माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर, बिहार — भारत के प्राचीनतम जीवित मंदिरों में एक | इतिहास, वास्तुकला और रहस्य
माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर, बिहार
कैमूर की पहाड़ी पर स्थित एक असाधारण प्राचीन मंदिर — जहाँ शक्ति और शिव की उपासना, पुरातात्त्विक विरासत, प्राचीन अभिलेख और निरंतर चली आ रही पूजा-परंपरा एक ही स्थान पर मिलती है।
बिहार के कैमूर जिले में स्थित माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर भारत के उन अत्यंत प्राचीन हिंदू मंदिरों में है जहाँ आज भी नियमित पूजा-अर्चना होती है।
इसकी विशेषता केवल इसकी आयु नहीं, बल्कि इसकी अष्टकोणीय पत्थर संरचना, शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना, प्राचीन अभिलेख और सदियों से जीवित धार्मिक परंपरा है।
इसी कारण माँ मुंडेश्वरी का मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला, धर्म और इतिहास — तीनों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है।
माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर
कैमूर जिला, बिहार
मुंडेश्वरी / पंवरा पहाड़ी
शक्ति एवं शिव उपासना
अष्टकोणीय पत्थर मंदिर
ASI संरक्षित स्मारक — 1915 से
📍 माँ मुंडेश्वरी मंदिर कहाँ स्थित है?
माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर क्षेत्र में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है।
कैमूर जिला प्रशासन इसे पंवरा पहाड़ी के शिखर पर, मैदानी क्षेत्र से लगभग 600 फीट ऊँचाई पर स्थित बताता है।
पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मंदिर परिसर से आसपास के कैमूर क्षेत्र का प्राकृतिक दृश्य भी दिखाई देता है।
यह स्थान केवल धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि इतिहास, पुरातत्व और प्राचीन भारतीय वास्तुकला में रुचि रखने वालों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।
🏛️ इस मंदिर को विशेष क्या बनाता है?
अत्यंत प्राचीन पूजा-परंपरा
अष्टकोणीय पत्थर की संरचना
शक्ति और शिव — दोनों की उपासना
प्राचीन शिलालेख एवं मूर्तिकला
1915 से पुरातात्त्विक संरक्षण
⏳ मंदिर वास्तव में कितना पुराना है?
यहीं से माँ मुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास सबसे रोचक हो जाता है।
इंटरनेट पर इसे अक्सर सीधे “108 ईस्वी में बना भारत का सबसे पुराना मंदिर” लिख दिया जाता है।
लेकिन उपलब्ध सरकारी स्रोतों को साथ रखकर देखने पर इतिहास थोड़ा अधिक जटिल दिखाई देता है।
बिहार पर्यटन विभाग के कुछ आधिकारिक विवरण मंदिर को 108 ईस्वी तक प्राचीन बताते हैं।
वहीं पर्यटन विभाग के अन्य आधिकारिक विवरणों में इसे गुप्त काल — लगभग चौथी से पाँचवीं शताब्दी से जोड़ा गया है।
दूसरी ओर कैमूर जिला प्रशासन मंदिर क्षेत्र से मिले एक प्राचीन अभिलेख का उल्लेख 389 ईस्वी से जोड़ता है और यहाँ की मूर्तिकला को गुप्तकालीन बताता है।
हम मंदिर के लिए एक विवादित तारीख को अंतिम और निर्विवाद तथ्य नहीं मान रहे। सबसे सुरक्षित ऐतिहासिक निष्कर्ष यह है कि —
माँ मुंडेश्वरी देवी मंदिर भारत के अत्यंत प्राचीन और आज भी सक्रिय पूजा-स्थलों में से एक है।
इसकी सटीक प्रारंभिक तिथि को लेकर आधिकारिक विवरणों में भी अंतर दिखाई देता है।
📜 प्राचीन शिलालेख का महत्व
किसी मंदिर की प्राचीनता जानने में केवल लोककथा पर्याप्त नहीं होती।
