श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–3, मूल पाठ और हिंदी भावार्थ

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

प्रथम स्कन्ध • भाग १ • अध्याय १–३

१०२ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

← ग्रंथालय में श्रीमद्भागवत महापुराण

नैमिषारण्य से भागवत-कथा का आरम्भ

नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषि सूतजी से मनुष्य के परम कल्याण का उपाय पूछते हैं। इन्हीं प्रश्नों से श्रीमद्भागवत का आरम्भ होता है। प्रथम अध्याय परम सत्य की वन्दना और ऋषियों की जिज्ञासाओं को सामने रखता है। दूसरे अध्याय में सूतजी निष्काम, अटूट भक्ति को परम धर्म बताते हैं। तीसरे अध्याय में पुरुषरूप, भगवान के अवतारों और भागवत के प्रवचन की परम्परा का वर्णन है।

यह प्रथम स्कन्ध का आरम्भिक भाग है। इसमें अध्याय 1 के 23, अध्याय 2 के 34 और अध्याय 3 के 45 श्लोक—कुल 102 श्लोक—मूल क्रम में हैं। हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है; यह किसी आधुनिक टीका का अक्षरशः अनुवाद नहीं है।

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 1

मङ्गलाचरण और शौनकादि ऋषियों के प्रश्न

श्लोक 1.1

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्महृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम उस परम सत्य का ध्यान करते हैं, जिससे जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। वह सबको प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जानने वाला, पूर्ण स्वतंत्र है। उसी ने आदिकवि ब्रह्मा के हृदय में वेदज्ञान प्रकट किया; उसके विषय में बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं। जैसे तेज, जल और मिट्टी के परस्पर आभास से भ्रम होता है, वैसे उसकी शक्ति से त्रिगुणमय जगत सत्य जैसा प्रतीत होता है; पर उसका अपना प्रकाश सदा समस्त छल और भ्रम से रहित है।

श्लोक 1.2

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् । श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस श्रीमद्भागवत में कपट और स्वार्थ से रहित परम धर्म का निरूपण है। ईर्ष्यारहित सज्जन इसके द्वारा वास्तविक, कल्याणकारी और तीनों प्रकार के दुःखों को जड़ से मिटाने वाले तत्त्व को जान सकते हैं। महामुनि की रची इस कथा को श्रद्धा और सुनने की अभिलाषा से ग्रहण करने वाले पुण्यात्माओं के हृदय में भगवान शीघ्र प्रतिष्ठित होते हैं।

श्लोक 1.3

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् । पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे रसिक और भावुक जनो! वेदरूपी कल्पवृक्ष का यह पका हुआ फल श्रीमद्भागवत है। शुकदेव के मुख से निकला होने के कारण यह अमृतमय रस से भरा है। इस भागवतरस का बार-बार आस्वादन करो।

श्लोक 1.4

नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः । सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के पावन क्षेत्र नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषि लोककल्याण और उत्तम आध्यात्मिक गति के लिए हजार वर्ष तक चलने वाले सत्र में बैठे थे।

श्लोक 1.5

त एकदा तु मुनयः प्रातर्हुतहुताग्नयः । सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन प्रातःकाल अग्निहोत्र पूरा करके उन मुनियों ने आदरपूर्वक आसन पर विराजमान सूतजी का सत्कार किया और उनसे प्रश्न पूछे।

श्लोक 1.6

ऋषय ऊचुः । त्वया खलु पुराणानि सेतिहासानि चानघ । आख्यातान्यप्यधीतानि धर्मशास्त्राणि यान्युत ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों ने कहा—हे निष्पाप सूतजी! आपने इतिहासों सहित पुराणों और धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है और उनका विवेचन भी सुना-सुनाया है।

श्लोक 1.7

यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः । अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ भगवान वेदव्यास और तत्त्व के ज्ञाता अन्य मुनि जिन विषयों को जानते हैं, उनका भी आपको ज्ञान है।

श्लोक 1.8

वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् । ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सौम्य! उन आचार्यों की कृपा से आप इन सब बातों को यथार्थ रूप में जानते हैं। गुरु स्नेहशील शिष्य को अपने गूढ़ उपदेश भी बताते हैं।

श्लोक 1.9

तत्र तत्राञ्जसाऽऽयुष्मन् भवता यद्विनिश्चितम् । पुंसामेकान्ततः श्रेयस्तन्नः शंसितुमर्हसि ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे आयुष्मान! आपने इन सभी शास्त्रों में मनुष्यों के परम और निश्चित कल्याण का जो उपाय समझा है, वह हमें बताइए।

