श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 4–6, व्यास–नारद संवाद और हिंदी भावार्थ
श्रीमद्भागवत महापुराण
प्रथम स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ४–६
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व्यास–नारद संवाद और भक्ति की प्रेरणा
वेदों का विभाग और महाभारत की रचना करने के बाद भी व्यासजी का हृदय पूर्ण प्रसन्न नहीं था। देवर्षि नारद ने उन्हें भगवान के निर्मल यश का गान करने का उपदेश दिया। अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि संतसेवा और श्रद्धापूर्वक हरिकथा सुनने से उनके भीतर भक्ति कैसे जागी।
इस भाग में प्रथम स्कन्ध के अध्याय 4 के 33, अध्याय 5 के 40 और अध्याय 6 के 39 श्लोक—कुल 112 श्लोक—मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ दिया गया है।
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 4
व्यासजी की जिज्ञासा और नारदजी का आगमन
श्लोक 4.1
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी कहते हैं—दीर्घ सत्र में बैठे ऋषियों के वृद्ध कुलपति और ऋग्वेद के विद्वान शौनकजी ने सूतजी के कथन की प्रशंसा करके उनसे फिर प्रश्न किया।
श्लोक 4.2
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी बोले—हे महाभाग सूतजी! हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! भगवान शुकदेव ने जो पुण्यदायिनी भागवत-कथा कही थी, वह हमें सुनाइए।
श्लोक 4.3
सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा किस युग में, कहाँ और किस कारण प्रकट हुई? कृष्णद्वैपायन व्यास मुनि ने किसकी प्रेरणा से इस संहिता की रचना की?
श्लोक 4.4
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी के पुत्र शुकदेव महान योगी, समदर्शी, भेदबुद्धि से रहित और परमात्मा में एकनिष्ठ हैं। उनका आत्मज्ञान बाहर से छिपा रहता है, इसलिए वे साधारण लोगों को अनजान जैसे दिखाई देते हैं।
श्लोक 4.5
सरल हिंदी भावार्थ: जब व्यासजी अपने गृहत्यागी पुत्र के पीछे जा रहे थे, तब स्नान करती देवियों ने वस्त्रधारी व्यासजी को देखकर लज्जा से वस्त्र पहन लिए, पर शुकदेवजी को देखकर ऐसा नहीं किया। व्यासजी के पूछने पर उन्होंने कहा—आपकी दृष्टि में स्त्री-पुरुष का भेद है; आपके पुत्र की निर्मल आत्मदृष्टि में वह भेद नहीं है।
श्लोक 4.6
सरल हिंदी भावार्थ: वे शुकदेवजी जब कुरुजाङ्गल प्रदेश में पहुँचे और हस्तिनापुर में उन्मत्त, मूक अथवा जड़ व्यक्ति की तरह विचर रहे थे, तब नगरवासियों ने उन्हें किस प्रकार पहचाना?
श्लोक 4.7
सरल हिंदी भावार्थ: हे तात! पाण्डववंशी राजर्षि परीक्षित और शुकदेव मुनि का वह संवाद कैसे हुआ, जिसमें यह भगवान की महिमा बताने वाली पावन कथा कही गई?
श्लोक 4.8
सरल हिंदी भावार्थ: वे महाभाग शुकदेव गृहस्थों के घरों में गाय दुहने जितने थोड़े समय के लिए ही ठहरते हैं और अपने सान्निध्य से उनके आश्रम को पवित्र कर देते हैं।
श्लोक 4.9
सरल हिंदी भावार्थ: हे सूतजी! अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को श्रेष्ठ भगवद्भक्त कहा जाता है। उनके आश्चर्यपूर्ण जन्म और कर्मों का भी वर्णन कीजिए।
श्लोक 4.10
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले उस सम्राट ने किस कारण विशाल राज्य और ऐश्वर्य की उपेक्षा करके गंगातट पर आमरण उपवास का संकल्प किया?
श्लोक 4.11
सरल हिंदी भावार्थ: अपने कल्याण के लिए शत्रु भी धन अर्पित करके जिनके चरणों में नमते थे, उस युवा वीर ने त्यागना कठिन राजलक्ष्मी को प्राणों सहित छोड़ने की इच्छा कैसे की?
