सुंदरकांड भाग 21: श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, नल-नील का उपाय और सुंदरकांड समापन | दोहा 58–60
तब प्रभु समझाते हैं कि जहाँ विनय और प्रेम का उचित प्रभाव न पड़े, वहाँ दृढ़ता आवश्यक हो जाती है।
श्रीराम के संकल्प को देखकर समुद्रदेव विनम्र होकर उपस्थित होते हैं, अपनी मर्यादा बताते हैं और नल-नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनाने का उपाय बताते हैं।
इसी दिव्य प्रसंग के साथ श्रीरामचरितमानस के पञ्चम सोपान — सुन्दरकाण्ड का समापन होता है।
॥ श्रीराम का समुद्र पर क्रोध ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
प्रभु बताते हैं कि जहाँ विनय, प्रेम और उत्तम नीति का सम्मान ही न हो, वहाँ केवल विनम्रता से कार्य सिद्ध होना कठिन हो सकता है।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
यदि ग्रहण करने की तैयारी ही न हो, तो उसका परिणाम ऊसर भूमि में बीज बोने जैसा हो सकता है।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
प्रभु ने शक्तिशाली बाण का संधान किया, जिसके प्रभाव से समुद्र अत्यंत व्याकुल हो उठा।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
वह ब्राह्मण रूप धारण करके, सोने के पात्र में अनेक रत्न लेकर विनम्रतापूर्वक श्रीराम के सामने उपस्थित हुआ।
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
कभी-कभी अनुशासन और दृढ़ता के बाद ही व्यक्ति उचित बात स्वीकार करता है।
॥ समुद्रदेव की विनती ॥
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— ये पंचमहाभूत अपनी-अपनी प्रकृति और मर्यादा के अनुसार कार्य करते हैं।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
जिसे प्रभु ने जैसी मर्यादा प्रदान की है, वह उसी के अनुसार रहकर उचित रूप से अपना कार्य करता है।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
इसके बाद मूल मानस में उपर्युक्त प्रसिद्ध पंक्ति आती है। इस पंक्ति की भाषा और “ताड़ना” शब्द को लेकर अलग-अलग पारंपरिक और आधुनिक व्याख्याएँ मिलती हैं। इसे आज किसी जाति, स्त्री या किसी भी व्यक्ति के प्रति हिंसा अथवा अपमान का समर्थन समझना उचित नहीं है।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अतः जो आपको उचित लगे, मैं उसे शीघ्र करने के लिए तैयार हूँ।
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
हे तात! ऐसा उपाय बताओ जिससे पूरी वानर-सेना समुद्र के पार उतर सके।
॥ नल-नील द्वारा सेतु का उपाय ॥
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
उनके स्पर्श से भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तैर सकेंगे।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
हे नाथ! नल-नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु बनवाइए, जिससे आपका यह महान यश तीनों लोकों में गाया जाए।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
कृपालु श्रीराम ने समुद्र की पीड़ा सुनी और उसका समाधान किया।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
उसने अपनी पूरी बात प्रभु से कही, फिर श्रीराम के चरणों में प्रणाम करके अपने स्थान को लौट गया।
॥ सुन्दरकाण्ड का अंतिम छंद ॥
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि के अनुसार इस चरित्र का गान किया है, जो कलियुग के दोषों को दूर करने वाला है।
श्रीराम के गुण सुख के धाम, संशय को मिटाने वाले और विषाद को दूर करने वाले हैं।
इसलिए हे मन! अन्य आशाओं का मोह छोड़कर निरंतर श्रीरघुनाथ के गुणों का श्रद्धापूर्वक गान और श्रवण कर।
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।
जो श्रद्धा और आदर के साथ इसका श्रवण करते हैं, वे प्रभु की कृपा से संसाररूपी भवसागर को पार करने का मार्ग पाते हैं।
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः ।
🌺 श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु 🌺
🌺 सुन्दरकाण्ड का अंतिम संदेश
सुन्दरकाण्ड की यात्रा हनुमान जी के
श्रीराम-कार्य के लिए प्रस्थान से आरंभ होकर
भक्ति, साहस, विवेक, सेवा, शरणागति और प्रभु-कृपा के
अनेक दिव्य प्रसंगों से गुजरती है।
हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि
सामर्थ्य का वास्तविक सौंदर्य अहंकार में नहीं,
बल्कि उसे प्रभु के कार्य और दूसरों के कल्याण में लगाने में है।
विभीषण का प्रसंग शरणागति का संदेश देता है,
माता सीता का प्रसंग अटल विश्वास का,
और श्रीराम का स्वभाव करुणा, मर्यादा तथा धर्म का मार्ग दिखाता है।
सुन्दरकाण्ड का मूल भाव यही है—
विश्वास श्रीराम में हो, सेवा हनुमान जी जैसी हो
और कठिन परिस्थिति में भी धर्म का मार्ग न छोड़ा जाए।
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