श्लोक 1.10

प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन् युगे जनाः । मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे साधु स्वभाव वाले सूतजी! इस कलियुग में मनुष्य प्रायः अल्पायु, साधना में शिथिल, दुर्बुद्धि, दुर्भाग्यग्रस्त और अनेक बाधाओं से पीड़ित होते हैं।

श्लोक 1.11

भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागशः । अतः साधोऽत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया । ब्रूहि नः श्रद्दधानानां येनात्मा सम्प्रसीदति ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: शास्त्र बहुत हैं और उनमें अलग-अलग प्रकार के अनेक कर्म बताए गए हैं। इसलिए अपनी विवेकबुद्धि से उनका सार निकालकर हम श्रद्धालुओं को वह उपाय बताइए, जिससे आत्मा पूर्ण प्रसन्नता पाए।

श्लोक 1.12

सूत जानासि भद्रं ते भगवान् सात्वतां पतिः । देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सूतजी! आपका मंगल हो। सात्वतों के स्वामी भगवान ने वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से किस उद्देश्य से जन्म लिया, यह आप जानते हैं।

श्लोक 1.13

तन्नः शुश्रूषमाणानामर्हस्यङ्गानुवर्णितुम् । यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम उस अवतार की कथा सुनना चाहते हैं। कृपया उसका वर्णन कीजिए, क्योंकि भगवान का अवतरण प्राणियों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए होता है।

श्लोक 1.14

आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् । ततः सद्यो विमुच्येत यद्बिभेति स्वयं भयम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भयंकर संसार-चक्र में पड़ा हुआ मनुष्य विवश होकर भी जिनका नाम लेता है, उससे मुक्त हो सकता है; स्वयं भय भी जिनसे भयभीत रहता है, उन भगवान की महिमा सुनाइए।

श्लोक 1.15

यत्पादसंश्रयाः सूत मुनयः प्रशमायनाः । सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टाः स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सूतजी! जिनके चरणों की शरण में रहकर मुनि परम शान्ति पाते हैं, उन संतों का सान्निध्य तत्काल पवित्र करता है। गंगाजल भी अपनी सेवा और संसर्ग से पवित्र करता है।

श्लोक 1.16

को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मणः । शुद्धिकामो न श‍ृणुयाद्यशः कलिमलापहम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने हृदय की शुद्धि चाहता है, वह उन भगवान का यश क्यों न सुने? उनके कर्म महात्माओं द्वारा गाए जाते हैं और उनकी कथा कलियुग के दोषों को दूर करने वाली है।

श्लोक 1.17

तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभिः । ब्रूहि नः श्रद्दधानानां लीलया दधतः कलाः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान लीला के लिए अनेक कलाएँ और स्वरूप धारण करते हैं। विद्वान जिन उदार कर्मों का गान करते हैं, वे हम श्रद्धापूर्वक सुनने वालों को बताइए।

श्लोक 1.18

अथाख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः । लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे बुद्धिमान! अपनी आत्ममाया से स्वतंत्र रूप में लीला करने वाले भगवान हरि के शुभ अवतारों की कथाएँ भी सुनाइए।

श्लोक 1.19

वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे । यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्तमश्लोक भगवान के पराक्रम सुनते हुए हमें तृप्ति नहीं होती। उनके रस को जानने वाले श्रोताओं को उनकी कथा प्रत्येक चरण में और अधिक मधुर लगती है।

श्लोक 1.20

कृतवान् किल वीर्याणि सह रामेण केशवः । अतिमर्त्यानि भगवान् गूढः कपटमानुषः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान केशव ने अपने ईश्वरीय स्वरूप को साधारण मनुष्य की तरह छिपाकर बलरामजी के साथ ऐसे पराक्रम किए, जो मनुष्य की शक्ति से परे हैं।

श्लोक 1.21

कलिमागतमाज्ञाय क्षेत्रेऽस्मिन् वैष्णवे वयम् । आसीना दीर्घसत्रेण कथायां सक्षणा हरेः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलियुग का आगमन जानकर हम इस वैष्णव क्षेत्र में दीर्घ सत्र के लिए बैठे हैं, ताकि भगवान हरि की कथा सुनने का अवसर मिले।

श्लोक 1.22

त्वं नः सन्दर्शितो धात्रा दुस्तरं निस्तितीर्षताम् । कलिं सत्त्वहरं पुंसां कर्णधार इवार्णवम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य की सात्त्विक शक्ति को हरने वाले दुस्तर कलियुग से पार होना चाहने वाले हम लोगों को विधाता ने आपसे मिलाया है। आप समुद्र पार कराने वाले कुशल नाविक के समान हमारे मार्गदर्शक बने हैं।

श्लोक 1.23

ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि । स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब बताइए—ब्रह्मण्य, धर्म के रक्षक और योगेश्वर श्रीकृष्ण के अपने धाम चले जाने पर धर्म ने किसका आश्रय लिया है?

