श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 36 — प्रतापभानु का अंत, रावणादि जन्म, वरदान और लंका
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 36 प्रतापभानु का अंत • ब्राह्मण-शाप • रावणादि जन्म • वरदान • लंका भाग 35 दोहा 168 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद “एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें…” से आरंभ होकर दोहा 180 तक जाता है। हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड तथा उसी के नीचे अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥ करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥ सरल अर्थ: कपटमुनि राजा को समझाता है कि इस उपाय से ब्राह्मण उसके वश में हो जाएँगे और उनके यज्ञ-हवन के प्रभाव से देवताओं पर भी उसका प्रभाव हो जाएगा। चौपाई और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥ तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥ सरल अर्थ: वह अपनी योजना का अगला चरण बताता है—वह इसी वेश में नहीं आएगा, बल्कि राजा के पुरोहित को माया से हटाकर उसका रूप धारण करेगा। चौपाई तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥ मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥ सरल अर्थ: कपटमुनि कहता है कि असली पुरोहित को एक वर्ष छिपाकर वह स्वयं उसका रूप लेकर राजा...