श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 4–6, व्यास–नारद संवाद और हिंदी भावार्थ

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

प्रथम स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ४–६

११२ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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व्यास–नारद संवाद और भक्ति की प्रेरणा

वेदों का विभाग और महाभारत की रचना करने के बाद भी व्यासजी का हृदय पूर्ण प्रसन्न नहीं था। देवर्षि नारद ने उन्हें भगवान के निर्मल यश का गान करने का उपदेश दिया। अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि संतसेवा और श्रद्धापूर्वक हरिकथा सुनने से उनके भीतर भक्ति कैसे जागी।

इस भाग में प्रथम स्कन्ध के अध्याय 4 के 33, अध्याय 5 के 40 और अध्याय 6 के 39 श्लोक—कुल 112 श्लोक—मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है।

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प्रथम स्कन्ध • अध्याय 4

व्यासजी की जिज्ञासा और नारदजी का आगमन

श्लोक 4.1

व्यास उवाच । इति ब्रुवाणं संस्तूय मुनीनां दीर्घसत्रिणाम् । वृद्धः कुलपतिः सूतं बह्वृचः शौनकोऽब्रवीत् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी कहते हैं—दीर्घ सत्र में बैठे ऋषियों के वृद्ध कुलपति और ऋग्वेद के विद्वान शौनकजी ने सूतजी के कथन की प्रशंसा करके उनसे फिर प्रश्न किया।

श्लोक 4.2

शौनक उवाच । सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर । कथां भागवतीं पुण्यां यदाह भगवाञ्छुकः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी बोले—हे महाभाग सूतजी! हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! भगवान शुकदेव ने जो पुण्यदायिनी भागवत-कथा कही थी, वह हमें सुनाइए।

श्लोक 4.3

कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना । कुतः सञ्चोदितः कृष्णः कृतवान् संहितां मुनिः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा किस युग में, कहाँ और किस कारण प्रकट हुई? कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि ने किसकी प्रेरणा से इस संहिता की रचना की?

श्लोक 4.4

तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः । एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी के पुत्र शुकदेव महान योगी, समदर्शी, भेदबुद्धि से रहित और परमात्मा में एकनिष्ठ हैं। उनका आत्मज्ञान बाहर से छिपा रहता है, इसलिए वे साधारण लोगों को अनजान जैसे दिखाई देते हैं।

श्लोक 4.5

दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नं देव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् । तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्ति स्त्रीपुम्भिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब व्यासजी अपने गृहत्यागी पुत्र के पीछे जा रहे थे, तब स्नान करती देवियों ने वस्त्रधारी व्यासजी को देखकर लज्जा से वस्त्र पहन लिए, पर शुकदेवजी को देखकर ऐसा नहीं किया। व्यासजी के पूछने पर उन्होंने कहा—आपकी दृष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है; आपके पुत्र की निर्मल आत्मदृष्टि में वह भेद नहीं है।

श्लोक 4.6

कथमालक्षितः पौरैः सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलान् । उन्मत्तमूकजडवद्विचरन् गजसाह्वये ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे शुकदेवजी जब कुरुजाङ्गल प्रदेश में पहुँचे और हस्तिनापुर में उन्मत्त, मूक अथवा जड़ व्यक्ति की तरह विचर रहे थे, तब नगरवासियों ने उन्हें किस प्रकार पहचाना?

श्लोक 4.7

कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह । संवादः समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुतिः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे तात! पाण्डववंशी राजर्षि परीक्षित और शुकदेव मुनि का वह संवाद कैसे हुआ, जिसमें यह भगवान की महिमा बताने वाली पावन कथा कही गई?

श्लोक 4.8

स गोदोहनमात्रं हि गृहेषु गृहमेधिनाम् । अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्वंस्तदाश्रमम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे महाभाग शुकदेव गृहस्थों के घरों में गाय दुहने जितने थोड़े समय के लिए ही ठहरते हैं और अपने सान्निध्य से उनके आश्रम को पवित्र कर देते हैं।

श्लोक 4.9

अभिमन्युसुतं सूत प्राहुर्भागवतोत्तमम् । तस्य जन्म महाश्चर्यं कर्माणि च गृणीहि नः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सूतजी! अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को श्रेष्ठ भगवद्भक्त कहा जाता है। उनके आश्चर्यपूर्ण जन्म और कर्मों का भी वर्णन कीजिए।

श्लोक 4.10

स सम्राट् कस्य वा हेतोः पाण्डूनां मानवर्धनः । प्रायोपविष्टो गङ्गायामनादृत्याधिराट् श्रियम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले उस सम्राट ने किस कारण विशाल राज्य और ऐश्वर्य की उपेक्षा करके गंगातट पर आमरण उपवास का संकल्प किया?

श्लोक 4.11

नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मनः शिवाय हानीय धनानि शत्रवः । कथं स वीरः श्रियमङ्ग दुस्त्यजां युवैषतोत्स्रष्टुमहो सहासुभिः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने कल्याण के लिए शत्रु भी धन अर्पित करके जिनके चरणों में नमते थे, उस युवा वीर ने त्यागना कठिन राजलक्ष्मी को प्राणों सहित छोड़ने की इच्छा कैसे की?

