श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 37 — रावण के अत्याचार, देवताओं की पुकार और श्रीराम जन्म

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 37

रावण के अत्याचार • पृथ्वी की पुकार • अवतार-वचन • पुत्रेष्टि यज्ञ • श्रीराम जन्म

भाग 36 दोहा 180 पर समाप्त हुआ था। यह लंबा भाग उसी के ठीक बाद “कामरूप जानहिं सब माया…” से आरंभ होकर श्रीराम जन्म के पावन प्रसंग और दोहा 192 तक जाता है। प्रत्येक चौपाई, दोहा, सोरठा और छन्द का अलग कार्ड तथा अलग सरल अर्थ रखा गया है।
चौपाई
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥
सरल अर्थ: राक्षस इच्छानुसार रूप बदलने और माया करने में समर्थ थे। एक बार रावण ने सभा में अपने विशाल परिवार और शक्ति को देखा।
चौपाई
सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥
सरल अर्थ: अपनी असंख्य संतानों, संबंधियों और सेना को देखकर रावण का अभिमान और बढ़ गया।
चौपाई
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥
ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥
सरल अर्थ: रावण ने राक्षसों को देवताओं के विरुद्ध उकसाया और उनकी शक्ति को चुनौती दी।
चौपाई
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥
द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥
सरल अर्थ: उसने यज्ञ, हवन, श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन जैसे धर्मकर्मों में बाधा डालने की दुष्ट योजना बताई।
दोहा 181
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥१८१॥
सरल अर्थ: रावण का विचार था कि धर्मकर्म रुकने से देवता दुर्बल होंगे और तब उन्हें अधीन करना सरल होगा।
चौपाई
मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥
सरल अर्थ: रावण ने मेघनाद को बुलाकर शक्तिशाली देवताओं से युद्ध करने को उकसाया।
चौपाई
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँघी॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्हीं। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥
सरल अर्थ: उसने देवताओं को परास्त कर बाँधकर लाने का आदेश दिया और स्वयं भी युद्ध के लिए निकल पड़ा।
चौपाई
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥
सरल अर्थ: रावण के अभियान से भय फैल गया और देवता सुरक्षित स्थानों की ओर हटने लगे।
चौपाई
दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥
सरल अर्थ: रावण ने दिक्पालों के लोक खाली पाए और गर्वपूर्वक देवताओं को ललकारा।
चौपाई
रन मद मत्त फिरइ गज धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥
सरल अर्थ: युद्ध के मद में वह अपने समान प्रतिद्वंद्वी खोजता फिरा और अनेक लोकपाल उसके भय से दबे रहे।
चौपाई
किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥
सरल अर्थ: किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देव और नाग—बहुतों पर रावण ने बलपूर्वक अपना प्रभाव स्थापित किया।
चौपाई
आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥
सरल अर्थ: भयभीत लोग उसकी आज्ञा मानने और विवश होकर उसके सामने झुकने लगे।
दोहा 182 (क)
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥१८२ (क)॥
सरल अर्थ: रावण ने बाहुबल से संसार को अपने प्रभाव में कर लिया और स्वतंत्रता को दबा दिया।
दोहा 182 (ख)
देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि।
जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि॥१८२ (ख)॥
सरल अर्थ: यह पंक्ति रावण के बलपूर्वक विस्तार और उसके अहंकार की चरम अवस्था दिखाती है।
चौपाई
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥
सरल अर्थ: मेघनाद और दूसरे राक्षस रावण की आज्ञाओं का तेजी से पालन करते थे।
चौपाई
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥
करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥
सरल अर्थ: राक्षस माया और भयंकर रूपों से देवताओं तथा सज्जनों को पीड़ा देने लगे।
चौपाई
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥
सरल अर्थ: वे धर्म की जड़ काटने और धार्मिक जीवन को नष्ट करने वाले कार्य करते थे।
चौपाई
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहु सुनिअ न बेद पुराना॥
सरल अर्थ: उनके आतंक से शुभ आचरण, गुरु-सम्मान, भक्ति, यज्ञ, तप और ज्ञान का वातावरण दब गया।
छन्द
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
सरल अर्थ: रावण धर्म और साधना को दबाता था। उसके आतंक से धार्मिक आचरण और वेद-पुराण की वाणी भी संकट में पड़ गई।
सोरठा 183
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥१८३॥
सरल अर्थ: राक्षसों की घोर अनीति और हिंसा की सीमा का वर्णन करना कठिन बताया गया है।
