श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 4 | सरस्वती-गंगा, अयोध्या, हनुमान और सीताराम वंदना अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥
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श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड

भाग 4 — सरस्वती-गंगा, अयोध्या, हनुमान और सीताराम वंदना
मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ
गोस्वामी तुलसीदास कृत
भाग 4 का प्रसंग

पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने महर्षि वाल्मीकि, चारों वेद, ब्रह्माजी, देवताओं और विद्वानों की वंदना की थी। अब वे माता सरस्वती और गंगाजी, भगवान शिव और माता पार्वती, श्रीअयोध्यापुरी, सरयूजी, महाराज दशरथ, माता कौसल्या, राजा जनक, भरतजी, लक्ष्मणजी, शत्रुघ्नजी, श्रीहनुमानजी तथा श्रीराम के सभी भक्तों को प्रणाम करते हैं।

अंत में जगज्जननी सीताजी और श्रीरघुनाथजी के चरणों की वंदना करके वे रामनाम की महिमा के अगले महान प्रसंग की भूमिका तैयार करते हैं।
सरस्वती और गंगा वंदना
चौपाई
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥
सरल अर्थ: अब तुलसीदासजी माता सरस्वती और गंगाजी की वंदना करते हैं। दोनों का चरित्र अत्यंत पवित्र और मनोहर है। गंगाजी में स्नान और उनका जल ग्रहण करना पापों को दूर करता है, जबकि सरस्वती अर्थात पवित्र ज्ञान-वाणी का कहना और सुनना अज्ञान को दूर करता है।
भगवान शिव और माता पार्वती की वंदना
चौपाई
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी भगवान शिव और माता पार्वती को अपने गुरु, पिता और माता के समान मानकर प्रणाम करते हैं। वे दीनों के सहायक और दानी हैं। वे श्रीसीताराम के सेवक, स्वामी और सखा के रूप में भी पूज्य हैं तथा तुलसीदासजी का निष्कपट हित करने वाले हैं।
चौपाई
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि कलियुग के जीवों के कल्याण के लिए भगवान शिव और माता पार्वती ने अनेक सरल साधन प्रदान किए। उनकी शक्ति और कृपा से सामान्य दिखने वाले मंत्र भी प्रभावशाली हो जाते हैं।
चौपाई
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी विश्वास करते हैं कि भगवान उमापति शिव उन पर कृपा करेंगे और उनकी यह कथा आनंद और मंगल की जड़ बनेगी। शिव-पार्वती का स्मरण करके और उनका आशीर्वाद प्राप्त करके वे उत्साहपूर्वक श्रीरामचरित का वर्णन करना चाहते हैं।
चौपाई
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान शिव की कृपा से मेरी रचना शोभा पाएगी। जो लोग प्रेम, श्रद्धा और समझ के साथ इस कथा को कहेंगे और सुनेंगे, वे इसके वास्तविक आध्यात्मिक भाव को प्राप्त करेंगे।
चौपाई
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥
सरल अर्थ: ऐसे श्रद्धालु श्रीराम के चरणों में प्रेम करने वाले बनेंगे, कलियुग के दोषों से बचेंगे और शुभ भाग्य के अधिकारी होंगे।
दोहा 15
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥१५॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि भगवान शिव और माता गौरी की कृपा मुझ पर स्वप्न में भी और वास्तव में भी बनी रहे, तो मेरी भाषा और रचना के विषय में जो शुभ फल मैंने कहा है वह सत्य हो।
शिव-पार्वती वंदना का भावार्थ
श्रीरामचरितमानस में भगवान शिव रामभक्ति के महान आचार्य के रूप में बार-बार सामने आते हैं। तुलसीदासजी यहाँ स्पष्ट करते हैं कि वे अपनी काव्य-प्रतिभा से अधिक शिव-पार्वती की कृपा पर भरोसा करते हैं। भक्ति में विनम्रता और कृपा का यह भाव मानस की मूल धारा है।
अयोध्यापुरी और सरयूजी की वंदना
चौपाई