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 2

परम धर्म, भक्तियोग और वासुदेव तत्त्व

श्लोक 2.1

व्यास उवाच । इति सम्प्रश्नसंहृष्टो विप्राणां रौमहर्षणिः । प्रतिपूज्य वचस्तेषां प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी कहते हैं—ब्राह्मणों के इन उत्तम प्रश्नों से रोमहर्षण के पुत्र सूतजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषियों के वचनों का सम्मान किया और उत्तर देना आरम्भ किया।

श्लोक 2.2

सूत उवाच । यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव । पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु- स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—मैं उन शुकदेव मुनि को प्रणाम करता हूँ, जो सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मतत्त्व से अभिन्न भाव रखते थे। वे उपनयन आदि संस्कारों की अपेक्षा किए बिना गृहत्याग कर चले, तो विरह से व्याकुल व्यासजी ने उन्हें पुत्र कहकर पुकारा। उनकी आत्ममय अवस्था के कारण वृक्षों ने भी मानो उस पुकार का उत्तर दिया।

श्लोक 2.3

यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक- मध्यात्मदीपमतितितीर्षतां तमोऽन्धम् । संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार के घोर अज्ञान से पार होना चाहने वाले जीवों पर करुणा करके व्यासपुत्र शुकदेव ने इस गूढ़ पुराण का उपदेश दिया। यह समस्त श्रुतियों का सार और आत्मज्ञान का दीपक है। मैं उन मुनियों के गुरु की शरण लेता हूँ।

श्लोक 2.4

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारायण, नरोत्तम नर, देवी सरस्वती और व्यासजी को नमस्कार करके इस पावन जय-कथा का पाठ आरम्भ करना चाहिए।

श्लोक 2.5

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम् । यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनियो! आपने लोकमंगल का उत्तम प्रश्न किया है। श्रीकृष्ण के विषय में ऐसा प्रश्न करना आत्मा को विशेष प्रसन्नता देने वाला है।

श्लोक 2.6

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे । अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों का सर्वोत्तम धर्म वही है, जिससे इन्द्रियों की पहुँच से परे भगवान में भक्ति हो। वह भक्ति किसी स्वार्थ की अपेक्षा से रहित और बाधाओं से न रुकने वाली हो; उसी से आत्मा पूर्ण प्रसन्न होती है।

श्लोक 2.7

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वासुदेव में किया गया भक्तियोग शीघ्र ही ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न करता है। इनके लिए फिर अलग किसी स्वार्थमय प्रयोजन की आवश्यकता नहीं रहती।

श्लोक 2.8

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः । नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य अपने धर्म का कितना ही अच्छी तरह पालन करे, यदि उससे भगवान की कथा में प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तो वह केवल परिश्रम बनकर रह जाता है।

श्लोक 2.9

धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते । नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म का उद्देश्य संसार-बन्धन से मुक्ति है; उसे केवल धन कमाने का साधन नहीं बनाना चाहिए। इसी प्रकार धर्मानुकूल प्राप्त धन का लक्ष्य केवल भोग बढ़ाना नहीं है।

श्लोक 2.10

कामस्य नेन्द्रियप्रीतिर्लाभो जीवेत यावता । जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थो यश्चेह कर्मभिः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामना और आवश्यकताओं की पूर्ति का उद्देश्य इन्द्रियों की तृप्ति मात्र नहीं, जीवन का निर्वाह है। मानव जीवन का लक्ष्य परम तत्त्व की जिज्ञासा है; कर्मों की उपलब्धि को इसी दिशा में लगाना चाहिए।

श्लोक 2.11

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वज्ञानी उस एक अद्वय ज्ञानस्वरूप सत्य को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान—इन नामों से कहते हैं। नाम और अनुभव की दृष्टियाँ अलग होते हुए भी तत्त्व एक है।

श्लोक 2.12

तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया । पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धालु मुनि शास्त्र से प्राप्त, ज्ञान और वैराग्य से युक्त भक्ति के द्वारा अपने ही अन्तःकरण में उस परमात्मा का साक्षात्कार करते हैं।

श्लोक 2.13

अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः । स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे द्विजश्रेष्ठो! वर्ण और आश्रम के अनुसार किए गए अपने कर्तव्यों की सिद्धि भगवान हरि को प्रसन्न करने में है।

श्लोक 2.14

तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए एकाग्र मन से भक्तों के स्वामी भगवान का सदा श्रवण, कीर्तन, ध्यान और पूजन करना चाहिए।

श्लोक 2.15

यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम् । छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी साधक भगवान के स्मरणरूपी तीक्ष्ण साधन से कर्म-बन्धन की गाँठ काटते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी कथा में प्रेम कौन न करेगा?

