श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3: कर्मयोग — सम्पूर्ण 43 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
भक्ति भावना • श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ३ • कर्मयोग सम्पूर्ण ४३ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ ☰ ग्रंथालय में गीता इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग का स्वरूप समझाते हैं। केवल कर्म छोड़ देना मुक्ति का मार्ग नहीं है; आसक्ति छोड़कर अपना उचित कर्तव्य करना आवश्यक है। यज्ञभाव, लोककल्याण, स्वधर्म और कामना पर विजय इस अध्याय के मुख्य विषय हैं। श्लोक समूह चुनें श्लोक १–१० श्लोक ११–२० श्लोक २१–३० श्लोक ३१–४० श्लोक ४१–४३ अध्याय का सार श्लोक १–१० अध्याय ३ • श्लोक १ अर्जुन उवाच । ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥३.१॥ सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने पूछा—हे जनार्दन! यदि आपके मत में ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे केशव! आप मुझे इस भयंकर युद्धरूप कर्म में क्यों लगाते हैं? अध्याय ३ • श्लोक २ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे । तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥३.२॥ सरल हिंदी अर्थ: आपके मिले-जुले वचनों से मेरी बुद्धि मानो भ्रमित हो रही है। कृपया एक मार्ग निश्चित करके बताइए, जिससे मैं कल्याण प्राप्त...