सुंदरकांड भाग 13: माता सीता की चूड़ामणि, हनुमान जी की वापसी और मधुवन | दोहा 27–29 अर्थ सहित
अब उनका श्रीराम के पास लौटने का समय है। हनुमान जी माता सीता से कोई ऐसा चिह्न माँगते हैं, जिसे देखकर श्रीराम को उनके दर्शन और संदेश का पूर्ण विश्वास हो जाए।
माता जानकी अपनी चूड़ामणि हनुमान जी को सौंपती हैं और प्रभु श्रीराम के लिए अपना संदेश देती हैं। इसके बाद हनुमान जी समुद्र पार कर पुनः वानर-सेना के पास लौटते हैं।
॥ माता सीता द्वारा चूड़ामणि प्रदान करना ॥
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
तब माता सीता ने अपनी चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को दी। पवनपुत्र ने उसे अत्यंत प्रसन्नता और श्रद्धा के साथ ग्रहण किया।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
प्रभु स्वयं पूर्णकाम हैं और दीन-दुःखियों पर दया करना उनका स्वभाव है। उनसे कहना कि अपने दीनदयाल स्वरूप का स्मरण करके मेरे इस बड़े संकट को दूर करें।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
साथ ही उन्हें मेरे संकट की गंभीरता बताना और शीघ्र लंका आने का निवेदन करना।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
तुम्हें देखकर मेरे हृदय को बहुत सांत्वना मिली थी। तुम्हारे जाने के बाद मेरे लिए फिर वही कठिन दिन और रात होंगे।
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
इसके बाद उनके चरण-कमलों में सिर झुकाकर श्रीराम के पास लौटने के लिए प्रस्थान किया।
॥ समुद्र पार कर वानर-सेना के पास वापसी ॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
फिर वे विशाल समुद्र को पार करके इस ओर पहुँचे और उन्होंने अपने वानर साथियों को अपनी आगमन-ध्वनि सुनाई।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
हनुमान जी का प्रसन्न मुख और तेजस्वी शरीर देखकर सभी समझ गए कि श्रीराम का कार्य सफल हुआ है।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
वे सब प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथ के पास चल पड़े। रास्ते में वे हनुमान जी से लंका के अद्भुत समाचार पूछते और सुनते रहे।
॥ मधुवन में वानरों का आनंद ॥
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
जब वन के रखवालों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो वानरों ने उन्हें परास्त कर दिया और वे भागकर समाचार देने चले गए।
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
यह सुनकर सुग्रीव क्रोधित नहीं हुए, बल्कि प्रसन्न हुए। उन्होंने समझ लिया कि वानर अवश्य श्रीराम का कार्य सफल करके लौटे हैं, तभी उनमें इतना उत्साह है।
॥ सुग्रीव से मिलकर श्रीराम की ओर प्रस्थान ॥
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
इतने में अंगद, हनुमान जी और अन्य सभी वानर वहाँ पहुँच गए।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
उन्होंने उनका कुशल-मंगल पूछा। वानरों ने कहा कि आपके चरणों का दर्शन करके अब सब कुशल है और श्रीराम की कृपा से महान कार्य सफल हो गया है।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
यह सुनकर सुग्रीव ने हनुमान जी को फिर प्रेम से अपनाया और सभी वानरों को साथ लेकर श्रीराम के पास चल पड़े।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
श्रीराम और लक्ष्मण स्फटिक शिला पर बैठे थे। सभी वानर जाकर उनके चरणों में गिर पड़े।
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
वानरों ने कहा— हे प्रभु! आपके चरण-कमलों के दर्शन के बाद अब सब प्रकार से कुशल है।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस प्रसंग में हनुमान जी की सफल सेवा का फल दिखाई देता है।
वे माता सीता की चूड़ामणि लेकर लौटते हैं,
लेकिन अपनी सफलता का श्रेय स्वयं नहीं लेते।
उनका प्रत्येक कदम श्रीराम के कार्य की पूर्ति के लिए है।
दूसरी ओर सुग्रीव केवल वानरों के व्यवहार को देखकर समझ जाते हैं
कि माता सीता का समाचार मिल चुका है।
सफल सेवा पूरे समूह में उत्साह और आनंद भर देती है।
सच्ची सेवा वह है जिसमें कार्य सिद्ध होने पर भी अहंकार नहीं,
बल्कि प्रभु के चरणों तक शीघ्र समाचार पहुँचाने की लगन हो।
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