सुंदरकांड भाग 12: हनुमान जी की पूँछ में अग्नि और लंका दहन | दोहा 24–26 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 12 • पूँछ में अग्नि एवं लंका दहन
श्रीहनुमान जी ने रावण को अत्यंत हितकारी वाणी में श्रीराम की शरण ग्रहण करने का उपदेश दिया, लेकिन अभिमान में डूबा रावण उनकी बात स्वीकार नहीं करता।

क्रोधित रावण हनुमान जी को दंड देने का आदेश देता है। विभीषण दूत को मारना नीति के विरुद्ध बताते हैं, जिसके बाद रावण हनुमान जी की पूँछ में अग्नि लगाने का आदेश देता है।

यहीं से वह प्रसिद्ध प्रसंग आरंभ होता है जिसमें रावण का दिया हुआ दंड स्वयं लंका के विनाश का कारण बन जाता है।

॥ रावण का क्रोध और विभीषण की नीति ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 24 से दोहा 26 तक
चौपाई

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने भक्ति, विवेक, वैराग्य और नीति से युक्त अत्यंत हितकारी बातें कहीं।

लेकिन अत्यंत अभिमानी रावण हँसकर बोला— आज हमें बड़ा ज्ञानी वानर गुरु मिल गया है, जो हमें उपदेश देने आया है।
चौपाई

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

सरल भावार्थ
रावण ने क्रोध में कहा— तुम्हारी मृत्यु निकट आ गई है, इसीलिए तुम मुझे शिक्षा देने लगे हो।

हनुमान जी ने निर्भय होकर कहा— इसके विपरीत तुम्हारा ही अंत निकट है; तुम्हारी बुद्धि भ्रमित हो चुकी है, यह मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
चौपाई

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

सरल भावार्थ
हनुमान जी के वचन सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हो गया और उसने उन्हें मार डालने का आदेश दिया।

आदेश सुनते ही राक्षस हनुमान जी की ओर बढ़े, लेकिन उसी समय अपने मंत्रियों सहित विभीषण वहाँ पहुँचे।
चौपाई

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

सरल भावार्थ
विभीषण ने सिर झुकाकर विनम्रतापूर्वक कहा— दूत को मारना नीति के विरुद्ध है।

हे स्वामी! इसे कोई दूसरा दंड दिया जा सकता है। सभा में उपस्थित लोगों ने भी विभीषण की इस सलाह को उचित माना।
चौपाई

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

सरल भावार्थ
यह बात सुनकर रावण हँसा और बोला— तो इस वानर को अंग-भंग करके वापस भेजा जाए।
॥ दोहा 24 ॥

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

दोहा का सरल भावार्थ
रावण ने कहा— वानरों को अपनी पूँछ बहुत प्रिय होती है।

इसकी पूँछ पर तेल में भीगे हुए कपड़े बाँधो और फिर उसमें आग लगा दो।

॥ पूँछ में अग्नि लगाने की तैयारी ॥

चौपाई

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

सरल भावार्थ
रावण का विचार था कि पूँछ जल जाने के बाद यह वानर अपने स्वामी के पास लौटेगा।

तब वह उन श्रीराम की शक्ति भी देख लेगा, जिनकी हनुमान जी इतनी प्रशंसा कर रहे हैं।
चौपाई

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

सरल भावार्थ
रावण की बात सुनकर हनुमान जी मन ही मन मुस्कराए। उन्होंने समझ लिया कि माता सरस्वती ने उनके कार्य में सहायता की है।

राक्षस रावण का आदेश पाकर उसकी योजना को पूरा करने में लग गए।
चौपाई

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी अपनी पूँछ बढ़ाते गए। उसे लपेटने में लंका के वस्त्र, घी और तेल की बड़ी मात्रा लग गई।

नगरवासी तमाशा देखने आने लगे और हनुमान जी का उपहास करने लगे।
चौपाई

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

सरल भावार्थ
ढोल बजाते और तालियाँ पीटते हुए राक्षस हनुमान जी को नगर में घुमाने लगे और फिर उनकी पूँछ में अग्नि लगा दी।

अग्नि जलती देखकर हनुमान जी ने तुरंत अपना शरीर अत्यंत छोटा कर लिया।
चौपाई

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

सरल भावार्थ
बंधन से निकलकर हनुमान जी स्वर्णमयी अट्टालिकाओं पर जा चढ़े।

यह देखकर लंका की राक्षसी स्त्रियाँ भयभीत हो गईं।
॥ दोहा 25 ॥

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

दोहा का सरल भावार्थ
प्रभु की प्रेरणा से उसी समय उनचास प्रकार की वायु चलने लगी।

हनुमान जी ने प्रचंड गर्जना की और अपना शरीर बढ़ाकर आकाश की ओर उठने लगे।

॥ लंका दहन ॥

चौपाई

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने विशाल किंतु अत्यंत हल्का रूप धारण किया और एक भवन से दूसरे भवन पर तेजी से जाने लगे।

नगर जलने लगा और लोग व्याकुल हो उठे। अग्नि की भयंकर लपटें चारों ओर फैलने लगीं।
चौपाई

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

सरल भावार्थ
लंका के लोग भय से अपने माता-पिता और परिजनों को पुकारने लगे और सोचने लगे कि इस संकट से अब कौन बचाएगा।

वे कहने लगे— हमने पहले ही कहा था कि यह कोई साधारण वानर नहीं है; निश्चय ही कोई देवता वानर रूप धारण करके आया है।
चौपाई

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।

सरल भावार्थ
नगरवासी कहने लगे— संत और साधु का अपमान करने का यही परिणाम है; आज नगर ऐसा जल रहा है मानो उसका कोई रक्षक ही न हो।

हनुमान जी ने बहुत थोड़े समय में लंका को जला दिया, लेकिन विभीषण जी का घर सुरक्षित रहा।
चौपाई

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— जिन प्रभु ने अग्नि की रचना की है, हनुमान जी उन्हीं प्रभु के दूत हैं; इसलिए अग्नि उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकी।

हनुमान जी ने चारों ओर घूमकर लंका को जला दिया और फिर समुद्र में कूद गए।
॥ दोहा 26 ॥

पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी ने समुद्र में अपनी पूँछ की अग्नि बुझाई, थकान दूर की और फिर अपना छोटा रूप धारण किया।

इसके बाद वे पुनः माता जानकी के सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हुए।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस प्रसंग में रावण का अहंकार और हनुमान जी की बुद्धि दोनों एक साथ स्पष्ट दिखाई देते हैं।

रावण जिस अग्नि को हनुमान जी का अपमान समझकर लगवाता है, वही अग्नि उसकी स्वर्णमयी लंका के विनाश का कारण बन जाती है।

हनुमान जी हर परिस्थिति को श्रीराम के कार्य के लिए उपयोग करते हैं। बंधन, अपमान और विरोध भी उनके संकल्प को रोक नहीं पाते।

प्रभु के कार्य में समर्पित बुद्धि विपरीत परिस्थिति को भी अवसर में बदल सकती है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 24, 25 और 26 के अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत की गई हैं।
अगला प्रसंग — माता सीता द्वारा चूड़ामणि देना और हनुमान जी का श्रीराम के पास प्रस्थान
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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