श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 4 | सरस्वती-गंगा, अयोध्या, हनुमान और सीताराम वंदना अर्थ सहित

🚩 भक्ति भावना प्रस्तुत
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड • भाग 4
सरस्वती-गंगा • अयोध्या • रामपरिवार • हनुमान • सीताराम वंदना
इस भाग में सरस्वती-गंगा वंदना से लेकर दोहा 18 में श्रीसीताराम की संयुक्त वंदना तक का प्रसंग क्रमबद्ध रूप से दिया गया है। मूल पाठ बड़े ग्रंथ-अक्षरों में तथा नीचे सरल हिंदी अर्थ के साथ है।
सरस्वती और गंगा वंदना
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी माता सरस्वती और गंगाजी की वंदना करते हैं। गंगाजी का पवित्र जल पापों को हरने वाला और सरस्वती की ज्ञानमयी वाणी अज्ञान को दूर करने वाली कही गई है।
शिव-पार्वती वंदना
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके॥
सरल अर्थ — भगवान शिव और माता पार्वती को गुरु, माता-पिता और निष्कपट हितैषी मानकर प्रणाम किया गया है।
शिव-कृपा
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥
सरल अर्थ — कलियुग में जीवों के कल्याण के लिए शिव-पार्वती की कृपा और शिव-प्रताप की महिमा का वर्णन है।
रामकथा के लिए कृपा
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी शिव-पार्वती का स्मरण करके उनकी कृपा से आनंदपूर्वक रामचरित का वर्णन करने की अभिलाषा व्यक्त करते हैं।
कथा का प्रभाव
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥
सरल अर्थ — शिव-कृपा से रचना शोभा पाएगी और प्रेम व समझ के साथ कथा कहने-सुनने वाले उसके आध्यात्मिक भाव को ग्रहण करेंगे।
रामचरण अनुराग
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥
सरल अर्थ — श्रद्धापूर्वक रामकथा का आस्वादन करने वाले रामचरणों में प्रेम और मंगल के अधिकारी बनते हैं।
दोहा 15
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥१५॥
सरल अर्थ — कवि प्रार्थना करते हैं कि शिव-गौरी की कृपा से उनकी भाषा और रचना के विषय में कहा गया शुभ प्रभाव सत्य हो।
अयोध्या और सरयू वंदना
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥
सरल अर्थ — पवित्र अयोध्यापुरी, सरयूजी और उन अयोध्यावासियों को प्रणाम है जिन पर श्रीराम का विशेष स्नेह है।
अयोध्यावासियों का मंगल
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥
सरल अर्थ — श्रीराम ने अयोध्यावासियों का कल्याण करके उन्हें दुःख से रहित मंगलमय अवस्था प्रदान की।
माता कौसल्या वंदना
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥
सरल अर्थ — माता कौसल्या को पूर्व दिशा की उपमा दी गई है, जिनसे श्रीरामरूपी सुंदर चंद्रमा प्रकट हुए।
दशरथ और रानियों की वंदना
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥
सरल अर्थ — महाराज दशरथ और उनकी रानियों को पुण्य और मंगल की मूर्ति मानकर मन-वचन-कर्म से प्रणाम किया गया है।
राम के माता-पिता की महिमा
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥
सरल अर्थ — श्रीराम के माता-पिता बनने का सौभाग्य इतना महान है कि उनकी महिमा का पूर्ण वर्णन कठिन है।
सोरठा 16
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥१६॥
सरल अर्थ — महाराज दशरथ के श्रीराम के प्रति सत्य प्रेम की वंदना है; राम-वियोग में उन्होंने शरीर तक त्याग दिया।
राजा जनक वंदना
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥
सरल अर्थ — राजा जनक का श्रीराम के प्रति गहरा प्रेम उनके ज्ञान-वैराग्य के भीतर छिपा था, जो रामदर्शन पर प्रकट हुआ।
भरतजी वंदना
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥
सरल अर्थ — भरतजी के नियम, व्रत और श्रीराम के चरणों के प्रति अनन्य प्रेम को प्रणाम किया गया है।
लक्ष्मणजी वंदना
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता॥
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥
सरल अर्थ — लक्ष्मणजी को भक्तों को सुख देने वाला और श्रीराम की निर्मल कीर्तिरूपी पताका का दंड कहा गया है।
लक्ष्मणजी की महिमा
सेष सहस्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥
सरल अर्थ — सुमित्रानंदन लक्ष्मणजी से कवि सदा अनुकूल और कृपालु रहने की प्रार्थना करते हैं।
शत्रुघ्नजी वंदना
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥
सरल अर्थ — वीर, सुशील और भरतजी के अनुगामी शत्रुघ्नजी के चरणकमलों को प्रणाम है।
श्रीहनुमानजी वंदना
महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥
सरल अर्थ — महावीर हनुमानजी की वंदना है, जिनकी भक्ति और सेवा की प्रशंसा स्वयं श्रीराम ने की।
सोरठा 17
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥
सरल अर्थ — पवनपुत्र हनुमानजी ज्ञान के भंडार और दुष्टतारूपी वन के लिए अग्नि हैं; उनके हृदय में धनुष-बाणधारी श्रीराम निवास करते हैं।
श्रीराम के सहयोगियों की वंदना
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥
सरल अर्थ — सुग्रीव, जाम्बवान, विभीषण, अंगद और श्रीराम के अन्य सहयोगियों के चरणों की वंदना की गई है।
समस्त रामभक्तों की वंदना
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥
सरल अर्थ — जाति या योनि के भेद से परे, निष्काम भाव से श्रीराम के चरणों की उपासना करने वाले सभी भक्तों को प्रणाम है।
भक्त मुनियों की वंदना
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥
सरल अर्थ — शुकदेवजी, सनकादिक, नारदजी और अन्य भक्त मुनियों को मस्तक झुकाकर प्रणाम और कृपा की प्रार्थना की गई है।
जगज्जननी सीताजी की वंदना
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
सरल अर्थ — जगत्-जननी जानकीजी के चरणों की वंदना करके निर्मल बुद्धि की प्रार्थना की गई है।
श्रीरामजी की वंदना
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक॥
राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक॥
सरल अर्थ — मन, वचन और कर्म से श्रीराम के चरणकमलों की वंदना है; वे भक्तों की विपत्ति हरने और सुख देने वाले हैं।
दोहा 18
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥१८॥
सरल अर्थ — वाणी और अर्थ जल और लहर की तरह कहने में अलग, पर वास्तव में अभिन्न हैं। उसी प्रकार सीता-राम की संयुक्त वंदना की गई है।
🌺 भाग 4 का भाव-संदेश
इस वंदना-क्रम में ज्ञान, कृपा, जन्मभूमि, परिवार, सेवा, निष्काम भक्ति और सीता-राम की अभिन्नता एक सूत्र में जुड़ती है। भरतजी का प्रेम, लक्ष्मणजी की सेवा और श्रीहनुमानजी की रामभक्ति साधक के लिए आदर्श रूप में सामने आती है।
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बालकाण्ड भाग 5 — श्रीराम नाम की महिमा और नाम-रूप का रहस्य
॥ श्री सीताराम ॥ 🚩
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