श्लोक 4.12
सरल हिंदी भावार्थ: भगवत्परायण जन अपने लिए नहीं, लोक के कल्याण और उन्नति के लिए जीते हैं। दूसरों के आश्रय बने परीक्षित ने विरक्त होकर अपना शरीर छोड़ने का निर्णय क्यों लिया?
श्लोक 4.13
सरल हिंदी भावार्थ: हमने जो कुछ पूछा है, वह सब हमें विस्तार से बताइए। वैदिक मन्त्रों के विषय को छोड़कर अन्य समस्त शास्त्रीय वाङ्मय में हम आपको पारंगत मानते हैं।
श्लोक 4.14
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—युगों के क्रम में तीसरे द्वापरयुग के आने पर भगवान की कला से योगी व्यासजी पराशर और सत्यवती के यहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 4.15
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन सूर्य उदित होने पर वे सरस्वती के जल से आचमन और शुद्धि करके नदी के एकान्त तट पर बैठे थे।
श्लोक 4.16
सरल हिंदी भावार्थ: भूत और भविष्य के ज्ञाता उन ऋषि ने काल के अदृश्य प्रभाव से युग-युग में पृथ्वी पर धर्म की व्यवस्था में आने वाले परिवर्तन को देखा।
श्लोक 4.17
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि काल के कारण भौतिक पदार्थों और प्राणियों की शक्ति घट रही है; मनुष्य श्रद्धाहीन, धैर्य और सत्त्व से रहित, कम बुद्धि और अल्पायु होते जा रहे हैं।
श्लोक 4.18
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी दिव्य दृष्टि से मनुष्यों की दुर्भाग्यपूर्ण दशा देखकर अमोघदर्शी व्यासजी सभी वर्णों और आश्रमों के लोगों के हित का उपाय सोचने लगे।
श्लोक 4.19
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की शुद्धि के लिए वैदिक यज्ञकर्म का महत्त्व देखकर उन्होंने यज्ञ-परम्परा को बनाए रखने के लिए एक वेद को चार विभागों में व्यवस्थित किया।
श्लोक 4.20
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—चार वेद पृथक किए गए। इतिहास और पुराण को पाँचवाँ वेद कहा जाता है।
श्लोक 4.21
सरल हिंदी भावार्थ: इनमें पैल ऋग्वेद के धारक बने, विद्वान जैमिनि सामवेद के और वैशम्पायन यजुर्वेद के विशेष ज्ञाता हुए।
श्लोक 4.22
सरल हिंदी भावार्थ: सुमन्तु मुनि अथर्वाङ्गिरस अर्थात अथर्ववेद के ज्ञाता हुए। इतिहास और पुराणों की शिक्षा मेरे पिता रोमहर्षण को प्राप्त हुई।
श्लोक 4.23
सरल हिंदी भावार्थ: इन ऋषियों ने अपने-अपने वेद को अनेक विभागों में बाँटा। उनके शिष्यों, प्रशिष्यों और आगे के शिष्यों से वेदों की अनेक शाखाएँ बनीं।
श्लोक 4.24
सरल हिंदी भावार्थ: कम ग्रहणशक्ति वाले लोग भी वेदों को धारण कर सकें, इसी उद्देश्य से दीनों पर स्नेह रखने वाले भगवान व्यासजी ने यह व्यवस्था की।
श्लोक 4.25
सरल हिंदी भावार्थ: उस समय की परम्परा में जिन स्त्रियों, शूद्रों और केवल नाममात्र के द्विजों को त्रयी की शिक्षा सुनने का अवसर नहीं था, तथा जो कल्याणकारी कर्म का मर्म नहीं जानते थे, उनके हित के लिए मुनि ने करुणापूर्वक महाभारत की रचना की।
श्लोक 4.26
सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रो! इस प्रकार पूरे हृदय से सभी प्राणियों के कल्याण में निरन्तर लगे रहने पर भी व्यासजी का मन पूर्ण सन्तुष्ट नहीं हुआ।
श्लोक 4.27
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ व्यासजी सरस्वती के पवित्र तट पर एकान्त में बैठे इस असन्तोष का कारण सोचने लगे और मन-ही-मन कहने लगे।
श्लोक 4.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने दृढ़ व्रत और निष्कपट भाव से वेदों, गुरुजनों तथा यज्ञाग्नियों का सम्मान किया है और प्राप्त अनुशासन को स्वीकार करके उसका पालन किया है।
श्लोक 4.29
सरल हिंदी भावार्थ: महाभारत के माध्यम से वेदों का अर्थ भी प्रकट किया है, जिसमें स्त्रियाँ और शूद्र आदि भी धर्म तथा अन्य पुरुषार्थों को समझ सकते हैं।
श्लोक 4.30
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी ब्रह्मतेज से सम्पन्न होते हुए मेरा शरीर और अन्तःकरण मानो अपूर्ण और असन्तुष्ट दिखाई देते हैं।
श्लोक 4.31
सरल हिंदी भावार्थ: क्या इसका कारण यह है कि मैंने भगवान के प्रिय और परमहंसों को प्रिय लगने वाले भागवतधर्म का पर्याप्त निरूपण नहीं किया?
