से तुलसी’ कवि की आत्मविनयपूर्ण तुलना है। यह आत्म-तिरस्कार का आमंत्रण नहीं, साधना से स्वभाव और जीवन की दिशा बदलने की संभावना का संकेत है।
दोहा १२ दोहा
सुकृत = पुण्यवान; सुखसालि = सुख से संपन्न; आलसी = जो जप को टाले
रामनाम जपकर अनेक लोग पुण्य और शांति की राह पर चले; जो इस मार्ग को सदा टालता है, वह मूल्यवान अवसर गँवा सकता है।
इस दोहे में समय की चेतना है। भक्ति को ‘कभी बाद में’ कहकर टालने के बजाय आज से छोटा और टिकाऊ अभ्यास शुरू करना अधिक सार्थक है।
दोहा १३ दोहा
गरीबनिवाज = दीनों पर कृपा करने वाला; घूर = कूड़े का ढेर; बिनिआ = दाने बीनने की आदत
प्रभु का नाम इतना उदार है कि साधक को अपना मानकर ऊँचा उठा सकता है, पर मन क्षुद्र आकर्षण छोड़ने को तैयार नहीं होता।
बड़ा मूल्य सामने होने पर भी छोटी आदतों से चिपके रहना मानव-मन की समस्या है। दोहा अपने चुनावों पर विचार करने को कहता है: क्या हम अस्थायी लालच के कारण स्थायी भलाई भूल रहे हैं?
खंड ३ · अनुराग, आत्मचिंतन और जीवन-परिवर्तन
नाम के प्रेम से जीवन की दिशा बदलने, ‘मैं-मेरा’ के मोह को समझने और सत्संगति अपनाने की शिक्षा।
दोहा १४ दोहा
कासीं = काशी; बिधि = विधिपूर्वक; प्रयाग = तीर्थराज प्रयाग; अनुराग = प्रेम
काशी और प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थों से जुड़ी धार्मिक फल-कल्पना के समान कल्याण रामनाम के प्रति सच्चे अनुराग में भी उपलब्ध बताया गया है।
यहाँ मृत्यु-विषयक पुराने धार्मिक संदर्भ आते हैं; इसे अपने शरीर को कष्ट देने या जीवन समाप्त करने का निर्देश न समझें। मूल संदेश है कि भक्ति का सार बाहरी परिस्थिति के बजाय प्रेमपूर्ण स्मरण में है।
दोहा १५ दोहा
कठवति = बड़ा पात्र; रौंताई = राजसत्ता या प्रभुत्व; छेम = सुरक्षा, कुशलता; परमारथ = आध्यात्मिक हित
तुलसी परस्पर कठिन लगने वाली इच्छाओं—मधुर सुख, पर्याप्तता, अधिकार और कल्याण—को रामनाम-प्रेम के साथ संतुलित होने योग्य बताते हैं।
कविता का बल संतुलन पर है। बाहरी सफलता के साथ नम्रता और आंतरिक सुरक्षा के साथ उदारता बनी रहे, तभी जीवन को सार्थक संतोष मिलता है।
दोहा १६ दोहा
सुजस भाजन = अच्छी कीर्ति के पात्र; कुजाति = पुराने समाज की निंदात्मक संज्ञा; कुतरुक = खराब वृक्ष का नाम-रूपक
तुलसी नाम-स्मरण की परिवर्तनकारी शक्ति बताते हुए ऐसे लोगों का उल्लेख करते हैं जिन्हें समाज में तुच्छ समझा जाता था, लेकिन जिनकी पहचान शुभ हो सकती है।
छंद की सामाजिक शब्दावली ऐतिहासिक है; किसी व्यक्ति का मूल्य जन्म या जाति से नहीं आँकना चाहिए। मूल आध्यात्मिक शिक्षा है कि सुधार और गरिमा की संभावना प्रत्येक व्यक्ति में है।
दोहा १७ दोहा
स्वारथ = लौकिक हित; परमारथ = आत्मकल्याण; अगम = दुर्लभ; कलेस = क्लेश
जिसे साधारण सुख या आध्यात्मिक दिशा आसानी से न मिली हो, उसके कठिन दुख भी रामनाम के सहारे हल्के होने की आशा की गई है।
भक्ति दुःख को जादुई ढंग से मिटाने का दावा नहीं; यह कठिन समय में आशा, धैर्य और नैतिक दिशा देने वाली साधना के रूप में पढ़ी जा सकती है।
