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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 40 — विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध और दिव्य विद्याओं की प्राप्ति

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 40 विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध और दिव्य विद्याओं की प्राप्ति कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 39 सोरठा 208 (ख) पर समाप्त हुआ था। अब विश्वामित्रजी के साथ यात्रा, ताड़का-वध और विद्याएँ प्रदान करने का प्रसंग आता है। चौपाई अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥ सरल अर्थ: श्रीराम के नेत्र अरुण हैं, वक्षस्थल और भुजाएँ विशाल हैं तथा उनका श्याम शरीर नीलकमल और तमाल के समान सुंदर है। कमर में पीत वस्त्र और सुंदर तरकस बँधा है तथा हाथों में सुंदर धनुष-बाण शोभित हैं। चौपाई स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना॥ सरल अर्थ: श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई अत्यंत सुंदर हैं। विश्वामित्रजी उन्हें साथ पाकर महान निधि पाने जैसा आनंद अनुभव करते हैं और प्रभु की ब्राह्मण-भक्तवत्सलता का मन में अनुभव करते हैं। चौपाई चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥ एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥ सरल अर्थ: मार्ग मे...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 39 — विश्वामित्र का अयोध्या आगमन और श्रीराम-लक्ष्मण का प्रस्थान

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 39 विश्वामित्र का अयोध्या आगमन और श्रीराम-लक्ष्मण का प्रस्थान विश्वामित्रजी के साथ यज्ञ-रक्षा के लिए अयोध्या से प्रस्थान करते श्रीराम और लक्ष्मण — बालकाण्ड भाग 39 कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 38 दोहा 205 पर समाप्त हुआ था। उसके ठीक बाद कथा विश्वामित्रजी के आश्रम से आगे बढ़ती है। मारीच-सुबाहु के यज्ञ-विघ्न से चिंतित विश्वामित्र अयोध्या पहुँचकर श्रीराम और लक्ष्मण को साथ ले जाने का अनुरोध करते हैं। चौपाई यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥ बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥ सरल अर्थ: बाललीला का वर्णन पूरा करके कथा विश्वामित्रजी के पवित्र वन-आश्रम की ओर बढ़ती है। चौपाई जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥ देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥ सरल अर्थ: आश्रम में जप, यज्ञ और योग होता था, पर मारीच और सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालकर मुनियों को दुःख देते थे। चौपाई गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥ तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥ सरल अर्थ: विश्वामित्रजी ...