सुंदरकांड भाग 18: विभीषण को श्रीराम का आलिंगन, प्रभु का स्वभाव और लंका का राजतिलक | दोहा 46–49

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 18 • विभीषण को श्रीराम का आलिंगन एवं लंका का राजतिलक
विभीषण श्रीराम के सामने दीन भाव से अपनी शरणागति प्रकट कर चुके हैं।

उनकी विनम्र वाणी सुनते ही श्रीराम स्वयं उठकर उन्हें अपनी विशाल भुजाओं में भर लेते हैं।

अब प्रभु विभीषण से उनके जीवन और धर्मपालन की बात पूछते हैं। इसके बाद विभीषण अपने हृदय की अवस्था बताते हैं और श्रीराम अपने भक्त-स्वभाव का अत्यंत सुंदर रहस्य प्रकट करते हैं।

अंततः प्रभु विभीषण को अपना भक्त स्वीकार करके उन्हें लंका का भावी राजा घोषित करते हैं।

॥ श्रीराम ने विभीषण को हृदय से लगाया ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 46 से दोहा 49 तक
चौपाई

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।

सरल भावार्थ
विभीषण को दंडवत करते देखकर श्रीराम अत्यंत प्रसन्न होकर तुरंत उठे।

उनकी दीन और विनम्र वाणी प्रभु के हृदय को बहुत प्रिय लगी। श्रीराम ने अपनी विशाल भुजाओं से उन्हें पकड़कर हृदय से लगा लिया।
चौपाई

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम और लक्ष्मण प्रेमपूर्वक विभीषण से मिले और प्रभु ने उन्हें अपने समीप बैठाया।

श्रीराम बोले— हे लंकेश! अपना और अपने परिवार का कुशल-मंगल बताओ। तुम तो ऐसे स्थान में रहते थे जहाँ चारों ओर प्रतिकूल वातावरण था।
चौपाई

खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— हे सखा! तुम दिन-रात दुष्ट प्रवृत्ति वाले लोगों के बीच रहते थे; ऐसे वातावरण में धर्म का पालन कैसे करते रहे?

प्रभु कहते हैं कि वे विभीषण के स्वभाव को जानते हैं— वे नीति में निपुण हैं और अधर्म उन्हें प्रिय नहीं है।
चौपाई

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।

सरल भावार्थ
भाव यह है कि नरक में रहना भी सहन किया जा सकता है, परंतु दुष्ट संगति मनुष्य के धर्म और विवेक के लिए अत्यंत कठिन होती है।

विभीषण कहते हैं— हे श्रीरघुनाथ! अब आपके चरणों का दर्शन करके मैं कुशल हूँ, क्योंकि आपने मुझे अपना सेवक जानकर कृपा की है।
॥ दोहा 46 ॥

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

दोहा का सरल भावार्थ
जब तक जीव संसार की आसक्तियों को छोड़कर श्रीराम का भजन नहीं करता, तब तक उसे वास्तविक कल्याण और हृदय की शांति प्राप्त नहीं होती।

॥ विभीषण के हृदय का परिवर्तन ॥

चौपाई

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— जब तक धनुष-बाण धारण करने वाले श्रीरघुनाथ हृदय में निवास नहीं करते,

तब तक लोभ, मोह, ईर्ष्या, अभिमान और मान जैसी दोषपूर्ण वृत्तियाँ मनुष्य के हृदय में बनी रहती हैं।
चौपाई

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

सरल भावार्थ
ममता को अँधेरी रात के समान और राग-द्वेष को उसमें प्रसन्न रहने वाले उल्लुओं के समान बताया गया है।

जब तक प्रभु के प्रताप रूपी सूर्य का प्रकाश हृदय में नहीं आता, तब तक यह अज्ञानरूपी अंधकार बना रहता है।
चौपाई

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— अब आपके चरण-कमलों का दर्शन करके मेरे सारे बड़े भय मिट गए और मैं वास्तव में कुशल हो गया हूँ।

हे कृपालु! जिस पर आपकी कृपा होती है, उसे संसार के तीनों प्रकार के ताप विचलित नहीं कर पाते।
चौपाई

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।

सरल भावार्थ
विभीषण अपनी विनम्रता प्रकट करते हुए कहते हैं— मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ और मैं अपने भीतर कोई विशेष योग्यता नहीं देखता।

फिर भी जिन प्रभु के स्वरूप को मुनिजन ध्यान में पाने का प्रयास करते हैं, उन्हीं प्रभु ने प्रसन्न होकर मुझे अपने हृदय से लगा लिया।
॥ दोहा 47 ॥

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— मेरा सौभाग्य अनंत है कि कृपा और सुख के धाम श्रीराम के उन दोनों चरण-कमलों को मैंने अपनी आँखों से देखा,

जिनकी सेवा ब्रह्मा और भगवान शिव जैसे देवता भी करते हैं।

॥ श्रीराम ने अपना भक्त-स्वभाव बताया ॥

चौपाई

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— हे सखा! अब मैं तुम्हें अपना स्वभाव बताता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, भगवान शिव और माता पार्वती भी जानते हैं।

