सुंदरकांड भाग 15: हनुमान जी का भक्ति वरदान, श्रीराम का प्रस्थान और मंदोदरी की नीति | दोहा 34–37

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 15 • भक्ति वरदान, श्रीराम का प्रस्थान एवं मंदोदरी की नीति
श्रीराम द्वारा अपनी सेवा की प्रशंसा किए जाने पर भी श्रीहनुमान जी के हृदय में तनिक अभिमान नहीं आता।

वे प्रभु से संसार का कोई पद, वैभव अथवा सामर्थ्य नहीं माँगते— वे केवल श्रीराम की अखंड और कभी न छूटने वाली भक्ति माँगते हैं।

इसके बाद श्रीराम वानर-भालुओं की विशाल सेना सहित लंका की ओर प्रस्थान करते हैं और समुद्र तट पर पहुँचते हैं।

उधर लंका में भय का वातावरण है। मंदोदरी रावण को श्रीराम से वैर छोड़कर माता सीता को वापस करने की नीति समझाती है, परंतु रावण का अभिमान उसकी बुद्धि पर भारी पड़ता है।

॥ हनुमान जी का अखंड भक्ति का वरदान ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 34 से दोहा 37 तक
चौपाई

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी श्रीराम से कहते हैं— हे नाथ! मुझे अपनी ऐसी भक्ति प्रदान कीजिए जो परम सुख देने वाली हो और कभी नष्ट न हो।

हनुमान जी की अत्यंत सरल और निष्कपट वाणी सुनकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें “एवमस्तु” अर्थात ऐसा ही हो—का वरदान दिया।
चौपाई

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— जिसने श्रीराम के स्वभाव और उनकी करुणा को समझ लिया, उसके हृदय में प्रभु के भजन के अतिरिक्त दूसरा भाव नहीं रहता।

जो इस श्रीराम-हनुमान संवाद को हृदय में धारण करता है, उसके भीतर श्रीरघुनाथ के चरणों की भक्ति जागती है।
चौपाई

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

सरल भावार्थ
प्रभु के वचन सुनकर सभी वानर करुणामय और सुख के धाम श्रीराम की जय-जयकार करने लगे।

तब श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को बुलाकर कहा— अब चलने की तैयारी की जाए।
चौपाई

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— अब विलंब करने का कोई कारण नहीं है; वानरों को तुरंत प्रस्थान की आज्ञा दी जाए।

यह मंगलमय दृश्य देखकर देवताओं ने पुष्पवर्षा की और प्रसन्न होकर अपने लोकों की ओर लौटे।
॥ दोहा 34 ॥

कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

दोहा का सरल भावार्थ
वानरराज सुग्रीव ने शीघ्र ही सभी दलपतियों को बुलाया।

अनेक रंग और रूप वाले, अतुलनीय बलशाली वानर और भालुओं के विशाल समूह वहाँ एकत्र हो गए।

॥ श्रीराम की विशाल सेना का प्रस्थान ॥

चौपाई

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।

सरल भावार्थ
महाबली वानर और भालू श्रीराम के चरण-कमलों में सिर झुकाकर प्रचंड उत्साह से गर्जना करने लगे।

श्रीराम ने अपनी पूरी वानर-सेना को कमल समान नेत्रों से कृपापूर्वक देखा।
चौपाई

राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।

सरल भावार्थ
श्रीराम की कृपा का बल पाकर वानरवीर मानो पंख लगे विशाल पर्वतों के समान शक्तिशाली दिखाई देने लगे।

तब श्रीराम ने प्रसन्न होकर प्रस्थान किया और अनेक सुंदर शुभ शकुन दिखाई देने लगे।
चौपाई

जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

सरल भावार्थ
जिन श्रीराम की कीर्ति स्वयं समस्त मंगलों का मूल है, उनके प्रस्थान के समय शुभ संकेत होना स्वाभाविक ही है।

लंका में माता जानकी को भी मानो अपने शरीर के शुभ संकेतों से प्रभु के प्रस्थान का आभास होने लगा।
चौपाई

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।

सरल भावार्थ
जो संकेत माता जानकी के लिए शुभ थे, वही रावण के लिए अशुभ सिद्ध हो रहे थे।

वानर और भालुओं की इतनी विशाल सेना चली कि उसका पूर्ण वर्णन करना कठिन था।
चौपाई

नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

सरल भावार्थ
वानर और भालू अपने नखों को आयुध बनाकर, पर्वत और वृक्ष उठाए हुए आगे बढ़ रहे थे।

उनकी सिंह जैसी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं और मानो दिशाओं को धारण करने वाले दिग्गज भी डगमगाने लगे।
॥ छंद ॥

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।

छंद का सरल भावार्थ
वानर-सेना के प्रचंड प्रस्थान से पृथ्वी और पर्वतों में कंपन-सा होने लगा और समुद्र भी आंदोलित प्रतीत हुआ।

देवता, गंधर्व, मुनि, नाग और किन्नर आनंदित हुए। करोड़ों वीर वानर आगे बढ़ते हुए प्रतापी कोसलनाथ श्रीराम की जय और गुणगान कर रहे थे।
॥ छंद ॥

सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

छंद का सरल भावार्थ
सेना का विस्तार और प्रभु के प्रस्थान का प्रभाव इतना विशाल बताया गया है कि शेषनाग के लिए भी उसका भार असाधारण प्रतीत होता है।

गोस्वामी तुलसीदास जी इस दिव्य प्रस्थान को अत्यंत पवित्र और अद्भुत रूप में चित्रित करते हैं।
॥ दोहा 35 ॥

एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

दोहा का सरल भावार्थ
इस प्रकार कृपा के सागर श्रीराम अपनी विशाल सेना सहित समुद्र के तट पर पहुँचे।

वहाँ अनेक वानर और भालू विश्राम करते हुए आसपास उपलब्ध फल खाने लगे।

॥ लंका में भय और मंदोदरी की नीति ॥

चौपाई

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।

सरल भावार्थ
उधर हनुमान जी द्वारा लंका जलाए जाने के बाद से राक्षसों के मन में भय और आशंका बनी हुई थी।

वे अपने-अपने घरों में विचार करते थे कि अब राक्षस कुल का बचना अत्यंत कठिन दिखाई देता है।
चौपाई

जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

सरल भावार्थ
लंका के लोग सोचने लगे— जिसके केवल दूत हनुमान जी का बल ही वर्णन से परे है, उस स्वामी के स्वयं आने पर लंका का क्या होगा?

नगरवासियों की ऐसी बातें दूतों से सुनकर मंदोदरी अत्यंत चिंतित हो गई।
चौपाई

रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।

सरल भावार्थ
मंदोदरी ने एकांत में हाथ जोड़कर अपने पति रावण के चरणों में प्रणाम किया और नीति से भरे हुए हितकारी वचन कहे।

उसने रावण से भगवान श्रीराम के साथ वैर छोड़ने और अपने हित की बात स्वीकार करने का आग्रह किया।
चौपाई

समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।

सरल भावार्थ
मंदोदरी कहती हैं— जिसके दूत हनुमान जी के पराक्रम को स्मरण करके ही लंका के राक्षस भयभीत हो रहे हैं,

यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास भेज दीजिए।
चौपाई

तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

सरल भावार्थ
मंदोदरी चेतावनी देती हैं कि माता सीता का हरण राक्षस कुल के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।

वह कहती हैं— हे नाथ! माता सीता को लौटाए बिना आपका कल्याण कठिन है।
॥ दोहा 36 ॥

राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

दोहा का सरल भावार्थ
मंदोदरी कहती हैं— श्रीराम के बाण सर्पों के समूह के समान हैं और राक्षस मानो मेंढकों के समान हैं।

जब तक वे बाण राक्षसों का विनाश नहीं कर देते, उससे पहले ही अपना हठ त्यागकर उचित उपाय कर लीजिए।

॥ रावण का अभिमान ॥

चौपाई

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।

सरल भावार्थ
रावण ने मंदोदरी की बात सुनी, लेकिन अपने प्रसिद्ध अभिमान के कारण वह हँस पड़ा।

उसने उसकी उचित चेतावनी को गंभीरता से लेने के बजाय उसे स्त्री का भय मानकर उपेक्षित कर दिया।
चौपाई

जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।

सरल भावार्थ
रावण अहंकारपूर्वक कहता है कि यदि वानरों की सेना आएगी तो राक्षस उसे अपना आहार बना लेंगे।

वह अपनी शक्ति का घमंड करते हुए मंदोदरी के भय का उपहास करता है।
चौपाई

अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

सरल भावार्थ
ऐसा कहकर रावण हँसा और मंदोदरी को हृदय से लगाकर अपनी सभा की ओर चला गया।

लेकिन मंदोदरी के हृदय में चिंता बनी रही। उसे प्रतीत हुआ कि उसके पति के लिए समय विपरीत हो चुका है।
चौपाई

बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।

सरल भावार्थ
सभा में बैठने पर रावण को समाचार मिला कि श्रीराम की विशाल सेना समुद्र के उस पार पहुँच चुकी है।

उसने अपने मंत्रियों से उचित सलाह माँगी, लेकिन वे वास्तविक स्थिति समझाने के बजाय हँसकर उसे निश्चिंत रहने की बात कहने लगे।
चौपाई

जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।

सरल भावार्थ
मंत्रियों ने रावण से कहा— आपने देवताओं और असुरों तक को बिना कठिनाई परास्त किया है।

फिर मनुष्य और वानर आपके सामने क्या महत्व रखते हैं?
॥ दोहा 37 ॥

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

दोहा का सरल भावार्थ
गोस्वामी तुलसीदास जी अत्यंत महत्वपूर्ण नीति बताते हैं— मंत्री, वैद्य और गुरु— यदि भय या किसी स्वार्थ के कारण केवल मन को अच्छी लगने वाली बात कहें और सत्य न बताएँ,

तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म— इन तीनों का शीघ्र नाश हो जाता है।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस भाग में दो बिल्कुल विपरीत भाव दिखाई देते हैं— हनुमान जी की विनम्रता और रावण का अभिमान।

हनुमान जी महान सेवा करने के बाद भी प्रभु से केवल भक्ति माँगते हैं। दूसरी ओर रावण के सामने मंदोदरी सत्य और हित की बात रखती है, फिर भी वह अहंकार के कारण उसे स्वीकार नहीं करता।

दोहा 37 हमें जीवन की बहुत गहरी नीति देता है— जो व्यक्ति केवल प्रसन्न करने वाली बात सुने और सत्य बोलने वाले की उपेक्षा करे, वह सही निर्णय लेने की क्षमता खो देता है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 34, 35, 36 और 37 के अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ, दोनों छंद और सभी दोहे क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत किए गए हैं।
अगला प्रसंग — रावण की सभा में विभीषण का नीति-उपदेश और श्रीराम की शरण लेने की सलाह
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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