सुंदरकांड भाग 21: श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, नल-नील का उपाय और सुंदरकांड समापन | दोहा 58–60

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 21 • समुद्रदेव, नल-नील का उपाय एवं सुन्दरकाण्ड समापन
तीन दिन तक श्रीराम समुद्र से विनयपूर्वक मार्ग देने की प्रार्थना करते हैं, परंतु समुद्र प्रकट नहीं होता।

तब प्रभु समझाते हैं कि जहाँ विनय और प्रेम का उचित प्रभाव न पड़े, वहाँ दृढ़ता आवश्यक हो जाती है।

श्रीराम के संकल्प को देखकर समुद्रदेव विनम्र होकर उपस्थित होते हैं, अपनी मर्यादा बताते हैं और नल-नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनाने का उपाय बताते हैं।

इसी दिव्य प्रसंग के साथ श्रीरामचरितमानस के पञ्चम सोपान — सुन्दरकाण्ड का समापन होता है।

॥ श्रीराम का समुद्र पर क्रोध ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 58 से अंतिम दोहा 60 तक
चौपाई

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

सरल भावार्थ
श्रीराम लक्ष्मण जी से धनुष-बाण लाने को कहते हैं और समुद्र के प्रति अब दृढ़ रुख अपनाने का निर्णय करते हैं।

प्रभु बताते हैं कि जहाँ विनय, प्रेम और उत्तम नीति का सम्मान ही न हो, वहाँ केवल विनम्रता से कार्य सिद्ध होना कठिन हो सकता है।
चौपाई

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

सरल भावार्थ
जो व्यक्ति मोह में डूबा हो उसके सामने केवल ज्ञान की बातें, अत्यंत लोभी के सामने वैराग्य, अत्यधिक क्रोधी के सामने शांति और विषयासक्त व्यक्ति के सामने भगवद्-कथा का उपदेश—

यदि ग्रहण करने की तैयारी ही न हो, तो उसका परिणाम ऊसर भूमि में बीज बोने जैसा हो सकता है।
चौपाई

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

सरल भावार्थ
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथ ने धनुष पर बाण चढ़ाया। लक्ष्मण जी को प्रभु का यह दृढ़ निर्णय उचित लगा।

प्रभु ने शक्तिशाली बाण का संधान किया, जिसके प्रभाव से समुद्र अत्यंत व्याकुल हो उठा।
चौपाई

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

सरल भावार्थ
समुद्र ने प्रभु के बाण का प्रभाव देखकर अपनी हठपूर्ण स्थिति छोड़ दी।

वह ब्राह्मण रूप धारण करके, सोने के पात्र में अनेक रत्न लेकर विनम्रतापूर्वक श्रीराम के सामने उपस्थित हुआ।
॥ दोहा 58 ॥

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

दोहा का सरल भावार्थ
भगवान शिव गरुड़ से कहते हैं कि जैसे केले का वृक्ष उचित अवस्था आने पर ही फल देता है, वैसे ही कुछ परिस्थितियों में केवल विनय पर्याप्त नहीं होती।

कभी-कभी अनुशासन और दृढ़ता के बाद ही व्यक्ति उचित बात स्वीकार करता है।

॥ समुद्रदेव की विनती ॥

चौपाई

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव भय और विनम्रता से श्रीराम के चरण पकड़कर बोले— हे नाथ! मेरे सभी दोष क्षमा कीजिए।

आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— ये पंचमहाभूत अपनी-अपनी प्रकृति और मर्यादा के अनुसार कार्य करते हैं।
चौपाई

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

सरल भावार्थ
समुद्र कहता है— हे प्रभु! आपकी प्रेरणा से ही ये तत्व सृष्टि के कार्य के लिए प्रकट हुए हैं।

जिसे प्रभु ने जैसी मर्यादा प्रदान की है, वह उसी के अनुसार रहकर उचित रूप से अपना कार्य करता है।
चौपाई

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव कहते हैं— हे प्रभु! आपने मुझे शिक्षा देकर उचित ही किया; मेरी मर्यादा भी अंततः आपकी ही बनाई हुई है।

इसके बाद मूल मानस में उपर्युक्त प्रसिद्ध पंक्ति आती है। इस पंक्ति की भाषा और “ताड़ना” शब्द को लेकर अलग-अलग पारंपरिक और आधुनिक व्याख्याएँ मिलती हैं। इसे आज किसी जाति, स्त्री या किसी भी व्यक्ति के प्रति हिंसा अथवा अपमान का समर्थन समझना उचित नहीं है।
चौपाई

