हरतालिका तीज व्रत कथा एवं शिव-पार्वती पूजा विधि | Hartalika Teej Vrat Katha

॥ ॐ गौरीशंकराय नमः ॥

हरतालिका तीज व्रत कथा

शिव-पार्वती पूजा • भाद्रपद शुक्ल तृतीया • माता पार्वती की तपस्या
हरतालिका तीज भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से जुड़ा प्रसिद्ध व्रत एवं पर्व है।

यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया से संबंधित है।

इस दिन माता पार्वती की भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए की गई दृढ़ तपस्या और संकल्प का स्मरण किया जाता है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र और भारत के कई अन्य क्षेत्रों में हरतालिका तीज अलग-अलग पारिवारिक विधियों से मनाई जाती है।
एक जरूरी बात:

हरतालिका तीज की पूजा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप से होती है।

कहीं मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाई जाती है, कहीं पहले से स्थापित मूर्ति या चित्र की पूजा की जाती है।

कुछ परिवार प्रातःकाल पूजा करते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में प्रदोषकाल में शिव-पार्वती पूजा भी की जाती है।

इसलिए अपनी पारिवारिक और कुल-परंपरा को प्राथमिकता दी जा सकती है।

॥ “हरतालिका” नाम का अर्थ ॥

हरत् + आलिका

प्रचलित धार्मिक व्याख्या के अनुसार “हरतालिका” शब्द को दो शब्दों से जोड़ा जाता है—

हरत् / हरण — ले जाना या दूर ले जाना

आलिका — सखी अथवा महिला मित्र

कथा में माता पार्वती की सखी उन्हें उनके पिता के घर से वन में ले जाती है ताकि पार्वती अपनी इच्छा के अनुसार भगवान शिव की आराधना जारी रख सकें।

इसी प्रसंग के कारण इस व्रत का नाम हरतालिका प्रचलित माना जाता है।

॥ हरतालिका तीज का आध्यात्मिक भाव ॥

माता पार्वती की कथा दृढ़ संकल्प, भक्ति, धैर्य और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की प्रेरणा देती है।

उनकी सखी की भूमिका सच्ची मित्रता और कठिन समय में एक-दूसरे का साथ देने का भाव भी दिखाती है।

इसलिए हरतालिका तीज का संदेश सिर्फ वैवाहिक कामना तक सीमित नहीं है।

इसमें भक्ति, आत्मसम्मान, विश्वास, मित्रता और धैर्य का भी सुंदर भाव है।

॥ हरतालिका तीज पूजा सामग्री ॥

  • भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र
  • मिट्टी या स्वच्छ रेत, यदि प्रतिमा बनाने की पारिवारिक परंपरा हो
  • भगवान गणेश का चित्र या मूर्ति
  • स्वच्छ चौकी एवं वस्त्र
  • स्वच्छ जल
  • चन्दन
  • रोली या कुमकुम
  • अक्षत
  • फूल
  • बिल्वपत्र उपलब्ध हों तो
  • धूप
  • दीपक
  • फल
  • सात्त्विक नैवेद्य
  • माता पार्वती के लिए श्रृंगार सामग्री, यदि आपकी परंपरा में हो
  • पूजा हेतु स्वच्छ आसन
हर सामग्री का उपलब्ध होना जरूरी नहीं है।

भगवान शिव और माता पार्वती की सरल पूजा जल, पुष्प, दीप, मंत्र और श्रद्धा से भी की जा सकती है।

॥ सरल हरतालिका तीज पूजा विधि ॥

1 स्वच्छता — स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को साफ रखें।
2 पूजा स्थान तैयार करें — चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर भगवान शिव, माता पार्वती और गणेशजी को स्थापित करें।
3 मिट्टी की प्रतिमा — यदि आपके परिवार में परंपरा हो, तो स्वच्छ मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाया जा सकता है।
4 गणेश पूजन — सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
श्री गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः ॥

5 संकल्प — भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण करके अपने जीवन में सत्य, धैर्य, भक्ति और सदाचार बढ़ाने का संकल्प लें।
6 शिव पूजन — जल, चन्दन, पुष्प और उपलब्ध होने पर बिल्वपत्र अर्पित करें।
शिव पंचाक्षर मंत्र