दोहा १८ दोहा
मोर = मेरा; निज नाम = अपना सच्चा परिचय; चुप साधहि = मौन हो जा
मन सब चीजों को ‘मेरा’ कहता है, पर अपने वास्तविक स्वरूप पर ध्यान नहीं देता। तुलसी कहते हैं कि या तो यह रहस्य समझकर मौन चिंतन कर या रामनाम जप।
स्वामित्व-बोध और आत्मबोध में फर्क समझना दोहे का विषय है। वस्तुओं से पहचान बनती है, लेकिन मनुष्य का चरित्र उसके सचेत कर्म और विचार से आकार पाता है।
दोहा १९ दोहा
हम, हमार = मैं और मेरा; अलख = जिसे इंद्रियाँ सीधे न पकड़ सकें; बीच = भेद का कारण
जो व्यक्ति ‘मैं’, ‘मेरा’ और उनके बीच संबंध को समझे बिना अगोचर परमात्मा को जानने का दावा करता है, उसे तुलसी पहले स्वयं को जाँचने और नाम-जपने को कहते हैं।
ज्ञान का केवल प्रदर्शन आत्मचिंतन का विकल्प नहीं है। विनम्रता से अपनी सीमाओं को पहचानना सत्य की खोज में उपयोगी पहला कदम है।
दोहा २० दोहा
अवलंब = सहारा; परमारथ = आध्यात्मिक लक्ष्य; बारिद = बादल; अकास = आकाश
नाम के सहारे के बिना परमार्थ की आशा करना तुलसी को वैसा लगता है जैसे वर्षा की बूँद पकड़कर आकाश तक चढ़ना।
रूपक में साधन और लक्ष्य का संबंध दिखाया गया है। जिस मार्ग को कवि अपना मूल साधन मानते हैं, उसे छोड़कर केवल फल की चाह करना उनके लिए असंगत है।
दोहा २१ दोहा
चित = मन; हित करि मानि = हितकारी समझ; बिसारें = भुलाने से
तुलसी अपने मन को बार-बार समझाते हैं कि राम का स्मरण सबसे बड़ा लाभ और राम को भुला देना बड़ी हानि है।
यहाँ ‘लाभ’ आध्यात्मिक स्थिरता का लाभ है। मन को नियमित रूप से याद दिलाना कि जीवन में कौन-से मूल्य प्राथमिक हैं, इस दोहे की व्यावहारिक शक्ति है।
दोहा २२ दोहा
बिगरी = बिगड़ी दशा; कुसमाजु = बुरी संगति; होहि राम को = राम के हो जाओ
चाहे अनेक समय से आदतें बिगड़ गई हों, आज भी उन्हें सुधारने का अवसर है। रामनाम जपो और खराब संगति से दूरी बनाओ।
यह दोहा परिवर्तन की आशा जगाता है। पछतावे में अटके रहने की जगह संगति सुधारने और साधना को व्यवहार में उतारने का मार्ग सुझाया गया है।
दोहा २३ दोहा
प्रीति = प्रेम; प्रतीति = भरोसा; सुरीति = अच्छी रीति; आदि-मध्य-परिनाम = आरंभ से अंत तक
प्रेम, विश्वास और उत्तम आचरण से रामनाम जपना जीवन की पूरी यात्रा में कल्याणकारी कहा गया है।
तुलसी केवल शब्दों का उच्चारण पर्याप्त नहीं मानते: प्रेम, भरोसा और आचरण तीनों का योग चाहिए। मूल्यवान भक्ति व्यक्ति के दैनिक कर्मों में झलकेगी।
खंड ४ · रामनाम की अद्भुत उपमाएँ एवं महिमा
मुख-मंडल, खेती, नरसिंह, कल्पवृक्ष, गुरु-भक्ति, शबरी-जटायु और रामनाम का आश्रय।
दोहा २४ दोहा
दंपति = दंपती; रसना = जीभ; दसन = दाँत; सुगेह = सुंदर घर; सहज सनेह = स्वाभाविक प्रेम
कवि मुख, जीभ, दाँत, वर्ण और परिवार के रूपकों से नाम के अक्षरों के बीच स्वाभाविक आत्मीयता प्रकट करते हैं।
इस काव्य में वर्णमाला एक परिवार बन जाती है। भाषा के छोटे-से घटक में भी प्रेम का संसार रचा जा सकता है—यह तुलसी की उपमा-शक्ति है।
