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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 34 — प्रभु का अवतार-वचन, मनु-शतरूपा प्रसंग पूर्ण और प्रतापभानु कथा

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 34 अवतार-वचन • मनु–शतरूपा प्रसंग पूर्ण • प्रतापभानु कथा का आरंभ भाग 33 सोरठा 151 पर समाप्त हुआ था। अब प्रभु अपने भावी मनुष्यावतार की लीला का विस्तार बताते हैं, मनु-शतरूपा का प्रसंग पूर्ण होता है और याज्ञवल्क्यजी श्रीराम-जन्म के अगले हेतु के रूप में राजा प्रतापभानु की कथा आरंभ करते हैं। चौपाई इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥ अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥ सरल अर्थ: प्रभु कहते हैं कि वे अपनी इच्छा से सुंदर मनुष्यरूप धारण करके मनुजी के घर प्रकट होंगे और अपने अंशों सहित भक्तों को सुख देने वाली लीलाएँ करेंगे। चौपाई जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥ आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥ सरल अर्थ: जो भाग्यवान इन लीलाओं को श्रद्धा से सुनेंगे वे ममता और अहंकार छोड़कर भवसागर पार करेंगे; प्रभु की आदिशक्ति भी अवतार लेंगी। चौपाई पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥ पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥ सरल अर्थ: प्रभु मनु-शतरूपा की अभिलाषा पूर्ण करने का सत्य संकल्प दो...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 33 — मनु-शतरूपा को प्रभु दर्शन, पुत्ररूप वरदान और अवध अवतार का वचन

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 33 मनु–शतरूपा की प्रार्थना • प्रभु दर्शन • पुत्ररूप वरदान • अवध अवतार का वचन भाग 32 दोहा 145 पर समाप्त हुआ था। अब मनु और शतरूपा प्रभु से उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं। भगवान प्रकट होकर उन्हें दर्शन देते हैं और अंततः स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवध में अवतार लेने का वचन देते हैं। चौपाई सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥ सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥ सरल अर्थ: मनुजी प्रभु की स्तुति करते हैं—आप सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु के समान हैं; आपके चरणों की रज ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी वंदित करते हैं। चौपाई जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥ जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥ सरल अर्थ: मनुजी कहते हैं—यदि हम पर आपकी कृपा है तो वही दिव्य स्वरूप दिखाइए जिसका शिवजी ध्यान करते और मुनि साधना करते हैं। चौपाई जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥ सरल अर्थ: वे उस सगुण-निर्गुण परम स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शन की प्...