श्लोक 4.12

शिवाय लोकस्य भवाय भूतये य उत्तमश्लोकपरायणा जनाः । जीवन्ति नात्मार्थमसौ पराश्रयं मुमोच निर्विद्य कुतः कलेवरम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवत्परायण जन अपने लिए नहीं, लोक के कल्याण और उन्नति के लिए जीते हैं। दूसरों के आश्रय बने परीक्षित ने विरक्त होकर अपना शरीर छोड़ने का निर्णय क्यों लिया?

श्लोक 4.13

तत्सर्वं नः समाचक्ष्व पृष्टो यदिह किञ्चन । मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमने जो कुछ पूछा है, वह सब हमें विस्तार से बताइए। वैदिक मन्त्रों के विषय को छोड़कर अन्य समस्त शास्त्रीय वाङ्मय में हम आपको पारंगत मानते हैं।

श्लोक 4.14

सूत उवाच । द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये । जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—युगों के क्रम में तीसरे द्वापरयुग के आने पर भगवान की कला से योगी व्यासजी पराशर और सत्यवती के यहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 4.15

स कदाचित्सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचिः । विविक्तदेश आसीन उदिते रविमण्डले ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन सूर्य उदित होने पर वे सरस्वती के जल से आचमन और शुद्धि करके नदी के एकान्त तट पर बैठे थे।

श्लोक 4.16

परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा । युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत और भविष्य के ज्ञाता उन ऋषि ने काल के अदृश्य प्रभाव से युग-युग में पृथ्वी पर धर्म की व्यवस्था में आने वाले परिवर्तन को देखा।

श्लोक 4.17

भौतिकानां च भावानां शक्तिह्रासं च तत्कृतम् । अश्रद्दधानान् निःसत्त्वान् दुर्मेधान् ह्रसितायुषः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि काल के कारण भौतिक पदार्थों और प्राणियों की शक्ति घट रही है; मनुष्य श्रद्धाहीन, धैर्य और सत्त्व से रहित, कम बुद्धि और अल्पायु होते जा रहे हैं।

श्लोक 4.18

दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा । सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी दिव्य दृष्टि से मनुष्यों की दुर्भाग्यपूर्ण दशा देखकर अमोघदर्शी व्यासजी सभी वर्णों और आश्रमों के लोगों के हित का उपाय सोचने लगे।

श्लोक 4.19

चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् । व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की शुद्धि के लिए वैदिक यज्ञकर्म का महत्त्व देखकर उन्होंने यज्ञ-परम्परा को बनाए रखने के लिए एक वेद को चार विभागों में व्यवस्थित किया।

श्लोक 4.20

ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः । इतिहासपुराणं च पञ्चमो वेद उच्यते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—चार वेद पृथक किए गए। इतिहास और पुराण को पाँचवाँ वेद कहा जाता है।

श्लोक 4.21

तत्रर्ग्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः । वैशम्पायन एवैको निष्णातो यजुषामुत ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: इनमें पैल ऋग्वेद के धारक बने, विद्वान जैमिनि सामवेद के और वैशम्पायन यजुर्वेद के विशेष ज्ञाता हुए।

श्लोक 4.22

अथर्वाङ्गिरसामासीत्सुमन्तुर्दारुणो मुनिः । इतिहासपुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुमन्तु मुनि अथर्वाङ्गिरस अर्थात अथर्ववेद के ज्ञाता हुए। इतिहास और पुराणों की शिक्षा मेरे पिता रोमहर्षण को प्राप्त हुई।

श्लोक 4.23

त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा । शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन ऋषियों ने अपने-अपने वेद को अनेक विभागों में बाँटा। उनके शिष्यों, प्रशिष्यों और आगे के शिष्यों से वेदों की अनेक शाखाएँ बनीं।

श्लोक 4.24

त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा । एवं चकार भगवान् व्यासः कृपणवत्सलः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कम ग्रहणशक्ति वाले लोग भी वेदों को धारण कर सकें, इसी उद्देश्य से दीनों पर स्नेह रखने वाले भगवान व्यासजी ने यह व्यवस्था की।

श्लोक 4.25

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह । इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस समय की परम्परा में जिन स्त्रियों, शूद्रों और केवल नाममात्र के द्विजों को त्रयी की शिक्षा सुनने का अवसर नहीं था, तथा जो कल्याणकारी कर्म का मर्म नहीं जानते थे, उनके हित के लिए मुनि ने करुणापूर्वक महाभारत की रचना की।

श्लोक 4.26

एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धृदयं ततः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रो! इस प्रकार पूरे हृदय से सभी प्राणियों के कल्याण में निरन्तर लगे रहने पर भी व्यासजी का मन पूर्ण सन्तुष्ट नहीं हुआ।

श्लोक 4.27

नातिप्रसीदद्धृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ व्यासजी सरस्वती के पवित्र तट पर एकान्त में बैठे इस असन्तोष का कारण सोचने लगे और मन-ही-मन कहने लगे।

श्लोक 4.28

धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः । मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने दृढ़ व्रत और निष्कपट भाव से वेदों, गुरुजनों तथा यज्ञाग्नियों का सम्मान किया है और प्राप्त अनुशासन को स्वीकार करके उसका पालन किया है।

श्लोक 4.29

भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः । दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाभारत के माध्यम से वेदों का अर्थ भी प्रकट किया है, जिसमें स्त्रियाँ और शूद्र आदि भी धर्म तथा अन्य पुरुषार्थों को समझ सकते हैं।

श्लोक 4.30

तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः । असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हुए मेरा शरीर और अन्तःकरण मानो अपूर्ण और असन्तुष्ट दिखाई देते हैं।

श्लोक 4.31

किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या इसका कारण यह है कि मैंने भगवान के प्रिय और परमहंसों को प्रिय लगने वाले भागवतधर्म का पर्याप्त निरूपण नहीं किया?