दोहा २५ दोहा
सालि = धान की फसल; रघुपति भगति = राम की भक्ति; बरन जुग = दो अक्षर; सावन भादव = वर्षा के मास
रामभक्ति को धान की खेती और रामनाम के दोनों अक्षरों को वर्षा ऋतु के दो महीनों के समान बताया गया है, जो फसल को सींचते हैं।
साधना बढ़ने के लिए पोषण और नियमितता चाहिए। बिना दिखावे के रोज़ का नाम-स्मरण मन की भक्ति-भूमि को सिंचित करने वाली वर्षा जैसा है।
दोहा २६ दोहा
नर केसरी = नरसिंह; कनककसिपु = हिरण्यकशिपु; जापक = जप करने वाला; प्रहलाद = भक्त प्रह्लाद
तुलसी रामनाम की तुलना रक्षक नरसिंह से और कलियुग की बाधाओं की तुलना हिरण्यकशिपु से करते हैं; जप करने वाला प्रह्लाद के समान आश्रित है।
यह पुराण-कथा पर आधारित संरक्षण का रूपक है। संदेश है कि विपरीत माहौल में भी श्रद्धा और सत्यनिष्ठा बनाए रखना संभव है।
दोहा २७ दोहा
कामतरु = कल्पवृक्ष; सुरधेनु = कामधेनु; गुरुपद पंकर रेनु = गुरु-चरणों की कमल-धूल
कलियुग में रामनाम को कल्पवृक्ष, रामभक्ति को कामधेनु और गुरु के प्रति श्रद्धा को शुभता का आधार कहा गया है।
नाम, भक्ति और गुरु के प्रति कृतज्ञता—ये तीन सूत्र इस छंद में साथ हैं। ज्ञानदाता का सम्मान तथा साधना की निरंतरता भक्ति को गहराई देती है।
दोहा २८ दोहा
सुमंगल कंद = मंगल की जड़; करतल सिद्धि = हथेली पर प्राप्ति की उपमा; परमानंद = गहरा आनंद
रामनाम को मंगल का मूल बताया गया है; उसका स्मरण साधक के भीतर आनंद और आश्वस्ति का अनुभव जगा सकता है।
यह छंद उपलब्धि को बहुत निकट दिखाने का काव्यात्मक तरीका है। इसकी प्रेरणा सजग स्मरण और निरंतर नैतिक आचरण है, किसी तात्कालिक चमत्कार की गारंटी नहीं।
दोहा २९ दोहा
जथा = जैसे; बीजमय = बीजों से भरी हुई; नखत = नक्षत्र; धरममय = धर्म का सार लिए
जैसे पृथ्वी में असंख्य बीज और आकाश में असंख्य तारों का स्थान है, वैसे ही तुलसी रामनाम में धर्म के अनेक रूप समाहित देखते हैं।
छोटी-सी ध्वनि में व्यापक आध्यात्मिक अर्थ सिमट सकता है। नाम साधक को सत्य, करुणा, संयम और सेवा जैसे गुण याद दिलाने वाला सूत्र बन सकता है।
दोहा ३० दोहा
कामना हीन = निजी लोभ से मुक्त; पियूष = अमृत; मन मीन = मन रूपी मछली
जिनका मन स्वार्थी इच्छाओं से हल्का होकर भक्ति में डूबा है, उनका मन रामनाम-प्रेम के अमृत में मछली की तरह आनंद से रहता है।
मछली का जल से सहज संबंध प्रेम के अनिवार्यत्व का चित्र है। भक्ति यहाँ सौदे की तरह नहीं, स्वाभाविक आत्मिक लगाव के रूप में समझाई गई है।
दोहा ३१ दोहा
ब्रह्म राम तें = ब्रह्म और श्रीराम से भी; वर दायक = वर देने वाला; महेस = शिव
तुलसी नाम की महिमा को इतना श्रेष्ठ बताते हैं कि शिव भी असंख्य रामकथाओं से नाम की सार्थकता पहचानते हैं।
इस दोहे का भाव नाम और नामी में प्रतिद्वंद्विता खड़ी करना नहीं है। भक्त के अनुभव में नाम वह सुलभ सेतु है जिसके सहारे ईश्वर का स्मरण हर समय संभव होता है।
दोहा ३२ दोहा