श्लोक 2.16

शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य वासुदेवकथारुचिः । स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रो! श्रद्धा से सुनना चाहने वाले मनुष्य में महात्माओं की सेवा और पवित्र तीर्थों के सेवन से वासुदेव-कथा के प्रति रुचि उत्पन्न होती है।

श्लोक 2.17

श‍ृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः । हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनका श्रवण और कीर्तन पुण्यदायक है, वे श्रीकृष्ण अपनी कथा सुनने वाले साधकों के हृदय में स्थित रहकर अशुभ संस्कारों को दूर करते हैं। वे सज्जनों के सच्चे हितैषी हैं।

श्लोक 2.18

नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया । भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नियमित भागवत-श्रवण और भगवद्भक्तों की सेवा से हृदय के दोष प्रायः नष्ट होने लगते हैं। तब उत्तमश्लोक भगवान में अटल भक्ति स्थापित होती है।

श्लोक 2.19

तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये । चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न काम, लोभ आदि भाव चित्त को व्याकुल नहीं करते। सत्त्व में स्थित मन शान्त और प्रसन्न रहता है।

श्लोक 2.20

एवं प्रसन्नमनसो भगवद्भक्तियोगतः । भगवत्तत्त्वविज्ञानं मुक्तसङ्गस्य जायते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार भक्तियोग से प्रसन्नचित्त और आसक्ति से मुक्त हुए साधक को भगवान के तत्त्व का अनुभूतिपूर्ण ज्ञान होता है।

श्लोक 2.21

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में ईश्वर का दर्शन होने पर हृदय की गाँठ खुल जाती है, सारे संशय कट जाते हैं और बन्धन पैदा करने वाले कर्म क्षीण होते हैं।

श्लोक 2.22

अतो वै कवयो नित्यं भक्तिं परमया मुदा । वासुदेवे भगवति कुर्वन्त्यात्मप्रसादनीम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसीलिए विवेकी महात्मा परम आनन्द के साथ भगवान वासुदेव की नित्य भक्ति करते हैं; वह आत्मा को वास्तविक प्रसन्नता देती है।

श्लोक 2.23

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैः युक्तः परमपूरुष एक इहास्य धत्ते । स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोर्नृणां स्युः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के सत्त्व, रज और तम—इन तीन गुणों से सम्बन्ध रखकर एक ही परम पुरुष जगत की स्थिति, सृष्टि और संहार के लिए हरि, ब्रह्मा और हर नाम धारण करता है। यहाँ जीवों के परम कल्याण के लिए सत्त्व का आश्रय लेने वाले भगवान की उपासना पर बल है।

श्लोक 2.24

पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः । तमसस्तु रजस्तस्मात्सत्त्वं यद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मिट्टी से उत्पन्न लकड़ी से धुआँ और उससे अग्नि अधिक उपयोगी है, क्योंकि वैदिक यज्ञ अग्नि में सम्पन्न होते हैं। इसी दृष्टान्त से तम की अपेक्षा रज और रज की अपेक्षा सत्त्व श्रेष्ठ बताया गया है; सत्त्व से ब्रह्मदर्शन का मार्ग स्पष्ट होता है।

श्लोक 2.25

भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् । सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राचीन मुनियों ने अपने परम कल्याण के लिए विशुद्ध सत्त्वस्वरूप अधोक्षज भगवान की उपासना की। यहाँ उनका अनुसरण करने वाले भी उसी कल्याण को प्राप्त कर सकते हैं।

श्लोक 2.26

मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ । नारायणकलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मोक्ष चाहने वाले और द्वेष से रहित साधक उग्र स्वरूप वाले भूताधिपतियों की कामनापरक उपासना छोड़कर नारायण के शान्त स्वरूपों का भजन करते हैं।

श्लोक 2.27

रजस्तमःप्रकृतयः समशीला भजन्ति वै । पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: रज और तम की प्रकृति वाले लोग अपने समान स्वभाव वाली शक्तियों—पितर, भूत और प्रजापति आदि—की उपासना धन, ऐश्वर्य और सन्तान जैसी इच्छाओं की पूर्ति के लिए करते हैं।

श्लोक 2.28

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः । वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदों का परम लक्ष्य वासुदेव हैं; यज्ञ उन्हीं के लिए हैं। योग और समस्त शास्त्रविहित क्रियाओं की परम परिणति भी वासुदेव में है।

श्लोक 2.29

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः । वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, तप, धर्म और अन्तिम प्राप्तव्य गति—सबका परम आश्रय भगवान वासुदेव हैं।

