वृंद सतसई भाग 2 — दोहे 351–706, मूल पाठ और हिंदी अर्थ सहित
भक्ति भावना प्रस्तुत · हिंदी नीति-साहित्य वृंद सतसई · विस्तृत भाग २ · समापन वृंद सतसई — भाग 2 दोहे 351–706 · हिंदी अर्थ सहित प्रमाण का विवेक · सतत अभ्यास · स्नेह और संतोष वृंद की दृष्टांतमयी नीति-वाणी का दूसरा और अंतिम भाग—वचन की मर्यादा, सहयोग, समय, उदारता, ज्ञान, प्रेम और आत्मचिंतन। मूल छंदों के साथ कठिन शब्दों का अर्थ और स्वतंत्र सरल व्याख्या पढ़ें। ३५६ क्रमांकित छंद मूल क्रम ३५१–७०६ शब्दार्थ · अर्थ · भावार्थ दो भागों की श्रृंखला का समापन परिचय दो भागों का क्रम दोहा चुनें पाठ की जानकारी संदर्भ जीवन को परखने की नीति-दृष्टि कमल, दीपक, नाव, वृक्ष, बाण और पक्षियों के छोटे दृश्य वृंद के यहाँ विचार की बड़ी बात बनते हैं। कोई दोहा समय पर उपाय करने को कहता है, कोई मीठी बात के पीछे की नीयत देखने को। एक पद सज्जन के उपकार की प्रशंसा करता है, दूसरा अंधानुकरण पर प्रश्न उठाता है। इन सूक्तियों को अपनी परिस्थिति के अनुसार विवेक से पढ़ें। यह लेख श्यामसुंदरदास संपादित सतसई-सप्तक , १९३१ के वृंद-सतसई खंड के क्रमांक ३५१–७०६ पर आधारित है। इसमें ३५६ क्रमांकित छंद हैं। पहला भाग १–३५० था; उसका कोई छंद...