सुंदरकांड भाग 9: श्रीराम का संदेश, हनुमान जी का विराट रूप और सीता माता का आशीर्वाद | दोहा 15–17

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 9 • श्रीराम का संदेश, हनुमान जी का विराट रूप एवं माता का आशीर्वाद
माता सीता के सामने अपनी पहचान प्रमाणित करने के बाद श्रीहनुमान जी अब उन्हें श्रीराम का अत्यंत भावपूर्ण संदेश सुनाते हैं।

इस संदेश से माता जानकी को यह ज्ञात होता है कि जिस प्रकार वे श्रीराम के विरह में व्याकुल हैं, उसी प्रकार श्रीराम का हृदय भी उनके वियोग से दुःखी है।

इसके बाद हनुमान जी माता को धैर्य देते हैं, अपने सामर्थ्य का परिचय कराते हैं और अंत में माता सीता से अमूल्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

॥ श्रीराम का संदेश ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 15 से दोहा 17 तक
चौपाई

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी श्रीराम का संदेश सुनाते हैं— हे सीता! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए संसार की सभी वस्तुएँ विपरीत हो गई हैं।

वृक्षों के कोमल नए पत्ते भी अग्नि के समान लगते हैं और रात्रि मानो भयानक कालरात्रि बन गई है।
चौपाई

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

सरल भावार्थ
कमलों का वन भी मानो भालों के वन जैसा प्रतीत होता है और बादलों की वर्षा मानो गर्म तेल की वर्षा जैसी लगती है।

जो वस्तुएँ पहले सुख देती थीं वही अब पीड़ा देती हैं, और शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु भी सर्प की साँस जैसी प्रतीत होती है।
चौपाई

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम का संदेश है— यदि अपने दुःख को कह देने से कुछ कम किया जा सकता, तो मैं उसे अवश्य कहता; पर इस प्रेम का वास्तविक रहस्य दूसरा कोई नहीं जानता।

हे प्रिये! मेरे और तुम्हारे प्रेम का सच्चा तत्व केवल मेरा मन ही जानता है।
चौपाई

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— वह मेरा मन सदा तुम्हारे ही पास रहता है। इसी से हमारे प्रेम की गहराई को समझो।

श्रीराम का ऐसा प्रेमपूर्ण संदेश सुनकर माता वैदेही प्रेम में अत्यंत भाव-विह्वल हो गईं।
चौपाई

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिए और सेवकों को सुख देने वाले श्रीराम का स्मरण कीजिए।

श्रीरघुनाथ की महान शक्ति को अपने हृदय में याद कीजिए और मेरे वचन सुनकर चिंता त्याग दीजिए।
॥ दोहा 15 ॥

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे माता! राक्षसों के समूह पतंगों के समान हैं और श्रीराम के बाण प्रचंड अग्नि के समान।

आप हृदय में धैर्य रखिए; इन राक्षसों का विनाश निश्चित समझिए।

॥ हनुमान जी का विराट रूप ॥

चौपाई

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— यदि श्रीराम को पहले से आपके यहाँ होने का निश्चित समाचार मिल गया होता, तो वे आने में तनिक भी विलंब नहीं करते।

हे जानकी! श्रीराम के बाण सूर्य के समान हैं। उनके सामने राक्षसों की सेना अंधकार की तरह नष्ट हो जाएगी।
चौपाई

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! मैं आपको अभी यहाँ से ले जा सकता हूँ, परंतु मुझे प्रभु श्रीराम की ऐसी आज्ञा नहीं है।

आप कुछ दिन धैर्य रखिए। श्रीरघुवीर स्वयं वानर-सेना सहित यहाँ आएँगे।
चौपाई

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।

सरल भावार्थ
वे राक्षसों का विनाश करके आपको सम्मानपूर्वक ले जाएँगे और तीनों लोकों में उनकी कीर्ति गाई जाएगी।

