सुंदरकांड भाग 7: त्रिजटा का स्वप्न और माता सीता को आश्वासन | दोहा 11 अर्थ सहित
उन्हीं राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक विवेकशील स्त्री थी, जिसके हृदय में श्रीराम के चरणों के प्रति श्रद्धा थी।
त्रिजटा ने एक विलक्षण स्वप्न देखा था। उस स्वप्न में उसने लंका और रावण के आने वाले परिणाम तथा श्रीराम की विजय के स्पष्ट संकेत देखे।
॥ त्रिजटा का स्वप्न ॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा— यदि तुम अपना कल्याण चाहती हो तो माता सीता की सेवा और सम्मान करो।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
उसने रावण को अत्यंत अपमानजनक और पराजित अवस्था में दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखा। यह स्वप्न उसके आने वाले पतन का संकेत था।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
पूरे नगर में श्रीरघुवीर की जय-जयकार होने लगी और इसके बाद भगवान श्रीराम ने माता सीता को अपने पास बुला भेजा।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
उसकी बात सुनकर सभी राक्षसियाँ भयभीत हो गईं और माता जानकी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा एवं शरण माँगने लगीं।
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
माता सीता के मन में रावण द्वारा दी गई समय-सीमा और आने वाले संकट की चिंता बनी रही। फिर भी उनका हृदय और विश्वास केवल श्रीराम में स्थित था।
🌺 इस प्रसंग का भाव
त्रिजटा का प्रसंग सुन्दरकाण्ड में आशा की एक महत्वपूर्ण किरण बनकर आता है।
चारों ओर प्रतिकूल वातावरण होने के बाद भी
उसी लंका में विभीषण जैसे श्रीराम-भक्त और त्रिजटा जैसी विवेकशील पात्र उपस्थित हैं।
त्रिजटा का स्वप्न आने वाले परिवर्तन का संकेत देता है—
अधर्म का प्रभाव कितना भी बड़ा दिखाई दे,
वह स्थायी नहीं होता।
इस प्रसंग का सुंदर संदेश है—
कठिन समय में भी आशा और प्रभु पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।