श्लोक 4.32

तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब कृष्णद्वैपायन व्यासजी इस प्रकार अपने कार्य में कमी अनुभव करके खिन्न थे, तभी देवर्षि नारद उनके उसी आश्रम में आ पहुँचे।

श्लोक 4.33

तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः । पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी को आते देखकर व्यास मुनि तुरन्त उठ खड़े हुए। उन्होंने देवताओं द्वारा पूजित देवर्षि का विधिपूर्वक सत्कार और पूजन किया।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 5

भगवद्यश का महत्त्व और नारदजी की पूर्वकथा

श्लोक 5.1

सूत उवाच । अथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छ्रवाः । देवर्षिः प्राह विप्रर्षिं वीणापाणिः स्मयन्निव ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—व्यासजी के समीप सुखपूर्वक बैठे वीणाधारी, परम यशस्वी देवर्षि नारद मुस्कराते हुए उनसे बोले।

श्लोक 5.2

नारद उवाच । पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना । परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी ने कहा—हे पराशरनन्दन महाभाग! क्या आपका शरीर और मन अपने-अपने स्तर पर सन्तोष अनुभव कर रहे हैं?

श्लोक 5.3

जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भुतम् । कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने जानने योग्य विषयों का भलीभाँति अनुसन्धान किया है और समस्त पुरुषार्थों से सम्पन्न अत्यन्त अद्भुत महाभारत की रचना की है।

श्लोक 5.4

जिज्ञासितमधीतं च यत्तद्ब्रह्म सनातनम् । अथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने सनातन ब्रह्म का भी अध्ययन और विचार किया है। फिर भी, हे प्रभो! आप स्वयं को अकृतार्थ मानकर क्यों खिन्न हो रहे हैं?

श्लोक 5.5

व्यास उवाच । अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं तथापि नात्मा परितुष्यते मे । तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधं पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी बोले—आपने जो कहा है, वह सब सत्य है; फिर भी मेरा मन सन्तुष्ट नहीं है। इस असन्तोष का कारण स्पष्ट नहीं हो रहा। ब्रह्माजी के पुत्र और अगाध ज्ञान वाले आपसे मैं उसका मूल पूछता हूँ।

श्लोक 5.6

स वै भवान् वेद समस्तगुह्य- मुपासितो यत्पुरुषः पुराणः । परावरेशो मनसैव विश्वं सृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप समस्त गूढ़ रहस्यों को जानते हैं। आपने उस सनातन पुरुष की उपासना की है, जो कारण और कार्य का स्वामी है और गुणों से असंग रहते हुए संकल्पमात्र से जगत की सृष्टि, पालन और संहार करता है।

श्लोक 5.7

त्वं पर्यटन्नर्क इव त्रिलोकी- मन्तश्चरो वायुरिवात्मसाक्षी । परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप सूर्य की तरह तीनों लोकों में घूमते हैं और वायु की तरह सबके भीतर तक पहुँचकर अन्तर्यामी भाव से जानते हैं। मैंने धर्म और व्रतों द्वारा ब्रह्म का अध्ययन किया है; फिर भी मुझमें जो कमी है, उसे स्पष्ट बताइए।

श्लोक 5.8

श्रीनारद उवाच । भवतानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम् । येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—आपने भगवान के निर्मल यश का पर्याप्त गान नहीं किया। जिस ज्ञान से भगवान प्रसन्न न हों, उसे मैं अधूरा समझता हूँ।

श्लोक 5.9

यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः । न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठ! आपने धर्म आदि पुरुषार्थों का जैसा विस्तार किया है, वैसा भगवान वासुदेव की महिमा का वर्णन नहीं किया।

श्लोक 5.10

न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो जगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित् । तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा न यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्यन्त सुन्दर शब्दों से सजी वाणी भी यदि जगत को पवित्र करने वाले हरि का यश नहीं गाती, तो महात्मा उसे कौओं के रमने का स्थान कहते हैं। आत्मरस में रमण करने वाले हंसस्वभाव संत उसमें आनन्द नहीं लेते।

श्लोक 5.11

तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि य- च्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत जिस वाणी में अनन्त भगवान के नाम और यश अंकित हों, वह जनसमुदाय के पापों को दूर करने वाली है। उसमें रचना के नियमों की कुछ कमी भी हो, तो साधु उसे सुनते, गाते और स्वीकार करते हैं।

श्लोक 5.12

नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम और निर्मल ज्ञान भी अच्युत के प्रति प्रेम से रहित होकर शोभा नहीं पाता। फिर भगवान को अर्पित न किए गए कर्म की क्या बात, जो प्रायः बन्धन और अशुभ परिणाम का कारण बनता है?