श्लोक 4.32
सरल हिंदी भावार्थ: जब कृष्णद्वैपायन व्यासजी इस प्रकार अपने कार्य में कमी अनुभव करके खिन्न थे, तभी देवर्षि नारद उनके उसी आश्रम में आ पहुँचे।
श्लोक 4.33
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी को आते देखकर व्यास मुनि तुरन्त उठ खड़े हुए। उन्होंने देवताओं द्वारा पूजित देवर्षि का विधिपूर्वक सत्कार और पूजन किया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 5
भगवद्यश का महत्त्व और नारदजी की पूर्वकथा
श्लोक 5.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—व्यासजी के समीप सुखपूर्वक बैठे वीणाधारी, परम यशस्वी देवर्षि नारद मुस्कराते हुए उनसे बोले।
श्लोक 5.2
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी ने कहा—हे पराशरनन्दन महाभाग! क्या आपका शरीर और मन अपने-अपने स्तर पर सन्तोष अनुभव कर रहे हैं?
श्लोक 5.3
सरल हिंदी भावार्थ: आपने जानने योग्य विषयों का भलीभाँति अनुसन्धान किया है और समस्त पुरुषार्थों से सम्पन्न अत्यन्त अद्भुत महाभारत की रचना की है।
श्लोक 5.4
सरल हिंदी भावार्थ: आपने सनातन ब्रह्म का भी अध्ययन और विचार किया है। फिर भी, हे प्रभो! आप स्वयं को अकृतार्थ मानकर क्यों खिन्न हो रहे हैं?
श्लोक 5.5
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी बोले—आपने जो कहा है, वह सब सत्य है; फिर भी मेरा मन सन्तुष्ट नहीं है। इस असन्तोष का कारण स्पष्ट नहीं हो रहा। ब्रह्माजी के पुत्र और अगाध ज्ञान वाले आपसे मैं उसका मूल पूछता हूँ।
श्लोक 5.6
सरल हिंदी भावार्थ: आप समस्त गूढ़ रहस्यों को जानते हैं। आपने उस सनातन पुरुष की उपासना की है, जो कारण और कार्य का स्वामी है और गुणों से असंग रहते हुए संकल्पमात्र से जगत की सृष्टि, पालन और संहार करता है।
श्लोक 5.7
सरल हिंदी भावार्थ: आप सूर्य की तरह तीनों लोकों में घूमते हैं और वायु की तरह सबके भीतर तक पहुँचकर अन्तर्यामी भाव से जानते हैं। मैंने धर्म और व्रतों द्वारा ब्रह्म का अध्ययन किया है; फिर भी मुझमें जो कमी है, उसे स्पष्ट बताइए।
श्लोक 5.8
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—आपने भगवान के निर्मल यश का पर्याप्त गान नहीं किया। जिस ज्ञान से भगवान प्रसन्न न हों, उसे मैं अधूरा समझता हूँ।
श्लोक 5.9
सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठ! आपने धर्म आदि पुरुषार्थों का जैसा विस्तार किया है, वैसा भगवान वासुदेव की महिमा का वर्णन नहीं किया।
श्लोक 5.10
सरल हिंदी भावार्थ: अत्यन्त सुन्दर शब्दों से सजी वाणी भी यदि जगत को पवित्र करने वाले हरि का यश नहीं गाती, तो महात्मा उसे कौओं के रमने का स्थान कहते हैं। आत्मरस में रमण करने वाले हंसस्वभाव संत उसमें आनन्द नहीं लेते।
श्लोक 5.11
सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत जिस वाणी में अनन्त भगवान के नाम और यश अंकित हों, वह जनसमुदाय के पापों को दूर करने वाली है। उसमें रचना के नियमों की कुछ कमी भी हो, तो साधु उसे सुनते, गाते और स्वीकार करते हैं।
श्लोक 5.12
सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम और निर्मल ज्ञान भी अच्युत के प्रति प्रेम से रहित होकर शोभा नहीं पाता। फिर भगवान को अर्पित न किए गए कर्म की क्या बात, जो प्रायः बन्धन और अशुभ परिणाम का कारण बनता है?
