श्री सरस्वती चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Saraswati Chalisa

📚 श्री सरस्वती चालीसा

माँ सरस्वती को भारतीय धार्मिक परंपरा में ज्ञान, विद्या, वाणी, संगीत और कला की देवी माना जाता है। श्री सरस्वती चालीसा में माता के दिव्य स्वरूप, कृपा और भक्त की प्रार्थना का वर्णन मिलता है। नीचे संपूर्ण प्रचलित पाठ सरल हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
जनक जननि पद कमल रज, निज मस्तक पर धारि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
रामसागर के पाप को, मातु तुही अब हन्तु॥

अर्थ: माता-पिता के चरणों की धूल को मस्तक पर धारण कर कवि माँ सरस्वती को प्रणाम करते हैं और उनसे बुद्धि, ज्ञान तथा अपने दोषों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

जय जय जय वीणाकर धारी।
करती सदा सुहंस सवारी॥

अर्थ: समस्त बुद्धि और ज्ञान की अधिष्ठात्री, वीणा धारण करने वाली तथा हंस पर विराजमान माँ सरस्वती की जय हो।

रूप चतुर्भुज धारी माता।
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

जग में पाप बुद्धि जब होती।
तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

अर्थ: चार भुजाओं वाली माता पूरे संसार में पूजित हैं। जब मनुष्य की बुद्धि अधर्म की ओर जाती है, तब धर्म का प्रकाश क्षीण पड़ने लगता है।

तबहि मातु ले निज अवतारा।
पाप हीन करती महि तारा॥

बाल्मीकि जी थे बहम ज्ञानी।
तव प्रसाद जानै संसारा॥

अर्थ: माता ज्ञान और सद्बुद्धि द्वारा संसार में धर्म का प्रकाश करती हैं। वाल्मीकि जी की महान विद्वत्ता और काव्य प्रतिभा का स्मरण भी माता की कृपा से किया गया है।

रामायण जो रचे बनाई।
आदि कवि की पदवी पाई॥

कालिदास जो भये विख्याता।
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

अर्थ: महर्षि वाल्मीकि को आदि कवि और कालिदास को महान साहित्यकार के रूप में स्मरण करते हुए इसका श्रेय माता की ज्ञान-कृपा को दिया गया है।

तुलसी सूर आदि विद्वाना।
भये और जो ज्ञानी नाना॥

तिन्हहिं न और रहेउ अवलम्बा।
केवल कृपा आपकी अम्बा॥

अर्थ: तुलसीदास, सूरदास और अनेक विद्वानों की प्रतिभा में भी माता सरस्वती की कृपा का भाव व्यक्त किया गया है।

करहु कृपा सोइ मातु भवानी।
दुखित दीन निज दासहि जानी॥

पुत्र करै अपराध बहूता।
तेहि न धरइ चित सुन्दर माता॥

अर्थ: भक्त माता से विनती करता है कि उसे अपना पुत्र और सेवक मानकर उसकी भूलों को क्षमा करें और उस पर कृपा करें।

राखु लाज जननी अब मेरी।
विनय करूं बहु भांति घनेरी॥

मैं अनाथ तेरी अवलम्बा।
कृपा करउ जय जय जगदम्बा॥

अर्थ: भक्त माता को अपना एकमात्र आश्रय मानकर उनसे रक्षा और करुणा की प्रार्थना करता है।

मधु कैटभ जो अति बलवाना।
बाहुयुद्ध विष्णु ते ठाना॥

समर हजार पांच में घोरा।
फिर भी मुख उनसे नहिं मोरा॥

अर्थ: मधु और कैटभ के साथ भगवान विष्णु के युद्ध के प्रसंग का वर्णन करते हुए देवी शक्ति की महिमा का स्मरण किया गया है।

मातु सहाय भई तेहि काला।
बुद्धि विपरीत करी खलहाला॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

अर्थ: देवी की शक्ति से दुष्टों की बुद्धि भ्रमित हुई और उनका अंत हुआ। भक्त इसी प्रकार माता से अपनी शुभ प्रार्थना स्वीकार करने का निवेदन करता है।

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।
क्षण महुं संहारेउ तेहि माता॥