सबरी = शबरी; गीध = जटायु; सुसेवक = श्रेष्ठ सेवक; अमित = असंख्य
प्रभु राम ने शबरी और जटायु जैसे भक्तों का कल्याण किया; तुलसी कहते हैं कि उनके नाम की महिमा असंख्य अन्य जनों तक पहुँचती है।
रामकथा के विविध पात्रों को याद करने से समझ आता है कि निष्कपट भक्ति और सेवा का आदर सामाजिक प्रतिष्ठा से ऊपर रखा गया है।
दोहा ३३ दोहा
प्रीति = प्रेम; प्रतीति = निश्चय; भरोस = विश्वास; कोस = खजाना
तुलसी कहते हैं कि जिसका रामनाम में प्रेम, दृढ़ विश्वास और भरोसा है, उसके लिए नाम मंगलमय गुणों का खजाना बन जाता है।
केवल यांत्रिक दोहराव और सजीव स्मरण में अंतर है। नाम तब मन का आधार बनता है जब उसके साथ जीवन की दिशा में भी विश्वास हो।
दोहा ३४ दोहा
लंक बिभीषन राज = विभीषण को लंका का राज्य; कपि पति = सुग्रीव; खग मीच = जटायु का अंत
विभीषण, सुग्रीव, हनुमान और जटायु को प्रभु की निकटता मिली; तुलसी स्वयं वैसा रामनाम-प्रेम चाहते हैं।
काव्य के चरित्र अलग-अलग परिस्थितियों से आते हैं। कवि अपने लिए बाहरी पद नहीं, उन्हीं जैसा ईश्वर से आत्मीय संबंध माँगते हैं।
दोहा ३५ दोहा
अमंगल = अशुभ; अघ = पाप; अखिल = सभी; हर = शिव
रामनाम को समस्त अमंगल दूर करने और मंगल बढ़ाने वाला कहकर तुलसी स्मरण कराते हैं कि शिव और वेद-पुराण भी इसकी महिमा कहते हैं।
धार्मिक परंपरा में राम और शिव की भक्ति विरोधी नहीं बनती। यह छंद दोनों के बीच आदर तथा नाम-स्मरण की नैतिक प्रेरणा को व्यक्त करता है।
दोहा ३६ दोहा
प्रीति प्रतीति = प्रेम और भरोसे के साथ; बिधि दाहिनो = भाग्य अनुकूल; अभागेहि = अभाग्य वाले को
प्रेम तथा भरोसे से रामनाम जपने पर निराश मन भी शुभ भविष्य की ओर उन्मुख हो सकता है—तुलसी इसे भाग्य के अनुकूल हो जाने जैसा कहते हैं।
‘भाग्य बदलना’ यहाँ भक्त की आशावान दृष्टि है। अच्छे कर्म, धैर्य और विश्वास के साथ जुड़े नाम-स्मरण से व्यक्ति अपनी परिस्थितियों का सामना बेहतर कर सकता है।
दोहा ३७ दोहा
जल थल नभ = पानी, धरती और आकाश; अग-जग = स्थावर-जंगम; गति = आश्रय
असंख्य जीव इस विस्तृत संसार में अपने-अपने सहारे खोजते हैं; तुलसी जैसे दीन भक्त के लिए रामनाम ही एकमात्र आश्रय है।
विराट जगत और छोटे-से व्यक्ति की तुलना नम्रता पैदा करती है। व्यापक अनिश्चितता में कोई स्थिर मूल्य या आध्यात्मिक सहारा मन को दिशा दे सकता है।
दोहा ३८ दोहा
भरोसो = भरोसा; बल = आत्मबल का आधार; बिस्वास = विश्वास; कुसल = कुशलता
तुलसी के लिए राम ही आश्रय, राम ही बल और रामनाम ही विश्वास है; वे स्मरण करके मंगल और कुशल माँगते हैं।
यहाँ प्रार्थना निर्बलता नहीं, भीतर दृढ़ता खोजने का अभ्यास है। भरोसा व्यक्ति को दायित्व से हटाता नहीं बल्कि साहस से निभाने की प्रेरणा दे सकता है।
दोहा ३९ दोहा
रति = अनुराग; गति = परम आश्रय; दुहुँ दिसि = दोनों ओर, इस लोक और परलोक
रामनाम में प्रेम और विश्वास रखने वाला साधक स्मरण से दोनों लोकों का मंगल चाहता है।