शिलालेख, मूर्ति-शैली, निर्माण तकनीक और पुरातात्त्विक अवशेष इतिहासकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रमाण होते हैं।
कैमूर जिला प्रशासन के अनुसार मुंडेश्वरी मंदिर क्षेत्र में प्राचीन अभिलेख मिला है, जो इस स्थान की बहुत पुरानी धार्मिक गतिविधि की ओर संकेत करता है।
यही कारण है कि मंदिर को केवल धार्मिक मान्यता से नहीं, बल्कि पुरातात्त्विक महत्व की दृष्टि से भी देखा जाता है।
🇮🇳 1915 से संरक्षित पुरातात्त्विक स्मारक
बिहार पर्यटन के आधिकारिक विवरण के अनुसार माँ मुंडेश्वरी मंदिर 1915 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण — ASI के संरक्षण में है।
इसका अर्थ है कि मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की संरक्षित सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है।
ऐसे प्राचीन मंदिरों में संरक्षण का उद्देश्य पत्थर, मूर्ति, नक्काशी और मूल वास्तुकला को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना है।
🛕 अद्भुत अष्टकोणीय वास्तुकला
माँ मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे आसानी से पहचानी जाने वाली वास्तु विशेषता है — इसका अष्टकोणीय अर्थात आठ भुजाओं वाला रूप।
कैमूर जिला प्रशासन इसे पत्थर से निर्मित अष्टकोणीय मंदिर बताता है।
भारतीय मंदिरों में चौकोर गर्भगृह अधिक सामान्य रूप से दिखाई देता है, इसलिए मुंडेश्वरी का अष्टकोणीय स्वरूप इसे और विशेष बनाता है।
🏛️ प्राचीन मंदिर को देखते समय केवल उम्र न देखें
उसकी संरचना,
पत्थर की तकनीक,
देव प्रतिमाएँ,
शिलालेख,
द्वार,
मंडप,
और पूजा के बदलते स्वरूप भी पढ़ें।
तभी मंदिर एक भवन से आगे बढ़कर इतिहास की जीवित पुस्तक बनता है।
🔱 शिव और शक्ति का अद्भुत संगम
माँ मुंडेश्वरी मंदिर विशेष रूप से शक्ति और भगवान शिव दोनों की उपासना से जुड़ा है।
मंदिर के पूर्वी भाग में माँ मुंडेश्वरी की प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
मंदिर के केंद्रीय भाग में एक प्राचीन बहुमुखी शिवलिंग स्थापित है।
यही व्यवस्था इस मंदिर को शाक्त और शैव परंपराओं के मिलन का महत्वपूर्ण उदाहरण बनाती है।
🔍 शिवलिंग चारमुखी है या पंचमुखी?
इस विषय में भी सरकारी स्रोतों में एक रोचक अंतर दिखाई देता है।
बिहार पर्यटन का एक आधिकारिक विवरण इसे चतुर्मुख लिंग बताता है।
जबकि कैमूर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट इसे पंचमुखी शिवलिंग कहती है।
इसलिए Bhakti Bhavna इसे बिना आवश्यकता किसी एक संख्या पर निश्चित नहीं कर रहा, बल्कि प्राचीन बहुमुखी शिवलिंग के रूप में वर्णित कर रहा है।
दो आधिकारिक स्रोतों में यदि विवरण अलग हो, तो किसी एक को चुपचाप चुनकर दूसरे को छिपाना सही तरीका नहीं है। अंतर को पाठक के सामने रखना और उपलब्ध प्रमाण के अनुसार सावधानी से निष्कर्ष निकालना अधिक विश्वसनीय तरीका है।
🌺 माँ मुंडेश्वरी का स्वरूप
मंदिर में माँ मुंडेश्वरी की प्राचीन पाषाण प्रतिमा विशेष श्रद्धा का केंद्र है।
सरकारी पर्यटन और जिला विवरण माँ को शक्ति, दुर्गा और क्षेत्रीय देवी-परंपरा से जोड़ते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के अत्यंत पुराने पूजा स्थलों में कई बार अलग-अलग कालखंडों की धार्मिक परंपराएँ एक ही मंदिर परिसर में एक-दूसरे से जुड़ती चली जाती हैं।
मुंडेश्वरी में शक्ति और शिव की संयुक्त उपस्थिति इसी ऐतिहासिक निरंतरता का सुंदर उदाहरण है।
🙏 यहाँ पूजा कब से होती आ रही है?
