सुंदरकांड भाग 16: विभीषण का नीति-उपदेश, रावण का क्रोध और लंका त्याग | दोहा 38–41 अर्थ सहित
इसी समय विभीषण सभा में आते हैं। वे अपने बड़े भाई रावण के चरणों में प्रणाम करके अत्यंत विनम्रता से धर्म, नीति और कल्याण का मार्ग बताते हैं।
विभीषण बार-बार समझाते हैं कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं और माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटाकर उनकी शरण ग्रहण करना ही उचित है।
लेकिन रावण का अभिमान सत्य स्वीकार नहीं करता। अंततः वह विभीषण का अपमान करता है और यही घटना विभीषण के श्रीराम की शरण में जाने का मार्ग बनती है।
॥ विभीषण का नीति-उपदेश ॥
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
उसी समय अवसर देखकर विभीषण सभा में आए और अपने बड़े भाई रावण के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
हे तात! यदि आप मुझसे सलाह पूछ रहे हैं, तो मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही कहूँगा जिसमें आपका सच्चा हित हो।
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
उसे पराई स्त्री की ओर अनुचित दृष्टि से वैसे ही बचना चाहिए जैसे लोग चौथ के चंद्रमा के दर्शन से बचते हैं।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
और कोई व्यक्ति कितना ही गुणवान क्यों न हो, थोड़ा-सा लोभ भी उसके लिए अच्छा नहीं माना जाता।
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।
इन सबको त्यागकर श्रीरघुवीर का भजन कीजिए, जिनका संतजन प्रेमपूर्वक स्मरण और भजन करते हैं।
॥ श्रीराम साधारण मनुष्य नहीं हैं ॥
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
वे समस्त जगत के स्वामी, काल के भी काल, अजन्मा, सर्वव्यापक, अजेय, अनादि और अनंत भगवान हैं।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
उन्होंने मानव रूप धारण करके भक्तों को आनंद देने, दुष्टों का नाश करने और वेद-धर्म की रक्षा करने का कार्य स्वीकार किया है।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
माता वैदेही को प्रभु श्रीराम को लौटा दीजिए और उन श्रीराम का भजन कीजिए जो बिना किसी स्वार्थ के अपने भक्तों से प्रेम करते हैं।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
जिनका नाम जीव के तीनों प्रकार के तापों को दूर करने वाला है, हे रावण! उन्हीं प्रभु को सामने उपस्थित समझो।
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
अभिमान, मोह और मद को त्यागकर कोसलपति श्रीराम का भजन कीजिए।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।
उचित अवसर पाकर विभीषण ने वही संदेश रावण के सामने भी रख दिया।
॥ सुमति और कुमति की नीति ॥
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
उसने रावण से कहा— आपका छोटा भाई विभीषण नीति का भूषण है; जो यह कह रहा है उसे हृदय में धारण कीजिए।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
माल्यवंत अपने घर लौट गए, पर विभीषण फिर भी हाथ जोड़कर भाई का कल्याण समझाते रहे।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
शास्त्र बताते हैं कि जहाँ सद्बुद्धि होती है वहाँ अनेक प्रकार की संपत्ति और कल्याण आता है, और जहाँ दुर्बुद्धि होती है वहाँ विपत्ति जन्म लेती है।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
इसी कारण जो आपके सच्चे हित की बात कहता है वह आपको शत्रु जैसा लगता है, और जो विनाश का कारण है उसी से आपको मोह हो गया है।
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
माता सीता को श्रीराम को लौटा दीजिए; इसमें आपका कोई अहित नहीं होगा।
॥ रावण का क्रोध और विभीषण का लंका त्याग ॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
लेकिन उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठ खड़ा हुआ और विभीषण को कठोर वचन कहने लगा।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
वह अपनी शक्ति का घमंड करते हुए कहता है कि संसार में ऐसा कौन है जिसे उसने अपने बाहुबल से नहीं जीता।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
क्रोध में उसने विभीषण का अपमान किया, फिर भी विभीषण ने बड़े भाई का सम्मान नहीं छोड़ा।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
विभीषण रावण से कहते हैं— आप मेरे लिए पिता के समान हैं; आपने मुझे अपमानित किया तब भी मैं आपका हित ही चाहता हूँ। आपका कल्याण श्रीराम के भजन में ही है।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
उन्होंने सबको स्पष्ट कर दिया कि अब वे श्रीरघुवीर की शरण में जा रहे हैं।
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
अतः अब मैं श्रीरघुवीर की शरण में जा रहा हूँ। इसके लिए मुझे दोष मत देना।
🌺 इस प्रसंग का भाव
विभीषण का यह प्रसंग हमें बताता है कि
सच्चा हितैषी वह नहीं जो केवल हमारी पसंद की बात कहे,
बल्कि वह है जो कठिन होने पर भी सत्य और कल्याण की बात कहे।
विभीषण ने रावण को बार-बार प्रेम,
विनम्रता और नीति से समझाया।
अपमान मिलने के बाद भी उनके मन में भाई के प्रति द्वेष नहीं आया।
लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि रावण सत्य स्वीकार करने को तैयार नहीं है,
तब विभीषण ने अधर्म का साथ छोड़कर श्रीराम की शरण ग्रहण करने का निर्णय लिया।
सच्ची भक्ति केवल प्रभु का नाम लेने में नहीं,
बल्कि कठिन समय में भी धर्म और सत्य का पक्ष चुनने में दिखाई देती है।
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