श्लोक 2.30

स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणे विभुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों से परे और सर्वव्यापक उन्हीं भगवान ने आरम्भ में अपनी त्रिगुणमयी माया से कारण और कार्यरूप इस जगत की रचना की।

श्लोक 2.31

तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव । अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी माया से प्रकट गुणमय जगत में प्रवेश करके भगवान गुणों वाले जैसे दिखाई देते हैं, पर उनका चैतन्य स्वरूप स्वतंत्र और सर्वप्रकाशक रहता है।

श्लोक 2.32

यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु । नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे विभिन्न लकड़ियों में एक ही अग्नि अलग-अलग दिखाई देती है, वैसे ही सभी प्राणियों में स्थित एक विश्वात्मा अनेक रूपों में प्रकाशित होता है।

श्लोक 2.33

असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः । स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपने बनाए हुए, गुणों से युक्त शरीरों में अन्तर्यामी रूप से प्रवेश करते हैं। सूक्ष्म तत्त्वों और इन्द्रियों के माध्यम से होने वाले अनुभवों में वे साक्षी और नियन्ता रूप से उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 2.34

भावयत्येष सत्त्वेन लोकान् वै लोकभावनः । लीलावतारानुरतो देवतिर्यङ्नरादिषु ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकों को उत्पन्न करने वाले भगवान सत्त्वशक्ति से उनका पालन करते हैं। वे देवता, पशु-पक्षी और मनुष्य आदि रूपों में लीलावतार धारण करते हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 3

पुरुषरूप, अवतार और भागवत की परम्परा

श्लोक 3.1

सूत उवाच । जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः । सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—लोकों की सृष्टि की इच्छा से भगवान ने आरम्भ में महत्तत्त्व आदि से सम्बद्ध और सोलह कलाओं से युक्त पुरुषरूप धारण किया।

श्लोक 3.2

यस्याम्भसि शयानस्य योगनिद्रां वितन्वतः । नाभिह्रदाम्बुजादासीद्ब्रह्मा विश्वसृजां पतिः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि के जल में योगनिद्रा में स्थित उस पुरुष की नाभिरूपी सरोवर से कमल प्रकट हुआ। उसी कमल पर सृष्टि करने वालों के अधिपति ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।

श्लोक 3.3

यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस पुरुष के अंगों की व्यवस्था में सम्पूर्ण लोकविस्तार की कल्पना की जाती है, वह भगवान का विशुद्ध और अत्यन्त समर्थ सत्त्वमय रूप है।

श्लोक 3.4

पश्यन्त्यदो रूपमदभ्रचक्षुषा सहस्रपादोरुभुजाननाद्भुतम् । सहस्रमूर्धश्रवणाक्षिनासिकं सहस्रमौल्यम्बरकुण्डलोल्लसत् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य दृष्टि वाले साधक उस अद्भुत रूप का दर्शन करते हैं—उसके असंख्य चरण, जाँघें, भुजाएँ, मुख, सिर, कान, आँखें और नासिकाएँ हैं; मुकुट, वस्त्र और कुण्डल उसे शोभित करते हैं।

श्लोक 3.5

एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यही पुरुषरूप भगवान के अनेक अवतारों का अक्षय आधार और बीज है। इनके अंशों के अंश से देवता, पशु-पक्षी और मनुष्य आदि प्रकट होते हैं।

श्लोक 3.6

स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमाश्रितः । चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पहले भगवान ने कुमार-सृष्टि में सनकादि कुमारों के रूप में प्रकट होकर कठिन और अखण्ड ब्रह्मचर्य का आचरण किया।

श्लोक 3.7

द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम् । उद्धरिष्यन्नुपादत्त यज्ञेशः सौकरं वपुः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे अवतार में यज्ञेश्वर भगवान ने जगत के कल्याण के लिए वराह का रूप लिया और रसातल में गई पृथ्वी का उद्धार किया।

श्लोक 3.8

तृतीयं ऋषिसर्गं च देवर्षित्वमुपेत्य सः । तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीसरे अवतार में वे ऋषि-सृष्टि में देवर्षि नारद बने। उन्होंने सात्वत तन्त्र का उपदेश दिया, जिससे कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से मुक्ति का मार्ग मिलता है।

श्लोक 3.9

तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी । भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तपः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: चौथे अवतार में धर्म और उनकी पत्नी मूर्ति के यहाँ नर तथा नारायण ऋषि के रूप में प्रकट होकर उन्होंने पूर्ण आत्मसंयम के साथ कठिन तप किया।

श्लोक 3.10

पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । प्रोवाचासुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँचवें अवतार में सिद्धों के स्वामी कपिल ने काल के प्रभाव से लुप्त हुए सांख्यज्ञान को आसुरि के लिए पुनः प्रकट किया; उसमें तत्त्वों का स्पष्ट निर्णय है।