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी परम पवित्र अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों को दूर करने वाली सरयू नदी की वंदना करते हैं। वे अयोध्या के उन सभी नर-नारियों को भी प्रणाम करते हैं जिन पर भगवान श्रीराम का विशेष स्नेह है।
चौपाई
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥
सरल अर्थ: भगवान श्रीराम ने अपने भक्तों और अयोध्यावासियों का कल्याण किया और उन्हें दुःख से रहित परम मंगलमय अवस्था प्रदान की।
माता कौसल्या और महाराज दशरथ की वंदना
चौपाई
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी माता कौसल्या को पूर्व दिशा के समान मानकर प्रणाम करते हैं। जैसे पूर्व दिशा से चंद्रमा उदय होता है, वैसे ही माता कौसल्या से श्रीरामरूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुए, जो संसार को सुख देने वाले हैं।
चौपाई
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी महाराज दशरथ और उनकी सभी रानियों को पुण्य और मंगल की मूर्ति मानकर मन, वचन और कर्म से प्रणाम करते हैं तथा स्वयं को उनका सेवक और पुत्रवत मानकर कृपा की प्रार्थना करते हैं।
चौपाई
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥
सरल अर्थ: जिन्हें श्रीराम के माता-पिता बनने का सौभाग्य मिला, उनकी रचना करके स्वयं ब्रह्माजी का भी गौरव बढ़ा। उनकी महिमा का पूरा वर्णन करना संभव नहीं है।
सोरठा 16
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥१६॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी अयोध्या के राजा दशरथ को प्रणाम करते हैं, जिनका श्रीराम के चरणों में सच्चा प्रेम था। प्रिय श्रीराम से वियोग होने पर उन्होंने अपने शरीर को तिनके के समान त्याग दिया।
राजा जनक, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की वंदना
चौपाई
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी राजा जनक और उनके परिवार को प्रणाम करते हैं। राजा जनक के हृदय में श्रीराम के चरणों के प्रति अत्यंत गहरा प्रेम था। उनका यह प्रेम ज्ञान और वैराग्य के भीतर छिपा था, जो श्रीराम के दर्शन होते ही प्रकट हो गया।
चौपाई
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी सबसे पहले भरतजी के चरणों को प्रणाम करते हैं, जिनके नियम और व्रत का वर्णन करना कठिन है। उनका मन श्रीराम के चरणकमलों से ऐसा जुड़ा है जैसे प्रेम में मग्न भौंरा कमल को छोड़ना नहीं चाहता।
चौपाई
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता॥
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी लक्ष्मणजी के चरणकमलों की वंदना करते हैं। वे भक्तों को सुख देने वाले और श्रीराम की निर्मल कीर्तिरूपी पताका के दंड के समान सदा उनके साथ रहने वाले हैं।
चौपाई
सेष सहस्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार माना गया है। तुलसीदासजी उनसे प्रार्थना करते हैं कि कृपा के समुद्र और गुणों के भंडार सुमित्रानंदन लक्ष्मणजी सदा उन पर अनुकूल रहें।
चौपाई
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी शत्रुघ्नजी के चरणकमलों को प्रणाम करते हैं। वे वीर, सुशील और भरतजी के प्रति अत्यंत समर्पित हैं।
श्रीहनुमानजी की वंदना
चौपाई
महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी महावीर श्रीहनुमानजी से विनती करते हैं, जिनकी महान भक्ति और सेवा की प्रशंसा स्वयं भगवान श्रीराम ने की।
सोरठा 17
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥
सरल अर्थ: मैं पवनपुत्र श्रीहनुमानजी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टतारूपी वन को जलाने वाली अग्नि और ज्ञान के भंडार हैं। उनके हृदयरूपी मंदिर में धनुष-बाण धारण किए भगवान श्रीराम सदा निवास करते हैं।
हनुमान वंदना का भावार्थ
