सुंदरकांड भाग 12: हनुमान जी की पूँछ में अग्नि और लंका दहन | दोहा 24–26 अर्थ सहित
क्रोधित रावण हनुमान जी को दंड देने का आदेश देता है। विभीषण दूत को मारना नीति के विरुद्ध बताते हैं, जिसके बाद रावण हनुमान जी की पूँछ में अग्नि लगाने का आदेश देता है।
यहीं से वह प्रसिद्ध प्रसंग आरंभ होता है जिसमें रावण का दिया हुआ दंड स्वयं लंका के विनाश का कारण बन जाता है।
॥ रावण का क्रोध और विभीषण की नीति ॥
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
लेकिन अत्यंत अभिमानी रावण हँसकर बोला— आज हमें बड़ा ज्ञानी वानर गुरु मिल गया है, जो हमें उपदेश देने आया है।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
हनुमान जी ने निर्भय होकर कहा— इसके विपरीत तुम्हारा ही अंत निकट है; तुम्हारी बुद्धि भ्रमित हो चुकी है, यह मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
आदेश सुनते ही राक्षस हनुमान जी की ओर बढ़े, लेकिन उसी समय अपने मंत्रियों सहित विभीषण वहाँ पहुँचे।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
हे स्वामी! इसे कोई दूसरा दंड दिया जा सकता है। सभा में उपस्थित लोगों ने भी विभीषण की इस सलाह को उचित माना।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
इसकी पूँछ पर तेल में भीगे हुए कपड़े बाँधो और फिर उसमें आग लगा दो।
॥ पूँछ में अग्नि लगाने की तैयारी ॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
तब वह उन श्रीराम की शक्ति भी देख लेगा, जिनकी हनुमान जी इतनी प्रशंसा कर रहे हैं।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
राक्षस रावण का आदेश पाकर उसकी योजना को पूरा करने में लग गए।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
नगरवासी तमाशा देखने आने लगे और हनुमान जी का उपहास करने लगे।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
अग्नि जलती देखकर हनुमान जी ने तुरंत अपना शरीर अत्यंत छोटा कर लिया।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
यह देखकर लंका की राक्षसी स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।
हनुमान जी ने प्रचंड गर्जना की और अपना शरीर बढ़ाकर आकाश की ओर उठने लगे।
॥ लंका दहन ॥
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
नगर जलने लगा और लोग व्याकुल हो उठे। अग्नि की भयंकर लपटें चारों ओर फैलने लगीं।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
वे कहने लगे— हमने पहले ही कहा था कि यह कोई साधारण वानर नहीं है; निश्चय ही कोई देवता वानर रूप धारण करके आया है।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
हनुमान जी ने बहुत थोड़े समय में लंका को जला दिया, लेकिन विभीषण जी का घर सुरक्षित रहा।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
हनुमान जी ने चारों ओर घूमकर लंका को जला दिया और फिर समुद्र में कूद गए।
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
इसके बाद वे पुनः माता जानकी के सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हुए।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस प्रसंग में रावण का अहंकार और हनुमान जी की बुद्धि
दोनों एक साथ स्पष्ट दिखाई देते हैं।
रावण जिस अग्नि को हनुमान जी का अपमान समझकर लगवाता है,
वही अग्नि उसकी स्वर्णमयी लंका के विनाश का कारण बन जाती है।
हनुमान जी हर परिस्थिति को श्रीराम के कार्य के लिए उपयोग करते हैं।
बंधन, अपमान और विरोध भी उनके संकल्प को रोक नहीं पाते।
प्रभु के कार्य में समर्पित बुद्धि विपरीत परिस्थिति को भी अवसर में बदल सकती है।
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