वृंद सतसई भाग 2 — दोहे 351–706, मूल पाठ और हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत · हिंदी नीति-साहित्य
वृंद सतसई · विस्तृत भाग २ · समापन

वृंद सतसई — भाग 2
दोहे 351–706 · हिंदी अर्थ सहित

प्रमाण का विवेक · सतत अभ्यास · स्नेह और संतोष

वृंद की दृष्टांतमयी नीति-वाणी का दूसरा और अंतिम भाग—वचन की मर्यादा, सहयोग, समय, उदारता, ज्ञान, प्रेम और आत्मचिंतन। मूल छंदों के साथ कठिन शब्दों का अर्थ और स्वतंत्र सरल व्याख्या पढ़ें।

३५६ क्रमांकित छंदमूल क्रम ३५१–७०६शब्दार्थ · अर्थ · भावार्थदो भागों की श्रृंखला का समापन

जीवन को परखने की नीति-दृष्टि

कमल, दीपक, नाव, वृक्ष, बाण और पक्षियों के छोटे दृश्य वृंद के यहाँ विचार की बड़ी बात बनते हैं। कोई दोहा समय पर उपाय करने को कहता है, कोई मीठी बात के पीछे की नीयत देखने को। एक पद सज्जन के उपकार की प्रशंसा करता है, दूसरा अंधानुकरण पर प्रश्न उठाता है। इन सूक्तियों को अपनी परिस्थिति के अनुसार विवेक से पढ़ें।

यह लेख श्यामसुंदरदास संपादित सतसई-सप्तक, १९३१ के वृंद-सतसई खंड के क्रमांक ३५१–७०६ पर आधारित है। इसमें ३५६ क्रमांकित छंद हैं। पहला भाग १–३५० था; उसका कोई छंद यहाँ दोहराया नहीं गया है।

पूरी श्रृंखला केवल दो बड़े भागों में

भागमुद्रित क्रमांकछंद-संख्या
भाग ११–३५०३५०
भाग २ · यह लेख३५१–७०६३५६
दोनों भाग मिलाकर१–७०६७०६

चुने हुए मुद्रित संस्करण का अंतिम क्रमांक ७०६ है। आरंभ और समापन के छंद भी उसके क्रम का हिस्सा हैं। इसलिए केवल “सतसई” नाम देखकर पाठ को ७०० पर नहीं रोका गया। इस दूसरे भाग के अंतिम दो पद रचना का समापन और समय-स्थान का संकेत देते हैं।

पढ़ने से पहले

  1. मूल पाठ: पुरानी ब्रजभाषा और मुद्रित क्रमांक रखे गए हैं; विराम-चिह्न और यूनिकोड लेखन व्यवस्थित हैं।
  2. शब्दार्थ: मुख्य कठिन शब्दों का संक्षिप्त अर्थ।
  3. सरल हिंदी अर्थ: दोहे का प्रसंग और दृष्टांत।
  4. भावार्थ: विचार करने योग्य स्वतंत्र व्याख्या; यह कवि की अतिरिक्त पंक्ति नहीं।
  5. पाठ और प्रसंग: कठिन या अनिश्चित पाठ, ऐतिहासिक संदर्भ और लोकविश्वास की सूचना।

संदर्भ का विवेक: नीति-सूक्तियाँ हर व्यक्ति और अवसर का अटल नियम नहीं हैं। मूल में वंश, स्त्री, पेशा, गरीबी, दिव्यांगता और युद्ध के पुराने दृष्टांत भी हैं। किसी मनुष्य की गरिमा जन्म, शरीर, लिंग या संपत्ति से कम नहीं होती।

पौराणिक कथाएँ और पशु-पक्षियों के लोकविश्वास साहित्यिक संदर्भ हैं। उनसे वैज्ञानिक निष्कर्ष, चिकित्सा-विधि, हिंसा, अंधानुकरण या भाग्य के नाम पर निष्क्रियता का निर्देश न निकालें। अस्पष्ट बचे शब्दों के अर्थ अनुमान से निश्चित नहीं बनाए गए हैं।

क्रमांक से दोहा चुनें

नीचे सीमा खोलकर सीधे मनचाहे क्रमांक पर जाएँ। सभी ३५६ छंद और उनके अर्थ लेख में खुले रूप में उपलब्ध हैं। ये समूह केवल इसी लेख की पढ़ने की सुविधा हैं, अलग पोस्ट या मूल अध्याय नहीं।

क्रमांक ३५१–४००
क्रमांक ४०१–४५०
क्रमांक ४५१–५००
क्रमांक ५०१–५५०
क्रमांक ५५१–६००
क्रमांक ६०१–६५०
क्रमांक ६५१–७००
क्रमांक ७०१–७०६

कुछ प्रमुख विचार

पहली पंक्ति से खोजें · सभी ३५६ छंद
  1. जैसो प्रभु तैसो अनुग होय सुवात प्रमान।
  2. बढ़े न ऐसो कौन है दान मान को पाय।
  3. अपनी कीरति कान सुनि होत न कौन खुस्याल।
  4. बिद्या याद किए बिना बिसरत इहिं उनमान।
  5. सबै धकावै निबल कौं सबल पुरातन पाठ।
  6. अंतर अँगुरी चार कौ साँच झूठ मैं होय।
  7. जिबहै सोई कीजिए पन अपने उनमान।
  8. जोर न पहुँचै निबल कौं जो पै सबल सहाय।
  9. कारन बिन कारज नहीं निहचै मान बचन।
  10. परी विपत तैं छूटियै करिये जोर उपाव।
  11. दुख सुख दीवे कौं दई है आतुर इहिं ठाट।
  12. प्रेरक ही तैं होत है कारज सिद्ध निदान।
  13. होय भले कैं सुत बुरो भलो बुरे कैं होय।
  14. हार बड़े की जीत है निबल न मानै तास।
  15. होय भले चाकरन तैं भलो धनी कौ काम।
  16. सबकी समै बिनास में उपजति मति विपरीति।
  17. जो धनवंत सु दैह कछु दैह कहा धन-हीन।
  18. सुख सज्जन के मिलत कौं दुर्जन मिलैं जनाय।
  19. होत चाव तब दौड़ु है प्रेम सु सज्जन संग।
  20. जाहि मिलि सुख होतु है ता बिछुरे दुख होय।
  21. झूठे ही करियै जतन कारज बिगरै नाहिं।
  22. प्रेम-नेम के पंथ को है कछु अद्भुत रूप।
  23. दुखदाई सोइ देइ सुख सुखदाई संग जात।
  24. सम सहाय के बिन मिलैं सुखदाई दुख देइ।
  25. कारज सोई सुधरिहै जो करियै सम भाय।
  26. सज्जनता न मिलै किये जतन करौ किन कोइ।
  27. बिन बनाव बासिक बने ताही के कुबखान।
  28. तन बनाय उपजाय रुचि ठानत मान निदान।
  29. मन देत न तन देन कौं मन मिलयो तजि लाज।
  30. छोटे मन में छाड़िये कैसैं मोटी बात।
  31. होत निबाह न आपनो लीने फिरत समाज।
  32. रहै प्रजा धन छन सौं जहाँ बाँकी तरवार।
  33. जासौं परिचै होय सो पावै तिहि उनमान।
  34. बिना प्रयोजन भूलि हू ठट्ठियै नाहीं ठाट।
  35. आपहि कहा बखानिये भली बुरी की जोग।
  36. इंगित तैं आकार तैं जान जात जी भेट।
  37. जानै सो चूके कहा आदि अंत बिरंत।
  38. कहबो कछु करिबो कछु है जग की विधि दोय।
  39. आप बढ़े नाहीं करै ताको है यह हेत।
  40. जो कहिये सो कीजिये पहिलैं करि निधार।
  41. पीछै कारज कीजिये पहिलैं जतन बिचार।
  42. अरि हू चूके मंत्र कौं कहिये साँच सुनाय।
  43. कहिये तासौं जो हित भली बुरी हू जाय।
  44. संपत कीने बिलसवो सुख कौं चाहै कोइ।
  45. रन सनमुख पग सूर के बचन कहैं ते संत।
  46. आय बसै जिहिं दिन सुछिन सो सज्जन चित माहिं।
  47. बिन पूछे ही कहत हैं सज्जन हित के बैन।
  48. बिछुरे गए बिदेस हू सज्जन बिछुरै नाहिं।
  49. बसिये वहाँ बिचार कै जहाँ दुष्ट गति नाहिं।
  50. दान देत धन-हीनता होत तथापि बर्यान।
  51. ठीक किये बिन और की बात साँच मत थर्प।
  52. झूठ बिना फीकी लगै अधिक झूठ दुख-भौन।
  53. ठौर देखि कै हूजिये कुटिल सरल गति आप।
  54. एकतहू रह सज्जन खल तजत न अपनो अंग।
  55. भले बुरी जो आदरैं कौन सकै निरवारि।
  56. दोउ चाहैं मिलन कौं तौ मिलाप निरधार।
  57. हिए दुष्ट के बदन तैं मधुर न निकसे बात।
  58. रूखे बचन मिलाप में कहत होत रस-भंग।
  59. आप अकारज आपनो करतु कुबुध के साथ।
  60. ताही कौं करिये जतन रहिये जिहिं आधार।
  61. न्याय चलत बिगरै कछु तौ न करौ अफसोस।
  62. भले भलो ही कहत है पै न कहत है दोष।
  63. सदा सुथान प्रधान है बल न प्रधान बनाव।
  64. जामे विद्या नारदी बिगरन देत न लाग।
  65. भाग-हीन कौं ना मिलै भली बस्तु कौ भोग।
  66. सब कोउ चाहत भलो भिन्न भिन्न की ओर।
  67. भले बंस संतति भली कबहूँ नीच न होय।
  68. सूर बीर के बंस मैं सूर बीर सुत होय।
  69. करै न कबहूँ साहसी दीन हीन कौ काज।
  70. मान-धनी नर नीच पै जाँचै नाहीं जाय।
  71. छोटे नर कौ बड़ेनि सों कबहूँ बुरी न होय।
  72. नीचहु उत्तम संग मिलि उत्तम ही है जाय।
  73. अधिक चतुर की चातुरी होत चतुर के संग।
  74. परतछ नीके देखिए कहा बरन कोउ ताहि।
  75. सहज सील गुन सज्जन के खल बुधि होत न भंग।
  76. रति रस श्रुति रस राग रस पाय न चाहत और।
  77. मोह महातम रहतु है जौ लौं ज्ञान न होत।
  78. सबुध अबुध की सेव कौं यह सरूप जिय थाप।
  79. यै सेवा राजान की दीन्हीं कठिन बताय।
  80. पंडित अरु बनिता लता सोभित आश्रय पाय।
  81. इक गुन तैं सोभा लहैं इक अवगुन अवरोह।
  82. सुजन सुजन के दरस ही पावत जिय संतोष।
  83. सब संपति फल करत है सुहृद जतन को हेत।
  84. ऊँचे पद कौं पाय लघु होय तुरत ही पात।
  85. अपनी प्रभुता कौं सबै बोलत झूठ बनाय।
  86. अपने लालच के लिये दुख हू आपने दाय।
  87. धनी गुनी कौं न्याय ही धन अरपै धरि हेत।
  88. गुन सनेह जुत होउ है ताही की छबि होत।
  89. सुनि सुनि मीठी बात कौं को चाहत कटु बात।
  90. रस की कथा सुनी न तिहिं कूर कथा की चाहि।
  91. प्रेमी प्रीत न छाँड़हीं होत न प्रन तैं हीन।
  92. अति उदारता बड़ेनि की कहाँ लौं बरनै कोय।
  93. बड़े जु चाहैं सो करैं करन मती उर धारि।
  94. औसर बीते जतन कौं करिबो नहिं अभिराम।
  95. दुष्ट संग बसिये नहीं दुख उपजत इहिं भाय।
  96. करै अनादर गुनिनि कौं वाहि सभा छबि जाय।
  97. कहूँ कहूँ गुन तैं अधिक उपजत दोष सरीर।
  98. भले बुरे निबहैं सबै महत पुरुष के संग।
  99. बिनत कहे हू सत पुरुष पर की पूरै आस।
  100. कछू कहि नीच न छेड़िये भलो न वाकौ संग।
  101. हीन जाति न बिरोधिये वह तौ तन दुखदाय।
  102. नाहिं करत उपकरन तैं काज सिद्ध बलवान।
  103. बित दिये न मिलै कछु यह समभौ सब कोय।
  104. यह निश्चय करि जानिये जानहार सो जाय।
  105. दूर कहा नियरै कहा होनहार सो होय।
  106. आए आदर ना करै पीछै लेत मनाय।
  107. कहूँ अनादर पाय कै गुनी न करहु अँदेस।
  108. अपने अपने समय पर सब कौ आदर होय।
  109. होय सो होय हिसाब सौं बिन हिसाब नहिं होय।
  110. जिहिं डर डरि करिये जतन उपजत सोइ अमेट।
  111. मीठी कोउ बस्तु नहिं मीठी जाकी चाह।
  112. बड़ो बड़ाई नीच कौं दीजै अपने काम।
  113. कहा भयो जो नीच कौं देत बड़ाई कोय।
  114. भले बुरे कौं जानिबो जात बचन के बंध।
  115. जाति वृत्ति कैं करत नर अपने हेत अहेत।
  116. चिरजीवी तन हू तजै ताकौ जग जस बास।
  117. बहुत भए किहिं काम के भार निबाहक एक।
  118. बुद्ध न हैहै पाप तैं बुद्ध धरम तैं धार।
  119. देखत कौं पै कछु नहीं सुख पै खल की प्रीति।
  120. ऊपर दरसै सुमिल सी अंतर अनमिल आँक।
  121. निबल सबल के परस तैं सबलन सौं अनखात।
  122. दोष लगावत गुनिन कौं जाकौ हृदय मलीन।
  123. है ही गति है बड़नि की कुसुम मालती भाय।
  124. सब विधि डरिये दुष्ट सौं रहिये जतन समेत।
  125. खाय न खर्चै सूम धन चोर सबै ले जाय।
  126. जगत बहुत जन तदपि मन बिन सज्जन अति दीन।
  127. कोउ कहै न जानिये जोतिवंत सुनि कोय।
  128. खल निज दोष न देखई पर के दोषहि तानि।
  129. जैसौ जैसौ अधिक गुन तैसो होय मिलाय।
  130. भागहीन कौं देवहू देत सु लेत बनै न।
  131. दिवस भले बिगरै न कछु रहौं निचिंते सोय।
  132. दान दीन कौं दीजिये मिटै दरिद की पीर।
  133. सबही आगे होय कै कबहूँ न करिये बात।
  134. आवत समै विपति के मित्र शत्रु है जाय।
  135. उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय।
  136. निहचै कारन विपत कौ किए प्रीति अरि संग।
  137. जौ घर आवत शत्रु हू सज्जन देत सुख चाहि।
  138. ताकौ बुरो न ताकिये जासों जग ब्यौसाइ।
  139. दुष्ट भाव हिय मुख मधुर तासौं करहु न प्रीति।
  140. दुष्ट न छाँड़ै दुष्टता बड़ो ठौर हू पाय।
  141. बिन उद्यम मसलत किये कारज सिद्ध न थाय।
  142. नृप अनीति के दोष तैं चूके मंत्र प्रयोग।
  143. कहा करैं आगम निगम जो मूरख समझै न।
  144. दया दुष्ट कै चित्त में कबहूँ उपजत नाहिं।
  145. प्रीति टूटे हू सज्जन के मन तैं हेत छूटै न।
  146. सज्जन के प्रिय बचन तैं तन संताप मिटाय।
  147. सज्जन बचन दुर्जन बचन अंतर बहुत लखाय।
  148. धन अरु गेंद जु खेल की दोउ एक सुभाय।
  149. प्रभु कौं चिंता सबन की आप न करिये नाहिं।
  150. धन अरु जोबन कौ गरब कबहूँ करिए नाहिं।
  151. नृपति चोर जल अनल तैं धनि कौं भय उपजाय।
  152. बड़े बड़े कौं विपति तैं निबढ़े लेत उबारि।
  153. बड़े कष्ट हू जे बड़े करैं उचित ही काज।
  154. जिहिं जैतौ उनमान तिहिं तैतौ रिजक मिलाय।
  155. बहु गुन श्रम तैं उच्च पद तनक दोष तैं पात।
  156. छोटे अरि कौं साधिये छाँटौ करि उपचार।
  157. बड़े बड़े सौं रिस करैं छोटे सौं न रिसाय।
  158. सेवक सोई जानिये रहै विपति में संग।
  159. बुरी बस्तु लागत भली भली ठौर पै लीन।
  160. जोरावर हू कौं कियौ विधि बस करन इलाज।
  161. दुष्ट रहै जा ठौर पर ताकौ करै बिगार।
  162. बिना तेज के पुरुष की अवसि अवज्ञा होय।
  163. पाय प्रकृति बस कीजिये करि बुधि बचन बिबेक।
  164. नेह करति तिय नीच सौं धन किरपन घर माहिं।
  165. जहाँ रहै गुनवंत नर ताकी सोभा होत।
  166. खाली तजि पूरन पुरुष जिहिं सब आदर देत।
  167. सब आसान उपाय तैं तुरत फुरत फल देत।
  168. जाकी प्रापति होय सो मिलि आप तैं आप।
  169. खल सज्जन सूचींन के भाग दुहूँ सम भाय।
  170. तुला सुई की तुल्यता रीति सज्जन की होति।
  171. भले बुरे सौं एक सी मूढ़िन की परतीति।
  172. जिहिं दिसि भय तिहिं दिसि कबहूँ ना जैये करि चोज।
  173. सिद्धि होत कारज सबै जाकै जिय बिस्वास।
  174. बहुत द्रव्य संचै जहाँ चोर राज भय होय।
  175. जानि बूझि अज्ञान करै तासौं कहा बसाय।
  176. जहँ तहँ सज्जन मिलैं नहिं गुन गरुवै जग माहिं।
  177. विद्या बिन न बिराजहीं जदपि सरूप कुलीन।
  178. एकहि भले सुपुत्र तैं सब कुल भलो कहाय।
  179. गुरुमुख पढ़नो न कहतु है पोथी अर्थ बिचारि।
  180. जाकौ बुधिबल होत है ताहि न रिपु कौ त्रास।
  181. छमा खड्ग लीने रहै खल कौं कहा बसाय।
  182. एकै थल बिश्राम कौ ताकौ तजि कहाँ जाय।
  183. जिहिं जैसो अपराध तिहिं तैसो दंड बखानि।
  184. ओछे नर के पेट में रहै न मोटी बात।
  185. चलिए पैड़े साँच के साँई साँच सुहाय।
  186. गूढ़ मंत्र जौ लौं रहै करैं जु मिलि जन दोय।
  187. गूढ़ मंत्र गरुवै बिना कोउ राखि सकै न।
  188. बहुत जु बीतै तनक धन संचै सज्जन करै न।
  189. फिरत भार सब तैं उतरि गिरही पर ठहरात।
  190. सील करम कुल श्रुत चतुर पुरुष परिच्छा जान।
  191. जो पै जैसे होय तिहिं हित सौं मिलिहै आय।
  192. कबहूँ रन बिमुखौ भयो तऊ फिर लरै सिपाह।
  193. कबहूँ प्रीति न जोरिये जोरि तोरिये नाहिं।
  194. अंतर तनक न राखिये जहाँ प्रीति बिवहार।
  195. निरखत पलक न मारिये सज्जन मुख की ओर।
  196. सेवक साहिब के बढ़े बढ़ै बड़ाई भ्राज।
  197. ओछे नर के चित्त में प्रेम न पूरौ जाय।
  198. जे न होय दृढ़ चित्त के वहाँ न रहै सटेक।
  199. रस पीये बिनहीं रसिक रस उपजावत संत।
  200. मन भावन के मिलन कौं सुख कौ नाहिन छोर।
  201. बिरही जन के चित्त कौं नाहिं रहतु बुधि बोध।
  202. जहाँ सज्जन तहाँ प्रीति है प्रीति तहाँ सुख ठौर।
  203. जो प्रानी परबस परयो सो दुख सहत अपार।
  204. गुनी होय श्रम कष्ट करि लहै राज-दरबार।
  205. मन प्रसन्न तन चैन जहाँ स्वेच्छाचार बिचार।
  206. रहनदार जाइ न बसत तदपि जतन बिवहार।
  207. है पासे के दाव पर कहाँ जीत कहाँ हारि।
  208. सबकौं व्याकुल करति है एक जठर की आगि।
  209. उदर भरन के कारनै प्रानी करत इलाज।
  210. दुरभर उदर न दीन कौं होत न तन संताप।
  211. उदर धरत नर तैं भली राहु उदर तैं हीन।
  212. करी उदर दुरभरन भय हर अरधंगी दार।
  213. भरत पेट नट निरत कै उदरत करत उपाय।
  214. एक एक कौ शत्रु है जो जातैं बलवंत।
  215. एक एक तैं देखिये अधिक अधिक बलवंत।
  216. देत न प्रभु कछु बिन दियै दिये देत यह बात।
  217. यथाशक्ति ही दै सकै जो कुछ जाकै पास।
  218. जोरावर कौं होति है सबके सिर पर राह।
  219. अगम पंथ है प्रेम कौ जहाँ ठठरहै नाहिं।
  220. बचन रचन कापुरुष के कहै न छिन ठहराय।
  221. कबहूँ झूठी बात कौ जो करिहै पछपात।
  222. कुल कुपुत्र किहिं काम कौ तिहिं सुख सोभा नाहिं।
  223. बिगरनवारी बस्तु कौं कोऊ सुधारै कौन।
  224. काहू कौं हँसिये नहीं हँसी कलह कौ मूल।
  225. दुरजन गहत न सज्जनता जतन करौ किन कोय।
  226. जग परतीति बढ़ाइये रहिये साँचे होय।
  227. बड़े बड़ाई के जतन गहैं बिरद की लाज।
  228. है अयुक्त पै युक्त है करिय वहै प्रमान।
  229. जामें हित सो कीजिये कोउ कहौ हजार।
  230. सुनिये सबही की कही करिये सहित बिचार।
  231. प्रापति के दिन होति है प्रापति बारंबार।
  232. अप्रापति के दिनन में खरब होत अबिचार।
  233. हीन धनी आधीन है सीस नवावत नाहिं।
  234. रूखे सूखे उदर कौं भरे होतु संतुष्ट।
  235. एक एक के काम कौं रचि राखै जगदीस।
  236. भली किए हैहै बुरी देखौ विधि बिपरीत।
  237. कहे बचन पलटैं नहीं जे सत पुरुष सधीर।
  238. मति फिर जाय विपति में राव रंक इक रीति।
  239. जानहार सो जाय अरु होनहार तैं आय।
  240. अन उद्यम सुख पाइये जौ पूरब कृत होय।
  241. प्यारी अन प्यारी लगै समै पाय सब बात।
  242. जनमत ही पावै नहीं भली बुरी कोइ बात।
  243. भलौ ज्ञान अज्ञान नहिं है अज्ञान न ज्ञान।
  244. सत पुरुषनि तैं उतरि कै होत नीच अधिकार।
  245. हरवी गरुवे के हिए ठहरत नाहिं बात।
  246. पावत बहुत तलास तैं कर तैं छूटी बात।
  247. पिय के बिछुरे बिरह बस मन न कहूँ ठहरात।
  248. होत अधिक गुन निबल पै उपजत बैर निदान।
  249. आप तरै तारै अवर काठ नाव चित चाव।
  250. जूवा खेले होतु है सुख संपति कौ नास।
  251. सरसुति के भंडार की बड़ी अपूरब बात।
  252. यह अनहोनी बात पर को न देखि अनखात।
  253. देखा देखी करत सब नाहिन तत्त्व बिचार।
  254. काज बिगारतु और कौ इक निज काज सुधारि।
  255. काज बिगारतु आपनो एक और के काज।
  256. एक आपनो और कौ साधत काज सलोल।
  257. एक बिगारतु आपनो और परायौ काज।
  258. देखत कौं सुंदर लगै उर में कपट बिषाद।
  259. बिरह पीर व्याकुल भए आयौ प्रीतम गेह।
  260. खरचत खाति न जातु धन औसर किये अनेक।
  261. चलै जु पंथ पिपीलिका समुद पार है जाय।
  262. एक एक अछर पढ़े जानै ग्रंथ बिचार।
  263. भले बुरे हू सौं करत उपकारी उपकार।
  264. सज्जन करत उपकार कौं बित भोतिक जग माहिं।
  265. बिन देखे जाने परै देखे जहाँ निसान।
  266. भले बंस कौ पुरुष सो निहुरै बहु धन पाय।
  267. एक एक सौं लगि रहै अन्योन्य संबंध।
  268. नेगी दूर न होतु है यह जानौ तहकीक।
  269. चिदानंद घट में बसै घूमत कहाँ निवास।
  270. कै सम सौं कै अधिक सौं लरिये करिये बाद।
  271. सज्जन सौं रस पोषिये त्यौं त्यौं बढ़त हुलास।
  272. करिये सभा सुहावनौ सुख तैं बचन प्रकास।
  273. जासौं पहुँचि न आइये तासौं बहसि न ठान।
  274. सब काहू की लहत है भली बुरी संसार।
  275. जोति सरूपी हिय बसै सब सरीर में जोति।
  276. बय समान रुचि होति है रुचि प्रमान मन मोट।
  277. दान मान सनमान अरु अपनी अपनी बात।
  278. भले बुरे दोउ रहैं चिरंजीव संसार।
  279. सरस निरस नर होत है समय पाय सब कोइ।
  280. बाँके रन तैं होतु है बंदनीक सब लोय।
  281. करिये तहाँ पैसार जहँ जो जानिये निसार।
  282. अधिक अधिक बल पौरि के कंस हत्यौ अवतार।
  283. परुष बचन तैं रोष हित कोमल बचन समान।
  284. सुदृढ़ सूर नाहिन चलै कायर लगि रन घात।
  285. मित्र मित्र के काम कौं देखु बिमुख करि हेत।
  286. तन धन हू दै लाज के जतन करत जे धीर।
  287. भले बुरे गुरु जन बचन लोपत कबहूँ न धीर।
  288. बिपति समय हू देत हैं सत पुरुषन के काम।
  289. लोकन के अपवाद कौं डर करिये दिन-रैन।
  290. भले भले बिधिना रचे पै सदोष सब कीन।
  291. जैसौ कारन होतु है तैसौ कारज थाप।
  292. इन कौं मानुष जन्म दै कहा कियौ भगवान।
  293. कहा कहौं बिधि की अबिधि भूले परम प्रवीन।
  294. वह संपति कौहि काम की जन काहू पै होइ।
  295. नर भूषन सब दीन छमा बिक्रम अरु बच धेर।
  296. यौं निबाह सब जगत कौ रस रिस हेत अहेत।
  297. तृन हू तैं अरु तूल तैं हरवो जाचक आहि।
  298. नृप गुरु तिय बनहि सेइये मध्य भाग जम माहिं।
  299. देखत है जग जातु है तऊ ममता सौं मेल।
  300. भले बुराई तैं डरैं राख्यौ चाहैं सोय।
  301. गुन तैं अवगुन होतु है लिखे मिटत नाहिं अंक।
  302. निस दिन खटकत तनक तृन परै जु आँखनि माहिं।
  303. सज्जन बचावत कष्ट तैं रहै निरंतर साथ।
  304. धनी होत निरधन बहुर निरधन तैं धनवान।
  305. सबही कुल में होत है एक एक सरदार।
  306. जहाँ सनेही तहाँ रहत भ्रमत भ्रमत मन आय।
  307. प्रान पियारे के दरस हिय तैं बढ़त हुलास।
  308. सुनत स्रवन पिय के बचन हिय बिकसै हित पागि।
  309. ज्यौं ज्यौं छूटै अघरापन त्यौं त्यौं प्रेम प्रकास।
  310. चोरा चोरी प्रीति के कीने बढ़त हुलास।
  311. नीति अनीति बड़े सहैं रिस भरि देत न गारि।
  312. रहै न कबहूँ दोय लखि एक सदन के माहिं।
  313. परधन लेत छिनाय इक इक धन देत हसंत।
  314. जो न परत किहि बात में तिहिं मनुहारि न मारि।
  315. गहत तत्त्व ज्ञानी पुरुष बात बिचार बिचार।
  316. मात पिता के पन के पुरुषहि प्रगट प्रभाव।
  317. गुरु बच जोग अजोगहू करिए भ्रम बिसराय।
  318. ओछी मति युवतीन की कहैं बिबेक भुलाय।
  319. पूजनीक गुन तैं पुरुष दरसन पूज न होय।
  320. स्रवन करी यौं कीजिए मात पिता की सेव।
  321. बड़े जिती लघुता करैं तिती बड़ाई पाय।
  322. अरि के कर में दीजिए अवसर कौ अधिकार।
  323. जो लायक जिहि होय सो ताही ठौर मनोय।
  324. घन घेरे कौ मिलन सुख देत भरोसौ नाहिं।
  325. बढ़े सबै सब लच्छ तैं जिहिं बिनु लच्छ के जोग।
  326. ता बिनु होय न काज सिधि जासौं लागौ ब्रत।
  327. प्रभु सौं बात दुरी न तऊ डरिये करतु कुहेत।
  328. कठिन कला हू आइहै करत करत अभ्यास।
  329. जहँ उपजै सोई करै जिहिं कुल जो अभ्यास।
  330. बिना ललनी पुरुष पै होय तहाँ इक ठाँय।
  331. गुन प्रगटै अवगुन दुरै जानै केवल साच।
  332. जिसै दियो पूरब जनम न दिए लियै न सोइ।
  333. जाको न्यौत जिमाइये ताही की मनुहारि।
  334. निरस बात सोई सरस जहाँ होय हिय हेत।
  335. जो जिहिं काल में प्रबल सो तिहिं भेद प्रबीन।
  336. जो जैसो तिहिं तैसिये करिये नीति प्रकास।
  337. इन लच्छन तैं जानिये हरि अज्ञान नितांत।
  338. डरु उपजाव हित धरम सौं अधम करम की हानि।
  339. जपत एक हरि नाम तैं पातक कोटि बिलाय।
  340. जो समरथ सब बात मैं तिहि भजिए तजि संक।
  341. गर्व-प्रहारी हरि सदा या मैं नहिं संदेह।
  342. कहा बड़े छोटे कहा जहाँ हित तहाँ चित्त लागि।
  343. परजन सौं मनसौ करें परहरि हरि सौं प्रीति।
  344. अहै अवधि अबिबेक की देखि कौन अनखाय।
  345. मूरख कौं हित के बचन सुनि उपजतु है कोप।
  346. गुन गरुवो लघुता गहै तिहिं सनमानत धीर।
  347. बड़ी ठौर कौं लघु लहै आप आदर भाय।
  348. महिमा जुत कौं देत ही लेत न तन सकुचाय।
  349. धन पूरन धनवान पै बिन दीने न लहात।
  350. इक बिन माँगे ही लहै माँगे एक लहै न।
  351. बड़ेन की संपति सबै लघु बिलसंत अनंत।
  352. जिहि जैतौ निहचै तितौ देन दई पहुँचाय।
  353. जिय संतोष बिचारियै होय जु लिख्यौ नसीब।
  354. जथाजोग सब मिलत है जो बिधि लिख्यौ अंकूर।
  355. समय सार दोहानि कौ सुनत होय मनमोद।
  356. संवत ससि रस बार ससि कार्तिक सुदि ससि वार।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ३५१–४००