श्लोक 5.13

अथो महाभाग भवानमोघदृक्- शुचिश्रवाःसत्यरतो धृतव्रतः । उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे महाभाग! आपकी दृष्टि अमोघ है, आपका यश पवित्र है, आप सत्यनिष्ठ और दृढ़व्रती हैं। सभी बन्धनों से मुक्ति के लिए समाधि में भगवान के महान चरित्रों का स्मरण कीजिए।

श्लोक 5.14

ततोऽन्यथा किञ्चन यद्विवक्षतः पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः । न कुत्रचित्क्वापि च दुःस्थिता मति- र्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लीलाओं से अलग, उन्हीं की शक्ति से बने नाम-रूपों को स्वतंत्र मानकर अन्य विषयों का वर्णन करने वाले की बुद्धि स्थिर आश्रय नहीं पाती। उसकी दशा हवा से डगमगाती नाव जैसी होती है।

श्लोक 5.15

जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतः स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिन भोगों में स्वभाव से आसक्त है, उन्हें धर्म के नाम पर बढ़ावा देना बड़ी चूक हो सकती है। सामान्य जन फिर उन्हें ही धर्म मानकर पकड़ लेते हैं और उनसे निवृत्त होने की शिक्षा नहीं मानते।

श्लोक 5.16

विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो- रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन- स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी व्यक्ति निवृत्ति के द्वारा अनन्त भगवान के आनन्द को जान सकता है। गुणों के वश में विषयों की ओर भागने वाला यह नहीं समझता; इसलिए आप उसके लिए भगवान की लीलाएँ प्रकट कीजिए।

श्लोक 5.17

त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरे- र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि । यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किं को वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने सामान्य कर्तव्य छोड़कर भी हरि के चरणों का भजन करता है और साधना अपूर्ण रहने से कभी विचलित हो जाता है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता। पर भगवान का भजन किए बिना केवल स्वधर्म निभाने वाले ने परम लाभ क्या पाया?

श्लोक 5.18

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः । तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी मनुष्य को उसी दुर्लभ परम लाभ के लिए प्रयत्न करना चाहिए, जो ऊँचे-नीचे लोकों में भटकने से नहीं मिलता। विषयसुख तो दुःख की तरह काल के प्रबल प्रवाह से अपने कर्मानुसार मिलता रहता है।

श्लोक 5.19

न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजे- न्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम् । स्मरन् मुकुन्दाङ्घ्र्युपगूहनं पुन- र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो यतः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे व्यासजी! मुकुन्द की सेवा का रस चख चुका व्यक्ति सामान्य विषयासक्त मनुष्य की तरह संसार में नहीं बहता। भगवान के चरणों के आलिंगन का आनन्द याद करके वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता।

श्लोक 5.20

इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवाः । तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि वै प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व भगवान की शक्ति का विस्तार होने से उनसे अभिन्न भी है, पर उनके पूर्ण स्वरूप के समान सीमित विश्वमात्र नहीं है। उसी से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। आप यह जानते हैं; मैंने केवल थोड़ा संकेत किया है।

श्लोक 5.21

त्वमात्मनाऽऽत्मानमवेह्यमोघदृक्- परस्यपुंसः परमात्मनः कलाम् । अजं प्रजातं जगतः शिवाय तन्- महानुभावाभ्युदयोऽधिगण्यताम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे अमोघदर्शी! अपने विवेक से जानिए कि आप परम पुरुष परमात्मा की कला हैं। अजन्मा भगवान जगत के कल्याण के लिए प्रकट होते हैं; इसलिए उनके महान अवतारों और चरित्रों का वर्णन कीजिए।

श्लोक 5.22

इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः । अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्वानों ने तप, शास्त्राध्ययन, यज्ञ, उत्तम वचन, बुद्धि और दान का अचूक फल यही बताया है कि उनसे उत्तमश्लोक भगवान के गुणों का वर्णन हो।

श्लोक 5.23

अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम् । निरूपितो बालक एव योगिनां शुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मुने! एक पूर्वजन्म में मैं वेदज्ञ ब्राह्मणों की सेवा करने वाली एक दासी का पुत्र था। वर्षाकाल में एक स्थान पर ठहरे योगियों की सेवा में मुझे बाल्यावस्था में ही लगाया गया था।

श्लोक 5.24

ते मय्यपेताखिलचापलेऽर्भके दान्तेऽधृतक्रीडनकेऽनुवर्तिनि । चक्रुः कृपां यद्यपि तुल्यदर्शनाः शुश्रूषमाणे मुनयोऽल्पभाषिणि ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मुनि समदर्शी थे, फिर भी चंचलता से रहित, संयमी, खेल-कूद में अनासक्त, आज्ञाकारी और कम बोलने वाले सेवाभावी बालक के रूप में मुझ पर उन्होंने विशेष कृपा की।

