श्री बजरंग बाण अर्थ सहित | सम्पूर्ण पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

॥ श्री हनुमते नमः ॥

श्री बजरंग बाण

सम्पूर्ण पाठ • सरल हिंदी भावार्थ
श्री बजरंग बाण हनुमान जी के पराक्रम, श्रीराम-भक्ति और भक्त की पुकार को व्यक्त करने वाली लोकप्रिय भक्तिपूर्ण रचना है।

इसमें भक्त हनुमान जी के रामायण से जुड़े पराक्रमों का स्मरण करते हुए उनसे साहस, रक्षा, धैर्य और संकट में सहायता की प्रार्थना करता है।

नीचे श्री बजरंग बाण का सम्पूर्ण पाठ और उसके साथ सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है।

॥ श्री बजरंग बाण ॥

॥ प्रारंभिक दोहा ॥

निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान ॥

सरल भावार्थ
जो भक्त दृढ़ विश्वास, प्रेम और सम्मान के साथ हनुमान जी का स्मरण तथा विनय करता है, उसके शुभ कार्यों में हनुमान जी की कृपा और प्रेरणा का आश्रय माना गया है।
॥ स्तुति ॥

जय हनुमन्त संत हितकारी ।
सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।

जन के काज बिलम्ब न कीजै ।
आतुर दौरि महासुख दीजै ।।

सरल भावार्थ
हे संतों और भक्तों का हित करने वाले हनुमान जी! हमारी प्रार्थना सुनिए।

भक्त प्रार्थना करता है कि उसके धर्मपूर्ण कार्यों में अनावश्यक विलंब न हो और उसे धैर्य तथा सहायता प्राप्त हो।

जैसे कूदी सिन्धु महि पारा ।
सुरसा बदन पैठी विस्तारा ।।

आगे जाय लंकिनी रोका ।
मारेहु लात गई सुर लोका ।।

सरल भावार्थ
इसमें हनुमान जी के समुद्र पार करने, सुरसा की परीक्षा से निकलने और लंका प्रवेश के समय लंकिनी के प्रसंग का स्मरण किया गया है।

भक्त उनके साहस, बुद्धि और लक्ष्य के प्रति अटल निष्ठा को याद करता है।

जाय विभीषण को सुख दीन्हा ।
सीता निरखि परम-पद लीना ।।

बाग उजारि सिन्धु मह बोरा ।
अति आतुर जमकातर तोरा ।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने लंका में विभीषण से भेंट की और अशोक वाटिका में माता सीता का दर्शन किया।

इन प्रसंगों में उनका उद्देश्य केवल श्रीराम का कार्य पूरा करना और माता सीता को प्रभु का संदेश देना था।

अक्षय कुमार मारि संहारा ।
लूम लपेटि लंक को जारा ।।

लाह समान लंक जरि गई ।
जय-जय धुनि सुरपुर में भई ।।

सरल भावार्थ
यहाँ अशोक वाटिका के बाद के युद्ध और लंका-दहन के प्रसंग का स्मरण है।

भक्त हनुमान जी के उस अद्भुत पराक्रम को याद करता है जिससे रावण की शक्ति और अहंकार को बड़ी चुनौती मिली।

अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी ।
कृपा करहु उर अन्तर्यामी ।।

जय जय लखन प्रान के दाता ।
आतुर होई दु:ख करहु निपाता ।।

सरल भावार्थ
भक्त हनुमान जी से विनम्र प्रार्थना करता है— हे अन्तर्यामी प्रभु! मेरे दुःख और चिंता में मुझे धैर्य दीजिए।

लक्ष्मण जी के संकट के समय संजीवनी लाने वाले हनुमान जी का स्मरण करके भक्त उनके करुणामय सेवाभाव को याद करता है।

जै गिरिधर जै जै सुख सागर ।
सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

ओम हनु हनु हनु हनुमंत हठीले ।
बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

सरल भावार्थ
हनुमान जी को गिरिधर, सुख के सागर और महान वीर के रूप में प्रणाम किया गया है।

