सुंदरकांड भाग 16: विभीषण का नीति-उपदेश, रावण का क्रोध और लंका त्याग | दोहा 38–41 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 16 • विभीषण का नीति-उपदेश, रावण का क्रोध एवं लंका त्याग
रावण की सभा में उसके मंत्री भय और स्वार्थ के कारण उसे वही बातें बता रहे हैं जो उसे सुनना अच्छा लगता है।

इसी समय विभीषण सभा में आते हैं। वे अपने बड़े भाई रावण के चरणों में प्रणाम करके अत्यंत विनम्रता से धर्म, नीति और कल्याण का मार्ग बताते हैं।

विभीषण बार-बार समझाते हैं कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं और माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटाकर उनकी शरण ग्रहण करना ही उचित है।

लेकिन रावण का अभिमान सत्य स्वीकार नहीं करता। अंततः वह विभीषण का अपमान करता है और यही घटना विभीषण के श्रीराम की शरण में जाने का मार्ग बनती है।

॥ विभीषण का नीति-उपदेश ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 38 से दोहा 41 तक
चौपाई

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

सरल भावार्थ
रावण के मंत्री उसकी वास्तविक स्थिति बताने के बजाय उसकी प्रशंसा करके उसके अभिमान को बढ़ा रहे थे।

उसी समय अवसर देखकर विभीषण सभा में आए और अपने बड़े भाई रावण के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।
चौपाई

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

सरल भावार्थ
विभीषण फिर प्रणाम करके अपने आसन पर बैठे और बोलने की अनुमति मिलने पर अत्यंत विनम्रता से बोले—

हे तात! यदि आप मुझसे सलाह पूछ रहे हैं, तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही कहूँगा जिसमें आपका सच्चा हित हो।
चौपाई

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— जो मनुष्य अपना कल्याण, अच्छा यश, सद्बुद्धि, श्रेष्ठ गति और अनेक प्रकार का सुख चाहता है,

उसे पराई स्त्री की ओर अनुचित दृष्टि से वैसे ही बचना चाहिए जैसे लोग चौथ के चंद्रमा के दर्शन से बचते हैं।
चौपाई

चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

सरल भावार्थ
विभीषण समझाते हैं कि कोई व्यक्ति चाहे चौदहों लोकों का स्वामी ही क्यों न हो, यदि वह जीवों से द्रोह करता है तो उसका वैभव स्थायी नहीं रह सकता।

और कोई व्यक्ति कितना ही गुणवान क्यों न हो, थोड़ा-सा लोभ भी उसके लिए अच्छा नहीं माना जाता।
॥ दोहा 38 ॥

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— हे नाथ! काम, क्रोध, अभिमान और लोभ सभी पतन की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं।

इन सबको त्यागकर श्रीरघुवीर का भजन कीजिए, जिनका संतजन प्रेमपूर्वक स्मरण और भजन करते हैं।

॥ श्रीराम साधारण मनुष्य नहीं हैं ॥

चौपाई

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— हे तात! श्रीराम कोई साधारण मनुष्य या केवल राजा नहीं हैं।

वे समस्त जगत के स्वामी, काल के भी काल, अजन्मा, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत भगवान हैं।
चौपाई

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।

सरल भावार्थ
वे गौ, ब्राह्मण और देवताओं का हित करने वाले और कृपा के समुद्र हैं।

उन्होंने मानव रूप धारण करके भक्तों को आनंद देने, दुष्टों का नाश करने और वेद-धर्म की रक्षा करने का कार्य स्वीकार किया है।
चौपाई

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।

सरल भावार्थ
विभीषण रावण से कहते हैं— ऐसे श्रीरघुनाथ से वैर छोड़कर उनके सामने सिर झुकाइए।

माता वैदेही को प्रभु श्रीराम को लौटा दीजिए और उन श्रीराम का भजन कीजिए जो बिना किसी स्वार्थ के अपने भक्तों से प्रेम करते हैं।
चौपाई

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— यदि कोई अत्यंत बड़ा अपराधी भी सच्चे मन से प्रभु की शरण में जाए, तो श्रीराम उसे नहीं त्यागते।

जिनका नाम जीव के तीनों प्रकार के तापों को दूर करने वाला है, हे रावण! उन्हीं प्रभु को सामने उपस्थित समझो।
॥ दोहा 39(क) ॥

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण अत्यंत विनम्र होकर कहते हैं— हे दशानन! मैं बार-बार आपके चरणों में पड़कर निवेदन करता हूँ।

अभिमान, मोह और मद को त्यागकर कोसलपति श्रीराम का भजन कीजिए।
॥ दोहा 39(ख) ॥

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण बताते हैं कि महर्षि पुलस्त्य ने अपने शिष्य के माध्यम से यह हितकारी संदेश भेजा था।

उचित अवसर पाकर विभीषण ने वही संदेश रावण के सामने भी रख दिया।

॥ सुमति और कुमति की नीति ॥

चौपाई

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।

सरल भावार्थ
रावण का वृद्ध और बुद्धिमान मंत्री माल्यवंत विभीषण की नीति-युक्त बात सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ।

