सुंदरकांड भाग 8: श्रीराम की मुद्रिका और हनुमान-सीता संवाद | दोहा 12–14 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 8 • श्रीराम की मुद्रिका एवं हनुमान-सीता संवाद
त्रिजटा के चले जाने के बाद माता सीता अत्यंत गहरे विरह में श्रीराम का स्मरण करती रहती हैं। वृक्ष पर छिपे श्रीहनुमान जी माता की दशा देखकर उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं।

तभी हनुमान जी श्रीराम द्वारा दी गई मुद्रिका माता सीता के सामने डालते हैं। यही मुद्रिका आगे माता सीता के हृदय में आशा और विश्वास जगाने का माध्यम बनती है।

॥ विरह के बीच आशा की किरण ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 12 से दोहा 14 तक
प्रसंग का संक्षिप्त भाव:

इस चरण में माता सीता की विरह-व्यथा अत्यंत गहरी हो जाती है। त्रिजटा उन्हें श्रीराम के प्रताप और सामर्थ्य का स्मरण कराकर धैर्य देती है। बाद में माता सीता अशोक वृक्ष के सामने अपने शोक के निवारण की प्रार्थना करती हैं।

वृक्ष पर छिपे श्रीहनुमान जी माता की अत्यंत दुःखी अवस्था देखकर विचार करते हैं कि अब उन्हें श्रीराम की पहचान का विश्वसनीय संकेत देना चाहिए।
चौपाई

देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

सरल भावार्थ
माता सीता को अत्यंत विरहाकुल देखकर श्रीहनुमान जी के लिए वह एक क्षण भी मानो कल्प के समान लंबा हो गया।
॥ दोहा 12 ॥

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी ने मन में विचार करके श्रीराम की मुद्रिका नीचे डाल दी। माता सीता ने उसे देखा और प्रसन्न होकर हाथ में उठा लिया।

॥ श्रीराम की मुद्रिका ॥

चौपाई

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने उस सुंदर मुद्रिका को देखा, जिस पर श्रीराम का नाम अंकित था।

मुद्रिका को पहचानकर वे आश्चर्यचकित हो गईं। उनके हृदय में एक साथ आनंद और विरह का भाव उमड़ पड़ा।
चौपाई

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।

सरल भावार्थ
माता सीता मन में विचार करने लगीं कि अजेय श्रीराम की यह मुद्रिका किसी दूसरे को कैसे मिल सकती है? ऐसी वस्तु केवल माया से भी नहीं बनाई जा सकती।

माता के मन में अनेक विचार चल ही रहे थे कि श्रीहनुमान जी ने मधुर वाणी में बोलना आरंभ किया।
चौपाई

रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी श्रीरामचंद्र के गुणों का वर्णन करने लगे। प्रभु का यश सुनते ही माता सीता के दुःख को मानो सहारा मिलने लगा।

वे मन लगाकर सुनने लगीं और हनुमान जी ने आरंभ से पूरी कथा सुनाई।
चौपाई

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

सरल भावार्थ
माता सीता को श्रीराम की कथा अमृत के समान प्रिय लगी। उन्होंने उस मधुर वाणी बोलने वाले को सामने आने के लिए कहा।

तब हनुमान जी उनके निकट आए। उन्हें देखकर माता के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ।
चौपाई

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने कहा— हे माता जानकी! मैं श्रीराम का दूत हूँ। करुणानिधान श्रीराम की शपथ लेकर सत्य कहता हूँ।

यह मुद्रिका स्वयं श्रीराम ने आपको पहचान के प्रमाण के रूप में देने के लिए मुझे दी है।
चौपाई

नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने पूछा कि मनुष्य श्रीराम और वानरों का मिलन कैसे हुआ?

तब हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव के मिलन तथा वानर-सेना से संबंध बनने की पूरी कथा समझाई।
॥ दोहा 13 ॥

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर माता सीता के मन में विश्वास उत्पन्न हुआ।

उन्होंने समझ लिया कि मन, कर्म और वचन से ये वास्तव में कृपा-सागर श्रीराम के सेवक हैं।

॥ माता सीता का हनुमान जी पर विश्वास ॥

चौपाई

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी को श्रीराम का सच्चा भक्त जानकर माता सीता के हृदय में अत्यंत गहरा प्रेम उमड़ पड़ा।

उनके नेत्र भर आए और शरीर रोमांचित हो गया। उन्होंने कहा—हे तात हनुमान! विरह के अथाह सागर में तुम मेरे लिए सहारा बनकर आए हो।
चौपाई

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने प्रेमपूर्वक पूछा— श्रीराम और लक्ष्मण सकुशल तो हैं?

श्रीरघुनाथ अत्यंत कोमल हृदय और कृपालु हैं; फिर मेरे प्रति इतना कठोर प्रतीत होने का क्या कारण है?
चौपाई

सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

सरल भावार्थ
माता पूछती हैं— सेवकों को सुख देने वाले श्रीरघुनाथ क्या कभी मुझे स्मरण करते हैं?

हे तात! वह समय कब आएगा जब मैं उनके कोमल और श्याम शरीर का दर्शन करके अपने नेत्रों को शीतल करूँगी?
चौपाई

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।

सरल भावार्थ
माता सीता की आँखों में आँसू भर आए और वे भाव-विह्वल हो गईं।

उनकी गहरी विरह-व्यथा देखकर हनुमान जी अत्यंत नम्र और मधुर वाणी में उन्हें सांत्वना देने लगे।
चौपाई

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण दोनों सकुशल हैं।

कृपा के धाम श्रीराम आपके दुःख से स्वयं दुःखी हैं। अपने मन में किसी प्रकार की कमी मत मानिए— श्रीराम का प्रेम आपके प्रति अत्यंत गहरा है।
॥ दोहा 14 ॥

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! अब धैर्य धारण करके श्रीरघुनाथ का संदेश सुनिए।

इतना कहते ही हनुमान जी स्वयं भी प्रेम से भाव-विह्वल हो गए और उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं।

🌺 इस प्रसंग का भाव

यह सुंदरकांड का अत्यंत भावपूर्ण मोड़ है। माता सीता के लिए श्रीराम की मुद्रिका केवल एक आभूषण नहीं, बल्कि प्रभु के संदेश और आशा का प्रमाण बनकर आती है।

हनुमान जी अपने बल से नहीं, पहले श्रीराम के नाम, कथा और मुद्रिका के माध्यम से माता का विश्वास प्राप्त करते हैं।

इस प्रसंग का सुंदर संदेश है— सच्चा सेवक अपने स्वामी की महिमा को आगे रखता है, स्वयं को नहीं।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 12 से दोहा 14 तक का क्रम प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलाया गया है।
अगला प्रसंग — श्रीराम का संदेश, माता सीता को धैर्य और हनुमान जी का विराट रूप
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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