चौपाई
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥
सरल अर्थ: अधर्म बढ़ने से समाज में चोरी, दुराचार और माता-पिता, देवता तथा संतों के प्रति अनादर फैल गया।
चौपाई
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥
सरल अर्थ: शिवजी पार्वती से कहते हैं कि धर्म की ऐसी हानि देखकर पृथ्वी अत्यंत व्याकुल हो गई।
चौपाई
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥
सरल अर्थ: पृथ्वी कहती है कि पर्वत-समुद्र से अधिक भारी भार परद्रोही और अधर्मी का है।
चौपाई
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥
निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥
सरल अर्थ: पृथ्वी गौ का रूप लेकर देवताओं और मुनियों के पास गई और रोकर अपना दुःख सुनाया।
छन्द
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥
सरल अर्थ: देवता, मुनि और गंधर्व पृथ्वी को लेकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी ने परमात्मा की शरण लेने का मार्ग बताया।
सोरठा 184
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥१८४॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी ने पृथ्वी से धैर्य रखकर श्रीहरि का स्मरण करने को कहा।
चौपाई
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥
सरल अर्थ: देवता विचार करने लगे कि भगवान को कहाँ पुकारा जाए—बैकुंठ में या क्षीरसागर में।
चौपाई
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेउँ॥
सरल अर्थ: शिवजी बताते हैं कि भगवान भक्त के प्रेम और भक्ति के अनुरूप प्रकट होते हैं।
चौपाई
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
सरल अर्थ: भगवान सर्वव्यापक हैं और प्रेम से उनका अनुभव होता है; कोई स्थान उनसे रहित नहीं है।
चौपाई
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥
मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥
सरल अर्थ: भगवान चराचर में व्याप्त होकर भी निर्लिप्त हैं और प्रेम से अग्नि की तरह प्रकट होते हैं।
दोहा 185
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥१८५॥
सरल अर्थ: शिवजी की बात सुनकर ब्रह्माजी प्रेम से पुलकित हुए और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
छन्द
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी भगवान को शरणागत-पालक, गौ-ब्राह्मण हितकारी और दीनदयालु कहकर कृपा की प्रार्थना करते हैं।
छन्द
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥
सरल अर्थ: भगवान को अविनाशी, अंतर्यामी, सर्वव्यापक, परमानंद और मायातीत कहकर स्तुति की जाती है।
छन्द
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥
सरल अर्थ: देवता अपनी सीमाएँ स्वीकार कर मन-वचन-कर्म से भगवान की शरण लेते हैं।
छन्द
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥
सरल अर्थ: देवता भगवान के अगम स्वरूप और दीनों पर उनकी करुणा का स्मरण कर चरणों में नमस्कार करते हैं।
दोहा 186
जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह॥१८६॥
सरल अर्थ: देवताओं और पृथ्वी की प्रार्थना सुनकर गंभीर दिव्य वाणी हुई जिसने उनका शोक और संदेह दूर किया।
चौपाई
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥
सरल अर्थ: भगवान आश्वासन देते हैं कि वे देवताओं के हित के लिए सूर्यवंश में मनुष्य रूप में अवतार लेंगे।
चौपाई
कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नर भूपा॥
सरल अर्थ: कश्यप और अदिति को दिए पूर्व वर के अनुसार वे दशरथ और कौसल्या के रूप में अयोध्या में जन्म ले चुके हैं।
चौपाई
तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥
सरल अर्थ: भगवान कहते हैं कि वे दशरथ के घर चार भाइयों के रूप में प्रकट होंगे और अपनी परम शक्ति सहित अवतार लेंगे।
चौपाई
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥
गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना॥
सरल अर्थ: भगवान पृथ्वी का भार दूर करने का वचन देते हैं और देवताओं को निर्भय करते हैं।
चौपाई
तब ब्रह्माँ धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी ने पृथ्वी को समझाया और भगवान के वचन से उसमें भरोसा आया।
दोहा 187
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥१८७॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी देवताओं को वानर रूप धारण कर पृथ्वी पर भगवान की सेवा में सहयोग करने का निर्देश देते हैं।
चौपाई
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥
सरल अर्थ: देवता अपने लोकों को लौटे और ब्रह्माजी की आज्ञा के अनुसार अवतार-कार्य की तैयारी करने लगे।
चौपाई
बनचर देह धरी छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं॥