यदि कोई व्यक्ति पहले कितना ही विपरीत आचरण करने वाला रहा हो, लेकिन भय और पश्चात्ताप के साथ सच्चे मन से मेरी शरण में आ जाए—
चौपाई

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

सरल भावार्थ
और वह अभिमान, मोह तथा अनेक प्रकार के छल-कपट छोड़ दे, तो प्रभु उसे शीघ्र ही साधु के समान स्वीकार कर लेते हैं।

माता-पिता, भाई, पुत्र, पत्नी, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार—इन सबके संबंध जीवन में होते हैं।
चौपाई

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— जो इन सभी संबंधों की ममता को एकत्र करके अपने मन को मेरे चरणों से बाँध देता है,

जो समदर्शी है, जिसकी स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ शांत हो गई हैं और जिसका मन हर्ष, शोक तथा भय से विचलित नहीं होता—
चौपाई

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।

सरल भावार्थ
ऐसा सज्जन प्रभु के हृदय में उसी प्रकार बसता है जैसे लोभी व्यक्ति के मन में धन निरंतर बसा रहता है।

श्रीराम विभीषण से कहते हैं— तुम्हारे जैसे संत मुझे अत्यंत प्रिय हैं; भक्तों के हित के लिए ही मैं अवतार धारण करता हूँ।
॥ दोहा 48 ॥

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

दोहा का सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— जो सगुण भगवान की उपासना करते हैं, दूसरों के हित में लगे रहते हैं और नीति तथा नियम में दृढ़ रहते हैं,

ऐसे भक्त मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।

॥ विभीषण का राजतिलक ॥

चौपाई

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम विभीषण से कहते हैं— हे लंकेश! ये सभी उत्तम गुण तुम्हारे भीतर हैं, इसी कारण तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।

प्रभु की ऐसी वाणी सुनकर समस्त वानर-समूह श्रीराम की जय-जयकार करने लगा।
चौपाई

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।

सरल भावार्थ
प्रभु की अमृतमयी वाणी सुनकर विभीषण तृप्त ही नहीं हो पा रहे थे।

वे बार-बार श्रीराम के चरण-कमलों को पकड़ते और उनके हृदय में अपार प्रेम उमड़ता जाता था।
चौपाई

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— हे देव! हे समस्त चराचर के स्वामी! हे शरणागत की रक्षा करने वाले और सबके हृदय को जानने वाले प्रभु!

मेरे हृदय में पहले कुछ सांसारिक इच्छाएँ थीं, लेकिन आपके चरणों के प्रेम की धारा में वे सब बह गईं।
चौपाई

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।

सरल भावार्थ
विभीषण ने कहा— हे कृपालु! अब मुझे अपनी वह पवित्र भक्ति दीजिए जो भगवान शिव के मन को भी सदा प्रिय है।

श्रीराम ने “एवमस्तु”—ऐसा ही हो—कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की और तुरंत समुद्र का जल मँगवाया।
चौपाई

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— हे सखा! यद्यपि तुम्हारे मन में राज्य की इच्छा नहीं है, फिर भी संसार में मेरा दर्शन निष्फल नहीं जाता।

ऐसा कहकर श्रीराम ने विभीषण का राजतिलक किया और आकाश से पुष्पों की अपार वर्षा होने लगी।
॥ दोहा 49(क) ॥

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

दोहा का सरल भावार्थ
रावण के क्रोधरूपी अग्नि से पीड़ित विभीषण को श्रीराम ने अपनी शरण में सुरक्षित किया

और उन्हें अखंड लंका-राज्य प्रदान किया।
॥ दोहा 49(ख) ॥

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

दोहा का सरल भावार्थ
जिस लंका की महान संपदा रावण ने कठिन साधना के बाद भगवान शिव की कृपा से प्राप्त की थी,

उसी संपदा का अधिकार श्रीरघुनाथ ने अपने शरणागत विभीषण को सहज कृपा से प्रदान कर दिया।

🌺 इस प्रसंग का भाव

यह प्रसंग श्रीराम के शरणागत-वात्सल्य की पूर्णता दिखाता है।

विभीषण प्रभु के पास राज्य माँगने नहीं आए थे। वे केवल शरण और भक्ति चाहते थे।

श्रीराम पहले उन्हें अपने हृदय से लगाते हैं, फिर अपना स्वभाव बताते हैं और अंत में बिना माँगे उन्हें लंका का राज्य प्रदान कर देते हैं।

भक्त प्रभु से केवल भक्ति माँगता है, लेकिन प्रभु अपने शरणागत के योगक्षेम और सम्मान का भी स्वयं ध्यान रखते हैं।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 46, 47, 48, 49(क) और 49(ख) तथा इनके अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत की गई हैं।
अगला प्रसंग — समुद्र पार करने का उपाय, विभीषण की सलाह और श्रीराम का समुद्र से मार्ग माँगना
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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