सुंदरकांड भाग 18: विभीषण को श्रीराम का आलिंगन, प्रभु का स्वभाव और लंका का राजतिलक | दोहा 46–49
उनकी विनम्र वाणी सुनते ही श्रीराम स्वयं उठकर उन्हें अपनी विशाल भुजाओं में भर लेते हैं।
अब प्रभु विभीषण से उनके जीवन और धर्मपालन की बात पूछते हैं। इसके बाद विभीषण अपने हृदय की अवस्था बताते हैं और श्रीराम अपने भक्त-स्वभाव का अत्यंत सुंदर रहस्य प्रकट करते हैं।
अंततः प्रभु विभीषण को अपना भक्त स्वीकार करके उन्हें लंका का भावी राजा घोषित करते हैं।
॥ श्रीराम ने विभीषण को हृदय से लगाया ॥
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
उनकी दीन और विनम्र वाणी प्रभु के हृदय को बहुत प्रिय लगी। श्रीराम ने अपनी विशाल भुजाओं से उन्हें पकड़कर हृदय से लगा लिया।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
श्रीराम बोले— हे लंकेश! अपना और अपने परिवार का कुशल-मंगल बताओ। तुम तो ऐसे स्थान में रहते थे जहाँ चारों ओर प्रतिकूल वातावरण था।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
प्रभु कहते हैं कि वे विभीषण के स्वभाव को जानते हैं— वे नीति में निपुण हैं और अधर्म उन्हें प्रिय नहीं है।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
विभीषण कहते हैं— हे श्रीरघुनाथ! अब आपके चरणों का दर्शन करके मैं कुशल हूँ, क्योंकि आपने मुझे अपना सेवक जानकर कृपा की है।
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।
॥ विभीषण के हृदय का परिवर्तन ॥
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
तब तक लोभ, मोह, ईर्ष्या, अभिमान और मान जैसी दोषपूर्ण वृत्तियाँ मनुष्य के हृदय में बनी रहती हैं।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का प्रकाश हृदय में नहीं आता, तब तक यह अज्ञानरूपी अंधकार बना रहता है।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
हे कृपालु! जिस पर आपकी कृपा होती है, उसे संसार के तीनों प्रकार के ताप विचलित नहीं कर पाते।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
फिर भी जिन प्रभु के स्वरूप को मुनिजन ध्यान में पाने का प्रयास करते हैं, उन्हीं प्रभु ने प्रसन्न होकर मुझे अपने हृदय से लगा लिया।
अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।
जिनकी सेवा ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे देवता भी करते हैं।
॥ श्रीराम ने अपना भक्त-स्वभाव बताया ॥
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
यदि कोई व्यक्ति पहले कितना ही विपरीत आचरण करने वाला रहा हो, लेकिन भय और पश्चात्ताप के साथ सच्चे मन से मेरी शरण में आ जाए—
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
माता-पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—इन सबके संबंध जीवन में होते हैं।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
जो समदर्शी है, जिसकी स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ शांत हो गई हैं और जिसका मन हर्ष, शोक तथा भय से विचलित नहीं होता—
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
श्रीराम विभीषण से कहते हैं— तुम्हारे जैसे संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं; भक्तों के हित के लिए ही मैं अवतार धारण करता हूँ।
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।
ऐसे भक्त मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।
॥ विभीषण का राजतिलक ॥
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
प्रभु की ऐसी वाणी सुनकर समस्त वानर-समूह श्रीराम की जय-जयकार करने लगा।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
वे बार-बार श्रीराम के चरण-कमलों को पकड़ते और उनके हृदय में अपार प्रेम उमड़ता जाता था।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
मेरे हृदय में पहले कुछ सांसारिक इच्छाएँ थीं, लेकिन आपके चरणों के प्रेम की धारा में वे सब बह गईं।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
श्रीराम ने “एवमस्तु”—ऐसा ही हो—कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और तुरंत समुद्र का जल मँगवाया।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
ऐसा कहकर श्रीराम ने विभीषण का राजतिलक किया और आकाश से पुष्पों की अपार वर्षा होने लगी।
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
और उन्हें अखंड लंका-राज्य प्रदान किया।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।
उसी संपदा का अधिकार श्रीरघुनाथ ने अपने शरणागत विभीषण को सहज कृपा से प्रदान कर दिया।
🌺 इस प्रसंग का भाव
यह प्रसंग श्रीराम के शरणागत-वात्सल्य की पूर्णता दिखाता है।
विभीषण प्रभु के पास राज्य माँगने नहीं आए थे।
वे केवल शरण और भक्ति चाहते थे।
श्रीराम पहले उन्हें अपने हृदय से लगाते हैं,
फिर अपना स्वभाव बताते हैं और अंत में
बिना माँगे उन्हें लंका का राज्य प्रदान कर देते हैं।
भक्त प्रभु से केवल भक्ति माँगता है,
लेकिन प्रभु अपने शरणागत के योगक्षेम और सम्मान का भी स्वयं ध्यान रखते हैं।
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