ॐ नमः शिवाय ॥

7 माता पार्वती पूजन — माता को फूल, कुमकुम, अक्षत और अपनी पारिवारिक परंपरा की पूजा-सामग्री अर्पित करें।
गौरी स्मरण

ॐ गौर्यै नमः ॥

8 धूप-दीप — सुरक्षित स्थान पर धूप और दीप अर्पित करें।
9 व्रत कथा — माता पार्वती और भगवान शिव की हरतालिका कथा श्रद्धापूर्वक पढ़ें या सुनें।
10 शिव-पार्वती प्रार्थना — जीवन में सद्बुद्धि, परस्पर सम्मान, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति माँगें।
11 आरती — भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की आरती करें।
12 प्रसाद — पूजा पूर्ण करके सात्त्विक प्रसाद श्रद्धापूर्वक अर्पित और वितरित करें।

॥ हरतालिका तीज व्रत कथा ॥

भगवान शिव और माता पार्वती की प्रचलित कथा

माता पार्वती की तपस्या और शिव प्राप्ति

धार्मिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।

बाल्यकाल से ही उनका मन भगवान शिव की ओर आकर्षित था।

उन्होंने भगवान शिव को अपने आराध्य के रूप में स्वीकार किया और उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरा आध्यात्मिक संकल्प लिया।

माता पार्वती ने दीर्घकाल तक कठिन तप और साधना की। उनकी इच्छा थी कि भगवान शिव ही उनके जीवनसाथी हों।

पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे।

एक समय देवर्षि नारद के माध्यम से भगवान विष्णु से विवाह का प्रस्ताव पर्वतराज हिमालय के सामने आया।

हिमालय ने इसे अत्यन्त सम्मानजनक प्रस्ताव समझा और अपनी सहमति व्यक्त की।

जब माता पार्वती को इस प्रस्ताव के विषय में पता चला, तो वे व्याकुल हुईं।

उनका संकल्प स्पष्ट था— वे भगवान शिव को ही अपने आराध्य और जीवनसाथी के रूप में स्वीकार कर चुकी थीं।

माता पार्वती ने अपनी एक विश्वस्त सखी को अपने मन की बात बताई।

सखी ने उनकी भावना समझी और कठिन समय में उनका साथ देने का निर्णय लिया।

कथा के अनुसार सखी माता पार्वती को घर से दूर एक घने वन में ले गई।

वहाँ एक शांत स्थान पर माता पार्वती ने भगवान शिव की पुनः आराधना आरम्भ की।

उन्होंने शिवलिंग का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाया और पूरी श्रद्धा से भगवान शिव का पूजन किया।

यह भाद्रपद शुक्ल तृतीया का दिन बताया जाता है।

माता पार्वती की अटूट श्रद्धा, दृढ़ संकल्प और तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए।

भगवान शिव ने उनकी भक्ति स्वीकार की और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी इच्छा पूर्ण होगी।

दूसरी ओर पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री को घर में न पाकर अत्यन्त चिंतित हो गए।

उन्होंने अपने लोगों के साथ माता पार्वती की खोज शुरू की।

अंततः उन्होंने पार्वती और उनकी सखी को वन में खोज लिया।

हिमालय ने पार्वती से घर लौटने को कहा।

तब माता पार्वती ने अपने पिता को अपने संकल्प के बारे में स्पष्ट रूप से बताया।

उन्होंने कहा कि वे भगवान शिव को ही अपने जीवनसाथी के रूप में स्वीकार करना चाहती हैं।

पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुत्री की इच्छा समझी और उसका सम्मान किया।

कथा के अनुसार बाद में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ।

माता पार्वती की सखी ने कठिन समय में उनका साथ दिया था। इसी प्रसंग को हरतालिका नाम की पारंपरिक व्याख्या से जोड़ा जाता है।

कथा का मुख्य संदेश:

माता पार्वती की कथा दृढ़ संकल्प और भक्ति की कथा है।

इसके साथ ही उनकी सखी की भूमिका सच्ची मित्रता, विश्वास और कठिन समय में साथ देने का संदेश देती है।