उसने रावण से कहा— आपका छोटा भाई विभीषण नीति का भूषण है; जो यह कह रहा है उसे हृदय में धारण कीजिए।
चौपाई

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

सरल भावार्थ
लेकिन रावण ने सत्य को स्वीकार करने के बजाय विभीषण और माल्यवंत की बात को शत्रु की प्रशंसा समझा।

माल्यवंत अपने घर लौट गए, पर विभीषण फिर भी हाथ जोड़कर भाई का कल्याण समझाते रहे।
चौपाई

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— सद्बुद्धि और दुर्बुद्धि दोनों की संभावना प्रत्येक मनुष्य के भीतर रहती है।

शास्त्र बताते हैं कि जहाँ सद्बुद्धि होती है वहाँ अनेक प्रकार की संपत्ति और कल्याण आता है, और जहाँ दुर्बुद्धि होती है वहाँ विपत्ति जन्म लेती है।
चौपाई

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।

सरल भावार्थ
विभीषण रावण से कहते हैं— आपके हृदय में इस समय विपरीत बुद्धि बस गई है।

इसी कारण जो आपके सच्चे हित की बात कहता है वह आपको शत्रु जैसा लगता है, और जो विनाश का कारण है उसी से आपको मोह हो गया है।
॥ दोहा 40 ॥

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण अंतिम बार अत्यंत प्रेम से कहते हैं— हे तात! आपके चरण पकड़कर निवेदन करता हूँ, मेरे भाई के प्रेम का मान रखिए।

माता सीता को श्रीराम को लौटा दीजिए; इसमें आपका कोई अहित नहीं होगा।

॥ रावण का क्रोध और विभीषण का लंका त्याग ॥

चौपाई

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।

सरल भावार्थ
विभीषण ने बुद्धिमानों, पुराणों और वेदों के अनुरूप नीति से भरी हुई बात कही।

लेकिन उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठ खड़ा हुआ और विभीषण को कठोर वचन कहने लगा।
चौपाई

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।

सरल भावार्थ
रावण अहंकार में विभीषण पर शत्रु का पक्ष लेने का आरोप लगाता है।

वह अपनी शक्ति का घमंड करते हुए कहता है कि संसार में ऐसा कौन है जिसे उसने अपने बाहुबल से नहीं जीता।
चौपाई

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।

सरल भावार्थ
रावण कहता है— मेरी नगरी में रहकर तुम मेरे विरोधियों से प्रेम रखते हो; जाओ उन्हीं से मिलो और उन्हें अपनी नीति सुनाओ।

क्रोध में उसने विभीषण का अपमान किया, फिर भी विभीषण ने बड़े भाई का सम्मान नहीं छोड़ा।
चौपाई

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— संत की यही महानता है कि कोई उसके साथ बुरा करे, फिर भी वह उसका कल्याण ही चाहता है।

विभीषण रावण से कहते हैं— आप मेरे लिए पिता के समान हैं; आपने मुझे अपमानित किया तब भी मैं आपका हित ही चाहता हूँ। आपका कल्याण श्रीराम के भजन में ही है।
चौपाई

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।

सरल भावार्थ
इसके बाद विभीषण अपने विश्वस्त साथियों को साथ लेकर आकाश मार्ग से लंका से निकल गए।

उन्होंने सबको स्पष्ट कर दिया कि अब वे श्रीरघुवीर की शरण में जा रहे हैं।
॥ दोहा 41 ॥

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— श्रीराम सत्य-संकल्प प्रभु हैं और हे रावण! तुम्हारी सभा अब काल के वश में जा चुकी है।

अतः अब मैं श्रीरघुवीर की शरण में जा रहा हूँ। इसके लिए मुझे दोष मत देना।

🌺 इस प्रसंग का भाव

विभीषण का यह प्रसंग हमें बताता है कि सच्चा हितैषी वह नहीं जो केवल हमारी पसंद की बात कहे, बल्कि वह है जो कठिन होने पर भी सत्य और कल्याण की बात कहे।

विभीषण ने रावण को बार-बार प्रेम, विनम्रता और नीति से समझाया। अपमान मिलने के बाद भी उनके मन में भाई के प्रति द्वेष नहीं आया।

लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि रावण सत्य स्वीकार करने को तैयार नहीं है, तब विभीषण ने अधर्म का साथ छोड़कर श्रीराम की शरण ग्रहण करने का निर्णय लिया।

सच्ची भक्ति केवल प्रभु का नाम लेने में नहीं, बल्कि कठिन समय में भी धर्म और सत्य का पक्ष चुनने में दिखाई देती है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 38, दोहा 39(क), दोहा 39(ख), दोहा 40 और दोहा 41 तथा इनके अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत की गई हैं।
अगला प्रसंग — विभीषण का श्रीराम की शरण में पहुँचना और शरणागत-वात्सल्य
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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