श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 48 — धनुष-यज्ञशाला में प्रवेश और प्रभु की अनुपम छवि

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 48

धनुष-यज्ञशाला में प्रवेश और प्रभु की अनुपम छवि

इस भाग का प्रसंग: धनुष-यज्ञशाला में प्रवेश और प्रभु की अनुपम छवि।

पाठ-सीमा: दोहा 238 के बाद से 243 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 239 से पहले
नृप सब नखत करहिं उजिआरी । टारि न सकहिं चाप तम भारी ॥
कमल कोक मधुकर खग नाना । हरषे सकल निसा अवसाना ॥
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे । होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ॥
रबि निज उदय ब्याज रघुराया । प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया ॥
तव भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ॥
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने । होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ॥
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए । चरन सरोज सुभग सिर नाए ॥
सतानंदु तब जनक बोलाए । कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई । हरषे बोलि लिए दोउ भाई ॥

सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी कहते हैं कि राजा तारों जैसे हैं; वे धनुष रूपी घने अंधकार को दूर नहीं कर सकते। धनुष टूटने पर आपके भक्त वैसे ही प्रसन्न होंगे जैसे सूर्योदय पर कमल और पक्षी होते हैं। सूर्य ने अपने उदय से आपके प्रताप और धनुषभंग का संकेत दिखाया है। श्रीराम मुस्कुराते हैं। स्नान और नित्यकर्म के बाद दोनों गुरु को प्रणाम करते हैं। जनकजी शतानंदजी के द्वारा धनुष-यज्ञ में आने का निमंत्रण भेजते हैं।

दोहा 239
सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुरु पहिं जाइ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ॥२३९॥

सरल अर्थ: श्रीराम शतानंदजी के चरणों में प्रणाम करके गुरु के पास बैठते हैं। मुनि कहते हैं—तात, चलो, जनकजी ने बुलाया है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 240 से पहले
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई । ईसु काहि धौं देइ बड़ाई ॥
लखन कहा जस भाजनु सोई । नाथ कृपा तव जापर होई ॥
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी । दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला । देखन चले धनुषमख साला ॥
रंगभूमि आए दोउ भाई । असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई ॥
चले सकल गृह काज बिसारी । बाल जुबान जरठ नर नारी ॥
देखी जनक भीर भै भारी । सुचि सेवक सब लिए हँकारी ॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू । आसन उचित देहू सब काहू ॥

सरल भावार्थ: मुनि कहते हैं कि सीता-स्वयंवर देखने चलें, जहाँ ईश्वर किसी को यश देंगे। लक्ष्मणजी उत्तर देते हैं कि यश वही पाएगा जिस पर आपकी कृपा होगी। मुनि प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और दोनों भाइयों के साथ धनुष-यज्ञशाला जाते हैं। उनके आने की खबर सुनकर बालक, युवा, वृद्ध, स्त्री और पुरुष घर के काम छोड़कर पहुँचते हैं। जनकजी सेवकों को सबके लिए उचित आसन देने का आदेश देते हैं।

दोहा 240
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि ॥२४०॥

सरल अर्थ: सेवक विनम्र और मधुर वचन बोलकर सभी स्त्री-पुरुषों को उनके योग्य स्थानों पर बैठाते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 241 से पहले
राजकुअँर तेहि अवसर आए । मनहुँ मनोहरता तन छाए ॥
गुन सागर नागर बर बीरा । सुंदर स्यामल गौर सरीरा ॥
राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
देखहिं रूप महा रनधीरा । मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी । मनहुँ भयानक मूरति भारी ॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा । तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा ॥
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई । नरभूषन लोचन सुखदाई ॥

सरल भावार्थ: दोनों राजकुमार रंगभूमि में आते हैं, मानो मनोहरता ही शरीर धारण करके आई हो। राजा-मंडली में वे तारों के बीच दो पूर्ण चंद्रमाओं जैसे शोभित हैं। सब उन्हें अपनी भावना के अनुसार देखते हैं। वीर उन्हें वीररस की मूर्ति, कुटिल राजा भयावह रूप और राजा का छद्मवेश धारण किए असुर काल के रूप में देखते हैं। नगरवासियों को दोनों भाई मानव समाज के आभूषण और आँखों को सुख देने वाले लगते हैं।

दोहा 241
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ॥२४१॥

सरल अर्थ: स्त्रियाँ अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें आनंद से देखती हैं, मानो अनुपम श्रृंगार रस ने मूर्त रूप धारण कर लिया हो।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 242 से पहले
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा । बहु मुख कर पग लोचन सीसा ॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं । सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ॥
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी । सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ॥
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा । सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ॥
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुख दाता ॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ॥
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ । कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ । तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ॥

सरल भावार्थ: विद्वानों को प्रभु अनेक मुख, हाथ, पाँव और नेत्रों वाले विराट स्वरूप में दिखते हैं। जनकजी के संबंधियों को वे प्रिय स्वजन लगते हैं; राजा और रानी उन्हें बच्चों जैसा स्नेह देते हैं। योगियों को वे शांत, शुद्ध, सम और प्रकाशस्वरूप परम तत्व दिखाई देते हैं। भक्त उन्हें अपने सुखदायक इष्टदेव देखते हैं। सीताजी जिस भाव से श्रीराम को देखती हैं, वह प्रेम और सुख केवल अनुभव किया जा सकता है, कथन से परे है।

दोहा 242
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर ॥२४२॥

सरल अर्थ: राजसभा में कोसलराज के श्याम और गौर किशोर दोनों भाई ऐसे सुशोभित हैं कि सारे संसार के नेत्रों को आकर्षित कर लेते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 243 से पहले
सहज मनोहर मूरति दोऊ । कोटि काम उपमा लघु सोऊ ॥
सरद चंद निंदक मुख नीके । नीरज नयन भावते जी के ॥
चितवत चारु मार मनु हरनी । भावति हृदय जाति नहीं बरनी ॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला । चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा । भृकुटी बिकट मनोहर नासा ॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं । कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई । कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥

सरल भावार्थ: दोनों की सहज मनोहर मूर्ति के आगे करोड़ों कामदेवों की उपमा भी छोटी है। शरद के चंद्रमा को लजाने वाला मुख, कमल जैसे नेत्र और मन हरने वाली दृष्टि सुंदर है। कपोलों पर झूलते कुंडल, सुंदर अधर, मधुर वाणी, उजली हँसी, मनोहर नासिका तथा तिलक शोभित हैं। घुँघराले बाल, पुष्प-कलियों से सजी पीली पगड़ी और शंख जैसे सुंदर कंठ उनकी छवि बढ़ाते हैं।

दोहा 243
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ॥२४३॥

सरल अर्थ: वक्ष पर गजमुक्ता के हार और तुलसी की मालाएँ हैं। वृषभ जैसे कंधे, सिंह जैसी चाल तथा विशाल भुजाएँ उनके बल और सौंदर्य को प्रकट करती हैं।

॥ श्री सीताराम ॥
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