सुंदरकांड भाग 7: त्रिजटा का स्वप्न और माता सीता को आश्वासन | दोहा 11 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 7 • त्रिजटा का स्वप्न
रावण के चले जाने के बाद उसके आदेश पर राक्षसियाँ माता सीता को भयभीत करने लगती हैं।

उन्हीं राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक विवेकशील स्त्री थी, जिसके हृदय में श्रीराम के चरणों के प्रति श्रद्धा थी।

त्रिजटा ने एक विलक्षण स्वप्न देखा था। उस स्वप्न में उसने लंका और रावण के आने वाले परिणाम तथा श्रीराम की विजय के स्पष्ट संकेत देखे।

॥ त्रिजटा का स्वप्न ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 11
चौपाई

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

सरल भावार्थ
वहाँ त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी। वह विवेकशील थी और उसके हृदय में भगवान श्रीराम के चरणों के प्रति प्रेम था।

उसने सभी राक्षसियों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा— यदि तुम अपना कल्याण चाहती हो तो माता सीता की सेवा और सम्मान करो।
चौपाई

सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

सरल भावार्थ
त्रिजटा ने बताया कि उसने स्वप्न में देखा— एक वानर ने लंका को जला दिया और राक्षसों की सेना पर विजय प्राप्त की।

उसने रावण को अत्यंत अपमानजनक और पराजित अवस्था में दक्षिण दिशा की ओर जाते हुए देखा। यह स्वप्न उसके आने वाले पतन का संकेत था।
चौपाई

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

सरल भावार्थ
त्रिजटा ने स्वप्न में देखा कि रावण दक्षिण दिशा की ओर चला गया और लंका मानो विभीषण को प्राप्त हो गई।

पूरे नगर में श्रीरघुवीर की जय-जयकार होने लगी और इसके बाद भगवान श्रीराम ने माता सीता को अपने पास बुला भेजा।
चौपाई

यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

सरल भावार्थ
त्रिजटा ने स्पष्ट रूप से कहा— मैं तुम्हें पुकार-पुकारकर बता रही हूँ कि यह स्वप्न शीघ्र सत्य होने वाला है।

उसकी बात सुनकर सभी राक्षसियाँ भयभीत हो गईं और माता जानकी के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा एवं शरण माँगने लगीं।
॥ दोहा 11 ॥

जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

दोहा का सरल भावार्थ
इसके बाद सभी राक्षसियाँ वहाँ से अलग-अलग चली गईं।

माता सीता के मन में रावण द्वारा दी गई समय-सीमा और आने वाले संकट की चिंता बनी रही। फिर भी उनका हृदय और विश्वास केवल श्रीराम में स्थित था।

🌺 इस प्रसंग का भाव

त्रिजटा का प्रसंग सुन्दरकाण्ड में आशा की एक महत्वपूर्ण किरण बनकर आता है।

चारों ओर प्रतिकूल वातावरण होने के बाद भी उसी लंका में विभीषण जैसे श्रीराम-भक्त और त्रिजटा जैसी विवेकशील पात्र उपस्थित हैं।

त्रिजटा का स्वप्न आने वाले परिवर्तन का संकेत देता है— अधर्म का प्रभाव कितना भी बड़ा दिखाई दे, वह स्थायी नहीं होता।

इस प्रसंग का सुंदर संदेश है— कठिन समय में भी आशा और प्रभु पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में त्रिजटा प्रसंग से दोहा 11 तक का मूल पाठ प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — माता सीता की गहन विरह-व्यथा और श्रीराम की मुद्रिका
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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