माता सीता ने पूछा— हे पुत्र! क्या सभी वानर तुम्हारे ही समान सामर्थ्यवान हैं? यहाँ के राक्षस अत्यंत बलवान योद्धा हैं।
चौपाई

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।

सरल भावार्थ
माता सीता के मन में वानर सेना के सामर्थ्य को लेकर स्वाभाविक संदेह हुआ।

उनकी बात सुनकर हनुमान जी ने अपना विशाल रूप प्रकट किया। उनका शरीर स्वर्ण पर्वत के समान विशाल और युद्ध में अत्यंत प्रभावशाली दिखाई दिया।
चौपाई

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी का महान सामर्थ्य देखकर माता सीता के मन में पूर्ण विश्वास उत्पन्न हो गया।

इसके बाद पवनपुत्र हनुमान जी ने फिर अपना छोटा और विनम्र रूप धारण कर लिया।
॥ दोहा 16 ॥

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी विनम्रता से कहते हैं— हे माता! वानरों में स्वयं कोई बहुत बड़ा बल या बुद्धि नहीं है।

यह सब प्रभु के प्रताप से संभव होता है। भगवान की कृपा से अत्यंत छोटा जीव भी महान कार्य करने में समर्थ हो सकता है।

॥ माता सीता का आशीर्वाद ॥

चौपाई

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी के भक्ति, प्रताप, तेज और बल से युक्त वचन सुनकर माता सीता के मन को बड़ा संतोष मिला।

उन्होंने हनुमान जी को श्रीराम का प्रिय सेवक जानकर आशीर्वाद दिया— हे पुत्र! तुम बल और उत्तम शील के भंडार बनो।
चौपाई

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने आशीर्वाद दिया— हे पुत्र! तुम गुणों के भंडार बनो और श्रीरघुनाथ तुम पर बहुत कृपा करें।

प्रभु की कृपा का आशीर्वाद सुनते ही हनुमान जी अत्यंत प्रेम में मग्न हो गए।
चौपाई

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बार-बार माता सीता के चरणों में मस्तक झुकाने लगे और हाथ जोड़कर बोले—

हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया, क्योंकि आपका आशीर्वाद निष्फल नहीं होता।
चौपाई

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! इन सुंदर फल वाले वृक्षों को देखकर मुझे बहुत भूख लगी है।

माता सीता ने कहा— हे पुत्र! इस वन की रक्षा अत्यंत बलवान राक्षस करते हैं।
चौपाई

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले— हे माता! मुझे उन राक्षसों का भय नहीं है।

यदि आपकी अनुमति हो और आपको इसमें प्रसन्नता हो, तो मैं इन वृक्षों के फल ग्रहण करना चाहता हूँ।
॥ दोहा 17 ॥

देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी की बुद्धि और बल में निपुणता देखकर माता जानकी ने उन्हें अनुमति दी—

हे पुत्र! श्रीरघुनाथ के चरणों को हृदय में धारण करके जाओ और मधुर फल खाओ।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस प्रसंग में भक्त और भगवान के प्रेम का अत्यंत सुंदर रूप सामने आता है।

श्रीराम का संदेश माता सीता को यह विश्वास देता है कि उनका विरह केवल उनका अपना दुःख नहीं है— श्रीराम भी उसी प्रेम और वियोग को अनुभव कर रहे हैं।

हनुमान जी अपना विराट सामर्थ्य दिखाने के बाद तुरंत फिर छोटा रूप धारण कर लेते हैं। यही उनकी महानता है—असीम शक्ति होने पर भी अहंकार का अभाव।

और अंत में उन्हें माता सीता का अमूल्य आशीर्वाद प्राप्त होता है। सच्ची शक्ति वही है जो प्रभु की सेवा और विनम्रता के साथ जुड़ी हो।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 15 से दोहा 17 तक के सभी मूल पद क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत किए गए हैं।
अगला प्रसंग — अशोक वाटिका में फल खाना, वृक्ष उखाड़ना और राक्षसों से युद्ध
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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