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ३५१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५१
जैसो प्रभु तैसो अनुग होय सुवात प्रमान। बामन कर की लठिका बढ़ै बढ़ी असमान॥

शब्दार्थ: अनुग=अनुचर; बामन=वामन।

सरल हिंदी अर्थ: स्वामी के विस्तार के साथ अनुचर भी बढ़ता है, जैसे वामन के हाथ की छड़ी।

भावार्थ: संगठन की उन्नति सहयोगियों को भी अवसर देती है।

दोहा ३५२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५२
बढ़े न ऐसो कौन है दान मान को पाय। पाय धरा बामन भए सीस स्वर्ग धर पाय॥

शब्दार्थ: मान=सम्मान; धरा=भूमि।

सरल हिंदी अर्थ: दान और सम्मान से कौन नहीं बढ़ता? वामन ने भूमि पाकर विराट रूप धरा।

भावार्थ: सहयोग और सम्मान से क्षमता विकसित होती है।

दोहा ३५३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५३
अपनी कीरति कान सुनि होत न कौन खुस्याल। नाग मंत्र के सुनत ही बिष छाँड़त है ब्याल॥

शब्दार्थ: कीरति=यश; खुस्याल=प्रसन्न; ब्याल=सर्प।

सरल हिंदी अर्थ: अपनी प्रशंसा सुनकर सब प्रसन्न होते हैं; कवि सर्प-मंत्र का लोकविश्वास जोड़ता है।

भावार्थ: प्रशंसा प्रभावी है, पर उसे विवेक से स्वीकारें।

पाठ और प्रसंग: सर्प-मंत्र से विष छोड़ने की बात लोकविश्वास है; इसे विष-चिकित्सा या सर्पदंश का उपाय न मानें।

दोहा ३५४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५४
बिद्या याद किए बिना बिसरत इहिं उनमान। बिगर जात बिन खबर के होली कैसो गान॥

शब्दार्थ: उनमान=अनुमान; खबर=ध्यान।

सरल हिंदी अर्थ: अभ्यास बिना विद्या भूलती है, जैसे ध्यान न रखने पर गाया जाने वाला गीत बिगड़ता है।

भावार्थ: सीखी बातों का नियमित अभ्यास करें।

पाठ और प्रसंग: “होली कैसो गान” का पुराना संकेत गाने का पाठ याद रखने से जोड़ा गया है; कोई निश्चित लोकगीत यहाँ आरोपित नहीं किया गया।

दोहा ३५५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५५
सबै धकावै निबल कौं सबल पुरातन पाठ। डारै जारि बहाय दे अनिल अनल जल काठ॥

शब्दार्थ: निबल=निर्बल; अनिल=वायु; अनल=अग्नि।

सरल हिंदी अर्थ: बलवान निर्बल को धकेलता है; लकड़ी को हवा, आग और पानी प्रभावित करते हैं।

भावार्थ: शक्ति का उपयोग कमजोर की रक्षा में हो।

दोहा ३५६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५६
अंतर अँगुरी चार कौ साँच झूठ मैं होय। सच मानै देखी कही सुनी न मानै कोय॥

शब्दार्थ: अँगुरी=अंगुल; देखी=प्रत्यक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: कान और आँख के अंतर से कवि सुनी और देखी बात का भेद समझाता है।

भावार्थ: अफवाह को प्रमाण समझकर स्वीकार न करें।

पाठ और प्रसंग: चार अंगुल का अंतर काव्यात्मक अनुमान है। प्रत्यक्ष देखने में भी भ्रम संभव है; विश्वसनीय प्रमाण का मिलान आवश्यक है।

दोहा ३५७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५७
जिबहै सोई कीजिए पन अपने उनमान। कैसैं होत गरीब पै राजा कैसो दान॥

शब्दार्थ: जिबहै=निभ सके; पन=प्रतिज्ञा।

सरल हिंदी अर्थ: अपनी सामर्थ्य देखकर प्रतिज्ञा करें; गरीब राजा जैसा दान कैसे दे?

भावार्थ: वचन अपनी वास्तविक क्षमता के अनुसार दें।

दोहा ३५८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५८
जोर न पहुँचै निबल कौं जो पै सबल सहाय। भोंडर की फानूस कौं दीप न बात बुझाय॥

शब्दार्थ: भोंडर=अभ्रक; फानूस=दीपावरण; बात=वायु।

सरल हिंदी अर्थ: मजबूत आवरण दीपक को हवा से बचाता है; वैसे ही सहायता निर्बल की रक्षा करती है।

भावार्थ: विश्वसनीय संरक्षण संकट में सहारा बनता है।

दोहा ३५९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३५९
कारन बिन कारज नहीं निहचै मान बचन। करै रसोई जो मिले आग इंधन जल अन्न॥

शब्दार्थ: कारन=साधन; कारज=कार्य।

सरल हिंदी अर्थ: आग, ईंधन, जल और अन्न मिलने पर ही रसोई बनती है।

भावार्थ: लक्ष्य के लिए आवश्यक साधन जुटाएँ।

दोहा ३६०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६०
परी विपत तैं छूटियै करिये जोर उपाव। कैसैं निकसै जतन बिन परी भौंर मैं नाव॥

शब्दार्थ: भौंर=भँवर; जतन=प्रयास।

सरल हिंदी अर्थ: संकट में भरपूर उपाय करें; भँवर की नाव प्रयास के बिना नहीं निकलती।

भावार्थ: कठिन समय में सक्रिय समाधान खोजें।

दोहा ३६१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६१
दुख सुख दीवे कौं दई है आतुर इहिं ठाट। अहि करंड मूसा परयो भखि निकस्यो उहि बाट॥

शब्दार्थ: अहि=साँप; करंड=पिटारा; मूसा=चूहा।

सरल हिंदी अर्थ: पिटारे में आया चूहा सर्प का भोजन और निकलने का मार्ग बना; एक घटना दो विपरीत फल लाई।

भावार्थ: एक ही घटना अलग लोगों पर अलग असर डालती है।

पाठ और प्रसंग: यह सर्प-पिटारे और चूहे का नीति-कथा दृष्टांत है, जीवों के साथ ऐसा प्रयोग करने का सुझाव नहीं।

दोहा ३६२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६२
प्रेरक ही तैं होत है कारज सिद्ध निदान। चढ़ै धनुष हू ना चलै बिना चलाए बान॥

शब्दार्थ: प्रेरक=चलाने वाला; बान=बाण।

सरल हिंदी अर्थ: चढ़ा हुआ बाण भी चलाने वाले के बिना नहीं चलता।

भावार्थ: साधन के साथ जिम्मेदार पहल जरूरी है।

दोहा ३६३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६३
होय भले कैं सुत बुरो भलो बुरे कैं होय। दीपक कैं काजर प्रगट कमल कीच तैं जोय॥

शब्दार्थ: सुत=संतान; काजर=कालिख।

सरल हिंदी अर्थ: दीप से कालिख और कीचड़ से कमल मिलता है; संतान का स्वभाव माता-पिता से भिन्न हो सकता है।

भावार्थ: व्यक्ति का मूल्य उसके अपने आचरण से आँकें।

दोहा ३६४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६४
हार बड़े की जीत है निबल न मानै तास। बिमुख होय हरि ज्यौं कियौ कालयमन कौ नास॥

शब्दार्थ: बिमुख=पीठ फेरना; कालयमन=कालयवन।

सरल हिंदी अर्थ: कवि कृष्ण-कालयवन कथा से बताता है कि पीछे हटना भी रणनीति हो सकता है।

भावार्थ: तात्कालिक पीछे हटने को अंतिम हार न समझें।

पाठ और प्रसंग: कालयवन, मुचुकुंद और कृष्ण का प्रसंग पौराणिक कथा है।

दोहा ३६५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६५
होय भले चाकरन तैं भलो धनी कौ काम। ज्यौं अंगद हनुमान तैं सीता पाई राम॥

शब्दार्थ: चाकर=सेवक; धनी=स्वामी।

सरल हिंदी अर्थ: अच्छे सहयोगियों से स्वामी का काम बनता है, जैसे राम को अंगद-हनुमान का सहयोग मिला।

भावार्थ: सफलता में सहकर्मियों का योगदान मानें।

दोहा ३६६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६६
सबकी समै बिनास में उपजति मति विपरीति। रघुपति मारयो लंकपति जो हरि लै गयो सीति॥

शब्दार्थ: बिनास=विनाश; सीति=सीता।

सरल हिंदी अर्थ: सीताहरण से रावण के विनाश का उदाहरण देकर कवि विपरीत बुद्धि का परिणाम बताता है।

भावार्थ: अहंकारपूर्ण निर्णयों के दुष्परिणाम समझें।

दोहा ३६७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६७
जो धनवंत सु दैह कछु दैह कहा धन-हीन। कहा निचोरे नर जन न्हात सरोवर कीन॥

शब्दार्थ: धनवंत=सम्पन्न; धनहीन=निर्धन।

सरल हिंदी अर्थ: संपन्न ही आर्थिक सहायता दे सकता है; सरोवर में नहाया व्यक्ति क्या वस्त्र निचोड़ेगा?

भावार्थ: सहायता की अपेक्षा सामने वाले की क्षमता देखकर रखें।

पाठ और प्रसंग: सरोवर-स्नान का पुराना उदाहरण पहने वस्त्र के अभाव में निचोड़ने को कुछ न होने का संकेत देता है।

दोहा ३६८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६८
सुख सज्जन के मिलत कौं दुर्जन मिलैं जनाय। जाने उख मिठास कौं जब मुख नीम चबाय॥

शब्दार्थ: उख=ईख; दुर्जन=दुष्ट।

सरल हिंदी अर्थ: नीम चखने पर ईख की मिठास अधिक समझ आती है; दुर्जन से सज्जन की पहचान होती है।

भावार्थ: अनुभव अच्छे व्यवहार का मूल्य समझाता है।

दोहा ३६९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३६९
होत चाव तब दौड़ु है प्रेम सु सज्जन संग। पास दिये बिन बास पर चढ़ै न गहरी रंग॥

शब्दार्थ: चाव=उत्साह; पास=रंग पक्का करने का सहायक।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन-संग में प्रेम से उत्साह बढ़ता है; रंग भी उचित सहायक से गहरा चढ़ता है।

भावार्थ: संबंधों की गहराई सहयोग और लगाव से बनती है।

पाठ और प्रसंग: रंग चढ़ने का “पास” वाला संकेत पुराने रंगाई-व्यवहार से जुड़ा है; निश्चित रासायनिक पदार्थ का नाम अनुमान से नहीं दिया गया।

दोहा ३७०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७०
जाहि मिलि सुख होतु है ता बिछुरे दुख होय। सूर उदै फूलै कमल ता बिन सकुचे सोय॥

शब्दार्थ: सूर=सूर्य; सकुचे=सिमटे।

सरल हिंदी अर्थ: जिसके मिलने से सुख मिलता है, उसके बिछुड़ने से दुख होता है; कमल और सूर्य का उदाहरण है।

भावार्थ: लगाव के साथ विरह की संवेदना भी जुड़ी है।

दोहा ३७१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७१
झूठे ही करियै जतन कारज बिगरै नाहिं। कपट पुरुष धन खेत पर देखत मृग भज जाहिं॥

शब्दार्थ: कपट पुरुष=पुतला; भज=भाग।

सरल हिंदी अर्थ: खेत का पुतला देखकर भी पशु भागते हैं; कभी आभासी उपस्थिति रक्षा करती है।

भावार्थ: रक्षा की व्यवस्था में प्रभावी संकेत भी उपयोगी हैं।

दोहा ३७२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७२
प्रेम-नेम के पंथ को है कछु अद्भुत रूप। पिय हिय लागे लागत क्यों सरद जौन सी धूप॥

शब्दार्थ: नेम=नियम; पिय=प्रिय; जौन=जैसी।

सरल हिंदी अर्थ: प्रिय के हृदय से लगे होने पर शरद की धूप जैसी सुखद अनुभूति होती है।

भावार्थ: प्रेम मन की अनुभूति बदल देता है।

पाठ और प्रसंग: पुरानी शृंगारिक भाषा में “सरद जौन” को शरद की जैसी धूप के आशय में पढ़ा है।

दोहा ३७३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७३
दुखदाई सोइ देइ सुख सुखदाई संग जात। घट जल भीजे चीर कौं लागि लूम सुखरात॥

शब्दार्थ: घट=घड़ा; चीर=वस्त्र; लूम=गर्म हवा।

सरल हिंदी अर्थ: गर्मी सूखे वस्त्र को कष्टदायक लग सकती है, पर भीगा वस्त्र उसी से सूखता है।

भावार्थ: वस्तु का लाभ परिस्थिति से बदलता है।

दोहा ३७४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७४
सम सहाय के बिन मिलैं सुखदाई दुख देइ। भिंजे चीर बिन घट सलिल लागत तपत करैह॥

शब्दार्थ: सम=उचित; सलिल=जल; करैह=कराह/ताप का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ: उचित सहायक के बिना सुखद वस्तु भी कष्ट दे सकती है; भीगे वस्त्र के अभाव का दृष्टांत है।

भावार्थ: लाभकारी साधन के उपयोग की शर्तें समझें।

पाठ और प्रसंग: अंत का “करैह” कठिन मुद्रित पाठ है। ऊपर सामान्य आशय—सुखद वस्तु को भी उचित सहायक चाहिए—का सीमित भावानुवाद है।

दोहा ३७५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७५
कारज सोई सुधरिहै जो करियै सम भाय। अति बरषै बरषै बिना जौ कीरसन कुम्हलाय॥

शब्दार्थ: सम भाय=संतुलित ढंग; कीरसन=कृषि।

सरल हिंदी अर्थ: अधिक वर्षा और वर्षा का अभाव दोनों खेती बिगाड़ते हैं।

भावार्थ: कार्य में संतुलन रखें।

दोहा ३७६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७६
सज्जनता न मिलै किये जतन करौ किन कोइ। ज्यौं करि फार निहारिये लोचन बड़ौ न होइ॥

शब्दार्थ: लोचन=नेत्र; निहारिये=देखें।

सरल हिंदी अर्थ: केवल दिखावटी चेष्टा से सज्जनता नहीं आती, जैसे आँख फाड़ने से उसका वास्तविक आकार नहीं बढ़ता।

भावार्थ: सद्गुण का अभ्यास भीतर से करें।

दोहा ३७७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७७
बिन बनाव बासिक बने ताही के कुबखान। दगले पर ज्यौं अरगजो माथे पर तनत्रान॥

शब्दार्थ: बनाव=उचित साज-सँवार; कुबखान=निंदा; दगला=रुईदार अँगरखा; अरगजा=सुगंधित लेप।

सरल हिंदी अर्थ: अनुपयुक्त ढंग से साज-सँवार उपहास कराती है; वस्त्र पर शरीर का लेप लगाने जैसे उदाहरण हैं।

भावार्थ: संसाधन सही जगह और तरीके से लगाएँ।

पाठ और प्रसंग: “कुबखान” और “दगला” के अर्थ मुद्रित दीपिका से लिए हैं। दूसरी पंक्ति का “तनत्रान” स्पष्ट नहीं; उसे अनुमान से नया शब्द बनाकर मूल में नहीं बदला गया।

दोहा ३७८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७८
तन बनाय उपजाय रुचि ठानत मान निदान। ज्यौं पंचामृत छाँड़ि कै करत तपत जल पान॥

शब्दार्थ: मान=रूठना; पंचामृत=मीठा मिश्रित पेय।

सरल हिंदी अर्थ: आकर्षण और रुचि होते हुए मान करना, मानो पंचामृत छोड़कर गर्म पानी पीना है।

भावार्थ: अनावश्यक रूठना उपलब्ध सुख घटाता है।

दोहा ३७९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३७९
मन देत न तन देन कौं मन मिलयो तजि लाज। ज्यौं अंकुस कौं नटत कोड़ है गिरि सौं गजराज॥

शब्दार्थ: अंकुस=हाथी साधने का उपकरण; गिरि=पर्वत।

सरल हिंदी अर्थ: मन मिल जाए तो देह का संकोच गौण होता है; छोटे अंकुश से विशाल हाथी नियंत्रित होता है।

भावार्थ: मन की सहमति संबंध की मुख्य शक्ति है।

पाठ और प्रसंग: “नटत कोड़” का विशिष्ट पुराना पद कठिन है; हाथी-अंकुश के स्पष्ट दृष्टांत तक अर्थ सीमित रखा है।

दोहा ३८०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८०
छोटे मन में छाड़िये कैसैं मोटी बात। छेरी के मुँह में दियो ज्यौं पेठा न समात॥

शब्दार्थ: छेरी=बकरी; मोटी=बड़ी।

सरल हिंदी अर्थ: बड़ी बात छोटे मन में नहीं समाती, जैसे बकरी के छोटे मुँह में बड़ा फल।

भावार्थ: गहरी समझ के लिए ग्रहणशीलता बढ़ाएँ।

दोहा ३८१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८१
होत निबाह न आपनो लीने फिरत समाज। चूहा बिल न समात है पुच्छ बाँधिए छाज॥

शब्दार्थ: छाज=सूप; निबाह=निर्वाह।

सरल हिंदी अर्थ: जो अपने बिल में ही न समा सके, उसकी पूँछ में सूप बाँधना कठिनाई बढ़ाता है।

भावार्थ: अपनी क्षमता सँभालकर अतिरिक्त जिम्मेदारी लें।

दोहा ३८२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८२
रहै प्रजा धन छन सौं जहाँ बाँकी तरवार। सो फल कोउ न लै सकै जहाँ कँटीली डार॥

शब्दार्थ: बाँकी तरवार=उठी तलवार; डार=डाली।

सरल हिंदी अर्थ: तलवार के भय में प्रजा का धन कैसे टिके? काँटेदार डाल से फल लेना कठिन है।

भावार्थ: भय और उत्पीड़न समृद्धि रोकते हैं।

दोहा ३८३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८३
जासौं परिचै होय सो पावै तिहि उनमान। रुपिया कौं खोटो खरो कैसैं कहै अजान॥

शब्दार्थ: परिचै=पहचान; खोटो=नकली; खरो=असली।

सरल हिंदी अर्थ: पहचान रखने वाला ही सिक्के का खरा-खोटा भेद जानता है।

भावार्थ: निर्णय से पहले विषय का ज्ञान प्राप्त करें।

दोहा ३८४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८४
बिना प्रयोजन भूलि हू ठट्ठियै नाहीं ठाट। जैबे नहिं जा गाँव कौं ताकी पूछ न बाट॥

शब्दार्थ: बाट=रास्ता; प्रयोजन=उद्देश्य।

सरल हिंदी अर्थ: जिस गाँव जाना नहीं, उसका रास्ता पूछना व्यर्थ है।

भावार्थ: समय और ध्यान सार्थक काम में लगाएँ।

दोहा ३८५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८५
आपहि कहा बखानिये भली बुरी की जोग। ऊढ़े धन की बान कौं कहैं बताइ लोग॥

शब्दार्थ: बखानिये=वर्णन करें; बान=बाण।

सरल हिंदी अर्थ: उड़े बाण की दिशा लोग देख लेते हैं; भली-बुरी योग्यता भी कर्म से खुलती है।

भावार्थ: अपने गुणों का प्रचार करने से अधिक काम करें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका में “ऊढ़े” का अर्थ उड़े हुए है। “धन” धनुष का संक्षिप्त रूप है; यह धन-सम्पत्ति का बाण नहीं।

दोहा ३८६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८६
इंगित तैं आकार तैं जान जात जी भेट। तासौं बात दुरै नहीं ज्यौं दाई सौं पेट॥

शब्दार्थ: इंगित=संकेत; दाई=प्रसूति सहायिका।

सरल हिंदी अर्थ: संकेत और रूप से अनुभवी व्यक्ति छिपी बात समझ लेता है, जैसे दाई गर्भ का अनुमान।

भावार्थ: अनुभव सूक्ष्म संकेत समझने में मदद करता है।

दोहा ३८७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८७
जानै सो चूके कहा आदि अंत बिरंत। घर जन्मे पशु के कहा देखत कोउ दंत॥

शब्दार्थ: बिरंत=वृत्तांत; दंत=दाँत।

सरल हिंदी अर्थ: घर जन्मे पशु की उम्र जानने वाला उसके दाँत क्यों जाँचे?

भावार्थ: प्रत्यक्ष जानकारी हो तो अनावश्यक अनुमान छोड़ें।

दोहा ३८८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८८
कहबो कछु करिबो कछु है जग की विधि दोय। देखन के अरु खान के और दुरद रद होय॥

शब्दार्थ: दुरद=हाथी; रद=दाँत।

सरल हिंदी अर्थ: हाथी के दिखाने और खाने के दाँत भिन्न हैं; लोग भी कभी कथन और कर्म अलग रखते हैं।

भावार्थ: बातों को आचरण की कसौटी पर परखें।

दोहा ३८९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३८९
आप बढ़े नाहीं करै ताको है यह हेत। आप जाय नहिं सासुरै औरन कौं सिख देत॥

शब्दार्थ: हेत=कारण; सासुरै=ससुराल।

सरल हिंदी अर्थ: स्वयं आगे न बढ़कर दूसरों को सीख देने वाले का उपहास किया गया है।

भावार्थ: सलाह के साथ अपना उदाहरण भी रखें।

दोहा ३९०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९०
जो कहिये सो कीजिये पहिलैं करि निधार। पानी पी घर पूछबौ नाहिन भलो विचार॥

शब्दार्थ: निधार=निश्चय/जाँच।

सरल हिंदी अर्थ: पहले विचार करके बोलें; पानी पी लेने के बाद घर पूछना उलटी सावधानी है।

भावार्थ: जाँच कार्य से पहले करें।

दोहा ३९१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९१
पीछै कारज कीजिये पहिलैं जतन बिचार। बढ़े रूख हैं बाँधिये पानी पहिलैं बार॥

शब्दार्थ: रूख=वृक्ष; बार=बाड़/रोक।

सरल हिंदी अर्थ: काम आरंभ करने से पहले उपाय सोचें; पानी की व्यवस्था पहले करनी चाहिए।

भावार्थ: पूर्व तैयारी से कार्य टिकाऊ बनता है।

दोहा ३९२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९२
अरि हू चूके मंत्र कौं कहिये साँच सुनाय। ज्यौं भीषम पांडवन कौं दीनो मरन बताय॥

शब्दार्थ: अरि=शत्रु; मंत्र=गुप्त उपाय।

सरल हिंदी अर्थ: कवि भीष्म द्वारा पांडवों को अपने वध का उपाय बताने की कथा कहता है।

भावार्थ: सत्य और कर्तव्य निजी पक्ष से ऊपर रखे जा सकते हैं।

पाठ और प्रसंग: भीष्म-वध का महाभारत-संदर्भ है; किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाने का निर्देश नहीं।

दोहा ३९३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९३
कहिये तासौं जो हित भली बुरी हू जाय। चोर करै चोरी तऊ साँच कहै घर जाय॥

शब्दार्थ: हित=विश्वास/निकटता; तऊ=तब भी।

सरल हिंदी अर्थ: चोर भी अपने विश्वास के घर जाकर सच कहता है; बात विश्वसनीय व्यक्ति से कही जाती है।

भावार्थ: निजी संवाद में भरोसा आवश्यक है।

दोहा ३९४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९४
संपत कीने बिलसवो सुख कौं चाहै कोइ। रूख उखारे फूल फल कह धौं कैसैं होइ॥

शब्दार्थ: संपत=सम्पत्ति; बिलसवो=उपभोग; रूख=पेड़।

सरल हिंदी अर्थ: संपत्ति नष्ट करके स्थायी सुख नहीं मिलता; उखड़े पेड़ पर फूल-फल नहीं आते।

भावार्थ: लाभ के मूल साधन को सुरक्षित रखें।

दोहा ३९५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९५
रन सनमुख पग सूर के बचन कहैं ते संत। निकसन पीछैं होत है ज्यौं गयंद के दंत॥

शब्दार्थ: सूर=वीर; गयंद=हाथी।

सरल हिंदी अर्थ: वीर का बढ़ा कदम और सज्जन का दिया वचन हाथी के निकले दाँत की तरह लौटते नहीं।

भावार्थ: प्रतिबद्धता विचारपूर्वक लें और निभाएँ।

दोहा ३९६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९६
आय बसै जिहिं दिन सुछिन सो सज्जन चित माहिं। चित्र महावत दुरद पर ज्यौं चढ़ि उतरे नाहिं॥

शब्दार्थ: सुछिन=शुभ क्षण; दुरद=हाथी।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन के मन में बसा स्नेह चित्र के हाथी पर बैठे महावत की तरह स्थिर रहता है।

भावार्थ: सच्चा अपनापन क्षणिक लाभ से नहीं बदलता।

दोहा ३९७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९७
बिन पूछे ही कहत हैं सज्जन हित के बैन। भले बुरे कौं कहत हैं ज्यौं तमचर गत रैन॥

शब्दार्थ: बैन=वचन; तमचर=रात्रिचर; रैन=रात।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन बिना पूछे हित बताते हैं; रात बीतने की सूचना सबको समान मिलती है।

भावार्थ: समय पर उचित सलाह देना भी सहायता है।

पाठ और प्रसंग: तमचर से रात बीतने की सूचना देने वाले जीव का सामान्य संकेत लिया है; कोई निश्चित पक्षी मनमाने रूप से नहीं चुना गया।