श्लोक 5.25

उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैः सकृत्स्म भुञ्जे तदपास्तकिल्बिषः । एवं प्रवृत्तस्य विशुद्धचेतस- स्तद्धर्म एवात्मरुचिः प्रजायते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों की अनुमति से मैंने एक बार उनका बचा हुआ प्रसाद ग्रहण किया। इससे मेरे दोष दूर हुए और शुद्ध होते चित्त में उनके धर्म और साधना के प्रति रुचि उत्पन्न हुई।

श्लोक 5.26

तत्रान्वहं कृष्णकथाः प्रगायता- मनुग्रहेणाश‍ृणवं मनोहराः । ताः श्रद्धया मेऽनुपदं विश‍ृण्वतः प्रियश्रवस्यङ्ग ममाभवद्रुचिः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कृपा से मैं प्रतिदिन उनके मुख से मनोहर श्रीकृष्ण-कथाएँ सुनता था। श्रद्धापूर्वक लगातार सुनते-सुनते भगवान की कथा के प्रति मेरे भीतर प्रेम और रुचि बढ़ी।

श्लोक 5.27

तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामुने प्रियश्रवस्यास्खलिता मतिर्मम । ययाहमेतत्सदसत्स्वमायया पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे महामुने! भगवान में रुचि होने से मेरी बुद्धि उनमें अचल हुई। उसी से मैं समझने लगा कि स्थूल-सूक्ष्म जगत आत्मस्वरूप पर माया से आरोपित है।

श्लोक 5.28

इत्थं शरत्प्रावृषिकावृतू हरे- र्विश‍ृण्वतो मेऽनुसवं यशोऽमलम् । सङ्कीर्त्यमानं मुनिभिर्महात्मभि- र्भक्तिः प्रवृत्ताऽऽत्मरजस्तमोऽपहा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्षा और शरद—इन दोनों ऋतुओं में महात्माओं द्वारा गाए गए हरि के निर्मल यश को निरन्तर सुनने से मेरे भीतर रज और तम के दोषों को दूर करने वाली भक्ति प्रकट हुई।

श्लोक 5.29

तस्यैवं मेऽनुरक्तस्य प्रश्रितस्य हतैनसः । श्रद्दधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार मैं उन संतों से प्रेम करने वाला, विनम्र, पापों से शुद्ध होता हुआ, श्रद्धालु, संयमी और उनकी सेवा में लगा बालक था।

श्लोक 5.30

ज्ञानं गुह्यतमं यत्तत्साक्षाद्भगवतोदितम् । अन्ववोचन् गमिष्यन्तः कृपया दीनवत्सलाः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब दीनों पर करुणा करने वाले उन महात्माओं ने जाते समय कृपापूर्वक मुझे वह परम गोपनीय ज्ञान बताया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान ने दिया है।

श्लोक 5.31

येनैवाहं भगवतो वासुदेवस्य वेधसः । मायानुभावमविदं येन गच्छन्ति तत्पदम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी ज्ञान से मैंने जगत के स्रष्टा भगवान वासुदेव की माया की शक्ति को समझा। उसके द्वारा साधक भगवान के परम पद को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 5.32

एतत्संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् । यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! मैंने आपको तीन प्रकार के दुःखों की चिकित्सा का संकेत बताया है—अपने कर्मों को परम ब्रह्म भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित कर देना।

श्लोक 5.33

आमयो यश्च भूतानां जायते येन सुव्रत । तदेव ह्यामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सुव्रत! जिस पदार्थ से रोग उत्पन्न होता है, वही उचित उपचार और परिवर्तन से औषधि बनकर उस रोग को दूर भी कर सकता है।

श्लोक 5.34

एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः । त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी प्रकार मनुष्यों के कर्म सामान्यतः संसार-बन्धन का कारण बनते हैं; पर वही कर्म परमात्मा को अर्पित होने पर उस बन्धन को मिटाने में सहायक हो जाते हैं।

श्लोक 5.35

यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम् । ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यहाँ भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाने वाला कर्म भक्तियोग से युक्त होता है। उससे सम्बन्धित ज्ञान भी उसी भगवदर्पण भाव के अधीन रहता है।

श्लोक 5.36

कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छिक्षयासकृत् । गृणन्ति गुणनामानि कृष्णस्यानुस्मरन्ति च ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शिक्षा के अनुसार निरन्तर कर्म करते हुए साधक श्रीकृष्ण के नाम और गुणों का गान करते हैं तथा उनका स्मरण बनाए रखते हैं।

श्लोक 5.37

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय धीमहि । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे भगवान वासुदेव! आपको नमस्कार है; हम आपका ध्यान करते हैं। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और सङ्कर्षण स्वरूपों में भी आपको बारम्बार नमस्कार है।

श्लोक 5.38

इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम् । यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शनः पुमान् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो इस प्रकार भगवान के स्वरूपों के नामों से उस प्राकृत आकार से परे, मन्त्रों में प्रकट होने वाले यज्ञपुरुष की उपासना करता है, वह यथार्थ दृष्टि वाला मनुष्य है।

श्लोक 5.39

इमं स्वनिगमं ब्रह्मन्नवेत्य मदनुष्ठितम् । अदान्मे ज्ञानमैश्वर्यं स्वस्मिन् भावं च केशवः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! भगवान के इस उपदेश का मैंने आचरण किया। उससे प्रसन्न होकर केशव ने मुझे तत्त्वज्ञान, आध्यात्मिक सामर्थ्य और अपने प्रति प्रेम प्रदान किया।

