धर्मरथ के चार घोड़े: बल, विवेक, दम और परहित | रामचरितमानस प्रसंग
धर्मरथ के चार घोड़े: बल, विवेक, दम और परहित
भगवान श्रीराम द्वारा विभीषण जी को बताए गए धर्मरथ की अगली अत्यंत सुंदर और जीवनोपयोगी शिक्षा।
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे।।
रामचरितमानस के लंकाकाण्ड में भगवान श्रीराम विभीषण जी को उस धर्मरथ का स्वरूप समझाते हैं जिसके द्वारा मनुष्य जीवन के कठिन से कठिन संघर्षों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
पिछले प्रसंग में भगवान ने बताया कि शौर्य और धैर्य धर्मरथ के दो पहिए हैं तथा सत्य और शील उसकी दृढ़ ध्वजा और पताका हैं।
अब भगवान इस धर्मरथ को आगे बढ़ाने वाले चार घोड़ों का वर्णन करते हैं।
किसी रथ के पहिए और ध्वजा कितने ही मजबूत क्यों न हों, यदि उसे आगे ले जाने वाले घोड़े न हों तो वह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता।
इसी प्रकार जीवन में केवल अच्छे विचार रखना पर्याप्त नहीं। उन विचारों को कर्म में बदलने वाली शक्तियाँ भी आवश्यक हैं।
शक्ति अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। उसका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत बल हो, लेकिन विवेक न हो, तो वही शक्ति अहंकार का कारण बन सकती है।
इसलिए भगवान ने केवल बल को धर्मरथ का घोड़ा नहीं बताया, उसके साथ विवेक को भी रखा।
शक्ति से पहले यह समझना आवश्यक है कि उस शक्ति का उपयोग कहाँ, कब और किस उद्देश्य से करना है।
मनुष्य के सामने जीवन में अनेक विकल्प आते हैं। कई बार कोई कार्य तुरंत अच्छा लगता है लेकिन उसका परिणाम हानिकारक हो सकता है।
वहीं कभी कोई कठिन निर्णय वर्तमान में कष्टदायक दिखाई देता है लेकिन आगे जाकर कल्याणकारी सिद्ध होता है।
ऐसी परिस्थितियों में विवेक ही मनुष्य को सही और गलत के बीच अंतर समझने की क्षमता देता है।
संसार पर विजय पाने की इच्छा से पहले मनुष्य को स्वयं के मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए।
क्रोध आया और हमने तुरंत कठोर शब्द कह दिए, इच्छा हुई और बिना परिणाम सोचे उसके पीछे चल पड़े — यह संयम का अभाव है।
दम का अर्थ अपनी इच्छाओं को समाप्त कर देना नहीं, बल्कि उन्हें धर्म और विवेक के नियंत्रण में रखना है।
जो व्यक्ति दूसरों को नियंत्रित कर सके वह शक्तिशाली दिखाई दे सकता है, लेकिन जो स्वयं को नियंत्रित कर सके, वही सच्चे अर्थों में बलवान है।
भगवान श्रीराम धर्मरथ के चार घोड़ों में परहित को भी स्थान देते हैं।
इसका अर्थ है कि हमारी शक्ति, बुद्धि और संयम का अंतिम उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं होना चाहिए।
हमारे कर्मों से परिवार, समाज और अन्य प्राणियों का कल्याण भी हो — यही परहित की भावना है।
भगवान केवल धर्मरथ के चार घोड़े बताकर रुकते नहीं हैं। वे यह भी बताते हैं कि इन शक्तिशाली घोड़ों को नियंत्रित रखने वाली लगाम कौन-सी है।
यहाँ क्षमा, कृपा और समता को उस डोरी अथवा लगाम के रूप में बताया गया है जिससे धर्मरथ के घोड़े जुड़े हुए हैं।
🙏 क्षमा — दूसरों की भूल पर प्रतिशोध की आग में जलने के बजाय उचित स्थान पर क्षमा का भाव रखना।
❤️ कृपा — दूसरों के दुःख को देखकर हृदय में दया और सहायता का भाव उत्पन्न होना।
⚖️ समता — सुख-दुःख और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने मन को संतुलित रखने का प्रयास करना।
कल्पना कीजिए कि किसी रथ में बहुत तेज दौड़ने वाले चार शक्तिशाली घोड़े लगे हों, लेकिन उन्हें नियंत्रित करने के लिए लगाम न हो।
ऐसे घोड़े रथ को लक्ष्य तक पहुँचाने के बजाय किसी गलत दिशा में भी ले जा सकते हैं।
ठीक इसी प्रकार बल, बुद्धि और आत्मसंयम जैसी शक्तियों के साथ हृदय में क्षमा, कृपा और समता होना भी आवश्यक है।
✓ कठिन समय देखकर घबराएँ नहीं, अपने मनोबल को मजबूत रखें।
✓ कोई बड़ा निर्णय लेने से पहले सही और गलत पर विचार करें।
✓ क्रोध या आवेश में तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें।
✓ अपनी क्षमता और साधनों का कुछ भाग दूसरों के हित में भी लगाएँ।
✓ गलती करने वाले व्यक्ति के प्रति जहाँ संभव हो, क्षमा और सुधार का भाव रखें।
✓ सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में मन को संतुलित रखने का अभ्यास करें।
धर्ममय जीवन केवल शक्तिशाली बनने का नाम नहीं है।
वास्तविक धर्म वह है जहाँ शक्ति के साथ विवेक, इच्छाओं के साथ संयम और सफलता के साथ परहित की भावना जुड़ी हो।
और इन सभी को नियंत्रित करने वाली लगाम क्षमा, कृपा और समता हो।
छमा कृपा समता रजु जोरे।।
बिरति चर्म संतोष कृपाना।।
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इसकी सुंदर व्याख्या अगले प्रसंग में पढ़ेंगे।
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