दोहा ३९८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९८
बिछुरे गए बिदेस हू सज्जन बिछुरै नाहिं। दूर भए ज्यौं कुरज की सुरति सुतन के माहिं॥

शब्दार्थ: कुरज=कुररी/क्रौंच पक्षी; सुरति=स्मृति।

सरल हिंदी अर्थ: विदेश जाने पर भी सज्जन का स्नेह बना रहता है; पक्षी और बच्चों की स्मृति का दृष्टांत है।

भावार्थ: दूरी अपनापन समाप्त नहीं करती।

दोहा ३९९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ३९९
बसिये वहाँ बिचार कै जहाँ दुष्ट गति नाहिं। होत न कब हूँ भँवर डर ज्यौं चंपक बन माहिं॥

शब्दार्थ: गति=पहुँच; चंपक=चम्पा।

सरल हिंदी अर्थ: कवि चम्पा पर भौंरे न आने के काव्यविश्वास से सुरक्षित निवास का संकेत देता है।

भावार्थ: रहने का स्थान सुरक्षा देखकर चुनें।

पाठ और प्रसंग: चम्पा पर भौंरे न आने की उक्ति काव्यपरंपरा का विश्वास है, सार्वभौम वनस्पति-वैज्ञानिक तथ्य नहीं।

दोहा ४००

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४००
दान देत धन-हीनता होत तथापि बर्यान। दुरबल तनु सराहिये उदर भरत जब दान॥

शब्दार्थ: बर्यान=श्रेष्ठ/सराहनीय; उदर=पेट।

सरल हिंदी अर्थ: संसाधन घटने पर भी जरूरतमंद का पेट भरने वाला दान सराहनीय है।

भावार्थ: सहायता का मूल्य उसके उपयोग में है।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ४०१–४५०

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ४०१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०१
ठीक किये बिन और की बात साँच मत थर्प। होत अँधेरी रैन में परी जेवरी सर्प॥

शब्दार्थ: थर्प=स्थापित/मान लेना; जेवरी=रस्सी।

सरल हिंदी अर्थ: अँधेरे में रस्सी साँप लगती है; बिना जाँचे किसी की बात सच न मानें।

भावार्थ: विश्वास से पहले तथ्य स्पष्ट करें।

दोहा ४०२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०२
झूठ बिना फीकी लगै अधिक झूठ दुख-भौन। झूठ तितो ही बोलिये ज्यौं आटे में लौन॥

शब्दार्थ: लौन=नमक; भौन=घर।

सरल हिंदी अर्थ: कवि बातचीत के अलंकार और घातक असत्य में अंतर नमक की मात्रा से समझाता है।

भावार्थ: मनोरंजक अतिशयोक्ति को धोखे का औचित्य न बनाएँ।

पाठ और प्रसंग: यह हास्य/बातचीत में अतिशयोक्ति की पुरानी नीति है। आर्थिक, स्वास्थ्य या दूसरे महत्त्वपूर्ण निर्णयों में असत्य स्वीकार्य बताने का नियम नहीं।

दोहा ४०३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०३
ठौर देखि कै हूजिये कुटिल सरल गति आप। बाहर टेढ़ो फिरत है बाँबी सूधौ साँप॥

शब्दार्थ: ठौर=स्थान; बाँबी=बिल; सूधौ=सीधा।

सरल हिंदी अर्थ: साँप बाहर टेढ़ा चलता, बिल में सीधा प्रवेश करता है।

भावार्थ: परिस्थिति के अनुसार व्यवहार में लचीलापन रखें।

दोहा ४०४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०४
एकतहू रह सज्जन खल तजत न अपनो अंग। मनि बिष-हर बिष-कर सरप सदा रहत इक संग॥

शब्दार्थ: खल=दुष्ट; बिषहर=विष हरने वाला।

सरल हिंदी अर्थ: मणि और सर्प के लोकदृष्टांत में साथ रहने पर भी विपरीत गुण बने रहते हैं।

भावार्थ: केवल निकटता से चरित्र का अनुमान न लगाएँ।

दोहा ४०५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०५
भले बुरी जो आदरैं कौन सकै निरवारि। सीत बिमल पावन करत चलत नीच गति बारि॥

शब्दार्थ: निरवारि=रोकना; बारि=जल।

सरल हिंदी अर्थ: नीचे बहता जल भी शीतल और पवित्र करने वाला है; गुण का आदर रोकना कठिन है।

भावार्थ: स्थिति से अधिक उपयोगी गुण देखें।

दोहा ४०६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०६
दोउ चाहैं मिलन कौं तौ मिलाप निरधार। कबहूँ नाहिन बाजिहै एक हाथ सौं तार॥

शब्दार्थ: दोउ=दोनों; तार=ताली का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ: मिलन दोनों की इच्छा से होता है; एक हाथ से ताली नहीं बजती।

भावार्थ: संबंध में पारस्परिक सहमति जरूरी है।

दोहा ४०७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०७
हिए दुष्ट के बदन तैं मधुर न निकसे बात। जैसे करुई बेल के को मीठे फल खात॥

शब्दार्थ: हिए=हृदय; बदन=मुख; करुई=कड़वी।

सरल हिंदी अर्थ: कड़वी बेल से मीठे फल की तरह दुष्ट मन से मधुर हितवचन दुर्लभ हैं।

भावार्थ: मिठास के मूल में सद्भाव होना चाहिए।

दोहा ४०८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०८
रूखे बचन मिलाप में कहत होत रस-भंग। बीन बजत ज्यौं तार की टूटे रहत न रंग॥

शब्दार्थ: रसभंग=आनंद टूटना; बीन=वाद्य।

सरल हिंदी अर्थ: मिलन में कठोर वचन आनंद बिगाड़ते हैं, जैसे वाद्य का तार टूटना।

भावार्थ: संवाद में संवेदनशील भाषा रखें।

दोहा ४०९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४०९
आप अकारज आपनो करतु कुबुध के साथ। पाय कुल्हारी आपने मारतु मूरख हाथ॥

शब्दार्थ: अकारज=अहित; कुबुध=दुर्बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ: मूर्ख कुल्हाड़ी पाकर अपने ही हाथ पर चोट करता है।

भावार्थ: अविवेक से साधन अपना नुकसान करते हैं।

दोहा ४१०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१०
ताही कौं करिये जतन रहिये जिहिं आधार। को काटै ता डार कौं बैठै जाहि डार॥

शब्दार्थ: आधार=सहारा; डार=डाली।

सरल हिंदी अर्थ: जिस डाल पर बैठे हों, उसे कौन काटेगा?

भावार्थ: अपने जीवन के सहारों को सँभालें।

दोहा ४११

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४११
न्याय चलत बिगरै कछु तौ न करौ अफसोस। धार परत जो राजपथ तौ न देत कोउ दोस॥

शब्दार्थ: धार=धाड़/डाका; राजपथ=राजमार्ग; दोस=दोष।

सरल हिंदी अर्थ: न्यायपूर्वक चलकर कोई नुकसान हो तो व्यर्थ पछताएँ नहीं; राजमार्ग पर डाका पड़ने में यात्री को दोष नहीं दिया जाता।

भावार्थ: उचित सावधानी के बाद अनियंत्रित हानि का दोष स्वयं पर न लें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका में “धार” का अर्थ धाड़/डाका दिया है; इसे पानी की धारा नहीं पढ़ा गया।

दोहा ४१२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१२
भले भलो ही कहत है पै न कहत है दोष। सूरदास कहे अंध कौं उपजावत है तोष॥

शब्दार्थ: तोष=संतोष; पै=परंतु।

सरल हिंदी अर्थ: सम्मानजनक संबोधन प्रसन्न करता है; कमी को ताना बनाना उचित नहीं।

भावार्थ: व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखें।

दोहा ४१३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१३
सदा सुथान प्रधान है बल न प्रधान बनाव। नाग डरावत गरुड़ कौं हर उर हार प्रभाव॥

शब्दार्थ: सुथान=सुरक्षित प्रभावी स्थान; हर=शिव; उर=वक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: शिव के गले में बैठा सर्प गरुड़ से निर्भय है—आश्रय का प्रभाव।

भावार्थ: स्थान और समर्थन शक्ति को प्रभावित करते हैं।

दोहा ४१४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१४
जामे विद्या नारदी बिगरन देत न लाग। पैस चोर अँसि स्वान कौं कहत धनी सौं जाग॥

शब्दार्थ: नारदी=कलह कराने वाली; स्वान=कुत्ता; धनी=मालिक।

सरल हिंदी अर्थ: एक ओर चोर को प्रवेश, दूसरी ओर मालिक को जागने की सलाह देने वाला दोहरा व्यवहार बिगाड़ता है।

भावार्थ: विभिन्न पक्षों को भड़काने वाले से सावधान रहें।

पाठ और प्रसंग: कवि ने “नारदी विद्या” का व्यंग्यात्मक प्रयोग किया है। कथा-पात्र नारद की समस्त भूमिका को कपट कहना आशय नहीं।

दोहा ४१५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१५
भाग-हीन कौं ना मिलै भली बस्तु कौ भोग। दाख पके मुख पाक कौ होत काग को रोग॥

शब्दार्थ: दाख=अंगूर; मुखपाक=मुँह के छाले।

सरल हिंदी अर्थ: अंगूर पकने पर मुँह में रोग हो तो उनका स्वाद नहीं लिया जा सकता।

भावार्थ: अवसर के साथ उपभोग की क्षमता भी चाहिए।

पाठ और प्रसंग: अंगूर पकने पर कौए के मुँह में रोग का संकेत पुराना पक्षी-संबंधी विश्वास है।

दोहा ४१६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१६
सब कोउ चाहत भलो भिन्न भिन्न की ओर। ज्यौं चकई रवि कौ उदै ससि कौ उदै चकोर॥

शब्दार्थ: रवि=सूर्य; ससि=चंद्र; चकई=चकवी।

सरल हिंदी अर्थ: चकवी को सूर्योदय, चकोर को चंद्रोदय प्रिय है—सबकी पसंद भिन्न।

भावार्थ: अपनी पसंद सब पर न थोपें।

दोहा ४१७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१७
भले बंस संतति भली कबहूँ नीच न होय। ज्यौं कंचन की खान में काँच न उपजै कोय॥

शब्दार्थ: बंस=वंश; कंचन=सोना।

सरल हिंदी अर्थ: कवि अच्छे वंश की संतान को सोने की खान के दृष्टांत से सराहता है।

भावार्थ: इसे जन्म से श्रेष्ठता का प्रमाण न मानें; आचरण निर्णायक है।

पाठ और प्रसंग: वंश-आधारित श्रेष्ठता ऐतिहासिक उक्ति है, सार्वभौम तथ्य नहीं। अगला दोहा भी इसी पुराने प्रतिमान का प्रयोग करता है।

दोहा ४१८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१८
सूर बीर के बंस मैं सूर बीर सुत होय। ज्यौं सिंहिनि के गर्भ मैं हिरन न उपजै कोय॥

शब्दार्थ: सूर=शूर; सिंहिनि=सिंहनी।

सरल हिंदी अर्थ: शूर परिवार की संतान को वीर बताने के लिए सिंहनी का उदाहरण है।

भावार्थ: संस्कार प्रेरणा दे सकते हैं, क्षमता जन्म से निश्चित नहीं।

दोहा ४१९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४१९
करै न कबहूँ साहसी दीन हीन कौ काज। भूख सहै पर घास कौं नाहिं भखै मृगराज॥

शब्दार्थ: मृगराज=सिंह; भखै=खाए।

सरल हिंदी अर्थ: सिंह का घास न खाना साहसी के अनुचित काम न करने का दृष्टांत है।

भावार्थ: कठिनाई में भी अपने सिद्धांत बनाए रखें।

दोहा ४२०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२०
मान-धनी नर नीच पै जाँचै नाहीं जाय। कबहूँ न माँगी स्यार पै बलि भूख्यौ मृगराय॥

शब्दार्थ: जाँचै=माँगने; स्यार=सियार; मानधनी=स्वाभिमानी।

सरल हिंदी अर्थ: कवि सिंह-सियार के उदाहरण से अयोग्य व्यक्ति से याचना न करने की बात कहता है।

भावार्थ: स्वाभिमान रखें, जरूरी सहायता माँगना अपमान नहीं।

दोहा ४२१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२१
छोटे नर कौ बड़ेनि सों कबहूँ बुरी न होय। फूट आगि करि ना सकै तपत उदधि कौ तोय॥

शब्दार्थ: उदधि=समुद्र; तोय=जल।

सरल हिंदी अर्थ: छोटी आग पूरे समुद्र को गर्म नहीं कर सकती—सामर्थ्य का अंतर है।

भावार्थ: टकराव में शक्ति और परिणाम समझें।

दोहा ४२२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२२
नीचहु उत्तम संग मिलि उत्तम ही है जाय। गंग संग जल भिद्य हू गंगोदक के भाय॥

शब्दार्थ: गंगोदक=गंगाजल; भाय=भाव/स्थिति।

सरल हिंदी अर्थ: सामान्य जल गंगा में मिलकर उसी नाम से जाना जाता है।

भावार्थ: अच्छी संगति विकास का अवसर देती है।

दोहा ४२३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२३
अधिक चतुर की चातुरी होत चतुर के संग। नग निरमल के ढांक तैं बढ़त जोति रुचि रंग॥

शब्दार्थ: नग=रत्न; ढांक=जड़ने का आधार।

सरल हिंदी अर्थ: रत्न उचित आधार में अधिक चमकता है; चतुरता चतुर संग में बढ़ती है।

भावार्थ: योग्य साथियों से सीखें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका रत्न के पीछे ढाँक लगाने से चमक बढ़ने का उदाहरण बताती है; “नग” यहाँ पर्वत नहीं, नगीना है।

दोहा ४२४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२४
परतछ नीके देखिए कहा बरन कोउ ताहि। कर कंकन कौं आरसी को देखत है चाहि॥

शब्दार्थ: परतछ=प्रत्यक्ष; आरसी=दर्पण।

सरल हिंदी अर्थ: हाथ के कंगन को देखने के लिए दर्पण नहीं चाहिए।

भावार्थ: स्पष्ट प्रमाण के लिए अनावश्यक तर्क न जुटाएँ।

दोहा ४२५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२५
सहज सील गुन सज्जन के खल बुधि होत न भंग। रतन दीप की ज्यौं सिखा बुझत न बात प्रसंग॥

शब्दार्थ: सहज=स्वाभाविक; सिखा=शिखा; बात=वायु।

सरल हिंदी अर्थ: रत्न की चमक हवा से नहीं बुझती; सज्जन के गुण दुष्टता से सहज नष्ट नहीं होते।

भावार्थ: चरित्र को बाहरी दबाव से बचाएँ।

दोहा ४२६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२६
रति रस श्रुति रस राग रस पाय न चाहत और। चाखत मधु अरविंद कौ लै न ईख रस भौंर॥

शब्दार्थ: श्रुति=श्रवण; अरविंद=कमल।

सरल हिंदी अर्थ: कमल-मधु पाकर भौंरा ईख का रस नहीं चाहता—विशिष्ट आनंद में मन रम जाता है।

भावार्थ: रुचि का मूल्य केवल बाहरी आकर्षण से नहीं बनता।

पाठ और प्रसंग: भौंरे और विभिन्न रसों की पसंद काव्य-दृष्टांत है; इसे जैविक आहार का नियम न मानें।

दोहा ४२७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२७
मोह महातम रहतु है जौ लौं ज्ञान न होत। कहा महातम रहि सकै भए अदीत उदोत॥

शब्दार्थ: महातम=महाअंधकार; अदीत=आदित्य/सूर्य; उदोत=उदय।

सरल हिंदी अर्थ: ज्ञान आने पर मोह वैसे हटता है जैसे प्रकाश से अंधकार।

भावार्थ: समझ विकसित करके भ्रम दूर करें।

दोहा ४२८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२८
सबुध अबुध की सेव कौं यह सरूप जिय थाप। थल में रोपित कमल ज्यौं बधिर करन ज्यौं जाप॥

शब्दार्थ: सबुध=समझदार; अबुध=असमझ; थल=सूखी भूमि।

सरल हिंदी अर्थ: अनुपयुक्त जगह कमल रोपना या सुन न सकने वाले को सुनाना निष्फलता का दृष्टांत है।

भावार्थ: सहायता का तरीका जरूरत और ग्रहणक्षमता के अनुरूप रखें।

पाठ और प्रसंग: दिव्यांगता का दृष्टांत पुरानी भाषा में है। उपयोगी बात संप्रेषण का तरीका उपयुक्त करना है, किसी व्यक्ति की क्षमता या गरिमा नकारना नहीं।

दोहा ४२९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४२९
यै सेवा राजान की दीन्हीं कठिन बताय। ज्यौं चुंबन ब्याली बदन सिंह मिलन के भाय॥

शब्दार्थ: ब्याली=सर्पिणी; बदन=मुख।

सरल हिंदी अर्थ: राजसेवा को सर्पमुख चूमने और सिंह से मिलने जैसी जोखिमपूर्ण स्थिति कहा है।

भावार्थ: सत्ता के निकट काम में जोखिम पहचानें।

दोहा ४३०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३०
पंडित अरु बनिता लता सोभित आश्रय पाय। है मानिक बहु मोल कौ हेम जटित छबि छाय॥

शब्दार्थ: बनिता=स्त्री; हेम=सोना; मानिक=रत्न।

सरल हिंदी अर्थ: कवि विद्वान, स्त्री और लता की शोभा आश्रय से, रत्न की सोने में जड़ाई से जोड़ता है।

भावार्थ: अच्छा वातावरण प्रतिभा निखारता है; स्वतंत्रता और गरिमा भी जरूरी हैं।

दोहा ४३१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३१
इक गुन तैं सोभा लहैं इक अवगुन अवरोह। सोह उरोजन पीनता त्यौं कटि कृसता सोह॥

शब्दार्थ: पीनता=भरापन; कृसता=पतलापन; कटि=कमर।

सरल हिंदी अर्थ: शृंगारिक उदाहरण में एक अंग का भरापन, दूसरे का पतलापन सुहाता है।

भावार्थ: एक ही गुण हर संदर्भ में समान उपयुक्त नहीं।

दोहा ४३२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३२
सुजन सुजन के दरस ही पावत जिय संतोष। लहत कच्छ के बतस ज्यौं सोम दृष्टि तैं पोष॥

शब्दार्थ: कच्छ=कछुआ; बतस=बच्चे; सोम=चंद्र।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन सज्जन को देखकर संतोष पाता है; कछुए के अंडे चंद्रप्रकाश से पोषित होने का पुराना विश्वास दृष्टांत है।

भावार्थ: सद्भावी संग मन को संबल देता है।

पाठ और प्रसंग: मुद्रित दीपिका इसे कछुए के अंडों का चंद्रप्रकाश में परिपक्व होना बताती है। यह पुराना विश्वास है, आधुनिक प्राणिविज्ञान का कथन नहीं।

दोहा ४३३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३३
सब संपति फल करत है सुहृद जतन को हेत। दूरहिं सूरज उदित ज्यौं कमलन कौं सुख देत॥

शब्दार्थ: सुहृद=हितैषी; जतन=प्रयास।

सरल हिंदी अर्थ: दूर का सूर्य कमलों को लाभ देता है; संपन्न मित्र का प्रयत्न भी हित कर सकता है।

भावार्थ: हितैषिता दूरी से सीमित नहीं होती।

दोहा ४३४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३४
ऊँचे पद कौं पाय लघु होय तुरत ही पात। घन तैं गिरि पर गिरत जल गिरिहू तैं ढरि जात॥

शब्दार्थ: लघु=तुच्छ/अयोग्य; पात=पतन; गिरि=पर्वत।

सरल हिंदी अर्थ: पहाड़ पर गिरा जल नीचे बहता है; अयोग्य व्यक्ति ऊँचा पद सँभाल नहीं पाता।

भावार्थ: पद के साथ योग्यता विकसित करें।

दोहा ४३५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३५
अपनी प्रभुता कौं सबै बोलत झूठ बनाय। बेस्या बरस घटावही जोगी बरस बढ़ाय॥

शब्दार्थ: प्रभुता=महत्त्व; बरस=आयु।

सरल हिंदी अर्थ: कवि अलग पेशों में अपनी छवि के लिए उम्र घटाने-बढ़ाने की रूढ़ि का उदाहरण देता है।

भावार्थ: प्रचारित दावों की जाँच करें, पेशे पर सामान्यीकरण नहीं।

दोहा ४३६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३६
अपने लालच के लिये दुख हू आपने दाय। कान बिधावै खाय गुर पहिरै बीरबलाय॥

शब्दार्थ: गुर=गुड़; बीरबलाय=कर्णाभूषण।

सरल हिंदी अर्थ: गुड़ और गहने के लोभ में कान छिदवाने की पीड़ा सहने का उदाहरण है।

भावार्थ: लाभ के आकर्षण में कीमत भी देखें।

दोहा ४३७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३७
धनी गुनी कौं न्याय ही धन अरपै धरि हेत। सरगुन पात्र कौं कूप हू मिलतहि जीवन देत॥

शब्दार्थ: सरगुन=रस्सी सहित/गुणयुक्त; पात्र=बर्तन/योग्य व्यक्ति।

सरल हिंदी अर्थ: रस्सी लगे पात्र को कुआँ जल देता है; धन योग्य गुणी को देना उचित है।

भावार्थ: योग्यता और जरूरत देखकर संसाधन दें।

दोहा ४३८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३८
गुन सनेह जुत होउ है ताही की छबि होत। गुन सनेह के दीप की जैसैं जोति उदोत॥

शब्दार्थ: गुन=गुण/बाती; सनेह=प्रेम/तेल।

सरल हिंदी अर्थ: दीप बाती और तेल से चमकता है; मनुष्य गुण और स्नेह से।

भावार्थ: योग्यता के साथ मानवीय लगाव रखें।

दोहा ४३९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४३९
सुनि सुनि मीठी बात कौं को चाहत कटु बात। चाखि दाख के स्वाद कौं कौन निबौरी खात॥

शब्दार्थ: दाख=अंगूर; निबौरी=नीमफल।

सरल हिंदी अर्थ: अंगूर चखने के बाद कड़वा नीमफल कौन चाहेगा?

भावार्थ: मधुर भाषा अपनाएँ, पर सत्य न छिपाएँ।

दोहा ४४०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४०
रस की कथा सुनी न तिहिं कूर कथा की चाहि। जिन दाखै चाखी नहीं मिष्ट निबौरी ताहि॥

शब्दार्थ: कूर=कठोर/नीरस; मिष्ट=मीठा।

सरल हिंदी अर्थ: जिसने अंगूर नहीं चखे, उसे नीमफल भी अच्छा लग सकता है।

भावार्थ: अनुभव बढ़ने पर पसंद बदलती है।

दोहा ४४१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४१
प्रेमी प्रीत न छाँड़हीं होत न प्रन तैं हीन। मरे परे हू उदर में जल चाहत है मीन॥

शब्दार्थ: प्रन=प्रतिज्ञा; मीन=मछली; उदर=पेट।

सरल हिंदी अर्थ: प्रेमी निष्ठा नहीं छोड़ता; कवि मछली खा लेने पर भी खाने वाले को पानी की प्यास लगने का लोकदृष्टांत देता है।

भावार्थ: सच्चा लगाव स्थिर होता है; इसे आत्महानि का आदर्श न बनाएँ।

पाठ और प्रसंग: दीपिका मछली खाने के बाद प्यास के संकेत से उदर में भी जल की चाह समझाती है। यह आहार-विज्ञान का प्रमाणित दावा नहीं।

दोहा ४४२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४२
अति उदारता बड़ेनि की कहाँ लौं बरनै कोय। चातक जाँचै तनिक घन बरस भरैं घन तोय॥

शब्दार्थ: जाँचै=याचना; तोय=जल।

सरल हिंदी अर्थ: चातक थोड़ी बूँद चाहता है, बादल बहुत जल बरसाता है।

भावार्थ: उदार व्यक्ति अपेक्षा से अधिक सहायता कर सकता है।

दोहा ४४३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४३
बड़े जु चाहैं सो करैं करन मती उर धारि। हरि गिरि तारे जलधि पर करी सिला तैं नारि॥

शब्दार्थ: हरि=राम; जलधि=समुद्र; सिला=शिला।

सरल हिंदी अर्थ: रामकथा के तैरते पत्थर और अहल्या-उद्धार से समर्थ के अद्भुत कार्य कहे हैं।

भावार्थ: यह भक्तिपरक दृष्टांत है, सामान्य शक्ति का असीम दावा नहीं।

दोहा ४४४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४४
औसर बीते जतन कौं करिबो नहिं अभिराम। जैसे पानी बह गए सेतबंध किहिं काम॥

शब्दार्थ: औसर=अवसर; सेतबंध=बाँध।

सरल हिंदी अर्थ: पानी बह जाने के बाद बाँध बनाने से बीता नुकसान नहीं रुकता।

भावार्थ: उचित उपाय समय पर करें।

दोहा ४४५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४५
दुष्ट संग बसिये नहीं दुख उपजत इहिं भाय। घसत बाँस की अगिन तैं जरत सबै बनराय॥

शब्दार्थ: घसत=रगड़ने; बनराय=वन।

सरल हिंदी अर्थ: बाँसों के घर्षण की आग पूरे जंगल को जलाती है।

भावार्थ: हानिकारक संगति का प्रभाव व्यापक हो सकता है।

दोहा ४४६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४६
करै अनादर गुनिनि कौं वाहि सभा छबि जाय। गज कपोल शोभा मिटत ज्यौं अलि देत उड़ाय॥

शब्दार्थ: गुनिनि=गुणी; गजकपोल=हाथी के गाल; अलि=भौंरा।

सरल हिंदी अर्थ: गुणी का अपमान सभा की शोभा घटाता है, जैसे भौंरे हटने पर हाथी के गाल की शोभा।

भावार्थ: प्रतिभा को सम्मान देने से संस्था का मान बढ़ता है।

दोहा ४४७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४७
कहूँ कहूँ गुन तैं अधिक उपजत दोष सरीर। मीठी बानी बोलि कै परत पींजरा कीर॥

शब्दार्थ: कीर=तोता; पींजरा=पिंजरा।

सरल हिंदी अर्थ: मीठी बोली के कारण तोता पकड़ लिया जाता है; गुण भी संकट खींच सकता है।

भावार्थ: प्रतिभा के साथ सुरक्षा और सावधानी रखें।

दोहा ४४८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४८
भले बुरे निबहैं सबै महत पुरुष के संग। चंद साँप जल अगिन ए बसत संभु के अंग॥

शब्दार्थ: महत=महान; संभु=शिव।

सरल हिंदी अर्थ: शिव के साथ चंद्र, सर्प, जल और अग्नि जैसे विरोधी तत्त्व रहते हैं।

भावार्थ: समर्थ नेतृत्व विविध लोगों को साथ रख सकता है।

पाठ और प्रसंग: चंद्र, सर्प, गंगा और अग्नि शिव के पौराणिक रूप के तत्त्व हैं।

दोहा ४४९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४४९
बिनत कहे हू सत पुरुष पर की पूरै आस। कौन कहत है सूर कौं घर घर करव प्रकास॥

शब्दार्थ: सतपुरुष=सज्जन; सूर=सूर्य।

सरल हिंदी अर्थ: सूर्य से कोई नहीं कहता, फिर भी वह प्रकाश देता है।

भावार्थ: जरूरत पहचानकर स्वयं सहायता करें।

दोहा ४५०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५०
कछू कहि नीच न छेड़िये भलो न वाकौ संग। पाथर डारे कीच में उछरि बिगारै अंग॥

शब्दार्थ: वाकौ=उसका; कीच=कीचड़।

सरल हिंदी अर्थ: कीचड़ में पत्थर फेंकने से छींटे अपने ऊपर आते हैं।

भावार्थ: अनावश्यक उकसावे और अपशब्दों से बचें।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ४५१–५००

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ४५१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५१
हीन जाति न बिरोधिये वह तौ तन दुखदाय। रज हू ठोकर मारिये चढ़ै सीस पर आय॥

शब्दार्थ: रज=धूल; बिरोधिये=विरोध करें।

सरल हिंदी अर्थ: तुच्छ समझी धूल भी ठोकर से सिर पर चढ़ती है; कवि कमजोर समझे व्यक्ति से वैर न करने को कहता है।