श्लोक 5.40

त्वमप्यदभ्रश्रुतविश्रुतं विभोः समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् । आख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप भी भगवान की व्यापक रूप से सुनी और गाई जाने वाली महिमा का वर्णन कीजिए, जिससे ज्ञानीजनों की जिज्ञासा पूर्ण होती है। बार-बार दुःख से पीड़ित मनुष्यों के क्लेशों की वास्तविक निवृत्ति महात्मा इसी में देखते हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 6

नारदजी की साधना, भगवद्दर्शन और देवर्षि स्वरूप

श्लोक 6.1

सूत उवाच । एवं निशम्य भगवान् देवर्षेर्जन्म कर्म च । भूयः पप्रच्छ तं ब्रह्मन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—हे ब्रह्मन्! देवर्षि के पूर्वजन्म और कर्मों की यह कथा सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी ने उनसे फिर पूछा।

श्लोक 6.2

व्यास उवाच । भिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टृभिस्तव । वर्तमानो वयस्याद्ये ततः किमकरोद्भवान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी बोले—जिन संतों ने आपको तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया था, उनके चले जाने के बाद उस बाल्यावस्था में आपने क्या किया?

श्लोक 6.3

स्वायम्भुव कया वृत्त्या वर्तितं ते परं वयः । कथं चेदमुदस्राक्षीः काले प्राप्ते कलेवरम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्माजी के पुत्र! इसके बाद आपका जीवन किस प्रकार बीता? समय आने पर आपने वह शरीर कैसे छोड़ा?

श्लोक 6.4

प्राक्कल्पविषयामेतां स्मृतिं ते सुरसत्तम । न ह्येष व्यवधात्काल एष सर्वनिराकृतिः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देवश्रेष्ठ! पूर्वकल्प की यह स्मृति आपको कैसे बनी रही? सब स्मृतियों का नाश करने वाला काल इसे क्यों नहीं मिटा सका?

श्लोक 6.5

नारद उवाच । भिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टृभिर्मम । वर्तमानो वयस्याद्ये तत एतदकारषम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—मुझे तत्त्वज्ञान देने वाले उन महात्माओं के चले जाने पर बाल्यावस्था में मैंने इस प्रकार जीवन बिताया।

श्लोक 6.6

एकात्मजा मे जननी योषिन्मूढा च किङ्करी । मय्यात्मजेऽनन्यगतौ चक्रे स्नेहानुबन्धनम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी माता दूसरों की सेवा करने वाली साधारण स्त्री थीं और मैं उनका इकलौता पुत्र था। उनका और कोई सहारा न होने से वे मुझसे बहुत स्नेह करती थीं।

श्लोक 6.7

सास्वतन्त्रा न कल्पाऽऽसीद्योगक्षेमं ममेच्छती । ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मेरा पालन-पोषण चाहती थीं, पर स्वयं पराधीन होने से सब कुछ कर सकने में समर्थ नहीं थीं। जगत ईश्वर के अधीन है, जैसे काठ की कठपुतली संचालक के अधीन रहती है।

श्लोक 6.8

अहं च तद्ब्रह्मकुले ऊषिवांस्तदपेक्षया । दिग्देशकालाव्युत्पन्नो बालकः पञ्चहायनः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता के स्नेह के कारण मैं उसी ब्राह्मण-परिवार में रहा। उस समय मेरी आयु पाँच वर्ष थी और मुझे दिशा, देश तथा समय का विशेष ज्ञान नहीं था।

श्लोक 6.9

एकदा निर्गतां गेहाद्दुहन्तीं निशि गां पथि । सर्पोऽदशत्पदा स्पृष्टः कृपणां कालचोदितः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक रात माता गाय दुहने के लिए घर से बाहर निकलीं। मार्ग में उनके पैर से छू जाने पर कालप्रेरित सर्प ने उन्हें काट लिया।

श्लोक 6.10

तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीप्सतः । अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब मैंने इस घटना में भी भक्तों का कल्याण चाहने वाले ईश्वर की कृपा समझी और उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।

श्लोक 6.11

स्फीताञ्जनपदांस्तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् । खेटखर्वटवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में मैंने समृद्ध जनपद, नगर, गाँव, गोपालों की बस्तियाँ, खदानें, छोटी बस्तियाँ, उद्यान, वन और उपवन पार किए।

श्लोक 6.12

चित्रधातुविचित्राद्रीनिभभग्नभुजद्रुमान् । जलाशयाञ्छिवजलान्नलिनीः सुरसेविताः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न रंगों की धातुओं वाले पर्वत, हाथियों द्वारा तोड़ी गई वृक्षशाखाएँ, निर्मल जलाशय और देवताओं के योग्य सुन्दर कमलिनियाँ देखीं।

श्लोक 6.13

चित्रस्वनैः पत्ररथैर्विभ्रमद्भ्रमरश्रियः । नलवेणुशरस्तम्बकुशकीचकगह्वरम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पक्षी विविध मधुर स्वर कर रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे। आगे नरकट, बाँस, सरकण्डे, कुश और कीचक आदि से भरे घने प्रदेश मिले।