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥
सरल अर्थ: देवताओं ने शक्तिशाली वानर रूप धारण किए और भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।
चौपाई
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥
सरल अर्थ: वानर सेनाएँ पर्वतों और वनों में फैल गईं और कथा अयोध्या के प्रसंग पर लौटती है।
चौपाई
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥
सरल अर्थ: अयोध्या के राजा दशरथ धर्मनिष्ठ, गुणवान, ज्ञानी और भगवान के भक्त थे।
दोहा 188
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥१८८॥
सरल अर्थ: कौसल्या आदि रानियाँ पवित्र आचरण वाली और भगवान के चरणों में दृढ़ प्रेम रखने वाली थीं।
चौपाई
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥
सरल अर्थ: एक दिन दशरथ को पुत्र न होने का दुःख हुआ और वे गुरु वशिष्ठ के पास विनती करने गए।
चौपाई
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥
सरल अर्थ: वशिष्ठजी ने राजा को धैर्य देकर चार पुत्र होने का आश्वासन दिया।
चौपाई
सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥
सरल अर्थ: वशिष्ठजी ने श्रृंगी ऋषि से पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया और अग्निदेव दिव्य हविष्यान्न लेकर प्रकट हुए।
चौपाई
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥
सरल अर्थ: अग्निदेव ने राजा से हवि को उचित भागों में रानियों को बाँटने को कहा।
दोहा 189
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥१८९॥
सरल अर्थ: अग्निदेव अंतर्धान हुए और दशरथ का हृदय परम आनंद से भर गया।
चौपाई
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं॥
अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥
सरल अर्थ: राजा ने रानियों को बुलाकर हविष्यान्न का आधा भाग कौसल्या को दिया।
चौपाई
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥
सरल अर्थ: शेष में से कैकेयी को भाग दिया और फिर कौसल्या-कैकेयी की सहमति से सुमित्रा को भाग दिया।
चौपाई
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥
सरल अर्थ: रानियाँ गर्भवती हुईं और भगवान के गर्भ में आने से लोकों में मंगल और आनंद छा गया।
चौपाई
मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। सोभा सील तेज की खानीं॥
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥
सरल अर्थ: कुछ समय सुखपूर्वक बीता और भगवान के प्राकट्य का पवित्र समय आ पहुँचा।
दोहा 190
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥१९०॥
सरल अर्थ: योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि अनुकूल हुए और चर-अचर जगत श्रीराम जन्म के आनंद से भर उठा।
चौपाई
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
सरल अर्थ: चैत्र शुक्ल नवमी के अभिजित मुहूर्त में मध्याह्न का पवित्र समय आया।
चौपाई
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥
सरल अर्थ: प्रकृति मंगलमय हो उठी; शीतल सुगंधित पवन बहा और देव-संत प्रसन्न हुए।
चौपाई
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी और देवता विमानों से आए और आकाश मंगलगान से भर गया।
चौपाई
बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥
सरल अर्थ: पुष्पवर्षा हुई, दुंदुभियाँ बजीं और देवता-मुनि प्रभु की स्तुति करने लगे।
दोहा 191
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥१९१॥
सरल अर्थ: देवता प्रार्थना कर अपने लोकों को लौटे और जगत को शांति देने वाले प्रभु प्रकट हुए।
छन्द
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
सरल अर्थ: कृपालु प्रभु कौसल्या के सामने दिव्य रूप में प्रकट हुए; उनका अद्भुत श्याम स्वरूप देखकर माता आनंद से भर गईं।
छन्द
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥
सरल अर्थ: कौसल्या हाथ जोड़कर अनंत, मायातीत और करुणामय भगवान की स्तुति करती हैं।
छन्द
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥
सरल अर्थ: माता को प्रभु की विराट सत्ता का बोध होता है; प्रभु उन्हें पुत्र-प्रेम की लीला का आनंद देने के लिए समझाते हैं।
छन्द
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥
सरल अर्थ: कौसल्या प्रभु से दिव्य रूप छोड़कर बाललीला करने की प्रार्थना करती हैं और प्रभु शिशु रूप में लीला आरंभ करते हैं।
दोहा 192
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥१९२॥
सरल अर्थ: ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के हित के लिए भगवान ने मनुष्य अवतार लिया; उनका दिव्य स्वरूप उनकी अपनी इच्छा से प्रकट और माया-गुणों से परे है।

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