माँ मुंडेश्वरी मंदिर को विशेष रूप से लगातार पूजित रहने वाले भारत के प्राचीनतम मंदिरों में गिना जाता है।
बिहार पर्यटन इसे अत्यंत पुराने “functional temple” के रूप में प्रस्तुत करता है — अर्थात ऐसा प्राचीन मंदिर जहाँ आज भी धार्मिक पूजा जारी है।
यही बात इसे किसी पुरातात्त्विक मंदिर-खंडहर से अलग बनाती है।
🕉️ क्या कभी शिव यहाँ मुख्य आराध्य रहे?
बिहार पर्यटन के ऐतिहासिक विवरण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का उल्लेख मिलता है।
उसके अनुसार एक कालखंड में शैव उपासना का प्रभाव बढ़ा और मंदिर के केंद्रीय भाग में स्थित मुखलिंग को विशेष महत्व प्राप्त हुआ।
बाद में शक्ति उपासना की परंपरा और अधिक प्रभावशाली हुई और माँ मुंडेश्वरी मंदिर की प्रमुख आराध्य देवी बनीं।
फिर भी शिवलिंग अपनी केंद्रीय स्थिति में स्थापित रहा।
यह व्यवस्था मंदिर के लंबे धार्मिक इतिहास की एक रोचक परत को दर्शाती है।
🌞 गणेश, सूर्य और विष्णु से भी संबंध
बिहार पर्यटन विभाग मंदिर परिसर में गणेश, सूर्य और विष्णु से जुड़ी प्रतिमाओं का भी उल्लेख करता है।
इससे संकेत मिलता है कि यह स्थान एक लंबे कालखंड में विभिन्न हिंदू धार्मिक धाराओं से जुड़ा रहा।
प्राचीन मंदिरों में ऐसी बहुस्तरीय धार्मिक उपस्थिति भारतीय उपासना परंपरा को समझने में विशेष महत्व रखती है।
🐐 मुंडेश्वरी की अनोखी सात्त्विक बलि परंपरा
कैमूर जिला प्रशासन मंदिर की एक असामान्य धार्मिक परंपरा का उल्लेख करता है।
यहाँ भक्त अपनी मान्यता के अनुसार बकरे को देवी के समक्ष अर्पित करते हैं, लेकिन उसका वध नहीं किया जाता।
इस कारण स्थानीय विवरणों में इसे सात्त्विक बलि की परंपरा कहा जाता है।
यह धार्मिक अभ्यास सामान्य पशुबलि से अलग प्रतीकात्मक अर्पण का रूप माना जाता है।
🪔 मंदिर की पूजा परंपरा
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में देवी और शिव दोनों से जुड़ी पूजा परंपरा देखने को मिलती है।
भक्त माँ के दर्शन, पूजा, प्रसाद और अपनी श्रद्धा के अनुसार संकल्प के लिए यहाँ आते हैं।
शिवभक्तों के लिए मंदिर के मध्य स्थित प्राचीन शिवलिंग भी विशेष आस्था का केंद्र है।
इस प्रकार एक ही प्राचीन मंदिर में शक्ति और शिव भक्ति साथ दिखाई देती है।
🌺 नवरात्र में माँ मुंडेश्वरी
शक्ति उपासना का केंद्र होने के कारण नवरात्र में मंदिर का धार्मिक महत्व विशेष रूप से बढ़ जाता है।
इस समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए पहाड़ी पर पहुँचते हैं।
नवरात्र साधक के लिए देवी के विविध स्वरूपों, शक्ति, संयम और आत्मशुद्धि पर चिंतन का समय भी है।
🔱 महाशिवरात्रि का महत्व
मंदिर में प्राचीन शिवलिंग होने के कारण महाशिवरात्रि का पर्व भी विशेष महत्व रखता है।
