सुंदरकांड भाग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आगमन और शरणागत-वात्सल्य | दोहा 42–45 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 17 • विभीषण की शरणागति एवं श्रीराम का शरणागत-वात्सल्य
रावण द्वारा अपमानित किए जाने के बाद विभीषण के हृदय में किसी प्रकार का प्रतिशोध नहीं है।

वे आनंदपूर्वक श्रीराम की ओर चल पड़ते हैं। रास्ते भर उनके मन में केवल एक ही इच्छा है— उन चरण-कमलों का दर्शन करना जिन्हें भरत जी ने अपने हृदय में धारण किया, जिनसे अहल्या का उद्धार हुआ और जो भक्तों को सुख देने वाले हैं।

लेकिन जब विभीषण श्रीराम की सेना के पास पहुँचते हैं, तो सुग्रीव के मन में स्वाभाविक शंका उत्पन्न होती है। यहीं श्रीराम अपना वह अमूल्य शरणागत-व्रत बताते हैं जो इस प्रसंग को सुन्दरकाण्ड के महानतम भक्ति-संदेशों में स्थान देता है।

॥ विभीषण का श्रीराम की ओर प्रस्थान ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 42 से दोहा 45 तक
चौपाई

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— जैसे ही विभीषण रावण को छोड़कर चले, उसी समय से रावण और उसके साथियों के विनाश का समय निकट आ गया।

संत का अपमान मनुष्य के समस्त कल्याण को नष्ट करने वाला होता है।
चौपाई

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

सरल भावार्थ
जिस क्षण रावण ने विभीषण का त्याग किया, उसी क्षण उसका सौभाग्य और वैभव भी उससे दूर होने लगा।

दूसरी ओर विभीषण अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथ की ओर चले और मन में अनेक सुंदर भाव करने लगे।
चौपाई

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।

सरल भावार्थ
विभीषण सोचते हैं— आज मैं उन लालिमा युक्त, कोमल और सेवकों को सुख देने वाले श्रीराम के चरण-कमलों का दर्शन करूँगा।

उन्हीं चरणों के स्पर्श से ऋषि-पत्नी अहल्या का उद्धार हुआ और उन्हीं चरणों ने दंडकारण्य को पवित्र किया।
चौपाई

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।

सरल भावार्थ
विभीषण उन श्रीराम के चरणों का स्मरण करते हैं जिन्हें माता जानकी ने हृदय में धारण किया और जो मायावी मृग के पीछे जाते समय पृथ्वी पर पड़े थे।

वे कहते हैं— भगवान शिव के हृदय रूपी सरोवर में कमल के समान विराजने वाले उन्हीं चरणों को आज अपनी आँखों से देखना मेरा महान सौभाग्य होगा।
॥ दोहा 42 ॥

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— जिन चरणों की पादुकाओं में भरत जी ने अपना मन लगाए रखा, आज उन्हीं श्रीराम के चरणों का मैं अपनी आँखों से दर्शन करूँगा।

॥ सुग्रीव की शंका ॥

चौपाई

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

सरल भावार्थ
इस प्रकार प्रेमपूर्वक श्रीराम के चरणों का चिंतन करते हुए विभीषण शीघ्र ही समुद्र के इस पार पहुँचे।

वानरों ने उन्हें आते देखा तो पहले उन्हें शत्रु पक्ष का कोई विशेष दूत समझा।
चौपाई

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

सरल भावार्थ
वानरों ने विभीषण को वहीं रोककर वानरराज सुग्रीव के पास जाकर उनका समाचार दिया।

तब सुग्रीव ने श्रीराम से कहा— हे रघुनाथ! रावण का भाई विभीषण आपसे मिलने आया है।
चौपाई

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

सरल भावार्थ
श्रीराम ने सुग्रीव से पूछा— हे सखा! तुम्हारा इस विषय में क्या विचार है?

सुग्रीव ने कहा— हे प्रभु! राक्षसों की माया को समझ पाना कठिन है। वह इच्छानुसार रूप बदल सकता है, इसलिए उसके आने का वास्तविक कारण तुरंत जानना कठिन है।
चौपाई

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

सरल भावार्थ
सुग्रीव का मत था कि संभव है विभीषण उनकी सेना का भेद लेने आया हो, इसलिए उसे रोककर रखना उचित होगा।

श्रीराम ने कहा— हे सखा! नीति की दृष्टि से तुम्हारा विचार उचित है, लेकिन मेरा प्रण है कि मैं शरण में आए हुए व्यक्ति का भय दूर करता हूँ।
चौपाई

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

सरल भावार्थ
श्रीराम का शरणागत के प्रति ऐसा प्रेम सुनकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए।

क्योंकि वे जानते थे कि प्रभु वास्तव में शरण में आने वाले पर असीम कृपा करने वाले हैं।
॥ दोहा 43 ॥

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

दोहा का सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— जो व्यक्ति अपने संभावित अहित की आशंका से शरण में आए हुए व्यक्ति को त्याग देता है, उसका ऐसा आचरण अत्यंत अनुचित है।