भावार्थ: किसी को जन्म या स्थिति से हीन समझना उचित नहीं।

दोहा ४५२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५२
नाहिं करत उपकरन तैं काज सिद्ध बलवान। मुनि बन बसिबो संग मृग किय अगस्त दधि पान॥

शब्दार्थ: उपकरन=साधन; दधि=उदधि का संक्षिप्त पाठ; अगस्त=अगस्त्य।

सरल हिंदी अर्थ: वनवासी अगस्त्य के समुद्र पीने की पौराणिक कथा से सामर्थ्य का महत्त्व कहा है।

भावार्थ: साधनों के साथ कौशल और संकल्प जरूरी हैं।

पाठ और प्रसंग: अगस्त्य का समुद्र-पान पौराणिक कथा है। “दधि” यहाँ उदधि/समुद्र के लिए है।

दोहा ४५३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५३
बित दिये न मिलै कछु यह समभौ सब कोय। होत सिसिर में पात तरु सुरभि समभव होय॥

शब्दार्थ: बित=बीतना; सिसिर=शिशिर; सुरभि=वसंत।

सरल हिंदी अर्थ: शिशिर के बाद वसंत में वृक्ष पर पत्ते आते हैं; कुछ फल समय आने पर मिलते हैं।

भावार्थ: हर प्रक्रिया की स्वाभाविक अवधि होती है।

दोहा ४५४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५४
यह निश्चय करि जानिये जानहार सो जाय। गज के भुक्त कपित्थ के ज्यौं गिर बीज बिलाय॥

शब्दार्थ: भुक्त=खाया; कपित्थ=कैथ; गिर=गूदा।

सरल हिंदी अर्थ: खाए कैथ का भीतर का अंश लुप्त होने के दृष्टांत से जाने वाली वस्तु का न टिकना कहा है।

भावार्थ: नश्वरता समझकर हानि का सामना करें।

पाठ और प्रसंग: हाथी के खाए कैथ का बाहरी ढाँचा बचने वाला पुराना दृष्टांत है; इसकी प्रक्रिया को वैज्ञानिक तथ्य नहीं बनाया गया।

दोहा ४५५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५५
दूर कहा नियरै कहा होनहार सो होय। धूर सींचे नालेर के फल में प्रगटै तोय॥

शब्दार्थ: नियरै=पास; धूर=जड़; नालेर=नारियल।

सरल हिंदी अर्थ: जड़ में दिया जल दूर लगे नारियल में पहुँचता है।

भावार्थ: दूरी के बावजूद कारण का फल पहुँच सकता है।

दोहा ४५६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५६
आए आदर ना करै पीछै लेत मनाय। आयौ नाग न पूजई बाँबी पूजन जाय॥

शब्दार्थ: नाग=साँप; बाँबी=बिल।

सरल हिंदी अर्थ: आए अतिथि का आदर छोड़कर बाद में मनाना, साँप छोड़ बिल पूजने जैसा है।

भावार्थ: व्यक्ति उपस्थित हो तभी सम्मान दें।

दोहा ४५७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५७
कहूँ अनादर पाय कै गुनी न करहु अँदेस। विद्या है तौ करहिंगे सब कोउ आदेस॥

शब्दार्थ: अँदेस=चिंता; आदेस=प्रणाम।

सरल हिंदी अर्थ: गुणी कहीं अपमानित होकर निराश न हो; विद्या का सम्मान कहीं और मिलेगा।

भावार्थ: एक अस्वीकृति से अपना मूल्य न घटाएँ।

दोहा ४५८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५८
अपने अपने समय पर सब कौ आदर होय। भोजन प्यारो भूख मैं तिख मैं प्यारो तोय॥

शब्दार्थ: तिख=प्यास; तोय=जल।

सरल हिंदी अर्थ: भूख में भोजन, प्यास में पानी प्रिय होता है।

भावार्थ: उपयोगिता समय और आवश्यकता पर निर्भर है।

दोहा ४५९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४५९
होय सो होय हिसाब सौं बिन हिसाब नहिं होय। भखै बदन तैं अन्न मन नाहि नाक तैं कोय॥

शब्दार्थ: हिसाब=उचित क्रम/अनुपात; भखै=खाए; बदन=मुख; मन=मण, पुराना भारमान।

सरल हिंदी अर्थ: प्रत्येक काम अपने उपयुक्त मार्ग से होता है; मनुष्य मण भर अन्न मुख से खा सकता है, नाक से नहीं।

भावार्थ: उचित परिणाम के लिए सही साधन और विधि अपनाएँ।

पाठ और प्रसंग: दूसरी स्कैन-प्रति से “भखै”, “अन्न” और “मन” का मिलान किया गया है। “मन” यहाँ मनोभाव नहीं, पुराने मण भारमान का रूप है।

दोहा ४६०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६०
जिहिं डर डरि करिये जतन उपजत सोइ अमेट। लगै दूखती चोट ज्यौं होति कनौड़े भेट॥

शब्दार्थ: अमेट=न मिटने वाला; कनौड़े=देनदार/संकोचयुक्त।

सरल हिंदी अर्थ: दुखती जगह चोट और संकोच के समय भेंट जैसे अनचाहे प्रसंग हो जाते हैं।

भावार्थ: हर घटना नियंत्रण में नहीं; धैर्य रखें।

दोहा ४६१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६१
मीठी कोउ बस्तु नहिं मीठी जाकी चाह। अमली मिसरी छाँड़ि कै आफू खात सराहि॥

शब्दार्थ: अमली=अफीम का आदी; आफू=अफीम।

सरल हिंदी अर्थ: आदी व्यक्ति मिश्री छोड़ अफीम चाहता है; पसंद मन की चाह से बनती है।

भावार्थ: आसक्ति को वस्तु की श्रेष्ठता न समझें।

पाठ और प्रसंग: अफीम का उल्लेख नशे की आसक्ति समझाने के लिए है, सेवन की सलाह नहीं।

दोहा ४६२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६२
बड़ो बड़ाई नीच कौं दीजै अपने काम। खरहू कौं बोलत पथिक कहत बिनायक नाम॥

शब्दार्थ: खर=गधा; बिनायक=शुभ शकुन/विघ्नहर्ता।

सरल हिंदी अर्थ: पथिक गधे को भी शुभ संबोधन देता है—अपने काम से प्रशंसा बदलती है।

भावार्थ: स्वार्थपूर्ण तारीफ को पहचानें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका मार्ग में गधे का मिलना शुभ शकुन मानने की प्रथा बताती है। शकुन को परिणाम की गारंटी न मानें।

दोहा ४६३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६३
कहा भयो जो नीच कौं देत बड़ाई कोय। कहत बिनायक नाम पै खर न बिनायक होय॥

शब्दार्थ: बिनायक=विघ्नहर्ता/शुभ संबोधन; खर=गधा।

सरल हिंदी अर्थ: सिर्फ श्रेष्ठ नाम देने से वस्तु के वास्तविक गुण नहीं बदलते।

भावार्थ: पदवी से अधिक क्षमता और कर्म देखें।

दोहा ४६४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६४
भले बुरे कौं जानिबो जात बचन के बंध। कहै अंध कौं सूर इक कहै अंध कौं अंध॥

शब्दार्थ: बचन के बंध=बोलने का ढंग; सूर=सम्मानजनक संबोधन।

सरल हिंदी अर्थ: एक व्यक्ति सम्मान से, दूसरा कमी उभारकर संबोधित करता है।

भावार्थ: बोलचाल से संवेदनशीलता प्रकट होती है।

दोहा ४६५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६५
जाति वृत्ति कैं करत नर अपने हेत अहेत। झूठी साँची बात पर कोउ मुचलका देत॥

शब्दार्थ: वृत्ति=कामकाज; मुचलका=लिखित जमानत।

सरल हिंदी अर्थ: लोग अपनी भूमिका और हित के अनुसार सच्ची-झूठी बात की जिम्मेदारी लेते हैं।

भावार्थ: औपचारिक दावे भी प्रमाण से परखें।

दोहा ४६६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६६
चिरजीवी तन हू तजै ताकौ जग जस बास। फूल गएहू फूल की रहै तेल में बास॥

शब्दार्थ: चिरजीवी=कीर्तिमान; जस=यश; बास=सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ: फूल हटने पर भी तेल में सुगंध रहती है; शरीर के बाद यश रह सकता है।

भावार्थ: अच्छे काम स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।

दोहा ४६७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६७
बहुत भए किहिं काम के भार निबाहक एक। सेस धरे धर सीस पर मेंढक भए अनेक॥

शब्दार्थ: सेस=शेषनाग; धर=धरती।

सरल हिंदी अर्थ: कथा में धरती का भार एक शेष सँभालता है, बहुत मेंढक नहीं।

भावार्थ: संख्या से अधिक उत्तरदायी क्षमता महत्त्वपूर्ण है।

दोहा ४६८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६८
बुद्ध न हैहै पाप तैं बुद्ध धरम तैं धार। सुन्यौ न देख्यौ सिंह के मृग कौं सौ परिवार॥

शब्दार्थ: बुद्ध=वृद्धि; धार=धारण करें।

सरल हिंदी अर्थ: सिंह और हिरनों की वंशवृद्धि के दृष्टांत से कवि हिंसा की अपेक्षा धर्म की वृद्धि कहता है।

भावार्थ: समृद्धि के लिए नैतिक आचरण अपनाएँ।

पाठ और प्रसंग: “बुद्ध” को प्रसंगानुसार वृद्धि का पुराना रूप पढ़ा गया है। सिंह-हिरन का दृष्टांत मनुष्यों के कर्मफल का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।

दोहा ४६९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४६९
देखत कौं पै कछु नहीं सुख पै खल की प्रीति। मृग-तृष्णा में होति है ज्यौं जल की परतीति॥

शब्दार्थ: परतीति=आभास; खल=दुष्ट।

सरल हिंदी अर्थ: दुष्ट का प्रेम मृगतृष्णा के जल जैसा दिखाई देता, पर तृप्त नहीं करता।

भावार्थ: दिखावे के प्रेम को व्यवहार से परखें।

दोहा ४७०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७०
ऊपर दरसै सुमिल सी अंतर अनमिल आँक। कपटी जन की प्रीति है खीरा की सी फाँक॥

शब्दार्थ: सुमिल=जुड़ा; अनमिल=अलग; फाँक=चीरा।

सरल हिंदी अर्थ: कपटी की निकटता खीरे की फाँक जैसी बाहर मिली, भीतर अलग है।

भावार्थ: बाहरी मेल को मन की एकता न मानें।

दोहा ४७१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७१
निबल सबल के परस तैं सबलन सौं अनखात। देति हिमायत की गधी ऐराकी कैं लात॥

शब्दार्थ: परस=संबंध; ऐराकी=ऐरावत।

सरल हिंदी अर्थ: बलवान का संरक्षण पाकर निर्बल भी बड़े से भिड़ता है; गधी-ऐरावत का अतिशयोक्त उदाहरण है।

भावार्थ: सहारे के घमंड में अनुचित टकराव न करें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका में “ऐराकी” का अर्थ इंद्र का हाथी ऐरावत दिया है।

दोहा ४७२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७२
दोष लगावत गुनिन कौं जाकौ हृदय मलीन। धरमी कौं धरमी कहैं छमियन कौं बलहीन॥

शब्दार्थ: मलीन=कलुषित; छमियन=क्षमाशील।

सरल हिंदी अर्थ: दुर्भाव वाला गुण में भी दोष बताता और क्षमाशील को कमजोर कहता है।

भावार्थ: क्षमा को कायरता समझना भूल है।

दोहा ४७३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७३
है ही गति है बड़नि की कुसुम मालती भाय। केशव के सिर पर रहै कै बन माहिं बिलाय॥

शब्दार्थ: केशव=कृष्ण; बिलाय=लुप्त।

सरल हिंदी अर्थ: मालती का फूल देवता के सिर सजे या वन में बिखरे—श्रेष्ठ की गति भिन्न हो सकती है।

भावार्थ: मूल्यवान होने पर भी अवसर हमेशा समान नहीं मिलता।

पाठ और प्रसंग: “केशव” के देव-संकेत के अनुसार फूल को समर्पण और वन में बिखरने का भाव लिया है।

दोहा ४७४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७४
सब विधि डरिये दुष्ट सौं रहिये जतन समेत। संभु सुधाकर सिर धरयो बिष बिषधर के हेत॥

शब्दार्थ: सुधाकर=चंद्र; बिषधर=सर्प।

सरल हिंदी अर्थ: शिव के विष, सर्प और चंद्र वाले रूप से कवि सावधानी का संकेत लेता है।

भावार्थ: हानिकारक व्यवहार के सामने सुरक्षा बनाए रखें।

पाठ और प्रसंग: शिव के सिर चंद्र, गले विष और सर्प की छवि से भाव लिया है; कोई एक विस्तृत कथाक्रम यहाँ निश्चित नहीं किया गया।

दोहा ४७५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७५
खाय न खर्चै सूम धन चोर सबै ले जाय। पीछै ज्यौं मधु मच्छिका हाथ मलै पछिताय॥

शब्दार्थ: सूम=कंजूस; मधुमच्छिका=मधुमक्खी।

सरल हिंदी अर्थ: जो धन न उपयोग करता, न खर्च, उसके लुटने पर पछतावा मधुमक्खी जैसा है।

भावार्थ: बचत के साथ उचित उपयोग भी करें।

दोहा ४७६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७६
जगत बहुत जन तदपि मन बिन सज्जन अति दीन। ससि तारा निस है तऊ रवि बिन नलिन मलीन॥

शब्दार्थ: निस=रात; नलिन=कमल।

सरल हिंदी अर्थ: तारे-चंद्र होते हुए भी कमल सूर्य चाहता है; भीड़ में सज्जन का अभाव खलता है।

भावार्थ: संबंधों में संख्या से अधिक गुणवत्ता देखें।

दोहा ४७७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७७
कोउ कहै न जानिये जोतिवंत सुनि कोय। हाथ दिया लै देखिये ऐसी आप न होय॥

शब्दार्थ: जोतिवंत=प्रकाशमान; दिया=दीप।

सरल हिंदी अर्थ: जिसे देखने के लिए अलग दीप चाहिए, वह स्वयं प्रकाशमान कैसे?

भावार्थ: बड़े दावे के लिए स्वतंत्र प्रमाण देखें।

दोहा ४७८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७८
खल निज दोष न देखई पर के दोषहि तानि। लखै न पग तर सब लखै परबत बरती आगि॥

शब्दार्थ: तानि=फैलाकर; पगतर=पैरों तले।

सरल हिंदी अर्थ: व्यक्ति अपने पैरों की कमी नहीं, दूर पहाड़ की आग देखता है।

भावार्थ: दूसरों की आलोचना से पहले आत्मपरीक्षण करें।

दोहा ४७९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४७९
जैसौ जैसौ अधिक गुन तैसो होय मिलाय। अहि-उर बिष गाल अनल चल शिव ससि सीस बसाय॥

शब्दार्थ: अहि=सर्प; अनल=अग्नि; ससि=चंद्र।

सरल हिंदी अर्थ: शिव के रूप में विभिन्न वस्तुओं को अलग स्थान देकर गुणानुसार स्थान का दृष्टांत है।

भावार्थ: भूमिका क्षमता और उपयुक्तता देखकर दें।

दोहा ४८०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८०
भागहीन कौं देवहू देत सु लेत बनै न। दीठ परै जहाँ बस्तु तहाँ चले मूँद कै नैन॥

शब्दार्थ: दीठ=दृष्टि; नैन=आँखें।

सरल हिंदी अर्थ: कथा का व्यक्ति रखे धन के पास आँखें मूँदकर निकल जाता है।

भावार्थ: उपलब्ध अवसर पहचानने की सजगता रखें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका में शिव-पार्वती और गरीब की कथा है: रास्ते में रखा धन वह आँखें मूँदकर निकलने से नहीं देख पाता। भाग्य-कथा को गरीब के दोष का प्रमाण न मानें।

दोहा ४८१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८१
दिवस भले बिगरै न कछु रहौं निचिंते सोय। आवै चोरी करन कौं चोर अँधेरो होय॥

शब्दार्थ: दिवस=दिन/समय; निचिंते=निश्चिंत।

सरल हिंदी अर्थ: अनुकूल भाग्य में चोर ही अँधा हो जाने की कल्पना से आश्वासन दिया है।

भावार्थ: यह भाग्यपरक उक्ति है, सुरक्षा छोड़ने का निर्देश नहीं।

दोहा ४८२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८२
दान दीन कौं दीजिये मिटै दरिद की पीर। औषध ताकौं दीजिये जाके रोग सरीर॥

शब्दार्थ: दीन=जरूरतमंद; दरिद=दरिद्रता।

सरल हिंदी अर्थ: जिसे आर्थिक कष्ट हो उसे दान, जिसे रोग हो उसे उपचार चाहिए।

भावार्थ: सहायता वास्तविक आवश्यकता के अनुसार दें।

दोहा ४८३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८३
सबही आगे होय कै कबहूँ न करिये बात। सुधरे काज समाज फल बिगरै गारी खात॥

शब्दार्थ: आगे होय=जिम्मेदारी लेकर; समाज=समूह।

सरल हिंदी अर्थ: काम सफल हो तो लाभ समूह को, बिगड़े तो आगे वाले को दोष मिलता है।

भावार्थ: जिम्मेदारी लेते समय भूमिका और जोखिम स्पष्ट रखें।

दोहा ४८४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८४
आवत समै विपति के मित्र शत्रु है जाय। दुहत होत बछ बाँधन कौं थम मातु कौ पाय॥

शब्दार्थ: बछ=बछड़ा; थम=खूँटा; पाय=पैर।

सरल हिंदी अर्थ: दूध दोहते समय माँ से जुड़ने वाला बछड़ा रोक दिया जाता है।

भावार्थ: हित बदलने पर व्यवहार भी बदल सकता है।

पाठ और प्रसंग: दूध दोहते समय बछड़े को अलग बाँधने का दृश्य है; “थम” खूँटे का संकेत है।

दोहा ४८५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८५
उत्तम विद्या लीजिये जदपि नीच पै होय। परयो अपावन ठौर कौ कंचन तजत न कोय॥

शब्दार्थ: अपावन=अशुद्ध; कंचन=सोना।

सरल हिंदी अर्थ: अशुद्ध जगह पड़ा सोना नहीं छोड़ते; ज्ञान कहीं से भी मिले ग्रहण करें।

भावार्थ: सीखने में जन्म या प्रतिष्ठा का भेद न रखें।

दोहा ४८६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८६
निहचै कारन विपत कौ किए प्रीति अरि संग। मृग के सुख मृगराज कौं होत कबहूँ अंग-भंग॥

शब्दार्थ: अरि=शत्रु; मृगराज=सिंह।

सरल हिंदी अर्थ: शिकारी और शिकार की सहज विरोधी रुचियों से असुरक्षित मित्रता का संकट बताया है।

भावार्थ: विश्वास से पहले हितों का टकराव समझें।

पाठ और प्रसंग: दूसरी पंक्ति का पुराना वाक्यबंध कठिन है; स्पष्ट मृग-सिंह के विरोधी हित तक सामान्य भाव रखा गया है।

दोहा ४८७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८७
जौ घर आवत शत्रु हू सज्जन देत सुख चाहि। ज्यौं काटै तरु-मूल कोउ छाँह करत रह ताहि॥

शब्दार्थ: तरुमूल=पेड़ की जड़।

सरल हिंदी अर्थ: काटने वाले को भी वृक्ष छाया देता है; सज्जन अतिथि शत्रु को भी सम्मान देता है।

भावार्थ: उदार रहें और उचित सुरक्षा भी रखें।

दोहा ४८८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८८
ताकौ बुरो न ताकिये जासों जग ब्यौसाइ। छाँह फूल फल देत तरु क्यों तिहि कटन कराइ॥

शब्दार्थ: ताकिये=सोचें; ब्यौसाइ=जीविका/व्यवहार।

सरल हिंदी अर्थ: फल, फूल और छाया देने वाले पेड़ को कटवाना अपने हित का नाश है।

भावार्थ: जीवनदायी साधनों के प्रति कृतज्ञ रहें।

दोहा ४८९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४८९
दुष्ट भाव हिय मुख मधुर तासौं करहु न प्रीति। भीतर बिष पय घट भरयो ताहिन छुइ इहि रीति॥

शब्दार्थ: हिय=हृदय; पय=दूध; घट=बर्तन।

सरल हिंदी अर्थ: भीतर विष और ऊपर दूध वाले पात्र जैसा कपटी का मधुर बोलना है।

भावार्थ: मिठास के साथ नीयत भी परखें।

दोहा ४९०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९०
दुष्ट न छाँड़ै दुष्टता बड़ो ठौर हू पाय। जैसैं तजत न स्यामता बिष शिव कंठ बसाय॥

शब्दार्थ: स्यामता=कालापन; ठौर=स्थान।

सरल हिंदी अर्थ: शिवकंठ में भी विष का कालापन बना है; स्थान बदलने से स्वभाव तुरंत नहीं बदलता।

भावार्थ: सुधार को वास्तविक व्यवहार से जाँचें।

दोहा ४९१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९१
बिन उद्यम मसलत किये कारज सिद्ध न थाय। रोग न जानत औषधी जाने जाइ जो खाय॥

शब्दार्थ: उद्यम=प्रयास; मसलत=विचार; थाय=होता।

सरल हिंदी अर्थ: दवा पर चर्चा नहीं, उसका उचित उपयोग प्रभाव देता है; केवल योजना से काम नहीं बनता।

भावार्थ: विचार के बाद क्रियान्वयन करें।

पाठ और प्रसंग: मुद्रित दीपिका में “मसलत” परिश्रम के आशय में समझाया है। औषधि का उदाहरण वास्तविक उपचार स्वयं तय करने की सलाह नहीं।

दोहा ४९२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९२
नृप अनीति के दोष तैं चूके मंत्र प्रयोग। करै कुपथ्य ता पुरुष कौं उपजै क्यों नहिं रोग॥

शब्दार्थ: नृप=शासक; कुपथ्य=हानिकारक आहार/आचरण।

सरल हिंदी अर्थ: शासक की अनीति अच्छी सलाह को निष्फल करती है, जैसे कुपथ्य स्वास्थ्य बिगाड़ता है।

भावार्थ: नीति की सफलता आचरण पर निर्भर है।

दोहा ४९३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९३
कहा करैं आगम निगम जो मूरख समझै न। दरपन कौ नहिं दोष कछु अंध बदन देखै न॥

शब्दार्थ: आगम-निगम=शास्त्र; दरपन=दर्पण।

सरल हिंदी अर्थ: देखने की क्षमता बिना दर्पण निष्फल है; समझे बिना शास्त्र का लाभ नहीं।

भावार्थ: ज्ञान को समझकर व्यवहार में उतारें।

दोहा ४९४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९४
दया दुष्ट कै चित्त में कबहूँ उपजत नाहिं। हिंसा छाँड़ि सिंह यह क्यों आवै मन माहिं॥

शब्दार्थ: चित्त=मन; सिंह=शेर।

सरल हिंदी अर्थ: सिंह के शिकार से कवि क्रूर प्रवृत्ति का दृष्टांत देता है।

भावार्थ: दया के दावे के साथ कर्म देखें।

दोहा ४९५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९५
प्रीति टूटे हू सज्जन के मन तैं हेत छूटै न। कमलनाल कौं तोरिये तदपि सूत टूटै न॥

शब्दार्थ: हेत=स्नेह; कमलनाल=कमल की डंडी।

सरल हिंदी अर्थ: टूटी कमलनाल के रेशों की तरह सज्जन का स्नेह कुछ अंश में बचा रहता है।

भावार्थ: मतभेद के बाद भी संवेदना रखी जा सकती है।

दोहा ४९६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९६
सज्जन के प्रिय बचन तैं तन संताप मिटाय। जैसैं चंदन नीर तैं तापन तन कौ जाय॥

शब्दार्थ: संताप=कष्ट; नीर=जल।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन के स्नेहपूर्ण वचन चंदन-जल जैसे मन को शीतल करते हैं।

भावार्थ: सांत्वना के शब्द पीड़ा हल्की कर सकते हैं।

दोहा ४९७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९७
सज्जन बचन दुर्जन बचन अंतर बहुत लखाय। वे सबकौं नीके लगैं वे काहू न सुहाय॥

शब्दार्थ: नीके=अच्छे; दुर्जन=दुष्ट।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन की वाणी सुख देती, दुर्जन की वाणी दुखाती है।

भावार्थ: वचन के प्रभाव की जिम्मेदारी लें।

दोहा ४९८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९८
धन अरु गेंद जु खेल की दोउ एक सुभाय। कर में आवत छिनक में छिन में कर तैं जाय॥

शब्दार्थ: छिनक=क्षण; सुभाय=स्वभाव।

सरल हिंदी अर्थ: धन खेल की गेंद की तरह हाथ में आकर फिर निकल जाता है।

भावार्थ: अस्थिर संपत्ति पर अनावश्यक घमंड न करें।

दोहा ४९९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ४९९
प्रभु कौं चिंता सबन की आप न करिये नाहिं। जनम अगाऊ भरत है दूध मातु थन माहिं॥

शब्दार्थ: सबन=सबकी; अगाऊ=पहले।

सरल हिंदी अर्थ: माँ के दूध की पूर्व व्यवस्था से कवि ईश्वर पर विश्वास व्यक्त करता है।

भावार्थ: आस्था रखें और अपनी जिम्मेदारी भी निभाएँ।

दोहा ५००

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५००
धन अरु जोबन कौ गरब कबहूँ करिए नाहिं। देखत ही मिट जात है ज्यौं बादर की छाँह॥

शब्दार्थ: जोबन=यौवन; गरब=गर्व।

सरल हिंदी अर्थ: धन और यौवन बादल की छाया जैसे अस्थायी हैं।

भावार्थ: विनम्र रहें और टिकाऊ गुण विकसित करें।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ५०१–५५०

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ५०१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०१
नृपति चोर जल अनल तैं धनि कौं भय उपजाय। जल थल नभ में मांस कौं मृग केहरि खग खाय॥

शब्दार्थ: अनल=अग्नि; केहरि=सिंह; खग=पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ: धन को शासन, चोर, जल और आग जैसे अनेक जोखिम हैं।

भावार्थ: संपत्ति की सुरक्षा और जोखिम पर ध्यान दें।

दोहा ५०२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०२
बड़े बड़े कौं विपति तैं निबढ़े लेत उबारि। ज्यौं हाथी कौं कीच तैं हाथी लेत निकारि॥

शब्दार्थ: निबढ़े=समर्थ; उबारि=बचाना।

सरल हिंदी अर्थ: कीचड़ में फँसे हाथी को दूसरा हाथी निकालता है।

भावार्थ: बड़े संकट में पर्याप्त सक्षम सहयोग खोजें।

दोहा ५०३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०३
बड़े कष्ट हू जे बड़े करैं उचित ही काज। स्यार निकट तजि खोज कै सिंह हनै गजराज॥

शब्दार्थ: स्यार=सियार; गजराज=हाथी।

सरल हिंदी अर्थ: सिंह आसान छोटे शिकार को छोड़ बड़े लक्ष्य खोजता है—कवि का वीरतापरक दृष्टांत।

भावार्थ: कठिनाई में भी अपने स्तर का सार्थक कार्य चुनें।

दोहा ५०४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०४
जिहिं जैतौ उनमान तिहिं तैतौ रिजक मिलाय। कन कीड़ी कुकुर टुकर मन भर हाथी खाय॥

शब्दार्थ: रिजक=भोजन; कन=कण; कुकुर=कुत्ता।

सरल हिंदी अर्थ: चींटी, कुत्ता और हाथी की भोजन-जरूरत आकार के अनुसार भिन्न है।

भावार्थ: आवश्यकताएँ अलग होती हैं; तुलना विवेक से करें।

दोहा ५०५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०५
बहु गुन श्रम तैं उच्च पद तनक दोष तैं पात। नीठ चढ़ै गिरि पर सिला ढरत ही दुरि जात॥

शब्दार्थ: नीठ=कठिनाई से; पात=पतन; सिला=शिला।

सरल हिंदी अर्थ: पहाड़ पर चढ़ाई शिला गिरते देर नहीं लगती; प्रतिष्ठा मेहनत से बनती, भूल से घटती है।

भावार्थ: सफलता के बाद भी सावधानी रखें।

दोहा ५०६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०६
छोटे अरि कौं साधिये छाँटौ करि उपचार। मरै न मूसा सिंह तैं मारै ताहि मँजार॥