इस अवसर पर शिवभक्त पूजा और दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं।
इसी प्रकार रामनवमी जैसे धार्मिक अवसरों पर भी मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष उपस्थिति का उल्लेख सरकारी पर्यटन विवरणों में मिलता है।
🏛️ प्राचीन मंदिर और आधुनिक पुनर्संरक्षण
किसी प्राचीन मंदिर को देखते समय यह समझना जरूरी है कि आज हमें दिखाई देने वाली संरचना के हर पत्थर का एक ही समय का होना आवश्यक नहीं।
सदियों के दौरान मंदिरों में क्षति, मरम्मत, संरक्षण और कभी-कभी पुनर्स्थापन होता रहता है।
इसलिए पूजा-स्थल की प्राचीनता और आज दिखाई देने वाली पूरी संरचना की तारीख दो अलग प्रश्न हो सकते हैं।
भारत के प्राचीन मंदिरों की इस पूरी श्रृंखला में हम यह अंतर हर जगह स्पष्ट रखेंगे।
🧱 मंदिर की प्रमुख वास्तु विशेषताएँ
- अष्टकोणीय योजना: मंदिर आठ भुजाओं वाली पत्थर संरचना में निर्मित है।
- पत्थर निर्माण: मुख्य मंदिर पत्थर से निर्मित प्राचीन संरचना है।
- बहुमुखी शिवलिंग: मंदिर के केंद्रीय भाग में प्राचीन मुखलिंग स्थापित है।
- देवी का स्थान: माँ मुंडेश्वरी की प्रतिमा मंदिर के एक प्रमुख भाग में प्रतिष्ठित है।
- द्वार व्यवस्था: जिला प्रशासन मंदिर में कई प्रवेश द्वारों का उल्लेख करता है।
- नंदी प्रतिमा: मुख्य मंदिर से जुड़ी प्राचीन नंदी प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है।
📚 इतिहास और धार्मिक मान्यता में क्या अंतर है?
| इतिहास / पुरातत्व | धार्मिक परंपरा / आस्था |
|---|---|
| शिलालेख, मूर्ति शैली, निर्माण तकनीक और पुरातात्त्विक अध्ययन से मंदिर की प्राचीनता समझी जाती है। | माँ के चमत्कार, मनोकामना और स्थानीय देवी-कथाएँ श्रद्धालुओं की धार्मिक परंपरा का भाग हैं। |
| मंदिर का अष्टकोणीय स्वरूप प्रत्यक्ष वास्तु प्रमाण है। | देवी की कृपा से जुड़े अनुभव व्यक्तिगत आस्था का विषय होते हैं। |
| मंदिर ASI संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज है। | माँ को शक्ति और संरक्षण देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। |
| अलग सरकारी स्रोत मंदिर की तिथि को अलग-अलग काल से जोड़ते हैं। | भक्तों के लिए मंदिर की पवित्रता सटीक पुरातात्त्विक तारीख पर निर्भर नहीं करती। |
🌿 कैमूर की पहाड़ियों और मंदिर का संबंध
कैमूर क्षेत्र भारत के अत्यंत पुराने भू-प्रदेशों में से एक है और यहाँ अनेक प्राचीन अवशेष, गुफाएँ, जलप्रपात और ऐतिहासिक स्थल मिलते हैं।
मुंडेश्वरी मंदिर का पहाड़ी पर स्थित होना इसके धार्मिक अनुभव को प्राकृतिक वातावरण से भी जोड़ता है।
पुराने समय में पहाड़, वन और नदी किनारे साधना एवं तीर्थ के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं।
🙏 प्राचीन मंदिर हमारे लिए महत्वपूर्ण क्यों हैं?