रक्तबीज से समरथ पापी।
सुर-मुनि हृदय धरा सब कांपी॥

अर्थ: चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे दैत्यों के संहार द्वारा देवी की अधर्म-विनाशिनी शक्ति का वर्णन किया गया है।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा।
बार बार बिनवउं जगदम्बा॥

जग प्रसिद्ध जो शुंभ निशुंभा।
छिन में बधे ताहि तू अम्बा॥

अर्थ: शुंभ और निशुंभ सहित दुष्ट शक्तियों के अंत का स्मरण कर भक्त जगदम्बा की शक्ति को प्रणाम करता है।

भरत-मातु बुधि फेरेउ जाई।
रामचंद्र बनवास कराई॥

एहि विधि रावन वध तुम कीन्हा।
सुर नर मुनि सब कहुं सुख दीन्हा॥

अर्थ: रामकथा के घटनाक्रम को देवी की व्यापक लीला से जोड़ते हुए अंततः रावण-वध और धर्म की विजय का वर्णन किया गया है।

को समरथ तव यश गुन गाना।
निगम अनादि अनंत बखाना॥

विष्णु रुद्र अज सकहिं न मारी।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

अर्थ: माता की अनंत महिमा का पूरा वर्णन करना कठिन है। वेद और देवता भी उनकी शक्ति का गुणगान करते हैं।

रक्त दन्तिका और शताक्षी।
नाम अपार है दानव भक्षी॥

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

अर्थ: देवी के विभिन्न शक्तिरूपों का स्मरण करते हुए उनके द्वारा कठिन कार्यों और अधर्म के नाश का वर्णन किया गया है।

दुर्ग आदि हरनी तू माता।
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

नृप कोपित जो मारन चाहै।
कानन में घेरे मृग नाहै॥

अर्थ: भक्त जीवन की कठिन परिस्थितियों और भय के समय माता से रक्षा और साहस की प्रार्थना करता है।

सागर मध्य पोत के भंगे।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में।
हो दरिद्र अथवा संकट में॥

अर्थ: किसी भी प्रकार के भय, संकट, अकेलेपन या कठिनाई में भक्त माता को अपना आश्रय मानता है।

नाम जपे मंगल सब होई।
संशय इसमें करइ न कोई॥

पुत्रहीन जो आतुर भाई।
सबै छांड़ि पूजें एहि माई॥

अर्थ: माता के नाम-स्मरण को मंगलकारी बताया गया है और भक्त अपनी पारिवारिक तथा व्यक्तिगत कामनाएँ उनकी शरण में रखता है।

करै पाठ नित यह चालीसा।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा॥

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।
संकट रहित अवश्य हो जावै॥

अर्थ: इस फलश्रुति में श्रद्धापूर्वक चालीसा पाठ, पूजा और नैवेद्य अर्पण के साथ परिवार के मंगल और जीवन में शांति की कामना की गई है।

भक्ति मातु की करै हमेशा।
निकट न आवै ताहि कलेशा॥

बंदी पाठ करें शत बारा।
बंदी पाश दूर हो सारा॥

अर्थ: माता की निरंतर भक्ति मन को आशा, साहस और आध्यात्मिक बल देती है। यहाँ बंधनों से मुक्ति की धार्मिक प्रार्थना व्यक्त की गई है।

करहु कृपा भवमुक्ति भवानी।
मो कहं दास सदा निज जानी॥

अर्थ: अंत में भक्त माता से निवेदन करता है कि उसे अपना सेवक मानकर कृपा करें और संसार के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रदान करें।

॥ समापन दोहा ॥
माता सूरज कान्ति तव, अंधकार मम रूप।
डूबन ते रक्षा करहु, परूं न मैं भव-कूप॥

बल बुद्धि विद्या देहुं मोहि, सुनहु सरस्वति मातु।
अधम रामसागरहिं तुम, आश्रय देउ पुनातु॥

अर्थ: हे माता! आपका प्रकाश सूर्य के समान है। मेरे अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान कीजिए तथा अपने आश्रय में रखिए।

🌼 भक्ति भावना

श्री सरस्वती चालीसा का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता से करें। माँ सरस्वती की उपासना ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ विनम्रता, सद्बुद्धि, शुद्ध वाणी और सीखने की भावना को भी महत्व देती है।

जय माँ सरस्वती 📚
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

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