सुंदरकांड मंगलाचरण अर्थ सहित | श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान

॥ ✦ ॐ ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस
पञ्चम सोपान • सुन्दरकाण्ड
मंगलाचरण अर्थात किसी पवित्र कार्य या ग्रंथ के आरंभ में भगवान का स्मरण और वंदना।

श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड के आरंभ में गोस्वामी तुलसीदास जी तीन संस्कृत श्लोकों के माध्यम से पहले भगवान श्रीराम की वंदना करते हैं, उनसे निष्काम एवं निर्मल भक्ति की प्रार्थना करते हैं और फिर श्रीराम के परमप्रिय भक्त पवनपुत्र श्रीहनुमान जी को प्रणाम करते हैं।

॥ सुन्दरकाण्ड मंगलाचरण ॥

श्लोक १

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ॥१॥

सरल भावार्थ
मैं उन भगवान श्रीराम की वंदना करता हूँ जो शांत, सनातन, ज्ञान और प्रमाणों की सीमाओं से परे, निष्पाप तथा परम शांति प्रदान करने वाले हैं। ब्रह्मा, भगवान शिव और शेषनाग निरंतर जिनकी सेवा करते हैं; जिन्हें वेदान्त के द्वारा जाना जाता है और जो सर्वव्यापक हैं। वे जगत के स्वामी, देवताओं के गुरु, माया से मनुष्य रूप में प्रकट हुए श्रीहरि, करुणा के सागर, रघुकुलश्रेष्ठ और राजाओं के शिरोमणि हैं।
श्लोक २

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥२॥

सरल भावार्थ
हे रघुनाथजी! मेरे हृदय में आपके अतिरिक्त कोई दूसरी अभिलाषा नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ और आप तो सभी के हृदय में स्थित अंतर्यामी हैं, इसलिए मेरे मन का भाव आप जानते ही हैं। हे रघुकुलश्रेष्ठ! मुझे अपनी पूर्ण और अटूट भक्ति प्रदान कीजिए तथा मेरे मन को काम आदि दोषों से मुक्त कीजिए।
श्लोक ३

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥३॥

सरल भावार्थ
जो अतुलनीय बल के धाम हैं, जिनका तेजस्वी शरीर स्वर्ण पर्वत के समान है, जो दैत्यरूपी वन को नष्ट करने वाली अग्नि के समान हैं, जो ज्ञानियों में अग्रणी और समस्त श्रेष्ठ गुणों के भंडार हैं, जो वानरों के अधीश्वर तथा भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं— उन पवनपुत्र श्रीहनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

🌺 मंगलाचरण का भाव

सुन्दरकाण्ड का आरंभ ही हमें भक्ति की दिशा बताता है। पहले श्रीराम के परम स्वरूप का स्मरण, फिर उनसे निष्काम और निर्मल भक्ति की प्रार्थना, और उसके बाद ऐसे श्रीहनुमान जी को प्रणाम जिनके जीवन में बल, ज्ञान, गुण और प्रभु-भक्ति का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

यही भाव आगे पूरे सुन्दरकाण्ड में हनुमान जी के प्रत्येक कार्य में दिखाई देता है— सामर्थ्य अपार है, पर अहंकार नहीं; बुद्धि महान है, पर उसका उपयोग केवल श्रीराम के कार्य के लिए है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। मूल श्लोकों को प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — जामवंत के वचन सुनकर हनुमान जी का प्रस्थान
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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