प्राचीन मंदिर केवल पूजा करने के स्थान नहीं हैं।
उनके भीतर कई पीढ़ियों की कला, अर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, शिल्पकला, भाषा और राजनीतिक इतिहास की जानकारी छिपी होती है।
एक मंदिर को ध्यान से पढ़ना कभी-कभी सैकड़ों वर्षों के भारतीय इतिहास को एक ही स्थान पर समझने जैसा होता है।
🛡️ प्राचीन मंदिरों का संरक्षण क्यों जरूरी है?
एक बार मूल प्राचीन नक्काशी, शिलालेख या स्थापत्य नष्ट हो जाए, तो उसे पूरी तरह वापस लाना संभव नहीं होता।
इसलिए ऐसे मंदिरों में श्रद्धालुओं की भी जिम्मेदारी है कि दीवारों पर नाम न लिखें, प्राचीन पत्थरों को नुकसान न पहुँचाएँ और निर्धारित संरक्षण नियमों का पालन करें।
मंदिर की रक्षा केवल सरकार या पुरातत्व विभाग का काम नहीं, हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।
🚶 माँ मुंडेश्वरी मंदिर कैसे पहुँचें?
📍 यात्रा की सामान्य जानकारी
जिला: कैमूर, बिहार
निकट प्रमुख रेलवे स्टेशन: भभुआ रोड / मोहनिया क्षेत्र
निकट प्रमुख हवाई संपर्क: वाराणसी की ओर से पहुँचना सुविधाजनक विकल्पों में शामिल है।
भभुआ से: स्थानीय टैक्सी और ऑटो जैसे साधनों से मंदिर क्षेत्र तक पहुँचा जा सकता है।
मंदिर पहाड़ी पर स्थित है, इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय समय और स्थानीय मौसम का ध्यान रखें।
🕰️ दर्शन का समय
बिहार पर्यटन की वर्तमान ऑनलाइन जानकारी में माँ मुंडेश्वरी मंदिर के लिए सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक का समय सूचीबद्ध है।
लेकिन धार्मिक पर्व, नवरात्र या प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार समय में परिवर्तन संभव है।
इसलिए दूर से यात्रा करने से पहले वर्तमान आधिकारिक जानकारी एक बार जाँच लेना उचित है।
🌦️ घूमने का अच्छा समय
बिहार पर्यटन सितंबर से अप्रैल तक के समय को यात्रा के लिए अनुकूल अवधि के रूप में सूचीबद्ध करता है।
गर्मियों में बिहार और कैमूर क्षेत्र में तापमान अधिक हो सकता है, जबकि बरसात के समय पहाड़ी क्षेत्रों में फिसलन और यात्रा संबंधी परिस्थितियाँ बदल सकती हैं।
🙏 दर्शन करते समय क्या ध्यान रखें?