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव कहते हैं— आपके प्रताप से मैं सूख भी सकता हूँ और आपकी सेना पार उतर सकती है, पर इसमें मेरी कोई महिमा नहीं होगी।

आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अतः जो आपको उचित लगे, मैं उसे शीघ्र करने के लिए तैयार हूँ।
॥ दोहा 59 ॥

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

दोहा का सरल भावार्थ
समुद्र के अत्यंत विनम्र वचन सुनकर कृपालु श्रीराम मुस्कराए और बोले—

हे तात! ऐसा उपाय बताओ जिससे पूरी वानर-सेना समुद्र के पार उतर सके।

॥ नल-नील द्वारा सेतु का उपाय ॥

चौपाई

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव ने कहा— हे नाथ! नील और नल नाम के दो वानर भाई हैं, जिन्हें बचपन में ऋषि का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।

उनके स्पर्श से भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर सकेंगे।
चौपाई

मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव कहते हैं— मैं भी प्रभु की महिमा हृदय में धारण करके अपनी क्षमता के अनुसार इस कार्य में सहायता करूँगा।

हे नाथ! नल-नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनवाइए, जिससे आपका यह महान यश तीनों लोकों में गाया जाए।
चौपाई

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।

सरल भावार्थ
समुद्रदेव ने श्रीराम से अपने उत्तर तट पर अत्याचार करने वाले दुष्टों से रक्षा का निवेदन किया।

कृपालु श्रीराम ने समुद्र की पीड़ा सुनी और उसका समाधान किया।
चौपाई

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम का महान बल और पराक्रम देखकर समुद्रदेव अत्यंत प्रसन्न और संतुष्ट हुआ।

उसने अपनी पूरी बात प्रभु से कही, फिर श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके अपने स्थान को लौट गया।

॥ सुन्दरकाण्ड का अंतिम छंद ॥

॥ छंद ॥

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

छंद का सरल भावार्थ
समुद्र अपने स्थान को लौट गया और उसका बताया हुआ उपाय श्रीरघुनाथ को अच्छा लगा।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार इस चरित्र का गान किया है, जो कलियुग के दोषों को दूर करने वाला है।

श्रीराम के गुण सुख के धाम, संशय को मिटाने वाले और विषाद को दूर करने वाले हैं।

इसलिए हे मन! अन्य आशाओं का मोह छोड़कर निरंतर श्रीरघुनाथ के गुणों का श्रद्धापूर्वक गान और श्रवण कर।
॥ अंतिम दोहा 60 ॥

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

अंतिम दोहे का सरल भावार्थ
श्रीरघुनाथ के गुणों का गान समस्त शुभ और मंगल प्रदान करने वाला है।

जो श्रद्धा और आदर के साथ इसका श्रवण करते हैं, वे प्रभु की कृपा से संसाररूपी भवसागर को पार करने का मार्ग पाते हैं।
॥ सुन्दरकाण्ड सम्पूर्ण ॥
मासपारायण — चौबीसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।

🌺 श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु 🌺

🌺 सुन्दरकाण्ड का अंतिम संदेश

सुन्दरकाण्ड की यात्रा हनुमान जी के श्रीराम-कार्य के लिए प्रस्थान से आरंभ होकर भक्ति, साहस, विवेक, सेवा, शरणागति और प्रभु-कृपा के अनेक दिव्य प्रसंगों से गुजरती है।

हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि सामर्थ्य का वास्तविक सौंदर्य अहंकार में नहीं, बल्कि उसे प्रभु के कार्य और दूसरों के कल्याण में लगाने में है।

विभीषण का प्रसंग शरणागति का संदेश देता है, माता सीता का प्रसंग अटल विश्वास का, और श्रीराम का स्वभाव करुणा, मर्यादा तथा धर्म का मार्ग दिखाता है।

सुन्दरकाण्ड का मूल भाव यही है— विश्वास श्रीराम में हो, सेवा हनुमान जी जैसी हो और कठिन परिस्थिति में भी धर्म का मार्ग न छोड़ा जाए।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस अंतिम भाग में दोहा 58, दोहा 59, दोहा 60 से पूर्व की सभी चौपाइयाँ, अंतिम छंद तथा दोहा 60 को क्रमवार प्रस्तुत किया गया है।
॥ श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान — सुन्दरकाण्ड यहाँ सम्पूर्ण होता है ॥
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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