श्लोक 3.11

षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया । आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: छठे अवतार में अनसूयाजी की प्रार्थना से वे अत्रि के पुत्र दत्तात्रेय बने। उन्होंने अलर्क और प्रह्लाद आदि को आत्मतत्त्व की विवेकपूर्ण विद्या का उपदेश दिया।

श्लोक 3.12

ततः सप्तम आकूत्यां रुचेर्यज्ञोऽभ्यजायत । स यामाद्यैः सुरगणैरपात्स्वायम्भुवान्तरम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सातवें अवतार में रुचि और आकूति के यहाँ यज्ञ भगवान प्रकट हुए। उन्होंने याम आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की।

श्लोक 3.13

अष्टमे मेरुदेव्यां तु नाभेर्जात उरुक्रमः । दर्शयन् वर्त्म धीराणां सर्वाश्रमनमस्कृतम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आठवें अवतार में वे नाभि और मेरुदेवी के पुत्र ऋषभदेव बने। उन्होंने धीर पुरुषों का वह श्रेष्ठ मार्ग दिखाया, जिसे सभी आश्रमों के लोग आदर देते हैं।

श्लोक 3.14

ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । दुग्धेमामोषधीर्विप्रास्तेनायं स उशत्तमः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नौवें अवतार में ऋषियों की प्रार्थना पर उन्होंने राजा पृथु का शरीर धारण किया। उन्होंने पृथ्वी से औषधि और अन्न आदि उत्पन्न कराए; इसलिए उनका यह रूप विशेष हितकारी हुआ।

श्लोक 3.15

रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे । नाव्यारोप्य महीमय्यामपाद्वैवस्वतं मनुम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चाक्षुष मन्वन्तर के अन्त के जलप्रलय में भगवान ने मत्स्यरूप धारण किया। उन्होंने वैवस्वत मनु को पृथ्वीरूपी नौका पर चढ़ाकर सुरक्षित रखा।

श्लोक 3.16

सुरासुराणामुदधिं मथ्नतां मन्दराचलम् । दध्रे कमठरूपेण पृष्ठ एकादशे विभुः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्यारहवें अवतार में भगवान कच्छप बने। देवता और असुर जब समुद्र मन्थन कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी पीठ पर मन्दराचल धारण किया।

श्लोक 3.17

धान्वन्तरं द्वादशमं त्रयोदशममेव च । अपाययत्सुरानन्यान् मोहिन्या मोहयन् स्त्रिया ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बारहवें अवतार में धन्वन्तरि प्रकट हुए। तेरहवें में भगवान ने मोहिनी स्त्री का रूप लेकर असुरों को मोहित किया और देवताओं को अमृत पिलाया।

श्लोक 3.18

चतुर्दशं नारसिंहं बिभ्रद्दैत्येन्द्रमूर्जितम् । ददार करजैर्वक्षस्येरकां कटकृद्यथा ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: चौदहवें अवतार में भगवान ने नरसिंह का रूप लिया। उन्होंने प्रबल दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वक्ष अपने नखों से वैसे विदीर्ण किया, जैसे चटाई बनाने वाला एरका घास को चीरता है।

श्लोक 3.19

पञ्चदशं वामनकं कृत्वागादध्वरं बलेः । पदत्रयं याचमानः प्रत्यादित्सुस्त्रिविष्टपम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पन्द्रहवें अवतार में वामन बनकर वे बलि के यज्ञ में गए। देवताओं का स्वर्ग वापस दिलाने के लिए उन्होंने तीन पग भूमि माँगी।

श्लोक 3.20

अवतारे षोडशमे पश्यन् ब्रह्मद्रुहो नृपान् । त्रिःसप्तकृत्वः कुपितो निःक्षत्रामकरोन्महीम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सोलहवें अवतार में परशुराम ने राजाओं को ब्रह्मविद्या और धर्म के प्रति द्रोह करते देखा। क्रोधित होकर उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी से अत्याचारी क्षत्रिय सत्ता का संहार किया।

श्लोक 3.21

ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्रहवें अवतार में पराशर और सत्यवती के यहाँ व्यासजी के रूप में जन्म लिया। लोगों की कम होती ग्रहणशक्ति देखकर उन्होंने वेदरूपी वृक्ष की अनेक शाखाएँ कीं।

श्लोक 3.22

नरदेवत्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया । समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यतः परम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद श्रीराम के रूप में राजा बनकर भगवान ने देवताओं का कार्य पूरा किया। समुद्र पर नियन्त्रण आदि अनेक अद्भुत पराक्रम किए।

श्लोक 3.23

एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्नीसवें और बीसवें अवतार में वृष्णिवंश में बलराम और श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होकर भगवान ने पृथ्वी का भार उतारा।

