श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 3 | तुलसीदासजी की विनम्रता, कवि वंदना और वाल्मीकि-वेद वंदना अर्थ सहित
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श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड • भाग 3
तुलसी-विनय • काव्य-विनय • रामनाम की महिमा
यह भाग पिछले भाग के दोहा 7(ख) के ठीक बाद दोहा 7(ग) से आगे बढ़ता है। मूल पाठ को बड़े ग्रंथ-अक्षरों में और प्रत्येक खंड के नीचे सरल हिंदी अर्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है।
दोहा 7(ग)
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥७(ग)॥
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥७(ग)॥
सरल अर्थ — समस्त जड़-चेतन जगत को श्रीराममय मानकर तुलसीदासजी सबके चरणों में हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।
दोहा 7(घ)
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७(घ)॥
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७(घ)॥
सरल अर्थ — देव, दानव, मनुष्य, नाग, पक्षी, पितर, गंधर्व, किन्नर और राक्षस—सबसे वे कृपा की प्रार्थना करते हैं।
तुलसीदासजी की विनय
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
सरल अर्थ — चौरासी लाख योनियों में स्थित समस्त जीवों और पूरे जगत को सीता-राममय जानकर वे प्रणाम करते हैं।
तुलसीदासजी की विनय
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही॥
सरल अर्थ — वे अपनी बुद्धि और बल पर अभिमान न करके सभी से कृपा की विनती करते हैं।
रघुपति गुणगान की अभिलाषा
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥
सरल अर्थ — श्रीराम के अथाह चरित्र का गान करने की इच्छा विशाल है, जबकि कवि अपनी बुद्धि को अत्यंत छोटी मानते हैं।
विनम्रता
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी अपनी बड़ी अभिलाषा और सीमित सामर्थ्य को स्वीकार करते हुए सज्जनों से क्षमा और स्नेहपूर्ण श्रवण की आशा करते हैं।
सज्जनों की उदारता
जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥
सरल अर्थ — जैसे माता-पिता बालक की तुतली वाणी भी प्रेम से सुनते हैं, वैसे ही सज्जन प्रेम से सुनते हैं; कुटिल व्यक्ति दोष खोजता है।
परकाव्य की प्रशंसा
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥
सरल अर्थ — अपनी रचना सबको प्रिय लगती है, पर दूसरे की रचना सुनकर सच्चे मन से प्रसन्न होने वाले उदार लोग विरले हैं।
सज्जन का स्वभाव
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥
सरल अर्थ — सज्जन समुद्र की तरह दूसरे की पूर्णता और उन्नति देखकर भी आनंदित होते हैं।
दोहा 8
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास॥८॥
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास॥८॥
सरल अर्थ — कवि का विश्वास है कि सज्जन कथा सुनकर सुख पाएँगे, जबकि दुष्ट उपहास कर सकते हैं।
उपहास पर विनय
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥
सरल अर्थ — निर्मल बात का उपहास भी कवि अपने हित में मानते हैं और आलोचना से विचलित नहीं होते।
रामकथा का रस
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥
सरल अर्थ — जिन्हें न काव्यरस में रुचि है न रामचरणों में प्रेम, उनके लिए यह हास्य का विषय हो सकता है; कवि इसे सहज भाव से स्वीकारते हैं।
रामकथा की मधुरता
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी॥
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की॥
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की॥
सरल अर्थ — हरि-हर के चरणों में प्रेम और कुतर्क से रहित बुद्धि रखने वालों को श्रीराम की कथा मधुर लगती है।
कवि की दीनता
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥
सरल अर्थ — कवि स्वयं को विद्या और वाणी में प्रवीण न मानकर रामभक्ति को ही अपनी रचना का आभूषण बताते हैं।
काव्य के अंग
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥
सरल अर्थ — काव्य में अक्षर, अर्थ, अलंकार, छंद, भाव, रस और गुण-दोष के अनेक रूप होते हैं।
काव्य-विनय
कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि उन्हें अपने काव्य-विवेक का कोई अभिमान नहीं है।
दोहा 9
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक॥९॥
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक॥९॥
सरल अर्थ — वे कहते हैं कि उनकी रचना में एक विश्वविख्यात गुण अवश्य है—उसमें श्रीराम का नाम और यश है।
रामनाम की महिमा
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
सरल अर्थ — श्रीराम का नाम वेद-पुराणों का सार, परम पवित्र, मंगल का धाम और अमंगल का नाश करने वाला बताया गया है।
रामनाम से कविता की शोभा
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी॥
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी॥
सरल अर्थ — श्रेष्ठ रचना भी रामनाम के बिना पूर्ण शोभा नहीं पाती—इसे सुंदर उपमा द्वारा समझाया गया है।
संत गुणग्राही हैं
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥
सरल अर्थ — संत भौंरे की तरह गुण ग्रहण करते हैं; साधारण रचना में भी रामनाम हो तो उसका आदर करते हैं।
रामप्रताप का भरोसा
जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा॥
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा॥
सरल अर्थ — कवि का भरोसा अपने साहित्यिक कौशल पर नहीं, श्रीराम के प्रताप और सत्संग की महिमा पर है।
सुसंग की महिमा
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥
सरल अर्थ — जैसे अगरु के संग से धुआँ सुगंधित हो जाता है, वैसे ही रामकथा की संगति साधारण वाणी को भी मंगलमय बना देती है।
हरिगीतिका छंद
मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की॥
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी॥
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी॥
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
सरल अर्थ — रघुनाथजी की कथा कलियुग के मल को हरने वाली है। प्रभु के सुयश की संगति से साधारण कविता भी सज्जनों को प्रिय और पवित्र लगती है।
दोहा 10(क)
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥१०(क)॥
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥१०(क)॥
सरल अर्थ — रामयश की संगति से रचना प्रिय हो जाती है, जैसे मलय पर्वत की संगति से साधारण लकड़ी भी चंदन-समान आदर पाती है।
दोहा 10(ख)
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥१०(ख)॥
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥१०(ख)॥
सरल अर्थ — जैसे काली गाय का उज्ज्वल गुणकारी दूध सभी ग्रहण करते हैं, वैसे ही लोकभाषा में सीता-राम का यश ज्ञानी प्रेम से सुनते हैं।
🌺 भाग 3 का भाव-संदेश
तुलसीदासजी की विनम्रता बताती है कि रामकथा का आधार अहंकार नहीं, प्रभु-कृपा है। साधारण वाणी भी श्रीराम के नाम और यश की संगति से मंगलमय बन जाती है।
🙏 और भक्ति सामग्री
॥ श्री सीताराम ॥ 🚩
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