श्लोक 6.14

एक एवातियातोऽहमद्राक्षं विपिनं महत् । घोरं प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अकेला चलते हुए मैं एक विशाल, घोर और भयावह वन में पहुँचा, जहाँ सर्प, उल्लू और गीदड़ आदि रहते थे।

श्लोक 6.15

परिश्रान्तेन्द्रियात्माहं तृट्परीतो बुभुक्षितः । स्नात्वा पीत्वा ह्रदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रमः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: थकान, भूख और प्यास से मेरी इन्द्रियाँ और शरीर शिथिल हो गए थे। नदी के जलाशय में स्नान करके जल पिया और आचमन किया, जिससे थकान दूर हुई।

श्लोक 6.16

तस्मिन्निर्मनुजेऽरण्ये पिप्पलोपस्थ आस्थितः । आत्मनाऽऽत्मानमात्मस्थं यथाश्रुतमचिन्तयम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस निर्जन वन में पीपल के नीचे बैठकर मैंने महात्माओं से जैसा सुना था, उसी प्रकार अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान किया।

श्लोक 6.17

ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा । औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से वश हुए मन द्वारा भगवान के चरणकमलों का ध्यान करते हुए मेरे नेत्रों में उत्कण्ठा के आँसू आए। धीरे-धीरे भगवान हरि मेरे हृदय में प्रकट हुए।

श्लोक 6.18

प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्यधिक प्रेम से मेरा शरीर रोमाञ्चित हो उठा और मैं परम आनन्द में डूब गया। हे मुने! उस समय मुझे अपने और बाहरी जगत का भान नहीं रहा।

श्लोक 6.19

रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम् । अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद्दुर्मना इव ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का वह मनोहर और शोक दूर करने वाला रूप सहसा अदृश्य हो गया। उसे न देखकर मैं व्याकुल होकर उठ खड़ा हुआ, जैसे कोई प्रिय वस्तु खोकर दुःखी हो।

श्लोक 6.20

दिदृक्षुस्तदहं भूयः प्रणिधाय मनो हृदि । वीक्षमाणोऽपि नापश्यमवितृप्त इवातुरः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस रूप को फिर देखने की इच्छा से मैंने मन को हृदय में एकाग्र किया, पर बहुत देखने पर भी दर्शन नहीं हुआ। अतृप्त और विरहाकुल मन से मैं व्यथित हो गया।

श्लोक 6.21

एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम् । गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुचः प्रशमयन्निव ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्जन स्थान में इस प्रकार प्रयत्न करते हुए मुझसे वाणी की पहुँच से परे भगवान ने गम्भीर और मधुर स्वर में कहा, मानो मेरा शोक शान्त कर रहे हों।

श्लोक 6.22

हन्तास्मिञ्जन्मनि भवान् न मां द्रष्टुमिहार्हति । अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे बालक! इस जन्म में तुम मेरा फिर दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनके अन्तःकरण के संस्कार और दोष पूरी तरह परिपक्व होकर शान्त नहीं हुए, उन अपूर्ण योगियों को मेरा दर्शन दुर्लभ है।

श्लोक 6.23

सकृद्यद्दर्शितं रूपमेतत्कामाय तेऽनघ । मत्कामः शनकैः साधु सर्वान् मुञ्चति हृच्छयान् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप! तुम्हारे भीतर मेरी प्राप्ति की उत्कट इच्छा जगाने के लिए मैंने एक बार अपना रूप दिखाया है। मुझे चाहने वाला साधक धीरे-धीरे हृदय की अन्य सभी कामनाएँ छोड़ देता है।

श्लोक 6.24

सत्सेवयादीर्घया ते जाता मयि दृढा मतिः । हित्वावद्यमिमं लोकं गन्ता मज्जनतामसि ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: थोड़े समय की संतसेवा से ही तुम्हारी बुद्धि मुझमें दृढ़ हुई है। इस दोषयुक्त संसार की देह छोड़कर तुम मेरे पार्षदों के समुदाय में आओगे।

श्लोक 6.25

मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कर्हिचित् । प्रजासर्गनिरोधेऽपि स्मृतिश्च मदनुग्रहात् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें लगी हुई तुम्हारी यह बुद्धि कभी नष्ट नहीं होगी। मेरी कृपा से सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के समय भी तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।

श्लोक 6.26

एतावदुक्त्वोपरराम तन्मह- द्भूतं नभोलिङ्गमलिङ्गमीश्वरम् । अहं च तस्मै महतां महीयसे शीर्ष्णावनामं विदधेऽनुकम्पितः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इतना कहकर वह महान, रूपातीत ईश्वर आकाशवाणी के रूप में बोलना बन्द कर गया। उनकी कृपा पाकर मैंने उन महानतम भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 6.27

नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन् गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् । गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहः कालं प्रतीक्षन् विमदो विमत्सरः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर मैं संकोच छोड़कर अनन्त भगवान के नाम गाता, उनकी गूढ़ और मंगलकारी लीलाएँ स्मरण करता हुआ पृथ्वी पर घूमता रहा। मेरा मन सन्तुष्ट, इच्छारहित, अभिमान और ईर्ष्या से मुक्त था; मैं देहत्याग के समय की प्रतीक्षा करता था।