श्लोक 3.24

ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । बुद्धो नाम्नाजनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर कलियुग के आरम्भ में देवद्वेषियों को मोहित करने के लिए कीकट प्रदेश में अजन के पुत्र बुद्ध नाम से प्रकट होने का वर्णन है। यह पुराण में दी गई अवतारवाणी है।

श्लोक 3.25

अथासौ युगसन्ध्यायां दस्युप्रायेषु राजसु । जनिता विष्णुयशसो नाम्ना कल्किर्जगत्पतिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: युग-सन्धि में जब शासक लुटेरों के समान हो जाएँगे, तब जगत के स्वामी विष्णुयशा के यहाँ कल्कि नाम से जन्म लेंगे—ऐसा इस श्लोक में कहा गया है।

श्लोक 3.26

अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः । यथाविदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रो! सत्त्व के भण्डार भगवान हरि के अवतार असंख्य हैं, जैसे अक्षय जलाशय से हजारों धाराएँ निकलती हैं।

श्लोक 3.27

ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयस्तथा ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि, मनु, देवता, अत्यन्त शक्तिशाली मनुपुत्र और प्रजापति—ये सब भगवान हरि की कलाओं से सम्पन्न हैं।

श्लोक 3.28

एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये अवतार उस परम पुरुष के अंश अथवा कलाएँ हैं; श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं। वे युग-युग में देवद्रोही शक्तियों से पीड़ित लोक का कल्याण करते हैं।

श्लोक 3.29

जन्म गुह्यं भगवतो य एतत्प्रयतो नरः । सायं प्रातर्गृणन् भक्त्या दुःखग्रामाद्विमुच्यते ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य शुद्ध भाव से प्रातः और सायंकाल भगवान के इन गूढ़ जन्मों का भक्तिपूर्वक कीर्तन करता है, उसके लिए दुःखों से मुक्ति की महिमा कही गई है।

श्लोक 3.30

एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वास्तव में प्राकृत आकार से रहित, चेतनस्वरूप हैं। उनके विराट रूप में जगत का वर्णन माया के गुणों तथा महत्तत्त्व आदि के आधार पर किया जाता है।

श्लोक 3.31

यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले । एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे आकाश में बादल और वायु में पृथ्वी की धूल आरोपित दिखाई देती है, वैसे ही अविवेकी लोग आत्मस्वरूप द्रष्टा में दृश्य के गुण आरोपित करते हैं।

श्लोक 3.32

अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणव्यूहितम् । अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात्स जीवो यत्पुनर्भवः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस स्थूल रूप से परे एक अव्यक्त सूक्ष्म रूप भी है, जिसमें गुण स्पष्ट स्थूल रूप में प्रकट नहीं होते। वह सामान्य दृष्टि और श्रवण का विषय नहीं है; उसी सूक्ष्म उपाधि से जीव का पुनर्जन्म होता है।

श्लोक 3.33

यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब अपने चेतन स्वरूप के ज्ञान से स्थूल और सूक्ष्म—दोनों उपाधियों का आत्मा पर आरोप निषिद्ध हो जाता है और वे अविद्या की कल्पना समझी जाती हैं, तब उसे ब्रह्मदर्शन कहते हैं।

श्लोक 3.34

यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः । सम्पन्न एवेति विदुर्महिम्नि स्वे महीयते ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब माया की वह शक्ति, जो बुद्धि में भेद और बन्धन का अनुभव कराती है, निवृत्त हो जाती है, तब ज्ञानी को अपने स्वरूप की प्राप्ति हुई कही जाती है। वह अपनी ही आत्ममहिमा में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 3.35

एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार ज्ञानी कवि हृदयेश्वर भगवान के वेदों में गूढ़ बताए गए जन्म और कर्मों का वर्णन करते हैं, यद्यपि वे स्वयं अजन्मा और अकर्मा हैं।

श्लोक 3.36

स वा इदं विश्वममोघलीलः सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽस्मिन् । भूतेषु चान्तर्हित आत्मतन्त्रः षाड्वर्गिकं जिघ्रति षड्गुणेशः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लीला कभी निष्फल नहीं होती। वे जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हुए भी उससे आसक्त नहीं होते। सभी प्राणियों में छिपे, पूर्ण स्वतंत्र और छह ऐश्वर्यों के स्वामी होकर वे इन्द्रियों के विषयों के अनुभव को जानते हैं।