प्रभु के लिए शरणागत की रक्षा अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि से कहीं ऊपर है।

॥ श्रीराम का महान शरणागत-व्रत ॥

चौपाई

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— यदि कोई व्यक्ति अत्यंत बड़े अपराधों का भार लेकर भी सच्चे भाव से मेरी शरण में आ जाए, तो मैं उसे नहीं त्यागता।

जब जीव सच्चे मन से प्रभु की ओर मुड़ता है, तो उसके अनेक जन्मों के पापों का प्रभाव मिटने लगता है।
चौपाई

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— जिसका हृदय वास्तव में दुष्टता में ही डूबा हो, उसे मेरे भजन और मेरी शरण में आने की इच्छा ही नहीं होती।

यदि कोई सच्चे भाव से मेरे सामने शरण लेने आया है, तो उसके भीतर परिवर्तन और सद्भाव अवश्य उपस्थित है।
चौपाई

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।

सरल भावार्थ
प्रभु कहते हैं— निर्मल हृदय वाला व्यक्ति ही मुझे प्राप्त करता है। मुझे कपट, छल और दोष खोजने की प्रवृत्ति प्रिय नहीं है।

और यदि रावण ने विभीषण को हमारा भेद लेने के लिए भेजा भी हो, तो भी हमें उससे कोई भय या हानि नहीं हो सकती।
चौपाई

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— हे सखा! संसार में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण अकेले ही उन्हें क्षण भर में परास्त करने में समर्थ हैं।

इसलिए हमें विभीषण से कोई भय नहीं है। यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आया है, तो मैं उसकी अपने प्राणों के समान रक्षा करूँगा।
॥ दोहा 44 ॥

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

दोहा का सरल भावार्थ
कृपा के धाम श्रीराम ने मुस्कराकर कहा— चाहे वह शरणागत हो या भेद लेने आया हो, दोनों ही स्थितियों में उसे मेरे पास ले आओ।

प्रभु की आज्ञा पाकर अंगद और हनुमान जी “जय कृपाल” कहते हुए विभीषण को लेने चले।

॥ विभीषण का प्रथम श्रीराम-दर्शन ॥

चौपाई

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।

सरल भावार्थ
वानरों ने विभीषण को सम्मानपूर्वक आगे किया और उन्हें करुणामय श्रीराम के पास ले चले।

दूर से ही विभीषण ने श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन किया, जो नेत्रों को परम आनंद देने वाले थे।
चौपाई

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।

सरल भावार्थ
श्रीराम के सौंदर्य को देखकर विभीषण क्षण भर के लिए वहीं ठहर गए और एकटक प्रभु को निहारने लगे।

प्रभु की लंबी भुजाएँ, कमल के समान अरुण नेत्र, श्याम शरीर और शरणागत का भय हरने वाला स्वरूप उनके हृदय को मोह रहा था।
चौपाई

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।

सरल भावार्थ
श्रीराम के सिंह के समान कंधे, विशाल वक्षस्थल और अनुपम सुंदर मुख देखकर विभीषण भाव-विभोर हो गए।

उनकी आँखों में प्रेम के आँसू भर आए, शरीर रोमांचित हो गया और उन्होंने मन को संभालकर अत्यंत विनम्र वाणी में अपनी बात कही।
चौपाई

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।

सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— हे प्रभु! मैं दशानन रावण का भाई हूँ और राक्षस कुल में मेरा जन्म हुआ है।

मेरे जन्म और परिवेश में तमोगुण की प्रधानता रही है, जैसे उल्लू को स्वभावतः अंधकार प्रिय होता है। विभीषण अपने गुणों का बखान नहीं करते, बल्कि अत्यंत दीनता और विनम्रता से प्रभु के सामने स्वयं को प्रस्तुत करते हैं।
॥ दोहा 45 ॥

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण कहते हैं— हे प्रभु! संसार के भय को मिटाने वाले आपके सुंदर यश को सुनकर मैं आपकी शरण में आया हूँ।

हे दुःख हरने वाले, हे शरण में आए जीव को सुख देने वाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए।

🌺 इस प्रसंग का भाव

यह प्रसंग श्रीराम के शरणागत-वात्सल्य का अद्भुत स्वरूप प्रकट करता है।

सुग्रीव की सावधानी नीति की दृष्टि से उचित थी, लेकिन श्रीराम उससे भी ऊँचा अपना धर्म बताते हैं— जो भयभीत होकर उनकी शरण में आया है, उसकी रक्षा करना उनका प्रण है।

विभीषण भी श्रीराम के पास अपना कुल, पद अथवा ज्ञान लेकर नहीं आते। वे केवल दीन भाव से प्रभु की शरण माँगते हैं।

प्रभु की शरण का द्वार उस व्यक्ति के लिए खुलता है जो कपट छोड़कर निर्मल हृदय से उनकी ओर आता है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 42, 43, 44 और 45 के अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ और दोहे क्रमवार प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किए गए हैं।
अगला प्रसंग — श्रीराम द्वारा विभीषण को हृदय से लगाना, उनकी कुशल पूछना और विभीषण की भक्ति
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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