श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 37 — रावण के अत्याचार, देवताओं की पुकार और श्रीराम जन्म
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 37 रावण के अत्याचार • पृथ्वी की पुकार • अवतार-वचन • पुत्रेष्टि यज्ञ • श्रीराम जन्म भाग 36 दोहा 180 पर समाप्त हुआ था। यह लंबा भाग उसी के ठीक बाद “कामरूप जानहिं सब माया…” से आरंभ होकर श्रीराम जन्म के पावन प्रसंग और दोहा 192 तक जाता है। प्रत्येक चौपाई, दोहा, सोरठा और छन्द का अलग कार्ड तथा अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥ सरल अर्थ: राक्षस इच्छानुसार रूप बदलने और माया करने में समर्थ थे। एक बार रावण ने सभा में अपने विशाल परिवार और शक्ति को देखा। चौपाई सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥ सरल अर्थ: अपनी असंख्य संतानों, संबंधियों और सेना को देखकर रावण का अभिमान और बढ़ गया। चौपाई सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥ सरल अर्थ: रावण ने राक्षसों को देवताओं के विरुद्ध उकसाया और उनकी शक्ति को चुनौती दी। चौपाई तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु ...