सुंदरकांड भाग 9: श्रीराम का संदेश, हनुमान जी का विराट रूप और सीता माता का आशीर्वाद | दोहा 15–17
इस संदेश से माता जानकी को यह ज्ञात होता है कि जिस प्रकार वे श्रीराम के विरह में व्याकुल हैं, उसी प्रकार श्रीराम का हृदय भी उनके वियोग से दुःखी है।
इसके बाद हनुमान जी माता को धैर्य देते हैं, अपने सामर्थ्य का परिचय कराते हैं और अंत में माता सीता से अमूल्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
॥ श्रीराम का संदेश ॥
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
वृक्षों के कोमल नए पत्ते भी अग्नि के समान लगते हैं और रात्रि मानो भयानक कालरात्रि बन गई है।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
जो वस्तुएँ पहले सुख देती थीं वही अब पीड़ा देती हैं, और शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु भी सर्प की साँस जैसी प्रतीत होती है।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का सच्चा तत्व केवल मेरा मन ही जानता है।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
श्रीराम का ऐसा प्रेमपूर्ण संदेश सुनकर माता वैदेही प्रेम में अत्यंत भाव-विह्वल हो गईं।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
श्रीरघुनाथ की महान शक्ति को अपने हृदय में याद कीजिए और मेरे वचन सुनकर चिंता त्याग दीजिए।
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
आप हृदय में धैर्य रखिए; इन राक्षसों का विनाश निश्चित समझिए।
॥ हनुमान जी का विराट रूप ॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
हे जानकी! श्रीराम के बाण सूर्य के समान हैं। उनके सामने राक्षसों की सेना अंधकार की तरह नष्ट हो जाएगी।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
आप कुछ दिन धैर्य रखिए। श्रीरघुवीर स्वयं वानर-सेना सहित यहाँ आएँगे।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
माता सीता ने पूछा— हे पुत्र! क्या सभी वानर तुम्हारे ही समान सामर्थ्यवान हैं? यहाँ के राक्षस अत्यंत बलवान योद्धा हैं।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
उनकी बात सुनकर हनुमान जी ने अपना विशाल रूप प्रकट किया। उनका शरीर स्वर्ण पर्वत के समान विशाल और युद्ध में अत्यंत प्रभावशाली दिखाई दिया।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
इसके बाद पवनपुत्र हनुमान जी ने फिर अपना छोटा और विनम्र रूप धारण कर लिया।
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
यह सब प्रभु के प्रताप से संभव होता है। भगवान की कृपा से अत्यंत छोटा जीव भी महान कार्य करने में समर्थ हो सकता है।
॥ माता सीता का आशीर्वाद ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
उन्होंने हनुमान जी को श्रीराम का प्रिय सेवक जानकर आशीर्वाद दिया— हे पुत्र! तुम बल और उत्तम शील के भंडार बनो।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
प्रभु की कृपा का आशीर्वाद सुनते ही हनुमान जी अत्यंत प्रेम में मग्न हो गए।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया, क्योंकि आपका आशीर्वाद निष्फल नहीं होता।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
माता सीता ने कहा— हे पुत्र! इस वन की रक्षा अत्यंत बलवान राक्षस करते हैं।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
यदि आपकी अनुमति हो और आपको इसमें प्रसन्नता हो, तो मैं इन वृक्षों के फल ग्रहण करना चाहता हूँ।
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
हे पुत्र! श्रीरघुनाथ के चरणों को हृदय में धारण करके जाओ और मधुर फल खाओ।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस प्रसंग में भक्त और भगवान के प्रेम का अत्यंत सुंदर रूप सामने आता है।
श्रीराम का संदेश माता सीता को यह विश्वास देता है कि
उनका विरह केवल उनका अपना दुःख नहीं है—
श्रीराम भी उसी प्रेम और वियोग को अनुभव कर रहे हैं।
हनुमान जी अपना विराट सामर्थ्य दिखाने के बाद तुरंत फिर छोटा रूप धारण कर लेते हैं।
यही उनकी महानता है—असीम शक्ति होने पर भी अहंकार का अभाव।
और अंत में उन्हें माता सीता का अमूल्य आशीर्वाद प्राप्त होता है।
सच्ची शक्ति वही है जो प्रभु की सेवा और विनम्रता के साथ जुड़ी हो।
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