- मंदिर की प्राचीन संरचना को छूकर या खरोंचकर नुकसान न पहुँचाएँ।
- शिलालेख और पुरानी मूर्तियों पर कुछ न लिखें।
- पूजा के दौरान स्थानीय मंदिर व्यवस्था का सम्मान करें।
- पहाड़ी और मंदिर परिसर में कचरा न फैलाएँ।
- धार्मिक मान्यता और ऐतिहासिक तथ्य को एक-दूसरे के स्थान पर न रखें।
- फोटोग्राफी से पहले वर्तमान मंदिर नियमों की जानकारी लें।
📜 19वीं शताब्दी से आधुनिक अध्ययन तक
कैमूर जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण में ब्रिटिश काल के आर. एन. मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और बाद के पुरातात्त्विक अध्येताओं द्वारा इस मंदिर क्षेत्र के निरीक्षण का उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट होता है कि मुंडेश्वरी मंदिर आधुनिक भारतीय पुरातत्व के प्रारंभिक अध्ययनकाल से ही विद्वानों की रुचि का विषय रहा है।
🌺 आस्था की दृष्टि से माँ मुंडेश्वरी
श्रद्धालुओं के लिए माँ मुंडेश्वरी शक्ति, रक्षा और मातृभाव की आराध्य देवी हैं।
भक्त अपने जीवन के सुख-दुख, संकल्प और प्रार्थनाएँ लेकर माँ के दरबार में पहुँचते हैं।
इतिहासकार के लिए यहाँ पत्थर और अभिलेख महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन भक्त के लिए वही मंदिर भगवान से संबंध का स्थान बन जाता है।
भारत के प्राचीन मंदिरों की विशेषता यही है — इतिहास और आस्था एक ही स्थान पर अलग-अलग अर्थों में जीवित रहते हैं।
🔱 शिव-शक्ति का आध्यात्मिक भाव
सनातन परंपरा में शिव और शक्ति को एक-दूसरे से अलग नहीं देखा जाता।
शिव चेतना का प्रतीक माने जाते हैं, जबकि शक्ति उस चेतना की सक्रिय सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करती हैं।
माँ मुंडेश्वरी मंदिर में देवी और शिवलिंग की साथ-साथ उपस्थिति भक्तों के लिए इसी शिव-शक्ति भाव को जीवंत बनाती है।
इतिहास को श्रद्धा से देखिए — लेकिन प्रमाण को भी महत्व दीजिए।
मंदिर में भगवान के दर्शन कीजिए — लेकिन उस प्राचीन धरोहर की रक्षा भी कीजिए।
पुरानी मान्यताओं का सम्मान कीजिए — लेकिन इतिहास और परंपरा में अंतर भी समझिए।
और जब हजारों वर्ष पुरानी परंपरा के सामने खड़े हों, तो एक क्षण यह भी सोचिए — हमसे पहले कितनी पीढ़ियाँ इसी स्थान पर अपने आराध्य के सामने हाथ जोड़ चुकी होंगी।
माँ मुंडेश्वरी का मंदिर केवल बिहार की धार्मिक धरोहर नहीं, भारत की जीवित मंदिर परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण द्वार है।
🌺 जय माँ मुंडेश्वरी
🔱 हर हर महादेव
इस लेख में मंदिर की प्राचीनता, स्थान, वास्तुकला, अभिलेख, ASI संरक्षण और यात्रा संबंधी विवरण के लिए मुख्य रूप से बिहार पर्यटन विभाग, कैमूर जिला प्रशासन, बिहार सरकार और बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम के प्रकाशित विवरणों को आधार बनाया गया है।
जहाँ अलग-अलग सरकारी स्रोतों में तारीख या प्रतिमा-विवरण अलग मिला, वहाँ उस अंतर को लेख में स्पष्ट रूप से बताया गया है।
🚩 Bhakti Bhavna — आस्था के साथ प्रामाणिक इतिहास
भारत के प्राचीन मंदिरों की इस श्रृंखला में हम केवल मंदिर की धार्मिक कथा नहीं, बल्कि उसकी वास्तुकला, शिलालेख, पुरातात्त्विक प्रमाण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी समझेंगे।
जहाँ इतिहास प्रमाणित है, वहाँ उसे इतिहास के रूप में बताएँगे। जहाँ धार्मिक मान्यता है, वहाँ उसे श्रद्धापूर्वक मान्यता के रूप में ही प्रस्तुत करेंगे।
इससे न तो आस्था कम होती है और न इतिहास कमजोर पड़ता है — बल्कि हमारी सनातन विरासत की समझ और गहरी होती है।
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