सुंदरकांड भाग 17: विभीषण का श्रीराम की शरण में आगमन और शरणागत-वात्सल्य | दोहा 42–45 अर्थ सहित
वे आनंदपूर्वक श्रीराम की ओर चल पड़ते हैं। रास्ते भर उनके मन में केवल एक ही इच्छा है— उन चरण-कमलों का दर्शन करना जिन्हें भरत जी ने अपने हृदय में धारण किया, जिनसे अहल्या का उद्धार हुआ और जो भक्तों को सुख देने वाले हैं।
लेकिन जब विभीषण श्रीराम की सेना के पास पहुँचते हैं, तो सुग्रीव के मन में स्वाभाविक शंका उत्पन्न होती है। यहीं श्रीराम अपना वह अमूल्य शरणागत-व्रत बताते हैं जो इस प्रसंग को सुन्दरकाण्ड के महानतम भक्ति-संदेशों में स्थान देता है।
॥ विभीषण का श्रीराम की ओर प्रस्थान ॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
संत का अपमान मनुष्य के समस्त कल्याण को नष्ट करने वाला होता है।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
दूसरी ओर विभीषण अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथ की ओर चले और मन में अनेक सुंदर भाव करने लगे।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
उन्हीं चरणों के स्पर्श से ऋषि-पत्नी अहल्या का उद्धार हुआ और उन्हीं चरणों ने दंडकारण्य को पवित्र किया।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
वे कहते हैं— भगवान शिव के हृदय रूपी सरोवर में कमल के समान विराजने वाले उन्हीं चरणों को आज अपनी आँखों से देखना मेरा महान सौभाग्य होगा।
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
॥ सुग्रीव की शंका ॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
वानरों ने उन्हें आते देखा तो पहले उन्हें शत्रु पक्ष का कोई विशेष दूत समझा।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
तब सुग्रीव ने श्रीराम से कहा— हे रघुनाथ! रावण का भाई विभीषण आपसे मिलने आया है।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
सुग्रीव ने कहा— हे प्रभु! राक्षसों की माया को समझ पाना कठिन है। वह इच्छानुसार रूप बदल सकता है, इसलिए उसके आने का वास्तविक कारण तुरंत जानना कठिन है।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
श्रीराम ने कहा— हे सखा! नीति की दृष्टि से तुम्हारा विचार उचित है, लेकिन मेरा प्रण है कि मैं शरण में आए हुए व्यक्ति का भय दूर करता हूँ।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
क्योंकि वे जानते थे कि प्रभु वास्तव में शरण में आने वाले पर असीम कृपा करने वाले हैं।
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
प्रभु के लिए शरणागत की रक्षा अपने व्यक्तिगत लाभ या हानि से कहीं ऊपर है।
॥ श्रीराम का महान शरणागत-व्रत ॥
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
जब जीव सच्चे मन से प्रभु की ओर मुड़ता है, तो उसके अनेक जन्मों के पापों का प्रभाव मिटने लगता है।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
यदि कोई सच्चे भाव से मेरे सामने शरण लेने आया है, तो उसके भीतर परिवर्तन और सद्भाव अवश्य उपस्थित है।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
और यदि रावण ने विभीषण को हमारा भेद लेने के लिए भेजा भी हो, तो भी हमें उससे कोई भय या हानि नहीं हो सकती।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
इसलिए हमें विभीषण से कोई भय नहीं है। यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण में आया है, तो मैं उसकी अपने प्राणों के समान रक्षा करूँगा।
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।
प्रभु की आज्ञा पाकर अंगद और हनुमान जी “जय कृपाल” कहते हुए विभीषण को लेने चले।
॥ विभीषण का प्रथम श्रीराम-दर्शन ॥
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
दूर से ही विभीषण ने श्रीराम और लक्ष्मण का दर्शन किया, जो नेत्रों को परम आनंद देने वाले थे।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
प्रभु की लंबी भुजाएँ, कमल के समान अरुण नेत्र, श्याम शरीर और शरणागत का भय हरने वाला स्वरूप उनके हृदय को मोह रहा था।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
उनकी आँखों में प्रेम के आँसू भर आए, शरीर रोमांचित हो गया और उन्होंने मन को संभालकर अत्यंत विनम्र वाणी में अपनी बात कही।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
मेरे जन्म और परिवेश में तमोगुण की प्रधानता रही है, जैसे उल्लू को स्वभावतः अंधकार प्रिय होता है। विभीषण अपने गुणों का बखान नहीं करते, बल्कि अत्यंत दीनता और विनम्रता से प्रभु के सामने स्वयं को प्रस्तुत करते हैं।
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।
हे दुःख हरने वाले, हे शरण में आए जीव को सुख देने वाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए।
🌺 इस प्रसंग का भाव
यह प्रसंग श्रीराम के शरणागत-वात्सल्य का अद्भुत स्वरूप प्रकट करता है।
सुग्रीव की सावधानी नीति की दृष्टि से उचित थी,
लेकिन श्रीराम उससे भी ऊँचा अपना धर्म बताते हैं—
जो भयभीत होकर उनकी शरण में आया है,
उसकी रक्षा करना उनका प्रण है।
विभीषण भी श्रीराम के पास अपना कुल,
पद अथवा ज्ञान लेकर नहीं आते।
वे केवल दीन भाव से प्रभु की शरण माँगते हैं।
प्रभु की शरण का द्वार उस व्यक्ति के लिए खुलता है
जो कपट छोड़कर निर्मल हृदय से उनकी ओर आता है।
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