सुंदरकांड भाग 10: अशोक वाटिका, अच्छकुमार वध और मेघनाद से युद्ध | दोहा 18–20
लेकिन उनका उद्देश्य केवल भूख मिटाना नहीं था। लंका में श्रीरामदूत की उपस्थिति का प्रभाव अब प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगता है।
वन के रक्षकों से संघर्ष होता है, रावण अनेक योद्धाओं को भेजता है, फिर उसका पुत्र अच्छकुमार आता है और उसके बाद अत्यंत बलवान मेघनाद स्वयं युद्ध के लिए पहुँचता है।
॥ अशोक वाटिका में श्रीहनुमान जी ॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
वहाँ अनेक बलवान राक्षस वाटिका की रक्षा कर रहे थे। हनुमान जी ने कुछ को परास्त किया और कुछ भागकर रावण के पास समाचार देने गए।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
उसने फल खाए, वृक्ष उखाड़े और वाटिका के अनेक रक्षकों को परास्त कर भूमि पर गिरा दिया।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
उन्हें आते देखकर हनुमान जी ने गर्जना की। उन्होंने राक्षस योद्धाओं को परास्त कर दिया, जबकि कुछ घायल अवस्था में लौटकर रावण को समाचार देने पहुँचे।
॥ अच्छकुमार का आगमन ॥
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
उसे आते देखकर हनुमान जी ने एक वृक्ष उठा लिया। युद्ध में अच्छकुमार को परास्त करने के बाद हनुमान जी ने प्रचंड गर्जना की।
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
जो कुछ बचकर लौटे उन्होंने रावण से कहा— हे स्वामी! उस वानर का बल अत्यंत विशाल है।
॥ मेघनाद से युद्ध ॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
रावण ने उससे कहा— इसे मारना मत; इसे बाँधकर मेरे सामने लाओ, ताकि देखा जाए कि यह वानर कहाँ से आया है।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
हनुमान जी ने उस प्रचंड योद्धा को आते देखा। वे गर्जना करते हुए उसके सामने आगे बढ़े।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
उसके साथ आए शक्तिशाली योद्धाओं को भी हनुमान जी ने अपने पराक्रम से परास्त किया।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
दोनों ऐसे युद्ध करने लगे मानो दो शक्तिशाली गजराज आमने-सामने हों। हनुमान जी के प्रहार से मेघनाद कुछ समय के लिए चेतना खो बैठा।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
लेकिन वह समझ गया कि पवनपुत्र हनुमान जी को साधारण युद्ध के द्वारा जीतना संभव नहीं है।
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
हनुमान जी ने मन में विचार किया कि यदि वे ब्रह्मास्त्र का सम्मान न करें, तो उसकी महान मर्यादा का अनादर होगा।
॥ हनुमान जी रावण की सभा में ॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
हनुमान जी को अचेत-सा देखकर मेघनाद ने उन्हें नागपाश से बाँधा और रावण की सभा की ओर ले चला।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
उनके दूत हनुमान जी वास्तव में बंधन में कैसे आ सकते हैं? उन्होंने तो श्रीराम के कार्य की सिद्धि के लिए स्वयं को बँधने दिया।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
हनुमान जी ने रावण की विशाल और वैभवशाली सभा को देखा, जिसकी प्रभुता और सजावट का वर्णन करना कठिन था।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
इतना प्रभाव देखने पर भी हनुमान जी के मन में तनिक भय नहीं हुआ। वे वहाँ वैसे ही निर्भय थे जैसे सर्पों के समूह के बीच गरुड़।
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
लेकिन उसी क्षण अपने पुत्र के वध का स्मरण आते ही उसके हृदय में दुःख और क्रोध का भाव उत्पन्न हो गया।
🌺 इस प्रसंग का भाव
यह प्रसंग हनुमान जी के पराक्रम के साथ उनकी बुद्धि और मर्यादा का भी अद्भुत उदाहरण है।
अशोक वाटिका में वे अपनी शक्ति का परिचय देते हैं,
अच्छकुमार और अनेक योद्धाओं को परास्त करते हैं तथा मेघनाद जैसे शक्तिशाली योद्धा का सामना करते हैं।
लेकिन ब्रह्मास्त्र के सामने उनका निर्णय सबसे महत्वपूर्ण है।
वे असमर्थ होकर नहीं, बल्कि उसकी मर्यादा का सम्मान करते हुए स्वयं को रोकते हैं।
और रावण की विशाल सभा में पहुँचने के बाद भी उनके मन में भय नहीं आता।
सच्चा सामर्थ्य वही है जिसमें शक्ति के साथ विवेक, मर्यादा और प्रभु-कार्य का स्पष्ट उद्देश्य हो।
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