तुलसीदासजी के लिए श्रीहनुमान केवल पराक्रम के प्रतीक नहीं हैं। वे ज्ञान, निष्काम सेवा, रामभक्ति और विनम्रता के आदर्श हैं। उनके हृदय में श्रीराम का निवास होना इस बात का प्रतीक है कि सच्चे भक्त का मन स्वयं भगवान का मंदिर बन जाता है।
श्रीराम के समस्त भक्तों की वंदना
चौपाई
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी वानरराज सुग्रीव, जाम्बवान, विभीषण, अंगद तथा श्रीराम के अन्य सभी सहयोगियों के चरणों की वंदना करते हैं। सामान्य शरीर प्राप्त होने पर भी उन्होंने श्रीराम की कृपा प्राप्त की।
चौपाई
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥
सरल अर्थ: पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य अथवा असुर— जितने भी निष्काम भाव से श्रीराम के चरणों के उपासक हैं, तुलसीदासजी उन सभी के चरणकमलों की वंदना करते हैं।
चौपाई
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी शुकदेवजी, सनकादिक, नारदजी और अन्य ज्ञान-विज्ञान में निपुण भक्त मुनियों को मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं और उनसे अपने ऊपर कृपा की प्रार्थना करते हैं।
जगज्जननी सीताजी की वंदना
चौपाई
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी राजा जनक की पुत्री और सम्पूर्ण जगत की माता श्रीजानकीजी की वंदना करते हैं, जो करुणानिधान भगवान श्रीराम को अत्यंत प्रिय हैं। वे उनके दोनों चरणकमलों को प्रणाम करके निर्मल बुद्धि प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।
श्रीरामजी की वंदना
चौपाई
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥
राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक॥
सरल अर्थ: अंत में तुलसीदासजी मन, वचन और कर्म से श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों की वंदना करते हैं। कमल जैसे नेत्रों वाले, धनुष-बाण धारण करने वाले श्रीराम भक्तों की विपत्तियों को दूर करने और उन्हें सुख प्रदान करने वाले हैं।
दोहा 18
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥१८॥
सरल अर्थ: वाणी और उसके अर्थ का संबंध जल और उसकी लहर के समान है— वे कहने में अलग लगते हैं, पर वास्तव में एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। उसी प्रकार सीता और राम अभिन्न हैं। तुलसीदासजी उन श्रीसीताराम के चरणों की वंदना करते हैं, जो दुःखी और शरणागत जीवों को अत्यंत प्रिय हैं।
इस पूरे भाग का भावार्थ
इस भाग में श्रीरामचरितमानस की वंदना-परंपरा अपने पूर्ण विस्तार पर दिखाई देती है। तुलसीदासजी ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती और पवित्रता की प्रतीक गंगाजी से आरंभ करके शिव-पार्वती, अयोध्या, सरयू, श्रीराम के माता-पिता और सम्पूर्ण रामपरिवार को प्रणाम करते हैं।

भरतजी में निष्काम प्रेम, लक्ष्मणजी में सेवा और समर्पण, शत्रुघ्नजी में विनय तथा श्रीहनुमानजी में ज्ञान और अद्वितीय रामभक्ति का दर्शन होता है।

इसके बाद तुलसीदासजी सामाजिक अथवा शारीरिक भेद से ऊपर उठकर उन सभी जीवों को प्रणाम करते हैं जिन्हें श्रीराम की भक्ति प्राप्त हुई। अंततः माता सीता और श्रीराम को वाणी और अर्थ के समान अभिन्न बताते हुए उनकी संयुक्त वंदना करते हैं।

यहीं से आगे रामचरितमानस का अत्यंत प्रसिद्ध “श्रीराम नाम की महिमा” वाला प्रसंग प्रारंभ होता है।
भाग 4 का सार

सरस्वती और गंगाजी की वंदना → शिव-पार्वती की कृपा → अयोध्या और सरयू वंदना → माता कौसल्या और महाराज दशरथ → राजा जनक → भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न → श्रीहनुमानजी → श्रीराम के समस्त भक्त → माता जानकी → श्रीसीताराम की संयुक्त वंदना।

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