और पर्वतराज हिमालय द्वारा अंततः पुत्री की इच्छा स्वीकार करना सम्मान और संवाद की भी सुंदर शिक्षा देता है।
कथा समापन

॥ गौरी-शंकर की जय ॥
॥ हर हर महादेव ॥

॥ क्या हरतालिका केवल विवाहित महिलाओं का व्रत है? ॥

लोकपरंपरा में यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं से जुड़ा है।

विवाहित महिलाएँ दाम्पत्य मंगल की भावना से और कुछ अविवाहित वयस्क महिलाएँ माता पार्वती की भक्ति के रूप में इस पर्व में भाग लेती हैं।

लेकिन उपलब्ध व्रत-विधि परंपरा में इसे केवल एक ही वर्ग तक सीमित बताना आवश्यक नहीं है।

भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा और कथा कोई भी भक्त श्रद्धा से कर सकता है। 1

॥ प्रातःकाल या प्रदोषकाल में पूजा? ॥

प्रचलित विधि में प्रातःकालीन पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।

यदि सुबह पूजा संभव न हो, तो कुछ परंपराओं में प्रदोषकाल में शिव-पार्वती पूजा भी की जाती है। 2

पूजा का exact समय वर्ष और स्थान के अनुसार बदलता है।

इसलिए किसी विशेष वर्ष की हरतालिका तीज पर अपने शहर का स्थानीय पंचांग देखना बेहतर है।

॥ अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराएँ ॥

मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश

शिव-पार्वती पूजा, व्रत कथा, श्रृंगार सामग्री और पारिवारिक पूजा-पद्धतियाँ विशेष रूप से प्रचलित हैं।
महाराष्ट्र

हरतालिका को गौरी-शिव आराधना और गणेशोत्सव के आसपास की धार्मिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है।
राजस्थान एवं उत्तर भारत

तीज के साथ श्रृंगार, भक्ति, लोकगीत और पारिवारिक रीति-रिवाज जुड़े मिलते हैं।
दक्षिण भारत की कुछ परंपराएँ

गौरी पूजा से संबंधित क्षेत्रीय उत्सव भी इसी समय के आसपास मनाए जाते हैं, लेकिन उनकी विधि स्थानीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

॥ व्रत और भोजन के बारे में जरूरी बात ॥

कठोर निर्जल व्रत सबके लिए जरूरी नहीं

हरतालिका तीज की कुछ लोकप्रिय परंपराओं में बहुत कठोर उपवास का पालन किया जाता है।

लेकिन धार्मिक श्रद्धा का अर्थ अपने स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाना नहीं है।

पूजा, कथा, मंत्रजप, शिव-पार्वती स्मरण और सात्त्विक व्यवहार के माध्यम से भी हरतालिका की भक्ति की जा सकती है।
बच्चों और किशोरों के लिए:

लंबे समय तक भूखे या प्यासे रहना आवश्यक नहीं है।

बढ़ती उम्र में पर्याप्त पानी और नियमित पौष्टिक भोजन जरूरी है।

हरतालिका तीज पर शिव-पार्वती पूजा, कथा सुनना, “ॐ नमः शिवाय” जप, आरती और घर की पूजा में सहायता करना सुरक्षित और सुंदर तरीका है।

॥ हरतालिका के दिन क्या कर सकते हैं? ॥

  • भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन
  • श्री गणेश का स्मरण
  • ॐ नमः शिवाय का जप
  • हरतालिका तीज कथा पढ़ना या सुनना
  • माता पार्वती को पुष्प और कुमकुम अर्पित करना
  • शिवजी को जल और उपलब्ध होने पर बिल्वपत्र अर्पित करना
  • मित्रों और परिवार के प्रति सम्मान रखना
  • क्रोध और कटु वाणी से बचना
  • जरूरतमंद की सहायता करना
  • पूजा के बाद प्रसाद बाँटना