आगे की पंक्तियाँ पारंपरिक वीर-भाव की प्रार्थना हैं, जिनमें भक्त अपने विरोध, भय और बाधाओं से रक्षा की प्रार्थना करता है।

गदा बज्र लै बैरिहि मारो ।
महाराज प्रभु दास उबारो ।।

ओंकार हुंकार महाप्रभु धाओ ।
बज्र गदा हनु विलम्ब न लाओ ।।

सरल भावार्थ
यहाँ भक्त हनुमान जी के वीर स्वरूप का स्मरण करता है और उनसे अपने जीवन की बाधाओं से उबरने की शक्ति माँगता है।

मुख्य भाव है— भक्त स्वयं को हनुमान जी का सेवक मानकर उनसे शीघ्र सहायता और साहस की प्रार्थना करता है।

ओम ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा ।
ओम हुं हुं हुं हनु अरि उर-सीसा॥

सत्य होहु हरी शपथ पायके ।
राम दूत धरु मारू जायके

सरल भावार्थ
इन पंक्तियों में हनुमान जी के शक्तिशाली वीर-स्वरूप का आवाहन है।

भक्त उन्हें श्रीराम का दूत मानकर अपने जीवन की नकारात्मक बाधाओं के सामने साहस और दृढ़ता देने की प्रार्थना करता है।

जय जय जय हनुमन्त अगाधा ।
दुःख पावत जन केहि अपराधा ।।

पूजा जप-तप नेम अचारा ।
नहिं जानत हो दास तुम्हारा ।।

सरल भावार्थ
भक्त अत्यंत विनम्र होकर कहता है— हे हनुमान जी! मैं पूजा, जप, तप और कठिन साधना के नियम नहीं जानता।

मैं केवल स्वयं को आपका सेवक मानकर आपकी शरण और कृपा चाहता हूँ।

वन उपवन मग गिरि गृह मांहीं ।
तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ।।

पायं परौं कर जोरी मनावौं ।
येहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।

सरल भावार्थ
भक्त कहता है कि वन, मार्ग, पर्वत या घर— जहाँ भी वह रहे, हनुमान जी का स्मरण उसे मानसिक साहस देता है।

वह हाथ जोड़कर कहता है— इस कठिन समय में आपके अतिरिक्त मैं किसे पुकारूँ?

जय अंजनी कुमार बलवंता ।
शंकर सुवन वीर हनुमंता ।।

बदन कराल काल कुलघालक।
राम सहाय सदा प्रतिपालक ।।

सरल भावार्थ
अंजनीपुत्र और वीर हनुमान जी की स्तुति की गई है।

वे श्रीराम के परम सेवक हैं और भक्त उन्हें धर्म तथा सत्य के पक्ष में सदैव खड़े रहने वाले महान रक्षक के रूप में स्मरण करता है।

भूत प्रेत पिसाच निसाचर।
अगिन वैताल काल मारी मर ।।

इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की ।
राखउ नाथ मरजाद नाम की ।।

सरल भावार्थ
यहाँ पारंपरिक धार्मिक भाषा में भय, अशुभ आशंकाओं और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना है।

भक्त श्रीराम के नाम का स्मरण करके हनुमान जी से भय दूर करने और मन में साहस देने की विनती करता है।

जनकसुता हरि दास कहावो ।
ताकी शपथ विलम्ब न लावो ।।

जै जै जै धुनि होत अकासा ।
सुमिरत होत दुसह दुःख नासा ।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी को माता सीता और श्रीराम का सेवक मानकर भक्त उनसे शीघ्र कृपा की प्रार्थना करता है।

हनुमान जी का स्मरण कठिन समय में भक्त को आशा, विश्वास और मानसिक बल देता है।

चरण शरण कर जोरि मनावौं ।
यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।

उठु उठु चलु तोहि राम-दोहाई ।
पायँ परौं, कर जोरि मनाई ।।

सरल भावार्थ
भक्त हाथ जोड़कर हनुमान जी के चरणों की शरण ग्रहण करता है और कहता है कि कठिन समय में वही उसका आश्रय हैं।