शब्दार्थ: अरि=शत्रु; मूसा=चूहा; मँजार=बिल्ली।

सरल हिंदी अर्थ: छोटे संकट का उपयुक्त छोटा उपाय करें; चूहे के लिए सिंह नहीं, बिल्ली उपयोगी है।

भावार्थ: समस्या के अनुरूप साधन चुनें।

दोहा ५०७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०७
बड़े बड़े सौं रिस करैं छोटे सौं न रिसाय। तरु कठोर तोरै पवन कोमल तृन बच जाय॥

शब्दार्थ: रिस=क्रोध; तृन=घास।

सरल हिंदी अर्थ: हवा कठोर वृक्ष तोड़ती, लचीली घास बच जाती है।

भावार्थ: लचीलापन संकट झेलने में सहायक है।

दोहा ५०८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०८
सेवक सोई जानिये रहै विपति में संग। तन-छाया ज्यौं धूप में रहै साथ इकरंग॥

शब्दार्थ: इकरंग=एकरूप; विपति=संकट।

सरल हिंदी अर्थ: सच्चा सहयोगी धूप में छाया की तरह संकट में साथ रहता है।

भावार्थ: संबंध की पहचान कठिन समय में होती है।

दोहा ५०९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५०९
बुरी बस्तु लागत भली भली ठौर पै लीन। तिय नैननि नीकौ लगै काजर जदपि मलीन॥

शब्दार्थ: तिय=स्त्री; नैननि=नेत्रों में; मलीन=काला।

सरल हिंदी अर्थ: काला काजल भी आँखों में सुंदर लगता है।

भावार्थ: स्थान और उपयोग वस्तु का प्रभाव बदलते हैं।

दोहा ५१०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१०
जोरावर हू कौं कियौ विधि बस करन इलाज। दीप तमहि अंकुस गाजहि जलनिधि तरनि इलाज॥

शब्दार्थ: तम=अंधकार; गाज=गज का पाठ; तरनि=नाव।

सरल हिंदी अर्थ: अंधकार का दीप, हाथी का अंकुश और समुद्र का नाव जैसे उपाय हैं।

भावार्थ: बड़ी बाधा का भी उपयुक्त समाधान खोजें।

दोहा ५११

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५११
दुष्ट रहै जा ठौर पर ताकौ करै बिगार। आगि जहाँ ही राखिये जारि करै तिहिं छार॥

शब्दार्थ: छार=राख; ठौर=स्थान।

सरल हिंदी अर्थ: आग रखी वस्तु जला देती है; दुष्टता आसपास को नुकसान देती है।

भावार्थ: हानिकारक प्रवृत्ति को बढ़ने न दें।

दोहा ५१२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१२
बिना तेज के पुरुष की अवसि अवज्ञा होय। आगि बुझे ज्यौं राख कौं छाँति छुवै सब कोय॥

शब्दार्थ: तेज=प्रभाव/सामर्थ्य; अवज्ञा=अनादर।

सरल हिंदी अर्थ: बुझी आग की राख सहज छुई जाती है; प्रभावहीन व्यक्ति का लोग अनादर करते हैं।

भावार्थ: आत्मविश्वास और योग्य सीमाएँ बनाएँ।

दोहा ५१३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१३
पाय प्रकृति बस कीजिये करि बुधि बचन बिबेक। लठ पुठ सौं एक कौं जठ मुठ सौं एक॥

शब्दार्थ: लठपुठ=मिलजुलकर; जठमुठ=लाठी-मुक्का।

सरल हिंदी अर्थ: स्वभाव समझकर किसी से मेल, किसी के विरुद्ध कठोर रोक का भेद पुरानी नीति में है।

भावार्थ: स्थिति के अनुरूप संवाद और वैध सीमाएँ रखें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका “लठपुठ” को मिलजुलकर और “जठमुठ” को लाठी-मुक्का कहती है। यह पुरानी कठोर नीति है; आधुनिक व्यवहार में वैध और अहिंसक सीमाएँ अपनाएँ।

दोहा ५१४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१४
नेह करति तिय नीच सौं धन किरपन घर माहिं। बरसै मेह पहार पै कै ऊसर बरसाहिं॥

शब्दार्थ: किरपन=कंजूस; ऊसर=बंजर।

सरल हिंदी अर्थ: अनुपयुक्त स्थान का प्रेम या कंजूस का धन, बंजर में वर्षा जैसा निष्फल बताया है।

भावार्थ: स्नेह और साधन सम्मानपूर्ण उपयोग में लगें।

दोहा ५१५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१५
जहाँ रहै गुनवंत नर ताकी सोभा होत। जहाँ धरै दीपक तहाँ निहचै करै उदोत॥

शब्दार्थ: गुनवंत=गुणी; उदोत=प्रकाश।

सरल हिंदी अर्थ: दीपक जहाँ रखा जाए उजाला करता है; गुणी अपने स्थान की शोभा बढ़ाता है।

भावार्थ: उपयोगी गुण आसपास को भी लाभ दें।

दोहा ५१६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१६
खाली तजि पूरन पुरुष जिहिं सब आदर देत। रीतौ कुवाँ उतारियै ऐंच भरो घट लेत॥

शब्दार्थ: रीतौ=खाली; ऐंच=खींचकर; घट=घड़ा।

सरल हिंदी अर्थ: खाली घड़ा कुएँ में उतार, भरा घड़ा खींचते हैं; पूर्णता को आदर मिलता है।

भावार्थ: ज्ञान और क्षमता से स्वयं को समृद्ध करें।

दोहा ५१७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१७
सब आसान उपाय तैं तुरत फुरत फल देत। मनि अरनी अरु काठ ज्यौं आगि प्रगटि करि लेत॥

शब्दार्थ: अरनी=अरणि; मनि=सूर्यकांत मणि।

सरल हिंदी अर्थ: अग्नि उत्पन्न करने के कई साधनों से उचित उपाय की उपयोगिता कही है।

भावार्थ: परिस्थिति में सरल प्रभावी उपाय अपनाएँ।

दोहा ५१८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१८
जाकी प्रापति होय सो मिलि आप तैं आप। पाले पोषे खग बचन देहै कहा कमाय॥

शब्दार्थ: प्रापति=प्राप्ति; खग=पक्षी; बचन=बच्चे।

सरल हिंदी अर्थ: पक्षियों के बच्चे कमाते नहीं, फिर भी माता-पिता उन्हें पोसते हैं।

भावार्थ: परस्पर देखभाल जीवन का सहारा है।

दोहा ५१९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५१९
खल सज्जन सूचींन के भाग दुहूँ सम भाय। निगुन प्रकासै छिद्र कौं सुगुन सु ढाँपत जाय॥

शब्दार्थ: सूचीन=सुई के; छिद्र=दोष/छेद।

सरल हिंदी अर्थ: बिना धागे सुई छेद खोलती, धागे सहित ढाँपती है; दुर्जन-सज्जन का भेद ऐसा है।

भावार्थ: दोष बताने के साथ सुधार का सहयोग दें।

दोहा ५२०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२०
तुला सुई की तुल्यता रीति सज्जन की होति। गरुवै दिस नै जाति है हलुवै कौं दै पीठि॥

शब्दार्थ: गरुवै=भारी/गुणवान; हलुवै=हलका।

सरल हिंदी अर्थ: तराजू की सुई भार की ओर झुकती है; सज्जन वास्तविक गुण को मान देता है।

भावार्थ: सम्मान सार्थक गुण के आधार पर करें।

दोहा ५२१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२१
भले बुरे सौं एक सी मूढ़िन की परतीति। गुंजा सम तोलत कनक तुला पला की रीति॥

शब्दार्थ: मूढ़िन=अज्ञानी; गुंजा=रत्ती; कनक=सोना।

सरल हिंदी अर्थ: तराजू सोने और गुंजा को समान भार पर तौलता है, मूल्य नहीं पहचानता।

भावार्थ: समान मात्रा को समान गुणवत्ता न समझें।

दोहा ५२२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२२
जिहिं दिसि भय तिहिं दिसि कबहूँ ना जैये करि चोज। गज तिहिं मग पग ना धरै जहाँ सिंह की खोज॥

शब्दार्थ: चोज=खेल; मग=मार्ग; खोज=पदचिह्न।

सरल हिंदी अर्थ: हाथी भी सिंह के चिह्न वाले मार्ग से बचता है।

भावार्थ: स्पष्ट खतरे को मनोरंजन समझकर न लें।

दोहा ५२३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२३
सिद्धि होत कारज सबै जाकै जिय बिस्वास। पूजत ऐपन कौं हृदय तिय जिय पूरैं आस॥

शब्दार्थ: ऐपन=पूजा का बनाया रूप; बिस्वास=विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ: पूजा के प्रतीक में आस्था से मन को आशा और संतोष मिलता है।

भावार्थ: विश्वास प्रयास को बल देता है, परिणाम की गारंटी नहीं।

दोहा ५२४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२४
बहुत द्रव्य संचै जहाँ चोर राज भय होय। काँसे ऊपर बीजुरी परति कहैं सब कोय॥

शब्दार्थ: द्रव्य=धन; बीजुरी=बिजली।

सरल हिंदी अर्थ: अधिक संचय जोखिम आकर्षित करता है; काँसे पर बिजली गिरने की पुरानी उक्ति जुड़ी है।

भावार्थ: धन बढ़े तो सुरक्षा की योजना भी बढ़ाएँ।

पाठ और प्रसंग: काँसे पर बिजली गिरने का संकेत लोकमान्यता है; बिजली-सुरक्षा का तकनीकी नियम नहीं।

दोहा ५२५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२५
जानि बूझि अज्ञान करै तासौं कहा बसाय। जागत ही सोवत रहै तिहिं को सकै जगाय॥

शब्दार्थ: बसाय=वश/उपाय; अज्ञान=अनजान बनना।

सरल हिंदी अर्थ: जागकर सोने का अभिनय करने वाले को जगाना कठिन है।

भावार्थ: जानबूझकर न समझने वाले से बहस सीमित रखें।

दोहा ५२६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२६
जहँ तहँ सज्जन मिलैं नहिं गुन गरुवै जग माहिं। जोति भरे पानिप भरे प्रति गज मुक्ता नाहिं॥

शब्दार्थ: पानिप=आभा; गजमुक्ता=हाथी का कल्पित मोती।

सरल हिंदी अर्थ: हर हाथी में मोती नहीं—वैसे ही महान गुण हर जगह नहीं मिलते।

भावार्थ: दुर्लभ सद्गुण की कद्र करें।

पाठ और प्रसंग: गजमुक्ता का संकेत पुरानी रत्न-परंपरा में है, वास्तविक हाथियों के अंगों में मोती खोजने का निर्देश नहीं।

दोहा ५२७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२७
विद्या बिन न बिराजहीं जदपि सरूप कुलीन। ज्यौं सोभा पावै नहीं टेसू बास बिहीन॥

शब्दार्थ: सरूप=सुंदर; बास=सुगंध; टेसू=पलाश।

सरल हिंदी अर्थ: कवि सुगंधहीन फूल से सुंदरता मात्र की सीमा बताता है।

भावार्थ: रूप और प्रतिष्ठा के साथ शिक्षा जरूरी है।

दोहा ५२८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२८
एकहि भले सुपुत्र तैं सब कुल भलो कहाय। सरस सुबासित वृच्छ तैं ज्यौं बन सकल बसाय॥

शब्दार्थ: सुबासित=सुगंधित; बसाय=महकना।

सरल हिंदी अर्थ: एक सुगंधित वृक्ष पूरे वन को महकाता है; एक सदाचारी परिवार का मान बढ़ाता है।

भावार्थ: अच्छे कर्मों का प्रभाव अपने से आगे जाता है।

दोहा ५२९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५२९
गुरुमुख पढ़नो न कहतु है पोथी अर्थ बिचारि। सो सोभा पावै नहीं जार गर्भजुत नारि॥

शब्दार्थ: गुरुमुख=गुरु से; पोथी=पुस्तक; जार=परपुरुष।

सरल हिंदी अर्थ: कवि मार्गदर्शित शिक्षा के अभाव को पुराने कठोर सामाजिक दृष्टांत से समझाता है।

भावार्थ: गंभीर अध्ययन में योग्य मार्गदर्शन लें; दृष्टांत को स्त्री-निंदा न मानें।

पाठ और प्रसंग: मूल दृष्टांत ऐतिहासिक लैंगिक नैतिकता की कठोर भाषा रखता है। उसका उपयोग किसी स्त्री या बच्चे को कलंकित करने के लिए न करें।

दोहा ५३०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३०
जाकौ बुधिबल होत है ताहि न रिपु कौ त्रास। घन बूँदैं कह करि सकैं सिर पर छतना जासु॥

शब्दार्थ: रिपु=शत्रु; छतना=छाता।

सरल हिंदी अर्थ: सिर पर छाता हो तो वर्षा का बचाव है; बुद्धि संकट से रक्षा करती है।

भावार्थ: समझ और तैयारी से भय घटता है।

दोहा ५३१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३१
छमा खड्ग लीने रहै खल कौं कहा बसाय। अगिन परी तृन रहित थल आपहि तैं बुझि जाय॥

शब्दार्थ: खड्ग=तलवार; तृन=घास; थल=भूमि।

सरल हिंदी अर्थ: ईंधनहीन भूमि की आग बुझती है; क्षमा दुष्टता को बढ़ने का अवसर नहीं देती।

भावार्थ: प्रतिशोध छोड़ना कभी प्रभावी रक्षा है।

दोहा ५३२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३२
एकै थल बिश्राम कौ ताकौ तजि कहाँ जाय। ज्यौं पंछी सुजहाज कौ उड़ि उड़ि तहाँ बसाय॥

शब्दार्थ: थल=स्थान; सुजहाज=जहाज।

सरल हिंदी अर्थ: समुद्र में पक्षी उड़कर फिर जहाज पर लौटता है; वही उसका सहारा है।

भावार्थ: विश्वसनीय आश्रय का महत्त्व पहचानें।

दोहा ५३३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३३
जिहिं जैसो अपराध तिहिं तैसो दंड बखानि। थाप ककरिया-चोर कौं धन-चोरहि जिय हानि॥

शब्दार्थ: थाप=थप्पड़; ककरिया=ककड़ी; जियहानि=प्राणदंड।

सरल हिंदी अर्थ: पुरानी दंडनीति में छोटे-बड़े अपराध के लिए अलग दंड का उदाहरण है।

भावार्थ: दंड अनुपातिक और न्यायसंगत हो; प्राणदंड की उक्ति आधुनिक निर्देश नहीं।

दोहा ५३४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३४
ओछे नर के पेट में रहै न मोटी बात। आध सेर के पात्र में कैसैं सेर समात॥

शब्दार्थ: ओछे=अल्पबुद्धि; सेर=पुराना भारमान।

सरल हिंदी अर्थ: आधे सेर के बर्तन में सेर नहीं समाता; अपरिपक्व मन बड़ी बात नहीं सँभालता।

भावार्थ: गोपनीयता और जिम्मेदारी योग्य व्यक्ति को दें।

दोहा ५३५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३५
चलिए पैड़े साँच के साँई साँच सुहाय। साँचौ जरै न आग तैं झूठौ ही जरि जाय॥

शब्दार्थ: पैड़े=मार्ग; साँई=प्रभु।

सरल हिंदी अर्थ: सत्य के मार्ग पर चलना प्रिय है; आग भी सत्य न जला सके—कवि की अतिशयोक्ति।

भावार्थ: सत्यनिष्ठा रखें; इसे अग्निपरीक्षा का निर्देश न मानें।

दोहा ५३६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३६
गूढ़ मंत्र जौ लौं रहै करैं जु मिलि जन दोय। भई छकानी बात तब जानि जात सब कोय॥

शब्दार्थ: मंत्र=गोपनीय सलाह; छकानी=छह कानों तक।

सरल हिंदी अर्थ: दो व्यक्तियों का रहस्य तीसरे तक पहुँचे तो फैलने लगता है।

भावार्थ: गोपनीय जानकारी अनावश्यक साझा न करें।

दोहा ५३७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३७
गूढ़ मंत्र गरुवै बिना कोउ राखि सकै न। धातु पात्र बिन और मैं बाघिन दूध रहै न॥

शब्दार्थ: गरुवै=गंभीर; धातु=यहाँ सोना।

सरल हिंदी अर्थ: बाघिन का दूध केवल सोने में टिकने के लोकविश्वास से गंभीर व्यक्ति की गोपनीयता कही है।

भावार्थ: संवेदनशील विषय परिपक्व जिम्मेदार व्यक्ति को दें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका “धातु” का अर्थ सोना बताती है। बाघिन का दूध केवल सोने में ठहरना लोकविश्वास है, रसायनशास्त्रीय तथ्य नहीं।

दोहा ५३८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३८
बहुत जु बीतै तनक धन संचै सज्जन करै न। नितन हानि उपज तहाँ कन कन कबहूँ भरै न॥

शब्दार्थ: बीते=खर्च हो; उपज=आमद; कन=कण।

सरल हिंदी अर्थ: अधिक खर्च और थोड़ी आय हो तो संचय नहीं बनता।

भावार्थ: आय-व्यय का वास्तविक संतुलन रखें।

दोहा ५३९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५३९
फिरत भार सब तैं उतरि गिरही पर ठहरात। नीर निबानहि पाइये ज्यौं बीति बरसात॥

शब्दार्थ: गिरही=गृहस्थ; निबान=निचला स्थान।

सरल हिंदी अर्थ: वर्षाजल नीचे टिकता है; अनेक सामाजिक दायित्व अंत में गृहस्थ पर आते हैं।

भावार्थ: जिम्मेदारी का भार न्यायपूर्वक बाँटें।

दोहा ५४०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४०
सील करम कुल श्रुत चतुर पुरुष परिच्छा जान। ताड़न छेदन कस तपन इन तैं कनक पिछान॥

शब्दार्थ: सील=शील; करम=कर्म; श्रुत=विद्या; परिच्छा=परीक्षा; कनक=सोना।

सरल हिंदी अर्थ: सोना कई परीक्षाओं से पहचाना जाता है; व्यक्ति के गुण भी अनेक आधारों से देखें।

भावार्थ: चरित्र का निर्णय एक बाहरी संकेत से न करें।

पाठ और प्रसंग: सोने की कसौटी, काटने, पीटने और तपाने के उदाहरण प्रतीक हैं। मनुष्य की परीक्षा में शारीरिक यातना या वंशगत भेद का औचित्य नहीं।

दोहा ५४१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४१
जो पै जैसे होय तिहिं हित सौं मिलिहै आय। गाठी चोरा चोर कौं साहै साह मिलाय॥

शब्दार्थ: गाठीचोरा=गिरहकट; साह=साहूकार।

सरल हिंदी अर्थ: समान काम और स्वभाव वाले लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

भावार्थ: संगति अपनी प्रवृत्ति को भी प्रकट करती है।

दोहा ५४२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४२
कबहूँ रन बिमुखौ भयो तऊ फिर लरै सिपाह। कहा भयो काहू समै भाज्यो तऊ बराह॥

शब्दार्थ: बिमुखौ=पीछे हटा; भाज्यो=भागा; बराह=सूअर।

सरल हिंदी अर्थ: एक बार हटे सैनिक का फिर लड़ना संभव है; कवि पशु-दृष्टांत देता है।

भावार्थ: क्षणिक असफलता से स्थायी क्षमता न आँकें।

दोहा ५४३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४३
कबहूँ प्रीति न जोरिये जोरि तोरिये नाहिं। ज्यौं तोरै जोरै बहुरि गाँठि परति गुन माहिं॥

शब्दार्थ: गुन=डोरी; बहुरि=फिर।

सरल हिंदी अर्थ: टूटी डोरी जोड़ें तो गाँठ बचती है; टूटे भरोसे में भी निशान रहते हैं।

भावार्थ: रिश्ता सोचकर बनाएँ और भरोसा सँभालें।

दोहा ५४४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४४
अंतर तनक न राखिये जहाँ प्रीति बिवहार। उर सौं उर लागै न तहाँ जहाँ रहतु है हार॥

शब्दार्थ: उर=हृदय/छाती; हार=गले का आभूषण।

सरल हिंदी अर्थ: बीच का हार भी आलिंगन में दूरी देता है—निकटता का शृंगारिक दृष्टांत।

भावार्थ: प्रेम में अनावश्यक दूरी और कपट न रखें।

दोहा ५४५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४५
निरखत पलक न मारिये सज्जन मुख की ओर। उदय अस्त लौं एकटक चितवत चंद चकोर॥

शब्दार्थ: निरखत=देखना; एकटक=लगातार।

सरल हिंदी अर्थ: चकोर के चंद्र-दर्शन से सज्जन-सान्निध्य की चाह कही है।

भावार्थ: अच्छे संग का आनंद और मूल्य पहचानें।

दोहा ५४६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४६
सेवक साहिब के बढ़े बढ़ै बड़ाई भ्राज। जेतौ गहरौ जल बढ़ै तेतौ बढ़ै सरोज॥

शब्दार्थ: साहिब=स्वामी; भ्राज=शोभा; सरोज=कमल।

सरल हिंदी अर्थ: पानी बढ़े तो कमल ऊँचा होता है; नेतृत्व की उन्नति सहयोगियों तक पहुँचती है।

भावार्थ: प्रगति का लाभ टीम को भी दें।

दोहा ५४७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४७
ओछे नर के चित्त में प्रेम न पूरौ जाय। जैसैं सागर कौ सलिल गागरि में न समाय॥

शब्दार्थ: सलिल=जल; गागरि=घड़ा।

सरल हिंदी अर्थ: समुद्र का जल घड़े में नहीं समाता; संकीर्ण मन व्यापक प्रेम नहीं सँभालता।

भावार्थ: उदारता के लिए मन का विस्तार करें।

दोहा ५४८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४८
जे न होय दृढ़ चित्त के वहाँ न रहै सटेक। ज्यौं काँचै घट में सलिल नहिं ठहरतु छिन एक॥

शब्दार्थ: सटेक=विश्वास/स्थिरता; काँचै=कच्चे।

सरल हिंदी अर्थ: कच्चे घड़े में पानी नहीं टिकता; अस्थिर मन भरोसा नहीं रख पाता।

भावार्थ: धैर्य और दृढ़ता विकसित करें।

दोहा ५४९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५४९
रस पीये बिनहीं रसिक रस उपजावत संत। बिन बरसे सरसे रहैं जैसैं बिटप बसंत॥

शब्दार्थ: रसिक=भावज्ञ; बिटप=वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: वसंत में बिना वर्षा वृक्ष हरे होते हैं; संत भीतर से आनंद जगाते हैं।

भावार्थ: प्रसन्नता का स्रोत अंतर्मन भी हो सकता है।

पाठ और प्रसंग: वसंत के वृक्ष वाला प्रकृति-दृष्टांत काव्यात्मक सामान्यीकरण है।

दोहा ५५०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५०
मन भावन के मिलन कौं सुख कौ नाहिन छोर। बोलि उठै नचि नचि उठै मोर सुनत घन घोर॥

शब्दार्थ: मनभावन=प्रिय; घन=बादल।

सरल हिंदी अर्थ: मेघ की गर्जना सुन मोर नाचता है; प्रिय से मिलन का आनंद ऐसा है।

भावार्थ: प्रिय संग जीवन में उल्लास भरता है।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ५५१–६००

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ५५१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५१
बिरही जन के चित्त कौं नाहिं रहतु बुधि बोध। थिर चर कौं पूछत फिरैं राघव सीता सोध॥

शब्दार्थ: थिर-चर=स्थावर-जंगम; सोध=खोज।

सरल हिंदी अर्थ: सीता की खोज में राम सब से पूछते हैं; विरह मन को व्याकुल करता है।

भावार्थ: वियोग में संवेदना और सहारा दें।

दोहा ५५२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५२
जहाँ सज्जन तहाँ प्रीति है प्रीति तहाँ सुख ठौर। जहाँ पुष्प तहाँ बास है जहाँ बास तहाँ भौंर॥

शब्दार्थ: बास=सुगंध; भौंर=भौंरा।

सरल हिंदी अर्थ: फूल-सुगंध-भौंरे की तरह सज्जनता, प्रेम और सुख जुड़े हैं।

भावार्थ: सद्भावपूर्ण वातावरण सुख बढ़ाता है।

दोहा ५५३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५३
जो प्रानी परबस परयो सो दुख सहत अपार। जूथ बिछोही गज सहै बंधन अंकुस मार॥

शब्दार्थ: परबस=पराधीन; जूथबिछोही=झुंड से बिछड़ा।

सरल हिंदी अर्थ: अकेला पकड़ा हाथी बंधन और अंकुश सहता है।

भावार्थ: स्वतंत्रता और सहयोगी समुदाय की रक्षा करें।

दोहा ५५४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५४
गुनी होय श्रम कष्ट करि लहै राज-दरबार। बीध बंध मुक्ता सहै तब उर-हार बिहार॥

शब्दार्थ: बीध=बेधना/छेदना; बंध=पिरोना; मुक्ता=मोती; उरहार=वक्ष का हार।

सरल हिंदी अर्थ: मोती छेदने और पिरोने के बाद हार बनता है; गुणी श्रम और कष्ट के बाद राजदरबार में स्थान पाता है।

भावार्थ: सम्मान के पीछे प्रशिक्षण और कठिन परिश्रम होता है।

पाठ और प्रसंग: दूसरी स्कैन-प्रति में “मुक्ता” स्पष्ट है: मोती बेधा और पिरोया जाकर हार बनता है। इसे तोता या धागा नहीं पढ़ा गया।

दोहा ५५५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५५
मन प्रसन्न तन चैन जहाँ स्वेच्छाचार बिचार। संग मृगी मृग सुख सबै बन बसि तृन आहार॥

शब्दार्थ: स्वेच्छाचार=अपनी इच्छा से जीवन; तृन=घास।

सरल हिंदी अर्थ: वन में साधारण आहार के साथ स्वतंत्र जीवन को सुखद कहा है।

भावार्थ: विलास से अधिक स्वतंत्रता और मन की शांति मूल्यवान हैं।

दोहा ५५६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५६
रहनदार जाइ न बसत तदपि जतन बिवहार। देहौ सब कै देखिये काहे द्वार किवार॥

शब्दार्थ: रहनदार=रहने वाला; किवार=कपाट।

सरल हिंदी अर्थ: घर में सबको बसाना संभव नहीं; द्वार-कपाट निजी सीमा के संकेत हैं।

भावार्थ: आतिथ्य के साथ उचित निजी सीमाएँ रखें।

पाठ और प्रसंग: दूसरी पंक्ति का पुराना वाक्यबंध कठिन है; द्वार-कपाट वाले स्पष्ट संकेत से भावानुवाद है।

दोहा ५५७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५७
है पासे के दाव पर कहाँ जीत कहाँ हारि। सारि उठै यौं चौकसी छक पै उठै न सारि॥

शब्दार्थ: पासे=खेल के पाँसे; सारि=गोटी; छक=दाँव।

सरल हिंदी अर्थ: चौपड़ की गोटी का बढ़ना दाँव पर निर्भर है; सावधानी अकेली हर परिणाम नहीं तय करती।

भावार्थ: अनिश्चितता समझें और जुए को सफलता का उपाय न मानें।

पाठ और प्रसंग: चौपड़ के “छक” और “सारि” खेल-संबंधी पद हैं। विशिष्ट चाल का निश्चित नियम आरोपित नहीं किया गया।

दोहा ५५८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५८
सबकौं व्याकुल करति है एक जठर की आगि। परे किलकिला जलधि मधि जल जलचर डर त्यागि॥

शब्दार्थ: जठर=पेट; किलकिला=मछली पकड़ने वाला पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ: पेट की भूख पक्षी को समुद्र और जलजीव के डर में भी उतारती है।

भावार्थ: जीविका की मजबूरी के प्रति संवेदनशील रहें।

दोहा ५५९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५५९
उदर भरन के कारनै प्रानी करत इलाज। नाँचै बाँचै रन भिरै राँचै काज अकाज॥

शब्दार्थ: बाँचै=पढ़े; राँचै=लगे; इलाज=उपाय।

सरल हिंदी अर्थ: भोजन के लिए लोग नृत्य, अध्ययन, युद्ध और अनेक उचित-अनुचित काम करते हैं।

भावार्थ: रोजगार की जरूरत समझें, नैतिक सीमाएँ भी रखें।

दोहा ५६०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६०
दुरभर उदर न दीन कौं होत न तन संताप। तौ जन जन कौ को सहत तरजन गरजन ताप॥

शब्दार्थ: दुरभर=कठिनाई से भरने वाला; तरजन=धमकी।

सरल हिंदी अर्थ: यदि पेट भरने की कठिनाई न होती, तो गरीब दूसरों की धमकी क्यों सहता?

