सुंदरकांड भाग 5: लंका प्रवेश और विभीषण मिलन | दोहा 5–7 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 5 • लंका प्रवेश एवं विभीषण मिलन
लंकिनी से लंका में प्रवेश की अनुमति मिलने के बाद श्रीहनुमान जी अत्यंत छोटे रूप में नगर के भीतर प्रवेश करते हैं।

उनका एक ही उद्देश्य है—माता सीता का पता लगाना। वे महलों और भवनों में खोज करते हुए रावण के महल तक पहुँचते हैं, लेकिन वहाँ भी माता जानकी नहीं मिलतीं।

तभी उन्हें एक ऐसा भवन दिखाई देता है जो पूरी राक्षसी लंका के बीच प्रभु-भक्ति की अलग ही पहचान लिए हुए है।

॥ लंका में प्रवेश ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 5 से दोहा 7 तक
चौपाई

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

सरल भावार्थ
लंका में प्रवेश करते हुए भाव यह है कि हृदय में अयोध्या के राजा श्रीराम को धारण करके सभी कार्य किए जाएँ।

जिन पर श्रीराम की कृपा होती है, उनके लिए विष अमृत बन सकता है, शत्रु मित्रवत हो सकते हैं, विशाल समुद्र गाय के खुर के समान छोटा और अग्नि भी शीतल हो सकती है।
चौपाई

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।

सरल भावार्थ
जिस पर श्रीराम कृपा-दृष्टि करते हैं, उसके लिए बड़ी से बड़ी बाधा भी तुच्छ हो जाती है।

हनुमान जी ने अत्यंत छोटा रूप धारण किया और भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका नगर में प्रवेश किया।
चौपाई

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी प्रत्येक भवन में जाकर माता सीता की खोज करने लगे। उन्होंने चारों ओर असंख्य बलवान योद्धाओं को देखा।

खोज करते-करते वे रावण के महल में पहुँचे। वह भवन इतना विलक्षण और वैभवशाली था कि उसका पूरा वर्णन करना कठिन था।
चौपाई

सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने रावण को सोते हुए देखा, किंतु उस महल में भी उन्हें माता सीता दिखाई नहीं दीं।

इसके बाद उन्हें एक सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें भगवान का एक अलग और पवित्र मंदिर बना हुआ था।
॥ दोहा 5 ॥

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

दोहा का सरल भावार्थ
उस घर पर श्रीराम के आयुधों के चिह्न बने हुए थे और उसकी शोभा का वर्णन करना कठिन था।

वहाँ तुलसी के नए-नए पौधों के समूह देखकर श्रीहनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए।

॥ विभीषण के घर का दर्शन ॥

चौपाई

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी मन में विचार करने लगे— यह लंका तो राक्षसों का निवास है, यहाँ किसी सज्जन भक्त का घर कैसे हो सकता है?

उसी समय विभीषण जी की नींद खुली।
चौपाई

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।

सरल भावार्थ
जागते ही विभीषण जी ने “राम-राम” कहकर भगवान का स्मरण किया।

यह सुनते ही हनुमान जी का हृदय प्रसन्न हो गया और उन्होंने समझ लिया कि यह कोई सज्जन भक्त है। उन्होंने विचार किया कि इससे परिचय करना चाहिए, क्योंकि साधु के संग से कार्य की हानि नहीं होती।
चौपाई

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके उनसे बात की। वाणी सुनकर विभीषण जी उठकर उनके पास आए।

उन्होंने प्रणाम करके कुशल-क्षेम पूछी और कहा— हे ब्राह्मण देव! कृपया अपना परिचय और अपनी कथा बताइए।
चौपाई

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

सरल भावार्थ
विभीषण जी ने पूछा— क्या आप भगवान के भक्तों में से कोई हैं? आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यंत प्रेम उत्पन्न हो रहा है।

अथवा क्या आप स्वयं दीनों से प्रेम करने वाले भगवान श्रीराम हैं, जो मुझे सौभाग्यशाली बनाने के लिए यहाँ आए हैं?
॥ दोहा 6 ॥

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

दोहा का सरल भावार्थ
तब हनुमान जी ने विभीषण जी को श्रीराम की पूरी कथा सुनाई और अपना परिचय भी दिया।

श्रीराम के गुणों का स्मरण करते हुए दोनों के शरीर रोमांचित हो उठे और उनके मन प्रभु-प्रेम में मग्न हो गए।

॥ हनुमान-विभीषण संवाद ॥

चौपाई

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।

सरल भावार्थ
विभीषण जी बोले— हे पवनपुत्र! मेरी स्थिति ऐसी है जैसे दाँतों के बीच जीभ रहती है।

हे तात! क्या सूर्यवंश के स्वामी श्रीराम कभी मुझे अनाथ जानकर मुझ पर कृपा करेंगे?
चौपाई

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

सरल भावार्थ
विभीषण जी विनम्रता से कहते हैं— मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है, मुझमें कोई विशेष साधना नहीं है और प्रभु के चरण-कमलों में वैसी प्रीति भी नहीं है।

लेकिन हे हनुमान जी! अब मुझे विश्वास हो गया है, क्योंकि भगवान की कृपा के बिना संतों का मिलन नहीं होता।
चौपाई

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

सरल भावार्थ
विभीषण जी कहते हैं— यदि श्रीरघुवीर ने मुझ पर कृपा न की होती, तो आप स्वयं यहाँ आकर मुझे दर्शन कैसे देते?

हनुमान जी उन्हें समझाते हैं— हे विभीषण! प्रभु की रीति सुनो, वे अपने सेवकों और भक्तों से सदैव प्रेम करते हैं।
चौपाई

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी स्वयं को अत्यंत विनम्र बताते हुए कहते हैं— बताओ, मैं कौन-सा बहुत ऊँचे कुल का हूँ? वानर तो स्वभाव से चंचल और अनेक दृष्टियों से साधारण माने जाते हैं।

वे अपने विषय में विनोदपूर्ण विनम्रता से कहते हैं कि प्रातःकाल हमारा नाम लेने वाले को उस दिन भोजन भी न मिले— अर्थात वे स्वयं को कोई बड़ा पात्र नहीं मानते।
॥ दोहा 7 ॥

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे सखा! ऐसा साधारण और छोटा होते हुए भी श्रीरघुवीर ने मुझ पर कृपा की है।

प्रभु के गुण और उनकी कृपा को स्मरण करते ही हनुमान जी के नेत्र प्रेम के आँसुओं से भर गए।

🌺 इस प्रसंग का भाव

राक्षसों से भरी लंका के बीच विभीषण का घर हमें यह सुंदर संदेश देता है कि प्रतिकूल वातावरण के बीच भी प्रभु-भक्ति जीवित रह सकती है।

हनुमान जी तुलसी, राम-चिह्न और “राम-राम” के स्मरण से तुरंत एक भक्त को पहचान लेते हैं।

दूसरी ओर विभीषण स्वयं को अयोग्य मानते हैं और हनुमान जी भी अपने महान सामर्थ्य के बावजूद स्वयं को छोटा बताते हैं।

यही भक्त का सौंदर्य है— कृपा मिलने पर अहंकार नहीं बढ़ता, विनम्रता और प्रेम बढ़ता है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 5 से दोहा 7 तक का मूल पाठ प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — विभीषण द्वारा माता सीता का पता बताना और अशोक वाटिका में हनुमान जी का पहुँचना
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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