॥ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न ॥

1. हरतालिका तीज किस तिथि को होती है?
हरतालिका तीज भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष तृतीया से जुड़ी है।
2. हरतालिका किस भगवान को समर्पित है?
यह विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना से जुड़ा पर्व है।
3. हरतालिका नाम क्यों पड़ा?
प्रचलित कथा में माता पार्वती की सखी उन्हें वन में ले जाती है। इसी प्रसंग से “हरत्” और “आलिका” अर्थात ले जाना और सखी की पारंपरिक व्याख्या जोड़ी जाती है।
4. हरतालिका की मुख्य कथा क्या है?
मुख्य कथा माता पार्वती की भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए की गई तपस्या, उनकी सखी द्वारा सहायता और अंततः शिव-पार्वती विवाह से जुड़ी है।
5. क्या मिट्टी के शिव-पार्वती बनाना जरूरी है?
मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती का प्रतीकात्मक स्वरूप बनाने की परंपरा प्रसिद्ध है। लेकिन क्षेत्र और परिवार के अनुसार चित्र या स्थापित मूर्ति की पूजा भी की जाती है।
6. पूजा सुबह करनी चाहिए या शाम?
प्रचलित विधि में प्रातःकाल पूजा का महत्व है। यदि यह संभव न हो, तो कुछ परंपराओं में प्रदोषकाल में भी शिव-पार्वती पूजा की जाती है।
7. क्या हरतालिका में निर्जल उपवास जरूरी है?
कठोर उपवास एक प्रचलित वयस्क परंपरा है, लेकिन हर व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं है। बच्चों और किशोरों को भोजन या पानी रोककर व्रत नहीं करना चाहिए।
8. क्या पुरुष भी शिव-पार्वती की पूजा कर सकते हैं?
हाँ। हरतालिका की लोकपरंपरा विशेष रूप से महिलाओं से जुड़ी है, लेकिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा किसी भी भक्त द्वारा श्रद्धा से की जा सकती है।
9. क्या हरतालिका तीज से विवाह की निश्चित मनोकामना पूरी होती है?
व्रत से जुड़े वैवाहिक फल धार्मिक आस्था और परंपरा के कथन हैं। किसी विवाह या अन्य जीवन-परिणाम की निश्चित गारंटी नहीं दी जा सकती। पूजा का प्रमुख आध्यात्मिक भाव भक्ति, धैर्य, सदाचार और शिव-पार्वती स्मरण है।

हरतालिका तीज का मूल संदेश

माता पार्वती की कथा हमें केवल तपस्या की शिक्षा नहीं देती।

यह बताती है कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्टता, धैर्य और अपनी इच्छा का सम्मान भी आवश्यक है।

उनकी सखी की भूमिका बताती है कि सच्चा मित्र कठिन समय में साथ देता है।

और शिव-पार्वती का संबंध हमें सम्मान, विश्वास, सहमति और आध्यात्मिक साथ का सुंदर भाव देता है।
कथा एवं परंपरा संबंधी टिप्पणी:

इस लेख में प्रस्तुत कथा हरतालिका तीज की व्यापक रूप से प्रचलित माता पार्वती, पर्वतराज हिमालय, देवर्षि नारद, पार्वती की सखी और भगवान शिव से जुड़ी कथा का सरल हिंदी रूप है।

प्रचलित कथा में विष्णु विवाह-प्रस्ताव, पार्वती की असहमति, सखी द्वारा उन्हें वन में ले जाना, वहाँ शिव आराधना, भगवान शिव का प्रसन्न होना और बाद में हिमालय द्वारा पार्वती की इच्छा स्वीकार करने के प्रसंग आते हैं।

अलग-अलग कथा-पुस्तकों में माता पार्वती की तपस्या की अवधि, पूजा की सामग्री और संवादों के शब्दों में अंतर मिल सकता है।

हरतालिका पूजा के लिए प्रातःकाल को महत्वपूर्ण माना गया है, और सुबह संभव न होने पर कुछ परंपराओं में प्रदोषकाल भी स्वीकार किया जाता है।

व्रत से जुड़े विवाह, दाम्पत्य-सुख या अन्य फल धार्मिक श्रद्धा के कथन हैं; इन्हें निश्चित जीवन-परिणाम की गारंटी न समझें।
भक्ति भावना
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॥ गौरी-शंकर की जय • हर हर महादेव ॥

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