श्रीराम के नाम की दुहाई देकर वह अपनी प्रार्थना स्वीकार करने की विनती करता है।

ओम चं चं चं चं चपल चलंता ।
ओम हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ।।

ओम हं हं हाँक देत कपि चंचल ।
ओम सं सं सहमि पराने खल-दल ।।

सरल भावार्थ
इन पंक्तियों में वीर रस और आवाहन का स्वर है।

भक्त हनुमान जी की तीव्र गति, साहस और दुष्ट प्रवृत्तियों के सामने निर्भीकता का स्मरण करता है।

अपने जन को तुरत उबारौ ।
सुमिरत होय आनंद हमारौ ।।

यह बजरंग बाण जेहि मारै।
ताहि कहो फिर कोन उबारै ।।

सरल भावार्थ
भक्त प्रार्थना करता है कि हनुमान जी अपने भक्त को संकट और भय से बाहर निकालें।

अगली पंक्तियाँ बजरंग बाण की पारंपरिक भक्ति-परंपरा में मानी जाने वाली शक्ति का वर्णन करती हैं।

पाठ करै बजरंग बाण की ।
हनुमत रक्षा करैं प्रान की ।।

यह बजरंग बाण जो जापैं ।
ताते भूत-प्रेत सब कापैं ।।

सरल भावार्थ
परंपरागत श्रद्धा के अनुसार बजरंग बाण का पाठ हनुमान जी की शरण और रक्षा का भाव जगाता है।

यहाँ “भूत-प्रेत” आदि का उल्लेख पारंपरिक धार्मिक भाषा में भय और अशुभ शक्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है।

धूप देय अरु जपै हमेशा ।
ताके तन नहिं रहै कलेसा ।।

सरल भावार्थ
भक्ति-परंपरा में श्रद्धा से नियमित पाठ और पूजा का महत्व बताया गया है।

इसका मुख्य भाव है कि भक्त हनुमान जी का स्मरण करते हुए अपने मन में विश्वास, अनुशासन और साहस बनाए रखे।
॥ समापन दोहा ॥

प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान ।
तेहि के कारज सकल सुभ, सिद्ध करैं हनुमान ।।

सरल भावार्थ
जो भक्त प्रेम और विश्वास से हनुमान जी का भजन करता है और उन्हें अपने हृदय में स्मरण रखता है,

उसके शुभ कार्यों में हनुमान जी की कृपा, साहस और प्रेरणा का आश्रय माना गया है।

🌺 बजरंग बाण का मूल भाव

बजरंग बाण की भाषा में प्रबल वीर-रस, आर्त पुकार और पूर्ण शरणागति दिखाई देती है।

भक्त हनुमान जी के समुद्र-लाँघने, लंका प्रवेश, माता सीता की खोज, लंका-दहन और लक्ष्मण जी के संकट जैसे प्रसंगों का स्मरण करके उनके साहस और सेवाभाव से प्रेरणा लेता है।

इस पाठ का भाव केवल संकट से बचने की इच्छा नहीं, बल्कि कठिन समय में श्रीराम-भक्ति, विश्वास, साहस और सेवा-भाव बनाए रखना भी है।

पाठ संबंधी टिप्पणी: बजरंग बाण के अलग-अलग प्रकाशित संस्करणों में कुछ शब्दों और मंत्रात्मक पंक्तियों में पाठभेद मिलते हैं। इस पोस्ट में वही पाठ रखा गया है जो इस संस्करण के लिए उपलब्ध कराया गया है; शब्दों को अपनी ओर से बदलकर नया पाठ नहीं बनाया गया है।

भक्ति संबंधी सूचना: धार्मिक पाठ श्रद्धा और आध्यात्मिक अभ्यास का विषय हैं। इन्हें किसी बीमारी, कानूनी, आर्थिक या अन्य व्यावहारिक समस्या के निश्चित समाधान की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
🌸 भक्ति भावना 🌸
www.bhaktibhavna.space
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

श्री हनुमान आरती: आरती कीजै हनुमान लला की, अर्थ सहित | Hanuman Aarti

सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57

श्री हनुमान चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Hanuman Chalisa