श्लोक 6.28

एवं कृष्णमतेर्ब्रह्मन्नसक्तस्यामलात्मनः । कालः प्रादुरभूत्काले तडित्सौदामनी यथा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! इस प्रकार श्रीकृष्ण में मन लगाए, अनासक्त और शुद्धचित्त रहते हुए समय आने पर मृत्यु बिजली की चमक की तरह अकस्मात उपस्थित हुई।

श्लोक 6.29

प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवतीं तनुम् । आरब्धकर्मनिर्वाणो न्यपतत्पाञ्चभौतिकः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मुझे भगवान की सेवा के योग्य शुद्ध पार्षद-देह प्राप्त हुई, तब प्रारब्ध कर्म समाप्त होने से मेरा पञ्चभौतिक शरीर गिर पड़ा।

श्लोक 6.30

कल्पान्त इदमादाय शयानेऽम्भस्युदन्वतः । शिशयिषोरनुप्राणं विविशेऽन्तरहं विभोः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्प के अन्त में भगवान इस जगत को अपने में समेटकर प्रलयजल में शयन करने लगे। तब ब्रह्माजी के विश्राम के समय मैं भी उनके प्राण के साथ भीतर प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 6.31

सहस्रयुगपर्यन्त उत्थायेदं सिसृक्षतः । मरीचिमिश्रा ऋषयः प्राणेभ्योऽहं च जज्ञिरे ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक हजार युगों की अवधि के बाद ब्रह्माजी जब उठे और फिर सृष्टि करना चाहा, तब उनके प्राणों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मैं भी प्रकट हुआ।

श्लोक 6.32

अन्तर्बहिश्च लोकांस्त्रीन् पर्येम्यस्कन्दितव्रतः । अनुग्रहान्महाविष्णोरविघातगतिः क्वचित् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाविष्णु की कृपा से अब मैं अपने व्रत को अक्षुण्ण रखते हुए तीनों लोकों के भीतर और बाहर विचरता हूँ। मेरी गति कहीं बाधित नहीं होती।

श्लोक 6.33

देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम् । मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान से प्राप्त और स्वरब्रह्म से सुशोभित इस वीणा को बजाकर मैं हरिकथा का गान करता हुआ घूमता रहता हूँ।

श्लोक 6.34

प्रगायतः स्ववीर्याणि तीर्थपादः प्रियश्रवाः । आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मैं भगवान के पराक्रम गाता हूँ, तब पवित्र चरणों वाले और मधुर कीर्तिवाले वे प्रभु बुलाए गए की तरह शीघ्र मेरे चित्त में दर्शन देते हैं।

श्लोक 6.35

एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहुः । भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनका मन विषयों के सुख की इच्छा से बार-बार व्याकुल होता है, उनके लिए भगवान की लीलाओं का गान और वर्णन संसार-सागर से पार कराने वाली नौका के समान देखा गया है।

श्लोक 6.36

यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः । मुकुन्दसेवया यद्वत्तथाऽऽत्माद्धा न शाम्यति ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: काम और लोभ से बार-बार पीड़ित मन यम आदि योगसाधनों से उतनी सहज शान्ति नहीं पाता, जितनी मुकुन्द की सेवा से प्राप्त करता है।

श्लोक 6.37

सर्वं तदिदमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ । जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्चात्मतोषणम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप व्यासजी! आपने जो पूछा था, वह सब मैंने कह दिया—मेरे जन्म और कर्मों का रहस्य तथा आपके आत्मसन्तोष का उपाय भी।

श्लोक 6.38

सूत उवाच । एवं सम्भाष्य भगवान्नारदो वासवीसुतम् । आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—सत्यवती के पुत्र व्यासजी से इस प्रकार बात करके भगवान नारद ने विदा ली। वे स्वतंत्र विचरण करने वाले मुनि अपनी वीणा बजाते हुए चले गए।

श्लोक 6.39

अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शार्ङ्गधन्वनः । गायन् माद्यन्निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि नारद धन्य हैं! वे शार्ङ्गधारी भगवान की कीर्ति गाते हुए आनन्द में मग्न रहते हैं और वीणा के स्वर से दुःखित जगत को आनन्द प्रदान करते हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥

श्रवण से भक्ति की ओर

नारदजी की कथा में संतों की सेवा, कथा में श्रद्धा, नामस्मरण और निष्कपट समर्पण का क्रम दिखाई देता है। जीवन का साधारण कर्म भी भगवान की प्रसन्नता के लिए अर्पित हो, तो वही साधना का आधार बन सकता है। व्यासजी को मिला उपदेश बताता है कि ज्ञान और रचना की पूर्णता हृदय में भगवत्प्रेम जगाने से होती है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। अध्याय 5 के अन्तिम श्लोक और अध्याय 6 की श्लोक-संख्या का संस्कृत विकिस्रोत से भी मिलान किया गया है। आधार-पाठ में अध्याय 5 के श्लोक 40 पर “आख्याहि/प्रख्याहि” विकल्प हैं; यहाँ पहला पाठ “आख्याहि” रखा गया है। विकल्प के रूप में दिए गए कोष्ठकीय पाठान्तर मुख्य पाठ में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है।

भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

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