श्लोक 3.37

न चास्य कश्चिन्निपुणेन धातु- रवैति जन्तुः कुमनीष ऊतीः । नामानि रूपाणि मनोवचोभिः सन्तन्वतो नटचर्यामिवाज्ञः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अल्पबुद्धि जीव केवल अपनी चतुराई से उस स्रष्टा की लीलाओं को नहीं समझ सकता। वे मन और वाणी द्वारा अनेक नाम-रूप प्रकट करते हैं; उनकी लीला न समझने वाले की दशा अभिनय का मर्म न जानने वाले दर्शक जैसी होती है।

श्लोक 3.38

स वेद धातुः पदवीं परस्य दुरन्तवीर्यस्य रथाङ्गपाणेः । योऽमायया सन्ततयानुवृत्त्या भजेत तत्पादसरोजगन्धम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो निष्कपट भाव से निरन्तर सेवा करके चक्रधारी भगवान के चरणकमलों की सुगन्ध का भी भजन करता है, वही उनकी अनन्त शक्ति और परम पद का रहस्य जान सकता है।

श्लोक 3.39

अथेह धन्या भगवन्त इत्थं यद्वासुदेवेऽखिललोकनाथे । कुर्वन्ति सर्वात्मकमात्मभावं न यत्र भूयः परिवर्त उग्रः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनियो! आप धन्य हैं, क्योंकि सभी लोकों के स्वामी वासुदेव में सम्पूर्ण हृदय से आत्मीय भाव रखते हैं। इस आश्रय में जीव को फिर भयंकर संसार-चक्र में लौटना नहीं पड़ता।

श्लोक 3.40

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवान् ऋषिः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ऋषि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत नामक इस पुराण की रचना की। यह वेदों के तत्त्व के अनुरूप है और उत्तमश्लोक भगवान के चरित्रों का निरूपण करता है।

श्लोक 3.41

निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत् । तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह महान, धन्य और मंगलकारी ग्रंथ लोक के परम कल्याण के लिए है। व्यासजी ने इसे अपने पुत्र, आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ शुकदेव को पढ़ाया।

श्लोक 3.42

सर्ववेदेतिहासानां सारं सारं समुद्धृतम् । स तु संश्रावयामास महाराजं परीक्षितम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसमें समस्त वेदों और इतिहासों का सार संकलित है। शुकदेवजी ने यही भागवत महाराज परीक्षित को सुनाई।

श्लोक 3.43

प्रायोपविष्टं गङ्गायां परीतं परमर्षिभिः । कृष्णे स्वधामोपगते धर्मज्ञानादिभिः सह ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाराज परीक्षित गंगातट पर आमरण उपवास का संकल्प लेकर बैठे थे और महान ऋषियों से घिरे हुए थे। यह प्रसंग श्रीकृष्ण के धर्म और ज्ञान आदि के साथ अपने धाम जाने के बाद का है।

श्लोक 3.44

कलौ नष्टदृशामेष पुराणार्कोऽधुनोदितः । तत्र कीर्तयतो विप्रा विप्रर्षेर्भूरितेजसः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलियुग में विवेक-दृष्टि खो चुके लोगों के लिए यह भागवतरूपी सूर्य उदित हुआ है। हे विप्रो! वहाँ महान तेजस्वी शुकदेव मुनि इस कथा का कीर्तन कर रहे थे।

श्लोक 3.45

अहं चाध्यगमं तत्र निविष्टस्तदनुग्रहात् । सोऽहं वः श्रावयिष्यामि यथाधीतं यथामति ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं भी उस सभा में बैठा था और उनकी कृपा से इस कथा को समझ पाया। अब जैसा मैंने पढ़ा-सुना है और जैसी मेरी समझ है, वैसा ही आपको सुनाऊँगा।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥

इन अध्यायों का साधना-सन्देश

शास्त्र का अध्ययन जीवन को भगवान की ओर मोड़ने के लिए है। भागवत का आरम्भ बताता है कि श्रद्धा से कथा सुनना, संतों की सेवा करना, अपने कर्तव्य को भगवान की प्रसन्नता के लिए निभाना और निष्कपट भक्ति रखना साधना की आधारभूमि है। भक्ति केवल इच्छा पूरी करने का साधन न रहकर आत्मा की शान्ति और प्रेम का मार्ग बने।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। अध्याय 3 का क्रम संस्कृत विकिस्रोत के उपलब्ध पाठ से भी मिलाया गया है। प्राचीन मूल ग्रंथ के चुने हुए पाठ का क्रम रखा गया है; विकल्प के रूप में दिए गए कोष्ठकीय पाठान्तर मुख्य श्लोक में नहीं मिलाए गए हैं। इस पाठ में तीसरे अध्याय की संख्या 45 तक है; इसीलिए इन तीन अध्यायों का कुल योग 102 है। यह प्रथम स्कन्ध या महापुराण की पूर्णता का दावा नहीं करता। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है।

भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

टिप्पणियाँ