भावार्थ: आर्थिक निर्भरता शोषण का कारण बन सकती है।

दोहा ५६१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६१
उदर धरत नर तैं भली राहु उदर तैं हीन। कबहूँ नाहिन होतु है जन जन कौ आधीन॥

शब्दार्थ: राहु=पौराणिक छिन्नशीर्ष ग्रह; आधीन=अधीन।

सरल हिंदी अर्थ: पेटविहीन राहु को बेहतर कहकर कवि भोजन के लिए पराधीनता पर व्यंग्य करता है।

भावार्थ: जीविका में सम्मान और स्वतंत्रता जरूरी हैं।

दोहा ५६२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६२
करी उदर दुरभरन भय हर अरधंगी दार। जौ न होय तौ क्यों रहै अब लौं तनय कुमार॥

शब्दार्थ: हर=शिव; अरधंगी=अर्धांगिनी; कुमार=कार्तिकेय/अविवाहित।

सरल हिंदी अर्थ: कवि पेट के खर्च से शिव के अर्धनारीश्वर रूप और कुमार पर विनोद करता है।

भावार्थ: गृहस्थी की जरूरतों पर यह पौराणिक शब्द-खेल है।

पाठ और प्रसंग: यह खर्च और अर्धांगिनी/कुमार शब्दों पर हास्य है, शिव-परिवार की धार्मिक व्याख्या का निर्णायक सिद्धांत नहीं।

दोहा ५६३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६३
भरत पेट नट निरत कै उदरत करत उपाय। धरत बरत पर पाय अरु परत बरत लपटाय॥

शब्दार्थ: नट=कलाबाज; निरत=नृत्य; बरत=रस्सी।

सरल हिंदी अर्थ: कलाबाज रस्सी पर चलने और लिपटकर उतरने जैसे कठिन कौशल से जीविका कमाता है।

भावार्थ: श्रमिक के जोखिम और कौशल का सम्मान करें।

दोहा ५६४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६४
एक एक कौ शत्रु है जो जातैं बलवंत। जलहि अनल अनलहिं पवन सरप जु पवन भखंत॥

शब्दार्थ: अनल=अग्नि; भखंत=खाने वाला।

सरल हिंदी अर्थ: जल-अग्नि-वायु और सर्प के लोकविश्वास से परस्पर विरोधी शक्तियाँ बताई हैं।

भावार्थ: हर शक्ति की कोई सीमा और प्रतिरोध होता है।

पाठ और प्रसंग: सर्प के हवा खाकर जीने का विचार लोकविश्वास है। सर्प अन्य जीवों की तरह वास्तविक भोजन करते हैं।

दोहा ५६५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६५
एक एक तैं देखिये अधिक अधिक बलवंत। सेष धराधर गिरि धरै गिरधर हरि भगवंत॥

शब्दार्थ: सेष=शेषनाग; धराधर=धरतीधारक; गिरधर=कृष्ण।

सरल हिंदी अर्थ: पृथ्वी, पर्वत और गोवर्धनधारी कृष्ण से बढ़ती शक्ति का पौराणिक क्रम है।

भावार्थ: अपनी शक्ति को अंतिम और असीम न मानें।

दोहा ५६६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६६
देत न प्रभु कछु बिन दियै दिये देत यह बात। लै तंदुल धन द्विजहि मुनि तृपत किए भखि पात॥

शब्दार्थ: तंदुल=चावल; द्विज=सुदामा; तृपत=तृप्त।

सरल हिंदी अर्थ: सुदामा के चावल और दुर्वासा-प्रसंग से छोटी भेंट पर बड़े प्रत्युपकार का भाव है।

भावार्थ: भक्ति में भाव का महत्त्व है, सौदे का नियम नहीं।

पाठ और प्रसंग: दीपिका सुदामा और दुर्वासा के दो अलग कृष्ण-प्रसंग बताती है; दोनों को एक घटना नहीं माना गया।

दोहा ५६७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६७
यथाशक्ति ही दै सकै जो कुछ जाकै पास। ब्राह्मन कन चावर दिए श्रीपति धन आवास॥

शब्दार्थ: कन=कण; श्रीपति=कृष्ण; आवास=निवास।

सरल हिंदी अर्थ: सुदामा ने चावल दिए, कृष्ण ने संपन्न आवास—दोनों अपनी सामर्थ्य के अनुसार देते हैं।

भावार्थ: भेंट का मूल्य देने वाले की क्षमता के सापेक्ष समझें।

दोहा ५६८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६८
जोरावर कौं होति है सबके सिर पर राह। हरि रुकमनि हरि लै गयो देखत रहे सिपाह॥

शब्दार्थ: राह=गुजर/प्रभाव; सिपाह=सेना।

सरल हिंदी अर्थ: कृष्ण-रुक्मिणी कथा में सेना देखते रह गई; समर्थ अपना मार्ग बना लेता है।

भावार्थ: सामर्थ्य प्रभावी है, पर किसी की सहमति अनिवार्य है।

दोहा ५६९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५६९
अगम पंथ है प्रेम कौ जहाँ ठठरहै नाहिं। गोपिन के पीछैं फिरै त्रिभुवनपति बन माहिं॥

शब्दार्थ: अगम=कठिन; ठठरहै=हँसी-ठट्ठा; त्रिभुवनपति=कृष्ण।

सरल हिंदी अर्थ: प्रेम के मार्ग में प्रभु भी गोपियों के पीछे वन में जाते हैं।

भावार्थ: प्रेम में अहंकार और पद का गर्व घटता है।

दोहा ५७०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७०
बचन रचन कापुरुष के कहै न छिन ठहराय। ज्यौं कर पद मुख कछुप के निकसि निकसि दुर जाय॥

शब्दार्थ: कापुरुष=अस्थिर/कायर; कछुप=कछुआ; दुर=छिप।

सरल हिंदी अर्थ: कछुए के अंग निकलकर छिपते हैं; अविश्वसनीय व्यक्ति की बात भी बदलती है।

भावार्थ: वचन में स्थिरता और जवाबदेही रखें।

दोहा ५७१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७१
कबहूँ झूठी बात कौ जो करिहै पछपात। झूठे संग झूठौ परत फिर पाछै पछतात॥

शब्दार्थ: पछपात=पक्षपात; पाछै=बाद में।

सरल हिंदी अर्थ: झूठ का साथ देने वाला स्वयं भी झूठा कहलाकर पछताता है।

भावार्थ: निष्ठा के नाम पर असत्य का बचाव न करें।

दोहा ५७२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७२
कुल कुपुत्र किहिं काम कौ तिहिं सुख सोभा नाहिं। ज्यौं बकरी के कंठ थन दूध न जल तिहिं माहिं॥

शब्दार्थ: कंठथन=गले की लटकन; सोभा=मान।

सरल हिंदी अर्थ: बकरी की दूधहीन लटकन से अनुपयोगी भूमिका का दृष्टांत है।

भावार्थ: वंश के नाम से अधिक उपयोगी कर्म करें।

दोहा ५७३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७३
बिगरनवारी बस्तु कौं कोऊ सुधारै कौन। डारै पय औटाय कै मिसरी भोयै नौन॥

शब्दार्थ: पय=दूध; औटाय=उबाल; नौन=नमक।

सरल हिंदी अर्थ: मिश्री के भ्रम में नमक डालने से दूध का स्वाद बिगड़ जाता है।

भावार्थ: गलत सामग्री बाद में सुधारना कठिन हो सकता है।

दोहा ५७४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७४
काहू कौं हँसिये नहीं हँसी कलह कौ मूल। हँसी ही तैं है गयौ कुल कौरव निरमूल॥

शब्दार्थ: कलह=झगड़ा; निरमूल=नष्ट।

सरल हिंदी अर्थ: कौरव-विनाश की कथा से अपमानजनक हँसी के परिणाम बताए हैं।

भावार्थ: उपहास से किसी की गरिमा न चोटें।

दोहा ५७५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७५
दुरजन गहत न सज्जनता जतन करौ किन कोय। जौ पै जौ कौं रोपिये कबहूँ सालि न होय॥

शब्दार्थ: गहत=ग्रहण; जौ=जौ; सालि=धान।

सरल हिंदी अर्थ: जौ बोने से धान नहीं उगता; कवि गहरे स्वभाव की जड़ता कहता है।

भावार्थ: सुधार के दावे को निरंतर व्यवहार से परखें।

दोहा ५७६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७६
जग परतीति बढ़ाइये रहिये साँचे होय। झूठे नर की साँचिहु साखि न मानै कोय॥

शब्दार्थ: परतीति=विश्वास; साखि=गवाही।

सरल हिंदी अर्थ: झूठे व्यक्ति की सच्ची गवाही पर भी संदेह होता है।

भावार्थ: विश्वसनीयता रोज की सत्यनिष्ठा से बनती है।

दोहा ५७७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७७
बड़े बड़ाई के जतन गहैं बिरद की लाज। भए चतुर्भुज चोर तैं नृप कन्या के काज॥

शब्दार्थ: बिरद=प्रतिष्ठित स्वभाव; चतुर्भुज=विष्णुरूप।

सरल हिंदी अर्थ: राजकन्या और चोर की कथासूचना से कवि प्रतिष्ठा निभाने का भाव कहता है।

भावार्थ: स्रोत की कथा को सामान्य छल का समर्थन न मानें।

पाठ और प्रसंग: नृपकन्या और चोर के विष्णुरूप की केवल कथासूचना मूल में है; कथा का विस्तृत रूप अनुमान से नहीं जोड़ा गया।

दोहा ५७८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७८
है अयुक्त पै युक्त है करिय वहै प्रमान। ब्राह्मन सौं गुरु जनन सौं हारे होत बर्यान॥

शब्दार्थ: अयुक्त=अनुचित; युक्त=उचित; बर्यान=श्रेष्ठ।

सरल हिंदी अर्थ: आदरणीय जनों के सामने हार स्वीकारना भी सम्माननीय हो सकता है।

भावार्थ: हर विवाद में जीतना जरूरी नहीं; अन्याय पर विवेक रखें।

दोहा ५७९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५७९
जामें हित सो कीजिये कोउ कहौ हजार। छल बल साधि बिजै करी पारथ भारथ बार॥

शब्दार्थ: पारथ=अर्जुन; भारथ=महाभारत; हित=लाभ।

सरल हिंदी अर्थ: महाभारत की रणनीति से कवि आलोचना के बावजूद लक्ष्य साधने की नीति कहता है।

भावार्थ: लक्ष्य के साथ साधनों की नैतिकता भी जाँचें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका अर्जुन के शिखंडी की आड़ से भीष्म पर बाण चलाने का संकेत बताती है। “हित” के नाम पर सामान्य जीवन में छल की खुली अनुमति नहीं।

दोहा ५८०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८०
सुनिये सबही की कही करिये सहित बिचार। खर्व तोक राजी रहैं सो कीजै उपचार॥

शब्दार्थ: खर्व=वृद्ध; तोक=बालक; उपचार=उपाय।

सरल हिंदी अर्थ: सबकी बात सुनकर सोचें और विभिन्न आयु-समूहों के हित वाला उपाय करें।

भावार्थ: सुनवाई व्यापक हो, निर्णय विचारपूर्ण।

दोहा ५८१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८१
प्रापति के दिन होति है प्रापति बारंबार। लाभ होतु ब्यौपार में आमंत्रन अधिकार॥

शब्दार्थ: प्रापति=अनुकूल प्राप्ति; ब्यौपार=व्यापार।

सरल हिंदी अर्थ: अनुकूल समय में व्यापारिक लाभ और निमंत्रण जैसे अवसर बार-बार मिलते हैं।

भावार्थ: अच्छे अवसरों का सदुपयोग करें।

दोहा ५८२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८२
अप्रापति के दिनन में खरब होत अबिचार। घर आवतु है पाहुनो बिन जन लाभ लगार॥

शब्दार्थ: पाहुनो=अतिथि; अप्रापति=अभाव का समय।

सरल हिंदी अर्थ: अभाव के समय अचानक आए अतिथि या अतिरिक्त खर्च भी कठिन लगते हैं।

भावार्थ: अनिश्चित खर्च के लिए तैयारी रखें।

पाठ और प्रसंग: दूसरी पंक्ति का “लाभ लगार” वाला अंश कठिन है; अर्थ अनुकूलता-अनुकूलता के विपरीत भाव तक सीमित है।

दोहा ५८३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८३
हीन धनी आधीन है सीस नवावत नाहिं। मान-भंग की भूमि यह पेट दिखावत ताहिं॥

शब्दार्थ: हीनधनी=संसाधनहीन; आधीन=पराधीन।

सरल हिंदी अर्थ: आर्थिक अभाव और पेट की जरूरत व्यक्ति को झुकने पर विवश करती है।

भावार्थ: गरीबी को चरित्र-दोष न मानें।

दोहा ५८४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८४
रूखे सूखे उदर कौं भरे होतु संतुष्ट। ये मन लाख करोर के पायें तुष्ट न तुष्ट॥

शब्दार्थ: उदर=पेट; तुष्ट=संतुष्ट।

सरल हिंदी अर्थ: पेट सादे भोजन से भरता है, मन लाखों-करोड़ों से भी नहीं भरता।

भावार्थ: जरूरत और अंतहीन लालसा में अंतर करें।

दोहा ५८५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८५
एक एक के काम कौं रचि राखै जगदीस। जैसैं भरिये पेट कौं निहुरैं सब कौं सीस॥

शब्दार्थ: जगदीस=ईश्वर; निहुरैं=झुकें।

सरल हिंदी अर्थ: पेट की आवश्यकता सबको श्रम और विनय के लिए प्रेरित करती है।

भावार्थ: परस्पर निर्भरता को स्वीकारें।

दोहा ५८६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८६
भली किए हैहै बुरी देखौ विधि बिपरीत। भक्ति करी द्विज जमदगनि अर्जुन करी अनीति॥

शब्दार्थ: द्विज=ब्राह्मण; अर्जुन=सहस्रार्जुन।

सरल हिंदी अर्थ: जमदग्नि के सत्कार का प्रत्युत्तर सहस्रार्जुन ने अन्याय से दिया।

भावार्थ: उपकार का उत्तर हमेशा सद्भाव से नहीं मिलता।

पाठ और प्रसंग: दीपिका का अर्जुन यहाँ सहस्रार्जुन है, पांडव अर्जुन नहीं। कथा में जमदग्नि और कामधेनु का प्रसंग है।

दोहा ५८७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८७
कहे बचन पलटैं नहीं जे सत पुरुष सधीर। कहत सबै हरिचंद नृप भरयो नीच घर नीर॥

शब्दार्थ: सधीर=धैर्यवान; हरिचंद=हरिश्चंद्र।

सरल हिंदी अर्थ: हरिश्चंद्र की कथा से कठिन सेवा में भी वचन निभाने का आदर्श कहा है।

भावार्थ: वचन विचारपूर्वक लें और ईमानदारी से निभाएँ।

दोहा ५८८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८८
मति फिर जाय विपति में राव रंक इक रीति। हेम हिरन पाछैं गए राम गँवाई सीति॥

शब्दार्थ: राव-रंक=राजा-गरीब; हेम=सोना; सीति=सीता।

सरल हिंदी अर्थ: स्वर्णमृग के पीछे गए राम का उदाहरण विवेक चूकने की संभावना दिखाता है।

भावार्थ: आकर्षक भ्रम पर निर्णय न करें।

दोहा ५८९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५८९
जानहार सो जाय अरु होनहार तैं आय। रावन तैं लंका गई बसे बिभीषन पाय॥

शब्दार्थ: जानहार=जाने वाली; होनहार=नियति।

सरल हिंदी अर्थ: कथा में लंका रावण से गई और विभीषण को मिली।

भावार्थ: सत्ता और संपत्ति स्थायी नहीं।

दोहा ५९०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९०
अन उद्यम सुख पाइये जौ पूरब कृत होय। दुख कौ उद्यम को करतु पावत है नर सोय॥

शब्दार्थ: अनउद्यम=बिना प्रयास; पूरबकृत=पूर्वकर्म।

सरल हिंदी अर्थ: अनचाहा दुख आता है, वैसे अनायास सुख को कवि पूर्वकर्म से जोड़ता है।

भावार्थ: यह कर्मफल की आस्था है, प्रयास छोड़ने का कारण नहीं।

दोहा ५९१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९१
प्यारी अन प्यारी लगै समै पाय सब बात। धूप सुहावै शीत में सी ग्रीषम न सुहात॥

शब्दार्थ: अनप्यारी=अप्रिय; सी=वही।

सरल हिंदी अर्थ: सर्दी में प्रिय धूप गर्मी में अप्रिय होती है।

भावार्थ: सही वस्तु भी गलत समय कष्ट देती है।

दोहा ५९२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९२
जनमत ही पावै नहीं भली बुरी कोइ बात। बूझत बूझत पाइये त्यौं त्यौं समझत जात॥

शब्दार्थ: बूझत=पूछते/समझते; जनमत=जन्म से।

सरल हिंदी अर्थ: समझ जन्म से पूर्ण नहीं आती; पूछने और सीखने से बढ़ती है।

भावार्थ: जिज्ञासा और संवाद बनाए रखें।

दोहा ५९३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९३
भलौ ज्ञान अज्ञान नहिं है अज्ञान न ज्ञान। भानु उग्यो तौ तम नहीं है तम त्यौं न भान॥

शब्दार्थ: भानु=सूर्य; तम=अँधेरा।

सरल हिंदी अर्थ: ज्ञान और अज्ञान सूर्य और अंधकार की तरह विरोधी हैं।

भावार्थ: समझ का प्रकाश भ्रम हटाता है।

दोहा ५९४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९४
सत पुरुषनि तैं उतरि कै होत नीच अधिकार। यह खटकत रवि सौं अस्तित तम कौ जगत प्रचार॥

शब्दार्थ: उतरि=हटकर; अस्तित=अस्त होने पर।

सरल हिंदी अर्थ: सूर्य अस्त होने पर अंधकार फैलता है; अच्छे नेतृत्व के हटने पर दुष्टता बढ़ सकती है।

भावार्थ: जिम्मेदार लोगों की निरंतर भागीदारी जरूरी है।

पाठ और प्रसंग: दूसरी पंक्ति का शब्दबंध कठिन है; सूर्यास्त के बाद अंधकार फैलने के स्पष्ट दृष्टांत का सामान्य भाव है।

दोहा ५९५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९५
हरवी गरुवे के हिए ठहरत नाहिं बात। तुंबी जल में दाबिये ज्यौं ऊपर ही आत॥

शब्दार्थ: हरवी=हलकी; गरुवे=गंभीर; तुंबी=सूखी लौकी।

सरल हिंदी अर्थ: लौकी पानी में दबकर ऊपर आती है; गंभीर मन में हलकी बात नहीं टिकती।

भावार्थ: गंभीरता अनावश्यक तुच्छता छोड़ती है।

दोहा ५९६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९६
पावत बहुत तलास तैं कर तैं छूटी बात। आँधी में टूटी गुड़ी को जाने कित जात॥

शब्दार्थ: तलास=खोज; गुड़ी=पतंग।

सरल हिंदी अर्थ: आँधी में छूटी पतंग को फिर पाना कठिन है; हाथ से निकला अवसर भी बहुत खोज माँगता है।

भावार्थ: अवसर और शब्द सँभालकर प्रयोग करें।

दोहा ५९७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९७
पिय के बिछुरे बिरह बस मन न कहूँ ठहरात। धरनि गिरतु बीचहि फिरतु परयो भैंभूरे पात॥

शब्दार्थ: पिय=प्रिय; भैंभूरे=बवंडर।

सरल हिंदी अर्थ: विरही मन बवंडर में पत्ते की तरह कहीं नहीं टिकता।

भावार्थ: वियोग में मन को समय और सहारा चाहिए।

दोहा ५९८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९८
होत अधिक गुन निबल पै उपजत बैर निदान। मृग मृगमद चमरी चमर लेत दुष्ट हत प्रान॥

शब्दार्थ: मृगमद=कस्तूरी; चमर=चँवर।

सरल हिंदी अर्थ: कस्तूरी और चँवर के लिए पशुओं का वध दिखाता है कि गुण भी लोभियों को खींचते हैं।

भावार्थ: शोषण से गुणवान और निर्बल की रक्षा करें।

पाठ और प्रसंग: चमरी का चँवर-पूँछ वाला पशु-संदर्भ है। मूल में पशुवध की आलोच्य स्थिति है, उसका निर्देश नहीं।

दोहा ५९९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ५९९
आप तरै तारै अवर काठ नाव चित चाव। बूड़ै बोरै अवर कौं ज्यौं पाथर की नाव॥

शब्दार्थ: अवर=दूसरे; बूड़ै=डूबे।

सरल हिंदी अर्थ: लकड़ी की नाव खुद तैरती और दूसरों को तारती; पत्थर की नाव डुबाती है।

भावार्थ: साथी और नेतृत्व का चुनाव सोचकर करें।

दोहा ६००

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६००
जूवा खेले होतु है सुख संपति कौ नास। राज-काज मल तैं छुट्यो पांडव किय बनबास॥

शब्दार्थ: मल=सब सहित/पाठ कठिन; बनबास=वनवास।

सरल हिंदी अर्थ: पांडवों के जुए से राज और सुख खोने की कथा कही है।

भावार्थ: जुआ आर्थिक और पारिवारिक नुकसान ला सकता है।

पाठ और प्रसंग: “राज-काज मल” का पुराना पदबंध कठिन है; पांडवों के जुए और वनवास का स्पष्ट संकेत सुरक्षित रखा है।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ६०१–६५०

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ६०१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०१
सरसुति के भंडार की बड़ी अपूरब बात। ज्यौं खर्चे त्यौं त्यौं बढ़ै बिन खर्चे घटि जात॥

शब्दार्थ: सरसुति=सरस्वती/ज्ञान; अपूरब=अद्भुत।

सरल हिंदी अर्थ: ज्ञान बाँटने और उपयोग करने से बढ़ता, अनुपयोग से घटता है।

भावार्थ: सीखें, सिखाएँ और अभ्यास करें।

दोहा ६०२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०२
यह अनहोनी बात पर को न देखि अनखात। नकटी बूची इक-नयनि पान खाति मुसकात॥

शब्दार्थ: अनखात=खीजता; बूची=कान-कटी; इकनयनि=एक आँख वाली।

सरल हिंदी अर्थ: कवि शारीरिक भिन्नता पर अपमानजनक उपहास का ऐतिहासिक उदाहरण देता है।

भावार्थ: रूप या दिव्यांगता पर यह निर्णय स्वीकार्य नहीं; सबको सम्मान और आनंद का अधिकार है।

पाठ और प्रसंग: मूल में रूप और शारीरिक दशा के आधार पर उपहास है। इसे नीति के नाम पर दोहराने की स्वीकृति नहीं; मूल पाठ के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में रखा है।

दोहा ६०३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०३
देखा देखी करत सब नाहिन तत्त्व बिचार। याकौ यह अनुमान है भेड़ चाल संसार॥

शब्दार्थ: तत्त्व=मूल बात; भेड़चाल=अंधानुकरण।

सरल हिंदी अर्थ: लोग विचार छोड़ दूसरों को देखकर चलते हैं।

भावार्थ: अपना निर्णय प्रमाण और समझ से लें।

दोहा ६०४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०४
काज बिगारतु और कौ इक निज काज सुधारि। किय मंत्रिनि मिलि राज नृप सुहृदहि दियौ निकारि॥

शब्दार्थ: सुहृद=मित्र; निकारि=निकाला।

सरल हिंदी अर्थ: स्वार्थी मंत्रियों ने मिलकर राजा से उसके हितैषी को निकलवा दिया।

भावार्थ: सलाह के पीछे छिपे हित देखें।

दोहा ६०५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०५
काज बिगारतु आपनो एक और के काज। बलिहि निवारत नैन की हानि सही कविराज॥

शब्दार्थ: बलि=राजा बलि; कविराज=शुक्राचार्य।

सरल हिंदी अर्थ: बलि को दान से रोकते हुए शुक्राचार्य की आँख क्षतिग्रस्त होने की कथा है।

भावार्थ: दूसरे के काम में हस्तक्षेप का परिणाम समझें।

पाठ और प्रसंग: “कविराज” यहाँ शुक्राचार्य हैं। बलि के दान में जल-मार्ग रोकने और आँख घायल होने का पौराणिक संदर्भ है।

दोहा ६०६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०६
एक आपनो और कौ साधत काज सलोल। अंगद अपने राम की कीनो सभा सबोल॥

शब्दार्थ: सलोल=सहज; सबोल=प्रभावी।

सरल हिंदी अर्थ: अंगद ने रावण-सभा में अपना और राम का मान बढ़ाया।

भावार्थ: साझे हित वाला सक्षम प्रतिनिधित्व करें।

दोहा ६०७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०७
एक बिगारतु आपनो और परायौ काज। रावन कौ अरु आपनो इंद्रजित कियौ अकाज॥

शब्दार्थ: अकाज=अहित; इंद्रजित=मेघनाद।

सरल हिंदी अर्थ: मेघनाद का संघर्ष अपने और रावण के विनाश में सहायक बना।

भावार्थ: अंधी निष्ठा दोनों पक्षों का नुकसान कर सकती है।

दोहा ६०८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०८
देखत कौं सुंदर लगै उर में कपट बिषाद। इंद्रायन के फलन सम भीतर कटुक सवाद॥

शब्दार्थ: इंद्रायन=कड़वे फल वाली बेल; कटुक=कड़वा।

सरल हिंदी अर्थ: बाहर सुंदर इंद्रायन का फल भीतर कड़वा है; कपटी ऐसा दिख सकता है।

भावार्थ: बाहरी आकर्षण से नीयत न आँकें।

दोहा ६०९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६०९
बिरह पीर व्याकुल भए आयौ प्रीतम गेह। जैसैं आवतु भाग तैं आग लगौ पर मेह॥

शब्दार्थ: गेह=घर; मेह=वर्षा; भाग=भाग्य।

सरल हिंदी अर्थ: विरह में प्रिय का घर आना आग पर समय से वर्षा पड़ने जैसा सुखद है।

भावार्थ: समय पर मिला स्नेह गहरी राहत देता है।

दोहा ६१०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१०
खरचत खाति न जातु धन औसर किये अनेक। जातु पुण्य पूरन भए अरु उपजै अबिबेक॥

शब्दार्थ: औसर=अवसर; अबिबेक=अविवेक।

सरल हिंदी अर्थ: कवि शुभ कार्यों के खर्च की अपेक्षा दुर्भाग्य और अविवेक को धननाश का कारण कहता है।

भावार्थ: उचित खर्च और लापरवाह अपव्यय अलग रखें।

दोहा ६११

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६११
चलै जु पंथ पिपीलिका समुद पार है जाय। जो न चलै तौ गरुड़ हू पैडहु चलै न पाय॥

शब्दार्थ: पिपीलिका=चींटी; पैड=कदम।

सरल हिंदी अर्थ: चलती चींटी दूर पहुँच सकती है; न चले तो गरुड़ भी कदम नहीं बढ़ाता।

भावार्थ: छोटा नियमित प्रयास निष्क्रिय क्षमता से बेहतर है।

दोहा ६१२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१२
एक एक अछर पढ़े जानै ग्रंथ बिचार। पैड़ पैड़ हू चलत जो पहुँचै कोस हजार॥

शब्दार्थ: अछर=अक्षर; पैड़=कदम।

सरल हिंदी अर्थ: अक्षर-अक्षर सीखने से ग्रंथ समझ आता, कदम-कदम से लंबी दूरी पूरी होती है।

भावार्थ: बड़े लक्ष्य छोटे निरंतर काम से पूरे करें।

दोहा ६१३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१३
भले बुरे हू सौं करत उपकारी उपकार। तरुवर छाया करत है नीच न ऊँच बिचार॥

शब्दार्थ: उपकारी=परोपकारी; तरुवर=वृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: वृक्ष भेदभाव किए बिना छाया देता है।

