सुंदरकांड भाग 8: श्रीराम की मुद्रिका और हनुमान-सीता संवाद | दोहा 12–14 अर्थ सहित
तभी हनुमान जी श्रीराम द्वारा दी गई मुद्रिका माता सीता के सामने डालते हैं। यही मुद्रिका आगे माता सीता के हृदय में आशा और विश्वास जगाने का माध्यम बनती है।
॥ विरह के बीच आशा की किरण ॥
इस चरण में माता सीता की विरह-व्यथा अत्यंत गहरी हो जाती है। त्रिजटा उन्हें श्रीराम के प्रताप और सामर्थ्य का स्मरण कराकर धैर्य देती है। बाद में माता सीता अशोक वृक्ष के सामने अपने शोक के निवारण की प्रार्थना करती हैं।
वृक्ष पर छिपे श्रीहनुमान जी माता की अत्यंत दुःखी अवस्था देखकर विचार करते हैं कि अब उन्हें श्रीराम की पहचान का विश्वसनीय संकेत देना चाहिए।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
॥ श्रीराम की मुद्रिका ॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
मुद्रिका को पहचानकर वे आश्चर्यचकित हो गईं। उनके हृदय में एक साथ आनंद और विरह का भाव उमड़ पड़ा।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
माता के मन में अनेक विचार चल ही रहे थे कि श्रीहनुमान जी ने मधुर वाणी में बोलना आरंभ किया।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
वे मन लगाकर सुनने लगीं और हनुमान जी ने आरंभ से पूरी कथा सुनाई।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
तब हनुमान जी उनके निकट आए। उन्हें देखकर माता के मन में आश्चर्य उत्पन्न हुआ।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
यह मुद्रिका स्वयं श्रीराम ने आपको पहचान के प्रमाण के रूप में देने के लिए मुझे दी है।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
तब हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव के मिलन तथा वानर-सेना से संबंध बनने की पूरी कथा समझाई।
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
उन्होंने समझ लिया कि मन, कर्म और वचन से ये वास्तव में कृपा-सागर श्रीराम के सेवक हैं।
॥ माता सीता का हनुमान जी पर विश्वास ॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
उनके नेत्र भर आए और शरीर रोमांचित हो गया। उन्होंने कहा—हे तात हनुमान! विरह के अथाह सागर में तुम मेरे लिए सहारा बनकर आए हो।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
श्रीरघुनाथ अत्यंत कोमल हृदय और कृपालु हैं; फिर मेरे प्रति इतना कठोर प्रतीत होने का क्या कारण है?
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
हे तात! वह समय कब आएगा जब मैं उनके कोमल और श्याम शरीर का दर्शन करके अपने नेत्रों को शीतल करूँगी?
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
उनकी गहरी विरह-व्यथा देखकर हनुमान जी अत्यंत नम्र और मधुर वाणी में उन्हें सांत्वना देने लगे।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
कृपा के धाम श्रीराम आपके दुःख से स्वयं दुःखी हैं। अपने मन में किसी प्रकार की कमी मत मानिए— श्रीराम का प्रेम आपके प्रति अत्यंत गहरा है।
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
इतना कहते ही हनुमान जी स्वयं भी प्रेम से भाव-विह्वल हो गए और उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं।
🌺 इस प्रसंग का भाव
यह सुंदरकांड का अत्यंत भावपूर्ण मोड़ है।
माता सीता के लिए श्रीराम की मुद्रिका केवल एक आभूषण नहीं,
बल्कि प्रभु के संदेश और आशा का प्रमाण बनकर आती है।
हनुमान जी अपने बल से नहीं, पहले श्रीराम के नाम,
कथा और मुद्रिका के माध्यम से माता का विश्वास प्राप्त करते हैं।
इस प्रसंग का सुंदर संदेश है—
सच्चा सेवक अपने स्वामी की महिमा को आगे रखता है, स्वयं को नहीं।
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