छंद में जीवन के वर्तमान आचरण और अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य को एकसूत्र किया गया है। नाम का प्रभाव शांत दृष्टि और सदाचार में झलकना चाहिए।
खंड ५ · रामप्रेम की व्याकुलता एवं करुणा-प्रार्थना
कठोर भक्तिकाव्य-उपमाएँ, पाँच सोरठे और राम को प्रेमपूर्ण स्वामी मानने का भाव।
दोहा ४० दोहा
रसना साँपिनि = जीभ को साँपिन से तुलना; बदन बिल = मुख रूपी बिल; बाम = प्रतिकूल
तुलसी तीखी उपमा देते हैं कि जो वाणी हरिनाम और शुभ स्मरण से दूर है, उसका जीवन अपने सर्वोत्तम उपयोग से वंचित रह जाता है।
यह कठोर अलंकार है, मनुष्यों को नीचा बताने का आह्वान नहीं। वाणी के अच्छे उपयोग—सत्य, करुणा और स्मरण—पर ध्यान देना इस दोहे की रचनात्मक शिक्षा है।
दोहा ४१ दोहा
हिय = हृदय; द्रवहिं = पिघलते हैं; पुलकइ = रोमांचित होता है
राम को याद कर हृदय में तनिक भी अनुराग न जगने पर तुलसी भावुक अतिशयोक्ति से अपने शरीर और आँखों की सार्थकता पूछते हैं।
भक्तिकाव्य की तीखी भाषा को शाब्दिक शारीरिक निर्देश नहीं समझना चाहिए। संदेश यह है कि केवल औपचारिकता से नहीं, हृदय से स्मरण करने का प्रयत्न हो।
दोहा ४२ दोहा
रन भिरत = युद्ध के लिए जुटते हुए; गुरु पाँय = गुरु के चरण; पुलक = आनंद का रोमांच
तुलसी याद दिलाते हैं कि राम-स्मरण, कठिन कर्तव्य और गुरु-वंदना के समय यदि मन श्रद्धा से भर उठे, तो कर्म अर्थवान होता है।
भाव की अभिव्यक्ति हर व्यक्ति में अलग होती है; किसी पर रोमांच या आँसू आने का दबाव नहीं है। इस छंद का भाव संवेदनशीलता और सच्चे समर्पण से जुड़ा है।
सोरठा ४३ सोरठा
कुलिस = वज्र, अत्यंत कठोर; द्रवइ = पिघले; दादुर = मेंढक
राम के गुण सुनकर जो हृदय कोमल न हो और जो जीभ मंगलमय गुणों का गान न करे, तुलसी उसकी कठोरता को वज्र और निष्फल ध्वनि को मेंढक की बोली कहते हैं।
सोरठा अत्युक्ति के सहारे संवेदनशीलता को महत्त्व देता है। ईश्वर-गुणगान का अर्थ दूसरों के प्रति करुणा और सज्जनता बढ़ना भी है।
सोरठा ४४ सोरठा
सलिल = जल, आँसू; सनेहु = स्नेह; रघुबीर जस = श्रीराम की कीर्ति
तुलसी भावावेश में कहते हैं कि यदि राम की कथा सुनकर आँखों में प्रेम का जल न आए तो ऐसी आँखों का होना उन्हें अधूरा लगता है।
यह सोरठा आंतरिक प्रेम की तीव्र इच्छा दर्शाता है; आँसू भक्ति की अनिवार्य परीक्षा नहीं हैं। करुणा और प्रेम कई शांत रूपों में भी व्यक्त हो सकते हैं।
सोरठा ४५ सोरठा
रावरो = आपका; सुजस = शुभ यश; धूरि = धूल; मूठी = मुट्ठी
श्रीराम का सुयश सुनकर आनंद से भीग न उठने वाली आँखों को कवि कठोर अलंकार से धिक्कारते हैं।
पुराने भक्तिकाव्य में अतिशयोक्ति भाव-प्रबलता व्यक्त करती है, व्यवहार करने का निर्देश नहीं देती। यहाँ अपेक्षा है कि हृदय रामकथा के स्नेह और मर्यादा से सचमुच प्रभावित हो।
सोरठा ४६ सोरठा
बारक = बालक; सम्मुख = सामने; दया सिंधु = दया के समुद्र; सँभारहि = स्मरण या संभालना
तुलसी प्रभु से पूछते हैं—आपका थोड़ा-सा स्मरण भी लोगों को सुख देता है; फिर आप मुझे दीन बालक की तरह क्यों नहीं सँभालते?
