सुंदरकांड भाग 5: लंका प्रवेश और विभीषण मिलन | दोहा 5–7 अर्थ सहित
उनका एक ही उद्देश्य है—माता सीता का पता लगाना। वे महलों और भवनों में खोज करते हुए रावण के महल तक पहुँचते हैं, लेकिन वहाँ भी माता जानकी नहीं मिलतीं।
तभी उन्हें एक ऐसा भवन दिखाई देता है जो पूरी राक्षसी लंका के बीच प्रभु-भक्ति की अलग ही पहचान लिए हुए है।
॥ लंका में प्रवेश ॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
जिन पर श्रीराम की कृपा होती है, उनके लिए विष अमृत बन सकता है, शत्रु मित्रवत हो सकते हैं, विशाल समुद्र गाय के खुर के समान छोटा और अग्नि भी शीतल हो सकती है।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
हनुमान जी ने अत्यंत छोटा रूप धारण किया और भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका नगर में प्रवेश किया।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
खोज करते-करते वे रावण के महल में पहुँचे। वह भवन इतना विलक्षण और वैभवशाली था कि उसका पूरा वर्णन करना कठिन था।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
इसके बाद उन्हें एक सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें भगवान का एक अलग और पवित्र मंदिर बना हुआ था।
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।
वहाँ तुलसी के नए-नए पौधों के समूह देखकर श्रीहनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए।
॥ विभीषण के घर का दर्शन ॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
उसी समय विभीषण जी की नींद खुली।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
यह सुनते ही हनुमान जी का हृदय प्रसन्न हो गया और उन्होंने समझ लिया कि यह कोई सज्जन भक्त है। उन्होंने विचार किया कि इससे परिचय करना चाहिए, क्योंकि साधु के संग से कार्य की हानि नहीं होती।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
उन्होंने प्रणाम करके कुशल-क्षेम पूछी और कहा— हे ब्राह्मण देव! कृपया अपना परिचय और अपनी कथा बताइए।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
अथवा क्या आप स्वयं दीनों से प्रेम करने वाले भगवान श्रीराम हैं, जो मुझे सौभाग्यशाली बनाने के लिए यहाँ आए हैं?
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
श्रीराम के गुणों का स्मरण करते हुए दोनों के शरीर रोमांचित हो उठे और उनके मन प्रभु-प्रेम में मग्न हो गए।
॥ हनुमान-विभीषण संवाद ॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
हे तात! क्या सूर्यवंश के स्वामी श्रीराम कभी मुझे अनाथ जानकर मुझ पर कृपा करेंगे?
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
लेकिन हे हनुमान जी! अब मुझे विश्वास हो गया है, क्योंकि भगवान की कृपा के बिना संतों का मिलन नहीं होता।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
हनुमान जी उन्हें समझाते हैं— हे विभीषण! प्रभु की रीति सुनो, वे अपने सेवकों और भक्तों से सदैव प्रेम करते हैं।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
वे अपने विषय में विनोदपूर्ण विनम्रता से कहते हैं कि प्रातःकाल हमारा नाम लेने वाले को उस दिन भोजन भी न मिले— अर्थात वे स्वयं को कोई बड़ा पात्र नहीं मानते।
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
प्रभु के गुण और उनकी कृपा को स्मरण करते ही हनुमान जी के नेत्र प्रेम के आँसुओं से भर गए।
🌺 इस प्रसंग का भाव
राक्षसों से भरी लंका के बीच विभीषण का घर हमें यह सुंदर संदेश देता है
कि प्रतिकूल वातावरण के बीच भी प्रभु-भक्ति जीवित रह सकती है।
हनुमान जी तुलसी, राम-चिह्न और “राम-राम” के स्मरण से तुरंत
एक भक्त को पहचान लेते हैं।
दूसरी ओर विभीषण स्वयं को अयोग्य मानते हैं और हनुमान जी भी
अपने महान सामर्थ्य के बावजूद स्वयं को छोटा बताते हैं।
यही भक्त का सौंदर्य है—
कृपा मिलने पर अहंकार नहीं बढ़ता, विनम्रता और प्रेम बढ़ता है।
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