भावार्थ: सहायता में ऊँच-नीच का भेद न रखें।

दोहा ६१४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१४
सज्जन करत उपकार कौं बित भोतिक जग माहिं। गहरे गाही छाँह तरु बिरले बिरली छाँहिं॥

शब्दार्थ: बित=वित्त; भोतिक=भौतिक; गाही=गहन।

सरल हिंदी अर्थ: घने वृक्ष की अधिक छाया की तरह सज्जन अपनी उपलब्ध क्षमता के अनुसार उपकार करते हैं।

भावार्थ: संपत्ति और शक्ति लोकहित में लगाएँ।

दोहा ६१५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१५
बिन देखे जाने परै देखे जहाँ निसान। दीप धरै धन लाख पर कोटि ध्वजा पहिचान॥

शब्दार्थ: निसान=चिह्न; कोटि=करोड़।

सरल हिंदी अर्थ: पुरानी संपन्नता-सूचक दीप और ध्वजा से बिना भीतर देखे अनुमान लगता था।

भावार्थ: बाहरी संकेत सूचना दें, अंतिम प्रमाण नहीं।

दोहा ६१६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१६
भले बंस कौ पुरुष सो निहुरै बहु धन पाय। नवै धनुष सदबंस कौ जिहिं है कोटि दिवाय॥

शब्दार्थ: निहुरै=झुके; सदबंस=अच्छा बाँस/कुल; कोटि=धनुष के सिरे/करोड़।

सरल हिंदी अर्थ: अच्छा बाँस तनकर भी झुकता है; सज्जन धन पाकर विनम्र रहता है।

भावार्थ: समृद्धि के साथ नम्रता बढ़ाएँ।

दोहा ६१७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१७
एक एक सौं लगि रहै अन्योन्य संबंध। चोली दामन ज्यौं रच्यौ जगत जँजीरा बंध॥

शब्दार्थ: अन्योन्य=परस्पर; जँजीरा=जंजीर।

सरल हिंदी अर्थ: जगत की कड़ियाँ चोली-दामन की तरह जुड़ी हैं।

भावार्थ: अपने काम के व्यापक प्रभाव समझें।

दोहा ६१८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१८
नेगी दूर न होतु है यह जानौ तहकीक। मिटत न ज्यौं क्यों हू किए ज्यौं हाथन की लीक॥

शब्दार्थ: नेगी=नियति/नियत अंश; तहकीक=निश्चय; लीक=रेखा।

सरल हिंदी अर्थ: कवि भाग्य को हाथ की रेखा जैसी न मिटने वाली मानता है।

भावार्थ: यह भाग्यवाद की उक्ति है, हस्तरेखा का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।

पाठ और प्रसंग: “नेगी” का विशिष्ट पुराना प्रयोग कठिन है। नियत भाग/नियति के आशय में सीमित भावानुवाद रखा है।

दोहा ६१९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६१९
चिदानंद घट में बसै घूमत कहाँ निवास। ज्यौं मृगमद मृगनाभि में ढूँढ़त फिरत सुबास॥

शब्दार्थ: चिदानंद=चेतना-आनंदस्वरूप; घट=देह; मृगमद=कस्तूरी।

सरल हिंदी अर्थ: कस्तूरी नाभि में होते हुए मृग बाहर ढूँढ़ता है; आत्मानंद भीतर खोजें।

भावार्थ: बाहरी दौड़ के साथ आत्मचिंतन करें।

दोहा ६२०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२०
कै सम सौं कै अधिक सौं लरिये करिये बाद। हारे जीते होतु है दोउ भाँति सवाद॥

शब्दार्थ: बाद=वाद; सम=बराबर।

सरल हिंदी अर्थ: बराबर या अधिक योग्य से स्पर्धा दोनों परिणामों में सीख दे सकती है।

भावार्थ: प्रतिस्पर्धा विकासकारी और सम्मानपूर्ण रखें।

दोहा ६२१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२१
सज्जन सौं रस पोषिये त्यौं त्यौं बढ़त हुलास। जेती मीठी बस्तु में तेती अधिक मिठास॥

शब्दार्थ: हुलास=उल्लास; रस=स्नेह।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन के साथ स्नेह बढ़ाने से आनंद बढ़ता है।

भावार्थ: अच्छे संबंधों को समय और ध्यान दें।

दोहा ६२२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२२
करिये सभा सुहावनौ सुख तैं बचन प्रकास। बिन समझे सिसुपाल के बचनन भयो बिनास॥

शब्दार्थ: सिसुपाल=शिशुपाल; प्रकास=प्रकट करना।

सरल हिंदी अर्थ: शिशुपाल के असंयमित सभा-वचन विनाशकारी बने।

भावार्थ: सार्वजनिक संवाद में विवेक और मर्यादा रखें।

दोहा ६२३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२३
जासौं पहुँचि न आइये तासौं बहसि न ठान। गई प्रतिष्ठा करन की फिर न बसै पुर थान॥

शब्दार्थ: करन=कर्ण; बहसि=स्पर्धा; प्रतिष्ठा=मान।

सरल हिंदी अर्थ: असमान सामर्थ्य की भिड़ंत प्रतिष्ठा बिगाड़ सकती है; कर्ण का संकेत है।

भावार्थ: प्रतिस्पर्धा से पहले क्षमता और उद्देश्य समझें।

पाठ और प्रसंग: कर्ण की प्रतिष्ठा का प्रसंग संक्षिप्त है; किसी एक अनुल्लिखित घटना की विस्तृत कथा अनुमान से नहीं जोड़ी गई।

दोहा ६२४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२४
सब काहू की लहत है भली बुरी संसार। दुरजोधन की दुष्टता विक्रम कौ उपकार॥

शब्दार्थ: लहत=मिलती/जानी जाती; विक्रम=विक्रमादित्य।

सरल हिंदी अर्थ: दुर्योधन की दुष्टता और विक्रम का उपकार याद किया जाता है।

भावार्थ: कर्म ही दीर्घकाल की पहचान बनते हैं।

दोहा ६२५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२५
जोति सरूपी हिय बसै सब सरीर में जोति। दीपक धरिए ताक में सब घर आभा होति॥

शब्दार्थ: हिय=हृदय; ताक=आला।

सरल हिंदी अर्थ: आले का दीप पूरे घर को रोशन करता है; भीतर की चेतना से देह प्रकाशित है।

भावार्थ: आध्यात्मिक दृष्टि भीतर के बोध को महत्त्व देती है।

दोहा ६२६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२६
बय समान रुचि होति है रुचि प्रमान मन मोट। बालक खेल सुहावही जोबन बिषै बिनोट॥

शब्दार्थ: बय=आयु; जोबन=यौवन; बिनोट=विनोद।

सरल हिंदी अर्थ: बच्चे खेल चाहते, युवा दूसरे आनंद; आयु के साथ रुचि बदलती है।

भावार्थ: जीवन की अवस्था के अनुसार जरूरत समझें।

दोहा ६२७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२७
दान मान सनमान अरु अपनी अपनी बात। छोटो छोटी गति कही मोटो मोटी मान॥

शब्दार्थ: गति=सामर्थ्य/व्यवहार; मोटो=बड़ा।

सरल हिंदी अर्थ: दान और सम्मान की रीति उपलब्ध क्षमता और भूमिका से बदलती है।

भावार्थ: मूल्यांकन साधनों के संदर्भ में करें।

दोहा ६२८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२८
भले बुरे दोउ रहैं चिरंजीव संसार। जितने गुन अरु दोष कौं जान्यौ परतु बिचार॥

शब्दार्थ: चिरंजीव=दीर्घस्मरणीय; दोउ=दोनों।

सरल हिंदी अर्थ: अच्छे और बुरे लोग अपने गुण-दोष से याद रहते हैं।

भावार्थ: ऐसे कर्म चुनें जिन्हें सम्मान से याद किया जाए।

दोहा ६२९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६२९
सरस निरस नर होत है समय पाय सब कोइ। दिन में परम प्रकास रवि चंद मंद दुति होइ॥

शब्दार्थ: सरस=प्रभावी; दुति=चमक।

सरल हिंदी अर्थ: दिन में सूर्य चमकता, चंद्र फीका दिखता है; प्रभाव समय पर निर्भर है।

भावार्थ: अपना अनुकूल समय और भूमिका पहचानें।

दोहा ६३०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३०
बाँके रन तैं होतु है बंदनीक सब लोय। नमत दुतिया चंद कौं पूरन चंद न कोय॥

शब्दार्थ: बाँके=वीर/वक्र; बंदनीक=वंदनीय; लोय=लोक।

सरल हिंदी अर्थ: द्वितीया के वक्र चंद्र को प्रणाम और वीर के सम्मान का शब्द-खेल है।

भावार्थ: वंदनीयता केवल परिमाण से तय नहीं होती।

पाठ और प्रसंग: “बाँके रन” का वीरता और वक्रता से जुड़ा द्वयर्थ है; पूर्णिमा की अपेक्षा द्वितीया-चंद्र के लोकाचार का संकेत है।

दोहा ६३१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३१
करिये तहाँ पैसार जहँ जो जानिये निसार। चक्रब्यूह अभिमन्यु कौ सुन्यौ सबनि संसार॥

शब्दार्थ: पैसार=प्रवेश; निसार=निकलना।

सरल हिंदी अर्थ: अभिमन्यु का प्रसंग बताता है कि प्रवेश के साथ बाहर निकलने का उपाय भी जानें।

भावार्थ: कठिन काम में निकास और बचाव की योजना रखें।

दोहा ६३२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३२
अधिक अधिक बल पौरि के कंस हत्यौ अवतार। चढ़तैं चढ़तैं मोल ज्यौं दरसै बसन बजाज॥

शब्दार्थ: पौरि=पराक्रम; बजाज=कपड़ा व्यापारी।

सरल हिंदी अर्थ: कृष्ण के बढ़ते पराक्रम की तुलना व्यापारी के क्रमशः महँगे वस्त्र दिखाने से है।

भावार्थ: क्षमता क्रम से विकसित और प्रकट होती है।

दोहा ६३३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३३
परुष बचन तैं रोष हित कोमल बचन समान। रजक पछारयो कुबरी राखि लई ब्रजराज॥

शब्दार्थ: परुष=कठोर; रजक=धोबी; कुबरी=कुब्जा।

सरल हिंदी अर्थ: कृष्णकथा में धोबी और कुब्जा का अलग व्यवहार अलग प्रत्युत्तर लाता है।

भावार्थ: वाणी का प्रभाव समझें; कथा हिंसा का सामान्य औचित्य नहीं।

दोहा ६३४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३४
सुदृढ़ सूर नाहिन चलै कायर लगि रन घात। देवल डिगै न पवन तैं जैसैं ध्वज फहरात॥

शब्दार्थ: देवल=मंदिर; ध्वज=पताका।

सरल हिंदी अर्थ: मंदिर स्थिर रहता, पताका डोलती है; दृढ़ और डगमग व्यक्ति का भेद।

भावार्थ: संकट में धैर्य और निर्णय की स्थिरता रखें।

दोहा ६३५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३५
मित्र मित्र के काम कौं देखु बिमुख करि हेत। जैसैं चंद प्रकास करि रवि-मंडल तैं लेत॥

शब्दार्थ: बिमुख=दूसरी दिशा; हेत=स्नेह/कारण।

सरल हिंदी अर्थ: चंद्र सूर्य से प्रकाश लेकर दूसरी दिशा में चमकता है; दूरी में भी मित्र का लाभ पहुँचता है।

भावार्थ: सहयोग का मूल्य केवल सामने रहने में नहीं।

दोहा ६३६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३६
तन धन हू दै लाज के जतन करत जे धीर। टूक टूक है गिरत पै नहिं मुख फेरत बीर॥

शब्दार्थ: लाज=मान; धीर=धैर्यवान; टूक=टुकड़े।

सरल हिंदी अर्थ: पुराना वीरकाव्य मान की रक्षा में तन-धन त्याग का आदर्श कहता है।

भावार्थ: साहस को विवेक और जीवन की रक्षा के साथ समझें।

दोहा ६३७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३७
भले बुरे गुरु जन बचन लोपत कबहूँ न धीर। राज-काज कौं छाँड़ि कै चले बिपिन रघुबीर॥

शब्दार्थ: लोपत=उल्लंघन; बिपिन=वन।

सरल हिंदी अर्थ: राम द्वारा पिता का वचन निभाकर वन जाने का आदर्श है।

भावार्थ: वचन और सम्मान महत्त्वपूर्ण हैं; अन्यायी निर्देश पर विवेक रखें।

दोहा ६३८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३८
बिपति समय हू देत हैं सत पुरुषन के काम। राज बिभीषन कौं दियौ बैसी बिरिया राम॥

शब्दार्थ: बैसी बिरिया=वैसे संकट का समय।

सरल हिंदी अर्थ: स्वयं संकट में रहते राम ने विभीषण को राज्य का आश्वासन दिया।

भावार्थ: कठिनाई में भी मदद की भावना रखी जा सकती है।

दोहा ६३९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६३९
लोकन के अपवाद कौं डर करिये दिन-रैन। रघुपति सीता परिहरी सुनत रजक के बैन॥

शब्दार्थ: अपवाद=लोकनिंदा; परिहरी=त्यागा; बैन=वचन।

सरल हिंदी अर्थ: धोबी की बात पर सीता-परित्याग का प्रसंग लोकनिंदा की शक्ति दिखाता है।

भावार्थ: सामाजिक दबाव में निर्दोष के साथ अन्याय न करें।

पाठ और प्रसंग: सीता-परित्याग का प्रसंग ऐतिहासिक काव्य की लोकमत-संबंधी चिंता है; निर्दोष पर लोकनिंदा का दोष डालना उचित नहीं।

दोहा ६४०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४०
भले भले बिधिना रचे पै सदोष सब कीन। कामधेनु पसु कठिन मनि दधि खारो ससि छीन॥

शब्दार्थ: बिधिना=विधाता; दधि=उदधि; छीन=क्षीण।

सरल हिंदी अर्थ: कामधेनु पशु, रत्न कठोर, समुद्र खारा और चंद्र घटता है—श्रेष्ठ में भी सीमा है।

भावार्थ: पूर्ण दोषरहितता की अवास्तविक अपेक्षा न रखें।

दोहा ६४१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४१
जैसौ कारन होतु है तैसौ कारज थाप। कर सर धनु प्रानी हनत कर माला हरि जाप॥

शब्दार्थ: सर=बाण; थाप=स्थापित; कर=हाथ।

सरल हिंदी अर्थ: एक हाथ में धनुष-बाण वध का, माला जप का साधन बनते हैं।

भावार्थ: साधन और उद्देश्य परिणाम तय करते हैं।

दोहा ६४२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४२
इन कौं मानुष जन्म दै कहा कियौ भगवान। सुंदर मुख बोल न सकैं दै न सकैं धनवान॥

शब्दार्थ: मानुष=मनुष्य; दै=देना।

सरल हिंदी अर्थ: कवि मधुर वाणी न बोलने वाले और सहायता न करने वाले धनी की आलोचना करता है।

भावार्थ: अभिव्यक्ति और संसाधन लोकहित में लगाएँ; वाक्-दिव्यांगता पर ताना नहीं।

दोहा ६४३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४३
कहा कहौं बिधि की अबिधि भूले परम प्रवीन। मूरख कौं संपति दई पंडित संपति-हीन॥

शब्दार्थ: अबिधि=अव्यवस्था; प्रवीन=निपुण।

सरल हिंदी अर्थ: मूर्ख के पास धन और विद्वान के पास अभाव देखकर कवि असंगति पर प्रश्न करता है।

भावार्थ: संपत्ति को बुद्धिमत्ता या नैतिक योग्यता का प्रमाण न मानें।

दोहा ६४४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४४
वह संपति कौहि काम की जन काहू पै होइ। नीठ कमावै कष्ट करि बिलसै औरहि कोइ॥

शब्दार्थ: नीठ=कठिनाई से; बिलसै=उपभोग करे।

सरल हिंदी अर्थ: कोई कष्ट से कमाए और आनंद कोई और लूटे—कवि ऐसी संपत्ति की उपयोगिता पूछता है।

भावार्थ: कमाने वाले के श्रम और अधिकार का सम्मान करें।

दोहा ६४५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४५
नर भूषन सब दीन छमा बिक्रम अरु बच धेर। ज्यौं तिय भूषन लाज है निलज धरति की बेर॥

शब्दार्थ: छमा=क्षमा; बिक्रम=पराक्रम; बचधेर=वचन की दृढ़ता।

सरल हिंदी अर्थ: क्षमा, साहस और दृढ़ वचन को मानव के आभूषण कहा; स्त्री-लाज का पुराना दृष्टांत जुड़ा है।

भावार्थ: गरिमा और मर्यादा सभी के गुण हैं, केवल स्त्री का बंधन नहीं।

पाठ और प्रसंग: “दीन” एवं अंतिम “बेर” के पुराने पदबंध कठिन हैं; क्षमा, पराक्रम और वचन-दृढ़ता वाले स्पष्ट अंश का भाव मुख्य रखा है।

दोहा ६४६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४६
यौं निबाह सब जगत कौ रस रिस हेत अहेत। एक एक पै लेत है एक एक कौं देत॥

शब्दार्थ: रिस=रोष; हेत-अहेत=स्नेह-विरोध।

सरल हिंदी अर्थ: संसार में लोग विभिन्न भावों और लेन-देन से जुड़े हैं।

भावार्थ: व्यवहार में पारस्परिक प्रभाव समझें।

दोहा ६४७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४७
तृन हू तैं अरु तूल तैं हरवो जाचक आहि। जानतु है कछु माँगिहै पवन उड़ावत नाहिं॥

शब्दार्थ: तूल=रुई; हरवो=हलका; जाचक=याचक।

सरल हिंदी अर्थ: याचक से कुछ माँगने के डर से हवा भी उसे न उड़ाए—तीखा व्यंग्य है।

भावार्थ: मदद माँगने वाले को अपमानित करने की प्रवृत्ति पहचानें।

दोहा ६४८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४८
नृप गुरु तिय बनहि सेइये मध्य भाग जम माहिं। है बिनास अति निकट तैं दूर रहे फल नाहिं॥

शब्दार्थ: नृप=राजा; तिय=स्त्री; बनहि=वन्हि/अग्नि।

सरल हिंदी अर्थ: कवि राजसत्ता, गुरु, संबंध और अग्नि से न अति निकट, न निष्फल दूरी रखने की नीति कहता है।

भावार्थ: निकटता में मर्यादा और उचित सीमाएँ रखें।

पाठ और प्रसंग: “बनहि” को प्रसंग में वन्हि/अग्नि का पुराना रूप समझा है। गुरु, दांपत्य और सत्ता के साथ व्यवहार का यह ऐतिहासिक दृष्टांत है।

दोहा ६४९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६४९
देखत है जग जातु है तऊ ममता सौं मेल। जानतु है या जगत में देखत भूलो खेल॥

शब्दार्थ: ममता=आसक्ति; जातु=बीतता/जाता।

सरल हिंदी अर्थ: नश्वरता देखते हुए भी मन संसार में उलझा रहता है।

भावार्थ: जीवन के अस्थायी स्वरूप पर विचार करें।

दोहा ६५०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५०
भले बुराई तैं डरैं राख्यौ चाहैं सोय। जानत है पै दुष्ट के अवगुन कहत न कोय॥

शब्दार्थ: राख्यौ=मान सुरक्षित रखना; बुराई=कलह/दुष्परिणाम।

सरल हिंदी अर्थ: सज्जन अपना सम्मान बचाने को दुर्जन की कमी जानते हुए भी विवाद से बचते हैं।

भावार्थ: व्यर्थ कलह से बचें, जरूरी शिकायत उचित माध्यम से करें।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ६५१–७००

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ६५१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५१
गुन तैं अवगुन होतु है लिखे मिटत नाहिं अंक। बढ़ति जात ज्यौं ज्यौं कला त्यौं त्यौं ससि सकलंक॥

शब्दार्थ: कला=चंद्रभाग/गुण; सकलंक=दाग सहित।

सरल हिंदी अर्थ: चंद्र बढ़ता है तो दाग स्पष्ट होता; बढ़ी प्रतिष्ठा में कमियाँ भी दिखती हैं।

भावार्थ: प्रसिद्धि के साथ आत्मसुधार रखें।

दोहा ६५२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५२
निस दिन खटकत तनक तृन परै जु आँखनि माहिं। तिनसैं सज्जन राखिए सो छिन खटकतु नाहिं॥

शब्दार्थ: तृन=तिनका; तिनसैं=तिनके के समान/संग।

सरल हिंदी अर्थ: छोटा तिनका आँख को चुभता है; सज्जन का साथ कष्ट नहीं देता।

भावार्थ: निकटता ऐसी हो जो दूसरे को असुविधा न दे।

पाठ और प्रसंग: दूसरी पंक्ति का “तिनसैं” वाला संबंध कठिन है; सामान्य आशय सज्जन-संग से कष्ट न होना है।

दोहा ६५३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५३
सज्जन बचावत कष्ट तैं रहै निरंतर साथ। नैन सहाइ ज्यौं पलक देह सहाइ हाथ॥

शब्दार्थ: नैन=आँख; सहाइ=सहायक।

सरल हिंदी अर्थ: पलक आँख और हाथ देह की रक्षा करते हैं; सज्जन ऐसा निरंतर सहायक है।

भावार्थ: विश्वसनीय साथ संकट में सक्रिय रहता है।

दोहा ६५४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५४
धनी होत निरधन बहुर निरधन तैं धनवान। बड़ी होति निस सीत ऋतु ज्यौं ग्रीषम दिन-मान॥

शब्दार्थ: बहुर=फिर; निस=रात; दिनमान=दिन की अवधि।

सरल हिंदी अर्थ: धन-अभाव बदलते हैं, जैसे ऋतुओं में दिन-रात की लंबाई।

भावार्थ: स्थिति बदलने पर धैर्य और विनम्रता रखें।

दोहा ६५५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५५
सबही कुल में होत है एक एक सरदार। गज ऐरावत सुर सुरिंद्र तरुबर में मंदार॥

शब्दार्थ: सुरिंद्र=इंद्र; मंदार=देववृक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: हाथियों में ऐरावत, देवों में इंद्र जैसे प्रमुख उदाहरण हैं।

भावार्थ: हर क्षेत्र में विशिष्ट क्षमता पहचानी जाती है।

दोहा ६५६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५६
जहाँ सनेही तहाँ रहत भ्रमत भ्रमत मन आय। फिरत कटोरी मंत्र की चोरहि पै ठहराय॥

शब्दार्थ: सनेही=प्रिय; मंत्रकटोरी=लोकविश्वास का साधन।

सरल हिंदी अर्थ: भटकता मन प्रिय के पास लौटता है; मंत्र से चलती कटोरी का पुराना विश्वास दृष्टांत है।

भावार्थ: मन की दिशा लगाव प्रकट करती है।

पाठ और प्रसंग: मंत्र से कटोरी चलाकर चोर पहचानना लोकविश्वास है, अपराध की विश्वसनीय जाँच का तरीका नहीं।

दोहा ६५७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५७
प्रान पियारे के दरस हिय तैं बढ़त हुलास। फैलत लगै बयार तैं ज्यौं फूलन में बास॥

शब्दार्थ: दरस=दर्शन; बयार=हवा; बास=सुगंध।

सरल हिंदी अर्थ: प्रिय-दर्शन से आनंद फैलता है, जैसे हवा से फूलों की सुगंध।

भावार्थ: स्नेहपूर्ण उपस्थिति जीवन में ऊर्जा देती है।

दोहा ६५८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५८
सुनत स्रवन पिय के बचन हिय बिकसै हित पागि। ज्यौं कदंब बरषा समय फूलति बूँदनि लागि॥

शब्दार्थ: स्रवन=कान; पागि=रँगकर; बिकसै=खिले।

सरल हिंदी अर्थ: प्रिय वचन से हृदय वर्षा में कदंब की तरह खिलता है।

भावार्थ: सद्भाव के शब्द संबंध सींचते हैं।

दोहा ६५९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६५९
ज्यौं ज्यौं छूटै अघरापन त्यौं त्यौं प्रेम प्रकास। जैसे कैसी आम्र की पक्वस पकै मिठास॥

शब्दार्थ: अघरापन=कच्चापन/अपरिपक्वता; पक्वस=पकने पर।

सरल हिंदी अर्थ: आम पकने पर मीठा होता है; अपरिपक्वता घटे तो प्रेम निखरता है।

भावार्थ: परिपक्वता संबंध में मिठास लाती है।

पाठ और प्रसंग: “अघरापन” पुराने कच्चेपन/अपरिपक्वता के संकेत में पढ़ा है; दूसरी पंक्ति में आम पकने का दृष्टांत है।

दोहा ६६०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६०
चोरा चोरी प्रीति के कीने बढ़त हुलास। अति खाए उपजै अरुचि थोरी बात मिठास॥

शब्दार्थ: चोरा चोरी=छिपकर; अरुचि=अनिच्छा।

सरल हिंदी अर्थ: कवि शृंगार में सीमित मिलन की मिठास को भोजन की मात्रा से जोड़ता है।

भावार्थ: स्नेह में संतुलन रखें; गोपनीयता को धोखे का बहाना न बनाएँ।

दोहा ६६१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६१
नीति अनीति बड़े सहैं रिस भरि देत न गारि। भृगु उर दीनी लात की कीनी हरि मनुहारि॥

शब्दार्थ: रिस=क्रोध; गारि=गाली; मनुहारि=विनय।

सरल हिंदी अर्थ: भृगु के आघात पर विष्णु की विनम्र प्रतिक्रिया से महान क्षमा कही है।

भावार्थ: उकसावे में संयम रखें और सुरक्षा की सीमाएँ भी बनाएँ।

दोहा ६६२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६२
रहै न कबहूँ दोय लखि एक सदन के माहिं। एक म्यान में द्वै छुरी जैसै मावै नाहिं॥

शब्दार्थ: दोय=दो; सदन=घर; म्यान=तलवार का खोल।

सरल हिंदी अर्थ: एक म्यान में दो छुरियों की तरह प्रतिस्पर्धी अधिकार एक जगह नहीं टिकते।

भावार्थ: साझी व्यवस्था में भूमिकाएँ स्पष्ट करें।

दोहा ६६३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६३
परधन लेत छिनाय इक इक धन देत हसंत। सिसर करतु पतभार तरु गहरो करत बसंत॥

शब्दार्थ: परधन=दूसरों का धन; सिसर=शिशिर; गहरो=घना।

सरल हिंदी अर्थ: शिशिर पत्ते छीनता, वसंत भरता है; कोई छीनता, कोई प्रसन्नता से देता है।

भावार्थ: अपना प्रभाव सहायक बनाएँ, शोषक नहीं।

दोहा ६६४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६४
जो न परत किहि बात में तिहिं मनुहारि न मारि। ऐसो खेल न खेलिए जामें जीति न हारि॥

शब्दार्थ: मनुहारि=मनाना; मारि=कठोर दबाव।

सरल हिंदी अर्थ: जहाँ न समझाने का असर, न दबाव का, वहाँ निरर्थक संघर्ष छोड़ें।

भावार्थ: प्रयास का उद्देश्य और संभावित परिणाम देखें।

दोहा ६६५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६५
गहत तत्त्व ज्ञानी पुरुष बात बिचार बिचार। मथनिहारि तजि छाछ कौं माखन लेत निकारि॥

शब्दार्थ: तत्त्व=सार; मथनिहारि=मथने वाली।

सरल हिंदी अर्थ: मक्खन निकालने की तरह ज्ञानी विचार से सार ग्रहण करता है।

भावार्थ: अनावश्यक विस्तार से उपयोगी तत्व चुनें।

दोहा ६६६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६६
मात पिता के पन के पुरुषहि प्रगट प्रभाव। जामदग्नि में देखिए सम रस बीर सुभाव॥

शब्दार्थ: पन=प्रतिज्ञा/आज्ञा; जामदग्नि=परशुराम का संकेत।

सरल हिंदी अर्थ: परशुराम के मातृ-पितृ प्रसंग से कवि दृढ़ और वीर स्वभाव कहता है।

भावार्थ: पौराणिक आज्ञापालन को पारिवारिक हिंसा का निर्देश न मानें।

पाठ और प्रसंग: परशुराम की कथा में हिंसा और पुनर्जीवन के पौराणिक प्रसंग हैं; माता-पिता के वचन से किसी को हानि पहुँचाना उचित नहीं।

