सुंदरकांड भाग 15: हनुमान जी का भक्ति वरदान, श्रीराम का प्रस्थान और मंदोदरी की नीति | दोहा 34–37
वे प्रभु से संसार का कोई पद, वैभव अथवा सामर्थ्य नहीं माँगते— वे केवल श्रीराम की अखंड और कभी न छूटने वाली भक्ति माँगते हैं।
इसके बाद श्रीराम वानर-भालुओं की विशाल सेना सहित लंका की ओर प्रस्थान करते हैं और समुद्र तट पर पहुँचते हैं।
उधर लंका में भय का वातावरण है। मंदोदरी रावण को श्रीराम से वैर छोड़कर माता सीता को वापस करने की नीति समझाती है, परंतु रावण का अभिमान उसकी बुद्धि पर भारी पड़ता है।
॥ हनुमान जी का अखंड भक्ति का वरदान ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
हनुमान जी की अत्यंत सरल और निष्कपट वाणी सुनकर प्रभु श्रीराम ने उन्हें “एवमस्तु” अर्थात ऐसा ही हो—का वरदान दिया।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
जो इस श्रीराम-हनुमान संवाद को हृदय में धारण करता है, उसके भीतर श्रीरघुनाथ के चरणों की भक्ति जागती है।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
तब श्रीराम ने वानरराज सुग्रीव को बुलाकर कहा— अब चलने की तैयारी की जाए।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
यह मंगलमय दृश्य देखकर देवताओं ने पुष्पवर्षा की और प्रसन्न होकर अपने लोकों की ओर लौटे।
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
अनेक रंग और रूप वाले, अतुलनीय बलशाली वानर और भालुओं के विशाल समूह वहाँ एकत्र हो गए।
॥ श्रीराम की विशाल सेना का प्रस्थान ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
श्रीराम ने अपनी पूरी वानर-सेना को कमल समान नेत्रों से कृपापूर्वक देखा।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
तब श्रीराम ने प्रसन्न होकर प्रस्थान किया और अनेक सुंदर शुभ शकुन दिखाई देने लगे।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
लंका में माता जानकी को भी मानो अपने शरीर के शुभ संकेतों से प्रभु के प्रस्थान का आभास होने लगा।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
वानर और भालुओं की इतनी विशाल सेना चली कि उसका पूर्ण वर्णन करना कठिन था।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
उनकी सिंह जैसी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं और मानो दिशाओं को धारण करने वाले दिग्गज भी डगमगाने लगे।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
देवता, गंधर्व, मुनि, नाग और किन्नर आनंदित हुए। करोड़ों वीर वानर आगे बढ़ते हुए प्रतापी कोसलनाथ श्रीराम की जय और गुणगान कर रहे थे।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
गोस्वामी तुलसीदास जी इस दिव्य प्रस्थान को अत्यंत पवित्र और अद्भुत रूप में चित्रित करते हैं।
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
वहाँ अनेक वानर और भालू विश्राम करते हुए आसपास उपलब्ध फल खाने लगे।
॥ लंका में भय और मंदोदरी की नीति ॥
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
वे अपने-अपने घरों में विचार करते थे कि अब राक्षस कुल का बचना अत्यंत कठिन दिखाई देता है।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
नगरवासियों की ऐसी बातें दूतों से सुनकर मंदोदरी अत्यंत चिंतित हो गई।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
उसने रावण से भगवान श्रीराम के साथ वैर छोड़ने और अपने हित की बात स्वीकार करने का आग्रह किया।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास भेज दीजिए।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
वह कहती हैं— हे नाथ! माता सीता को लौटाए बिना आपका कल्याण कठिन है।
राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
जब तक वे बाण राक्षसों का विनाश नहीं कर देते, उससे पहले ही अपना हठ त्यागकर उचित उपाय कर लीजिए।
॥ रावण का अभिमान ॥
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
उसने उसकी उचित चेतावनी को गंभीरता से लेने के बजाय उसे स्त्री का भय मानकर उपेक्षित कर दिया।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
वह अपनी शक्ति का घमंड करते हुए मंदोदरी के भय का उपहास करता है।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
लेकिन मंदोदरी के हृदय में चिंता बनी रही। उसे प्रतीत हुआ कि उसके पति के लिए समय विपरीत हो चुका है।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
उसने अपने मंत्रियों से उचित सलाह माँगी, लेकिन वे वास्तविक स्थिति समझाने के बजाय हँसकर उसे निश्चिंत रहने की बात कहने लगे।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
फिर मनुष्य और वानर आपके सामने क्या महत्व रखते हैं?
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।
तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म— इन तीनों का शीघ्र नाश हो जाता है।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस भाग में दो बिल्कुल विपरीत भाव दिखाई देते हैं—
हनुमान जी की विनम्रता और रावण का अभिमान।
हनुमान जी महान सेवा करने के बाद भी प्रभु से केवल भक्ति माँगते हैं।
दूसरी ओर रावण के सामने मंदोदरी सत्य और हित की बात रखती है,
फिर भी वह अहंकार के कारण उसे स्वीकार नहीं करता।
दोहा 37 हमें जीवन की बहुत गहरी नीति देता है—
जो व्यक्ति केवल प्रसन्न करने वाली बात सुने और सत्य बोलने वाले की उपेक्षा करे,
वह सही निर्णय लेने की क्षमता खो देता है।
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