इस सोरठे में भगवान से आत्मीय संबंध है। भक्त अपनी कमी स्वीकारते हुए भी करुणा माँगने का अधिकार अनुभव करता है।
सोरठा ४७ सोरठा
साहिब = स्वामी; सरोष = क्रोधयुक्त; सेवक = भक्त; उर धरे = हृदय में रखना
सामान्य स्वामी सेवक की भूल पर नाराज़ हो सकता है; पर राम दया के कारण भक्त की कमियों को वैसा स्थान नहीं देते।
तुलसी सेवा-संबंध को भय के बजाय उदारता के आधार पर देखते हैं। विश्वास का अर्थ अपनी गलतियों को अनदेखा करना नहीं, सुधार का अवसर मिलना है।
दोहा ४८ दोहा
आपु तें = अपने आप से; रुचि = स्नेह, रुचि; सीतापति = सीता के पति राम; पीठि = पीठ फेरना
तुलसी कहते हैं कि राम को अपने से भी अधिक भक्त का प्रेम प्रिय है; ऐसे दयालु सीतापति से कोई कैसे विमुख हो सकता है?
यह भाग का मधुर निष्कर्ष है। स्वामी और भक्त का संबंध औपचारिक सत्ता-संबंध नहीं, परस्पर प्रेम और विश्वास का बंधन बन जाता है।
इस प्रथम भाग से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ
१. ध्यान और सेवा: श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का संयुक्त ध्यान प्रेम, मर्यादा और सहयोग का बोध कराता है। २. नाम-स्मरण और व्यवहार: नाम का दीप मन और वाणी दोनों में प्रकाश लाने की प्रेरणा है। ३. गुरु और सत्संग: जीवन में सही दिशा के लिए विनम्रता और अच्छी संगति आवश्यक हैं। ४. रूपक का सही आशय: कल्पवृक्ष, मछली, खेती और वर्षा जैसी उपमाएँ आध्यात्मिक अनुभव समझाती हैं। ५. रामप्रेम: अंतिम छंद बताते हैं कि भक्ति का मूल भय नहीं, करुणामय संबंध है।
संपूर्ण तुलसी दोहावली — १२ भागों की निर्धारित योजना
क्रम में कोई छंद न छूटे, इसलिए हर लेख अगली संख्या से शुरू होगा। सभी भाग प्रकाशित होने के बाद ही इन्हें भक्ति भावना ग्रंथालय के संयुक्त संग्रह-पेज में जोड़ा जाएगा।
| भाग | छंद क्रमांक | छंद संख्या |
|---|---|---|
| १ | १–४८ | ४८ |
| २ | ४९–९६ | ४८ |
| ३ | ९७–१४४ | ४८ |
| ४ | १४५–१९२ | ४८ |
| ५ | १९३–२४० | ४८ |
| ६ | २४१–२८८ | ४८ |
| ७ | २८९–३३६ | ४८ |
| ८ | ३३७–३८४ | ४८ |
| ९ | ३८५–४३२ | ४८ |
| १० | ४३३–४८० | ४८ |
| ११ | ४८१–५२८ | ४८ |
| १२ | ५२९–५७३ | ४५ |
आगामी लेखों के विषय और शीर्षक संबंधित मूल छंदों को जाँचकर अंतिम रूप देंगे; बिना पढ़े मनगढ़ंत विषय-विभाजन नहीं करेंगे।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
गोस्वामी तुलसीदास की दोहावली में कितने छंद हैं?
प्रचलित गीताप्रेस पाठ में ५७३ क्रमांकित छंद हैं। दोहों के साथ कुछ सोरठे भी सम्मिलित हैं।
इस लेख में कौन-से मूल छंद हैं?
भाग १ में छंद क्रमांक १ से ४८ तक सभी पाठ क्रम में दिए गए हैं; ४३–४७ को सोरठा चिह्नित किया है।
रामनाम मनिदीप वाला प्रसिद्ध दोहा किस क्रमांक पर है?
इस संदर्भ-पाठ में वह क्रमांक ६ पर है। अलग पाठ्यपुस्तकों के चयन-संग्रहों में संख्या भिन्न हो सकती है।
क्या यह गीता प्रेस की टीका की नकल है?
नहीं। मूल प्राचीन काव्य का क्रम संदर्भ से मिलाया गया है, जबकि शब्दार्थ और भावार्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र सरल हिंदी में तैयार किए गए हैं।
जय श्री सीताराम!
इस भाग को धीरे-धीरे पढ़िए। किसी एक दोहे का संदेश भी यदि आचरण में उतरे तो पाठ सार्थक होता है।
अगला भाग: तुलसी दोहावली — छंद ४९ से ९६ (प्रकाशन की तैयारी में)।

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