दोहा ६६७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६७
गुरु बच जोग अजोगहू करिए भ्रम बिसराय। राम राज सुख छाँड़िकै बनवासी भए जाय॥

शब्दार्थ: बच=वचन; जोग-अजोग=उचित-अनुचित।

सरल हिंदी अर्थ: राम का राजसुख छोड़ वन जाना बड़ों के वचन निभाने का उदाहरण है।

भावार्थ: श्रद्धा के साथ नैतिक विवेक भी रखें।

दोहा ६६८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६८
ओछी मति युवतीन की कहैं बिबेक भुलाय। दशरथ रानी के बचन बन पठए रघुराय॥

शब्दार्थ: पठए=भेजा; रघुराय=राम।

सरल हिंदी अर्थ: कैकेयी के वचन से राम वन गए; कवि उससे स्त्रियों पर व्यापक टिप्पणी करता है।

भावार्थ: एक पात्र का कर्म समस्त स्त्रियों की बुद्धि का प्रमाण नहीं।

दोहा ६६९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६६९
पूजनीक गुन तैं पुरुष दरसन पूज न होय। यज्ञ तिलक किय कृष्ण कौं छाँड़ि बड़े सब कोय॥

शब्दार्थ: पूजनीक=आदरणीय; दरसन=बाह्य रूप।

सरल हिंदी अर्थ: राजसूय में कृष्ण की अग्रपूजा से गुण का सम्मान बताया है।

भावार्थ: आदर आयु या रूप से अधिक आचरण का हो।

दोहा ६७०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७०
स्रवन करी यौं कीजिए मात पिता की सेव। काँधे काँवरि लै फिरयो पूजे जैसैं देव॥

शब्दार्थ: स्रवन=श्रवण कुमार; काँवरि=काँवड़।

सरल हिंदी अर्थ: श्रवण कुमार ने माता-पिता को काँवड़ में लेकर सेवा की।

भावार्थ: परिजनों की जरूरत के अनुसार करुणापूर्ण देखभाल करें।

दोहा ६७१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७१
बड़े जिती लघुता करैं तिती बड़ाई पाय। काम करैं सब जगत के तातैं त्रिभुवनराय॥

शब्दार्थ: लघुता=विनम्रता; त्रिभुवनराय=जगतपालक।

सरल हिंदी अर्थ: सबका काम करने से ही प्रभु महान कहलाते हैं; विनय मान बढ़ाती है।

भावार्थ: सेवा और विनम्रता सच्ची महानता हैं।

दोहा ६७२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७२
अरि के कर में दीजिए अवसर कौ अधिकार। ज्यौं ज्यौं द्रव्य लुटाइये त्यौं त्यौं जस बिस्तार॥

शब्दार्थ: अरि=शत्रु; जस=यश; द्रव्य=धन।

सरल हिंदी अर्थ: धन के उदार वितरण से विरोधी के पास भी प्रशंसा करने का अवसर आ सकता है।

भावार्थ: उदारता प्रतिष्ठा बढ़ाती है; पहली पंक्ति का आशय सीमित भावानुवाद है।

पाठ और प्रसंग: “अरि के कर” वाली पहली पंक्ति का अभिप्राय कठिन है; धन-वितरण और यश-विस्तार के स्पष्ट संबंध तक सीमित अर्थ है।

दोहा ६७३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७३
जो लायक जिहि होय सो ताही ठौर मनोय। चंदेरीपति क्यों बरै रुक्मिनि श्री हरि जोय॥

शब्दार्थ: चंदेरीपति=शिशुपाल; जोय=देखकर।

सरल हिंदी अर्थ: रुक्मिणी ने कृष्ण को चुना, शिशुपाल को नहीं—अनुकूलता और पसंद का प्रसंग।

भावार्थ: संबंध में योग्य मेल और स्वतंत्र सहमति मानें।

दोहा ६७४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७४
घन घेरे कौ मिलन सुख देत भरोसौ नाहिं। होय न होवै चाँदनी जैसे पावस माहिं॥

शब्दार्थ: घन=बादल; पावस=वर्षा ऋतु।

सरल हिंदी अर्थ: बरसाती बादलों में चाँदनी अनिश्चित है; बाधाओं में मिलन का सुख भी सुनिश्चित नहीं।

भावार्थ: अनिश्चित परिस्थिति में अपेक्षाएँ यथार्थ रखें।

दोहा ६७५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७५
बढ़े सबै सब लच्छ तैं जिहिं बिनु लच्छ के जोग। राम लखन धनु धरि बिपिन कौहू परख्यौ होग॥

शब्दार्थ: लच्छ=लक्षण/चिह्न; बिपिन=वन।

सरल हिंदी अर्थ: वन में साधारण रूप में गए राम-लक्ष्मण के भीतर की महानता पहचानना सबके लिए सरल नहीं।

भावार्थ: बाहरी चिह्नों के अभाव में भी योग्यता पहचानें।

पाठ और प्रसंग: “लच्छ” लक्षण/चिह्न है। अंतिम “परख्यौ होग” पुराने प्रश्नात्मक अनुमान का पाठ है।

दोहा ६७६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७६
ता बिनु होय न काज सिधि जासौं लागौ ब्रत। गुड़ बिनु होत न चौथ ब्रत चूल्ह बिना बरात॥

शब्दार्थ: गुड़=मीठा पदार्थ; चौथब्रत=चतुर्थी का व्रत; चूल्ह=चूल्हा।

सरल हिंदी अर्थ: व्रत में आवश्यक सामग्री और बारात में भोजन के चूल्हे की तरह हर काम के जरूरी साधन होते हैं।

भावार्थ: जरूरी घटक के बिना काम अधूरा रहता है।

पाठ और प्रसंग: “गुड़” और “चौथ” पुरानी छपाई में अस्पष्ट हैं; प्रसंग से व्रत की सामग्री के रूप में पढ़े हैं। यह किसी व्रत की संपूर्ण विधि नहीं।

दोहा ६७७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७७
प्रभु सौं बात दुरी न तऊ डरिये करतु कुहेत। लछमनि आतुरता लिख्यो हरि कहा जानत है न॥

शब्दार्थ: कुहेत=कपट/बुरा भाव; आतुरता=व्याकुलता।

सरल हिंदी अर्थ: लक्ष्मण की लिखी व्यथा के संकेत से कवि पूछता है: क्या प्रभु बात नहीं जानते?

भावार्थ: आस्था में अंतर्मन की सत्यता महत्त्वपूर्ण है।

पाठ और प्रसंग: लक्ष्मण की लिखी व्याकुलता का प्रसंग संक्षिप्त है; मूल में न दी विस्तृत कथा अनुमान से नहीं जोड़ी गई।

दोहा ६७८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७८
कठिन कला हू आइहै करत करत अभ्यास। नट ज्यौं चालतु बरत पर साधै बरस छ मास॥

शब्दार्थ: कला=कौशल; बरत=रस्सी।

सरल हिंदी अर्थ: नट महीनों-वर्षों के अभ्यास से रस्सी पर चलता है।

भावार्थ: कठिन कौशल निरंतर अभ्यास से आता है।

दोहा ६७९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६७९
जहँ उपजै सोई करै जिहिं कुल जो अभ्यास। कोटे मच्छ जल बिदै पंछी उड़ै अकास॥

शब्दार्थ: कोटे=करोड़ों; बिदै=विचरें; अकास=आकाश।

सरल हिंदी अर्थ: मछली पानी और पक्षी आकाश में सहज हैं; परिचित वातावरण क्षमता गढ़ता है।

भावार्थ: रुचि और प्रशिक्षण पहचानें, जन्म से पेशा न बाँधें।

पाठ और प्रसंग: जैविक उदाहरण से मनुष्यों के जन्माधारित पेशे या जाति तय नहीं होते; मानव कौशल शिक्षा और अवसर से बदलते हैं।

दोहा ६८०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८०
बिना ललनी पुरुष पै होय तहाँ इक ठाँय। नाहिन दुख सुख लेति सौं पिय पै एकहि जाय॥

शब्दार्थ: ललनी=प्रिय स्त्री; ठाँय=स्थान; पिय=प्रिय।

सरल हिंदी अर्थ: प्रिय साथी के बिना सुख-दुख साझा करने की निकटता अधूरी लगती है।

भावार्थ: संबंध में दोनों का सहारा और भागीदारी मूल्यवान है।

पाठ और प्रसंग: पहली पंक्ति “बिना ललनी” से दांपत्य-साथ का भाव लिया है; पूरे पुराने वाक्यबंध का निर्विवाद शब्दानुवाद नहीं।

दोहा ६८१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८१
गुन प्रगटै अवगुन दुरै जानै केवल साच। तिय मारी परिहरी तऊ कृष्ण त्रिलोकी-नाथ॥

शब्दार्थ: तिय=यहाँ पूतना; दुरै=ओझल; परिहरी=त्याग दिया।

सरल हिंदी अर्थ: पूतना-वध पर भी कृष्ण की दिव्यता अक्षुण्ण मानने का भक्तिपरक कथन है।

भावार्थ: कथा में विष देने वाली पूतना का प्रसंग है, सामान्य स्त्री-वध का समर्थन नहीं।

दोहा ६८२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८२
जिसै दियो पूरब जनम न दिए लियै न सोइ। कौन सयाने धन दियो किहिं अज्ञान दियो सोइ॥

शब्दार्थ: पूरबजनम=पूर्वजन्म; सयाने=बुद्धिमान।

सरल हिंदी अर्थ: धन का असमान मिलना कवि पूर्वकर्म से जोड़ता है, केवल चतुराई से नहीं।

भावार्थ: यह आस्थापरक उत्तर है; गरीबी को अपराध न मानें।

पाठ और प्रसंग: पूर्वजन्म-आधारित वितरण भक्तिकालीन विश्वास है। वर्तमान अभाव को किसी का दोष बताने का प्रमाण नहीं।

दोहा ६८३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८३
जाको न्यौत जिमाइये ताही की मनुहारि। परनै सोई गाइये बचन सुधारि सुधारि॥

शब्दार्थ: न्यौत=निमंत्रण; जिमाइये=भोजन कराएँ; परनै=विवाह में।

सरल हिंदी अर्थ: जिसे बुलाया है उसका सम्मान करें; विवाह में प्रसंगानुकूल गीत गाए जाते हैं।

भावार्थ: संवाद और सत्कार अवसर के अनुरूप हों।

दोहा ६८४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८४
निरस बात सोई सरस जहाँ होय हिय हेत। गारी हू प्यारी लगै ज्यौं ज्यौं समधिनि देत॥

शब्दार्थ: हियहेत=हार्दिक स्नेह; समधिनि=विवाह-संबंधी स्त्री।

सरल हिंदी अर्थ: विवाह की स्नेहपूर्ण गारियाँ संबंध के कारण प्रिय लगती हैं।

भावार्थ: आपसी सहमति का विनोद अपमान से अलग है।

दोहा ६८५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८५
जो जिहिं काल में प्रबल सो तिहिं भेद प्रबीन। नद-प्रवाह तैं गज बहै चढ़ै उलट लघु मीन॥

शब्दार्थ: प्रबल=समर्थ; प्रबीन=निपुण; मीन=मछली।

सरल हिंदी अर्थ: धारा हाथी बहा सकती है, छोटी मछली उलटी तैरती है।

भावार्थ: परिस्थिति-विशिष्ट कौशल आकार से बड़ा हो सकता है।

दोहा ६८६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८६
जो जैसो तिहिं तैसिये करिये नीति प्रकास। काठ कठिन भैदै भ्रमत मृदु अरविंद निवास॥

शब्दार्थ: भैदै=भेदे; मृदु=कोमल; अरविंद=कमल।

सरल हिंदी अर्थ: कठोर लकड़ी भेदने वाला भौंरा कोमल कमल में निवास करता है।

भावार्थ: व्यवहार व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार रखें।

दोहा ६८७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८७
इन लच्छन तैं जानिये हरि अज्ञान नितांत। ऊँघे कथा पुरान सुनि बिकथा सुनै हुलास॥

शब्दार्थ: लच्छन=लक्षण; बिकथा=सामान्य गप; हुलास=आनंद।

सरल हिंदी अर्थ: धार्मिक कथा में ऊँघना और गप में उत्साहित होना आध्यात्मिक अरुचि का संकेत कहा है।

भावार्थ: अपनी प्राथमिकताओं और ध्यान का निरीक्षण करें।

पाठ और प्रसंग: दीपिका “बिकथा” का अर्थ सामान्य कहानी बताती है। किसी की धार्मिक रुचि से उसका मानवीय मूल्य न आँकें।

दोहा ६८८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८८
डरु उपजाव हित धरम सौं अधम करम की हानि। मन प्रसन्न रुचि अन्न सौं ज्यौं ज्वर छूटै जानि॥

शब्दार्थ: अधमकरम=बुरे कर्म; ज्वर=बुखार।

सरल हिंदी अर्थ: धर्म से बुरे कर्म में भय-जागरण, जैसे ज्वर उतरने पर मन और भोजन-रुचि सुधरना।

भावार्थ: सद्बुद्धि अनुचित कर्म से रोकती है।

दोहा ६८९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६८९
जपत एक हरि नाम तैं पातक कोटि बिलाय। एकहि कनिका आगि तैं घास ढेर जरि जाय॥

शब्दार्थ: पातक=पाप; कनिका=चिनगारी।

सरल हिंदी अर्थ: चिनगारी घास जलाती है; भक्तिभाव में हरिनाम पाप हरता कहा है।

भावार्थ: स्मरण के साथ आचरण-सुधार और उत्तरदायित्व रखें।

दोहा ६९०

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९०
जो समरथ सब बात मैं तिहि भजिए तजि संक। करै रंक तैं राव हरि करै राव तैं रंक॥

शब्दार्थ: समरथ=समर्थ; संक=शंका; राव=राजा।

सरल हिंदी अर्थ: सर्वसमर्थ ईश्वर राजा को गरीब और गरीब को राजा कर सकता है—भक्ति की आस्था।

भावार्थ: बदलती स्थिति में अहंकार छोड़ें।

दोहा ६९१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९१
गर्व-प्रहारी हरि सदा या मैं नहिं संदेह। जरे लंक के लाख ज्यौं लाख लाख के गेह॥

शब्दार्थ: गर्वप्रहारी=अहंकार तोड़ने वाला; गेह=घर।

सरल हिंदी अर्थ: लंका के समृद्ध घरों के जलने से अहंकार के विनाश का उदाहरण है।

भावार्थ: वैभव के गर्व में अन्याय न करें।

दोहा ६९२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९२
कहा बड़े छोटे कहा जहाँ हित तहाँ चित्त लागि। हरि भोजन किए बिदुर घर दुरजोधन हूँ त्यागि॥

शब्दार्थ: हित=स्नेह; बिदुर=विदुर।

सरल हिंदी अर्थ: कृष्ण दुर्योधन का वैभव छोड़ विदुर के घर गए; प्रेम प्रधान है।

भावार्थ: सत्कार का मूल्य धन से अधिक सद्भाव में है।

दोहा ६९३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९३
परजन सौं मनसौ करें परहरि हरि सौं प्रीति। झूठे सौं मानैं हरष अहो जगत बिपरीति॥

शब्दार्थ: परहरि=त्यागकर; मनसौ=मनोरथ।

सरल हिंदी अर्थ: कवि ईश्वर-प्रेम छोड़ अस्थायी आश्रयों में सुख खोजने को उलटी रीति कहता है।

भावार्थ: आध्यात्मिक मूल्य पर विचार करें, मानवीय सहयोग न छोड़ें।

दोहा ६९४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९४
अहै अवधि अबिबेक की देखि कौन अनखाय। काग कनक के पींजरा हंस अनादर भाय॥

शब्दार्थ: अवधि=सीमा; अनखाय=खीजे; कनक=सोना।

सरल हिंदी अर्थ: कौए को सोने का पिंजरा और हंस का अनादर उलटे मूल्यांकन का दृष्टांत है।

भावार्थ: योग्यता को सही पहचान और सम्मान दें।

दोहा ६९५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९५
मूरख कौं हित के बचन सुनि उपजतु है कोप। साँपहि दूध पिवाइये वाकै मुख बिष ओप॥

शब्दार्थ: कोप=क्रोध; ओप=वृद्धि/प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ: अविवेकी हितवचन पर क्रोधित होता है; सर्प-दूध का पुराना दृष्टांत दिया है।

भावार्थ: सलाह तभी उपयोगी है जब सुनने की तैयारी हो।

पाठ और प्रसंग: साँप को दूध पिलाने से विष बढ़ने की उक्ति लोकविश्वास है; साँपों को दूध देना उचित आहार नहीं।

दोहा ६९६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९६
गुन गरुवो लघुता गहै तिहिं सनमानत धीर। मंद तेज प्यारो लगै सीतल सुरभि समीर॥

शब्दार्थ: गरुवो=महान; लघुता=विनम्रता; समीर=हवा।

सरल हिंदी अर्थ: शीतल सुगंधित हवा की कोमलता प्रिय है; गुणी की विनम्रता सम्मान पाती है।

भावार्थ: गुणों को नम्र व्यवहार से सँवारें।

दोहा ६९७

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९७
बड़ी ठौर कौं लघु लहै आप आदर भाय। मलयाचल की ज्यौं पवन परसै मंद सुहाय॥

शब्दार्थ: ठौर=स्थान; मलयाचल=चंदन का पर्वत; परसै=छुए।

सरल हिंदी अर्थ: चंदन-पर्वत की हवा सुगंध पाती है; अच्छा आश्रय छोटे को भी प्रतिष्ठा देता है।

भावार्थ: उत्तम वातावरण का लाभ सीखने में लगाएँ।

दोहा ६९८

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९८
महिमा जुत कौं देत ही लेत न तन सकुचाय। लेत भात जगनाथ कौ नृपहू सीस चढ़ाय॥

शब्दार्थ: महिमाजुत=महिमायुक्त; जगनाथ=जगन्नाथ; नृप=राजा।

सरल हिंदी अर्थ: जगन्नाथ का प्रसाद राजा भी सिर से लगाकर स्वीकारते हैं।

भावार्थ: सम्मानपूर्ण भेंट ग्रहण करने में अहंकार न रखें।

पाठ और प्रसंग: जगन्नाथ के भात/प्रसाद की महिमा का सांस्कृतिक उदाहरण है।

दोहा ६९९

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ६९९
धन पूरन धनवान पै बिन दीने न लहात। ज्यौं बिन बरषे सघन जल लियो पियौ नहिं जात॥

शब्दार्थ: लहात=मिलता; सघन=मेघसमूह।

सरल हिंदी अर्थ: बादल में जल हो, पर बरसे बिना पिया नहीं जा सकता; धन भी बाँटे बिना लाभ नहीं देता।

भावार्थ: संपत्ति की सार्थकता उपयोग और वितरण में है।

दोहा ७००

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७००
इक बिन माँगे ही लहै माँगे एक लहै न। घन जल सर सरिता भरैं चातक चोंच भरै न॥

शब्दार्थ: सर=तालाब; सरिता=नदी; चातक=काव्यपक्षी।

सरल हिंदी अर्थ: वर्षा तालाब-नदियाँ भरती है, पर याचक चातक की चोंच खाली—विषमता का दृष्टांत।

भावार्थ: प्राप्ति की असमानता देखकर जरूरतमंद को न भूलें।

मूल पाठ और हिंदी अर्थ · ७०१–७०६

पढ़ने की सुविधा के लिए क्रमांक-समूह · वृंद सतसई भाग २

दोहा ७०१

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०१
बड़ेन की संपति सबै लघु बिलसंत अनंत। दधि जल घन घन जल धरा धर जल जग बिलसंत॥

शब्दार्थ: दधि=उदधि/समुद्र; घन=बादल; बिलसंत=लाभ पाते।

सरल हिंदी अर्थ: समुद्र से बादल, बादल से धरती और धरती के जल से जग लाभ पाता है।

भावार्थ: बड़ी संपदा का फल अनेक लोगों तक पहुँचना चाहिए।

दोहा ७०२

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०२
जिहि जैतौ निहचै तितौ देन दई पहुँचाय। सक्कर खोरै को मिलै जैसैं सक्कर आय॥

शब्दार्थ: दई=दैव; सक्कर=शक्कर; खोरै=विकृत स्वाद/खोट का कठिन पाठ।

सरल हिंदी अर्थ: कवि नियत प्राप्ति की बात शक्कर पाने के दृष्टांत से करता है; दूसरी पंक्ति का सटीक संकेत कठिन है।

भावार्थ: सामान्य भाव संतोष का है; अनिश्चित शब्द से नया दावा न निकालें।

पाठ और प्रसंग: “सक्कर खोरै” और अंतिम “सक्कर आय” का विशिष्ट संकेत पूरी तरह निश्चित नहीं। यहाँ शाब्दिक पूर्णता का दावा नहीं किया गया।

दोहा ७०३

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०३
जिय संतोष बिचारियै होय जु लिख्यौ नसीब। खल गुर काँच कथीर सौं मानत बली गरीब॥

शब्दार्थ: खल=खली; गुर=गुड़; कथीर=राँगा/टिन।

सरल हिंदी अर्थ: खली-गुड़ और काँच-धातु के भिन्न मूल्यांकन से कवि उपलब्धि के अनुसार संतोष कहता है।

भावार्थ: तुलना से अधिक वास्तविक जरूरत पर ध्यान दें।

पाठ और प्रसंग: “खल” को खली और “गुर” को गुड़ पढ़ा गया है; दूसरी पंक्ति की पूरी तुलना कठिन होने से अर्थ सामान्य संतोष तक सीमित है।

दोहा ७०४

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०४
जथाजोग सब मिलत है जो बिधि लिख्यौ अंकूर। खल गुर भोग गवारसौं रानी पान कपूर॥

शब्दार्थ: जथाजोग=यथायोग्य; बिधि=विधाता; खल=खली।

सरल हिंदी अर्थ: गुड़-खली और पान-कपूर के पुराने सामाजिक अंतर से भाग्य और भोग का भेद कहा है।

भावार्थ: ऐतिहासिक वर्गभेद को जन्मसिद्ध अधिकार का प्रमाण न मानें।

पाठ और प्रसंग: मूल में वर्गगत भोजन-अंतर का पुराना संकेत है। भोजन या गरिमा किसी वर्ग का जन्मसिद्ध विशेषाधिकार नहीं।

समापन-छंद ७०५

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०५
समय सार दोहानि कौ सुनत होय मनमोद। प्रगट भई यह सतसई भाखा वृंद बिनोद॥

शब्दार्थ: मनमोद=मन का आनंद; भाखा=भाषा; बिनोद=विनोद।

सरल हिंदी अर्थ: वृंद अपने भाषा-दोहों के सार को आनंददायक बताते हुए सतसई का समापन करते हैं।

भावार्थ: काव्य का आनंद विचार और जीवन-बोध से जुड़ता है।

समय-स्थान सूचक छंद ७०६

वृंद सतसई · मुद्रित मूल क्रमांक ७०६
संवत ससि रस बार ससि कार्तिक सुदि ससि वार। सातैं ढाका सहर में उपज्यौ इहै बिचार॥

शब्दार्थ: ससि=१; रस=६; बार=७; सुदि=शुक्लपक्ष।

सरल हिंदी अर्थ: अंकों को उलटे क्रम में पढ़ने पर संवत १७६१ मिलता है; पद कार्तिक और ढाका का उल्लेख करता है।

भावार्थ: यह रचना के समय-स्थान का समापन अभिलेख है।

पाठ और प्रसंग: मुद्रित दीपिका: ससि=१, रस=६, बार=७, ससि=१; अंकों की विपरीत दिशा से १७६१। कार्तिक शुक्लपक्ष और ढाका का उल्लेख है। “ससि वार” तथा “सातैं” से अंग्रेजी तारीख, निश्चित तिथि या सप्ताह-दिन अनुमान से नहीं निकाले गए।

वृंद सतसई के दोनों भाग पूरे

इस फ़ाइल में ३५१–७०६ के सभी ३५६ क्रमांकित छंद हैं। पहला भाग १–३५० और यह दूसरा भाग मिलकर चुने हुए सतसई-सप्तक संस्करण का वृंद-सतसई खंड पूरा करते हैं। अन्य संस्करणों के सभी पाठांतर इसमें समाहित होने का दावा नहीं है।

  • प्रमाण: सुनी बात और दिखावे को जाँचकर स्वीकारें।
  • अभ्यास: अक्षर-अक्षर और कदम-कदम से कठिन काम पूरे होते हैं।
  • संबंध: मधुर वाणी, भरोसा, मर्यादा और संकट में सहयोग महत्त्वपूर्ण हैं।
  • उदारता: ज्ञान और संपदा का उपयोग दूसरों को लाभ पहुँचाए।
  • संतोष: धन, यौवन और पद अस्थायी हैं; गुण और विवेक सँभालें।

सामान्य प्रश्न

वृंद सतसई कितने भागों में पूरी हुई?

इस योजना में दो बड़े भाग: १–३५० और ३५१–७०६। यह दूसरी और अंतिम सामग्री-फ़ाइल है।

भाग २ में ३५६ छंद क्यों हैं?

३५१ से ७०६ तक दोनों सिरों सहित कुल ३५६ क्रमांक हैं। स्रोत के अंतिम छह छंद केवल “सतसई” नाम के कारण नहीं हटाए गए।

क्या ७०५ और ७०६ सामान्य नीति-दोहे हैं?

अंत में रचना के आनंद/समापन और समय-स्थान का उल्लेख है। स्रोत में क्रमांकित होने के कारण वे भी सुरक्षित हैं; कार्ड पर उनका अलग परिचय है।

संवत १७६१ कैसे पढ़ा गया है?

मुद्रित दीपिका ससि १, रस ६, बार ७, ससि १ बताती है। भूतसंख्या की विपरीत दिशा से १७६१ मिलता है। इस लेख में उससे मनमानी अंग्रेजी तारीख या सप्ताह-दिन नहीं निकाला गया।

क्या हर पुराने शब्द का अर्थ निर्विवाद है?

नहीं। कठिन मुद्रण और पुरानी भाषा के कुछ संकेत अस्पष्ट बचे हैं। संबंधित कार्ड में यह स्पष्ट है; वहाँ सीमित सामान्य भावानुवाद है, निश्चित आलोचनात्मक पाठ का दावा नहीं।

क्या यह सारी नीति आज का सार्वभौम नियम है?

नहीं। ऐतिहासिक सामाजिक धारणाओं, मिथकीय प्रसंगों और लोकविश्वास को संदर्भ में पढ़ें। उपयोगी बात विवेक से लें और मनुष्य की समान गरिमा बनाए रखें।

संदर्भ और संपादन-पद्धति

मुख्य मुद्रित आधार: सतसई-सप्तक, संग्रहकर्ता एवं संपादक श्यामसुंदरदास, हिंदुस्तानी एकेडमी, प्रयाग, १९३१; खंड ६, वृंद-सतसई; इस भाग के लिए मुद्रित पृष्ठ ३१४–३४१, क्रमांक ३५१–७०६। पुस्तक की अंत में दी “दीपिका” से चुनिंदा कठिन शब्दों और कथा-संकेतों का मिलान किया गया है।

  1. Internet Archive · सतसई-सप्तक की मुख्य मुद्रित स्कैन-प्रति
  2. Internet Archive · उसी पुस्तक की दूसरी स्कैन-प्रति
  3. हिन्दवी · सतसई-सप्तक का पुस्तक-परिचय और संस्करण विवरण

मूल और व्याख्या: मुद्रित पृष्ठ देखकर मूल का यूनिकोड पाठ व्यवस्थित किया गया है; OCR को अकेला अंतिम प्रमाण नहीं बनाया गया। शब्दार्थ, सरल अर्थ और भावार्थ इस लेख के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं, किसी आधुनिक टीका का शब्दशः पुनर्मुद्रण नहीं।

सीमा: यह साहित्य-अध्ययन के लिए एक संस्करण पर आधारित पाठ और सरल भावानुवाद है, सभी पांडुलिपियों का आलोचनात्मक संस्करण नहीं। जहाँ पाठ निश्चित नहीं, वहाँ टिप्पणी दी है। संशोधन का आधार वास्तविक मुद्रित पंक्ति और संदर्भ होना चाहिए।

पढ़ें, विचारें, व्यवहार में परखें

दोहा छोटा है, उसका प्रश्न बड़ा: क्या हमारी वाणी, कमाई, सीख और शक्ति दूसरों के लिए भी उपयोगी है?

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