श्लोक 5.13
सरल हिंदी भावार्थ: हे महाभाग! आपकी दृष्टि अमोघ है, आपका यश पवित्र है, आप सत्यनिष्ठ और दृढ़व्रती हैं। सभी बन्धनों से मुक्ति के लिए समाधि में भगवान के महान चरित्रों का स्मरण कीजिए।
श्लोक 5.14
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लीलाओं से अलग, उन्हीं की शक्ति से बने नाम-रूपों को स्वतंत्र मानकर अन्य विषयों का वर्णन करने वाले की बुद्धि स्थिर आश्रय नहीं पाती। उसकी दशा हवा से डगमगाती नाव जैसी होती है।
श्लोक 5.15
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिन भोगों में स्वभाव से आसक्त है, उन्हें धर्म के नाम पर बढ़ावा देना बड़ी चूक हो सकती है। सामान्य जन फिर उन्हें ही धर्म मानकर पकड़ लेते हैं और उनसे निवृत्त होने की शिक्षा नहीं मानते।
श्लोक 5.16
सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी व्यक्ति निवृत्ति के द्वारा अनन्त भगवान के आनन्द को जान सकता है। गुणों के वश में विषयों की ओर भागने वाला यह नहीं समझता; इसलिए आप उसके लिए भगवान की लीलाएँ प्रकट कीजिए।
श्लोक 5.17
सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने सामान्य कर्तव्य छोड़कर भी हरि के चरणों का भजन करता है और साधना अपूर्ण रहने से कभी विचलित हो जाता है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता। पर भगवान का भजन किए बिना केवल स्वधर्म निभाने वाले ने परम लाभ क्या पाया?
श्लोक 5.18
सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी मनुष्य को उसी दुर्लभ परम लाभ के लिए प्रयत्न करना चाहिए, जो ऊँचे-नीचे लोकों में भटकने से नहीं मिलता। विषयसुख तो दुःख की तरह काल के प्रबल प्रवाह से अपने कर्मानुसार मिलता रहता है।
श्लोक 5.19
सरल हिंदी भावार्थ: हे व्यासजी! मुकुन्द की सेवा का रस चख चुका व्यक्ति सामान्य विषयासक्त मनुष्य की तरह संसार में नहीं बहता। भगवान के चरणों के आलिंगन का आनन्द याद करके वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता।
श्लोक 5.20
सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व भगवान की शक्ति का विस्तार होने से उनसे अभिन्न भी है, पर उनके पूर्ण स्वरूप के समान सीमित विश्वमात्र नहीं है। उसी से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं। आप यह जानते हैं; मैंने केवल थोड़ा संकेत किया है।
श्लोक 5.21
सरल हिंदी भावार्थ: हे अमोघदर्शी! अपने विवेक से जानिए कि आप परम पुरुष परमात्मा की कला हैं। अजन्मा भगवान जगत के कल्याण के लिए प्रकट होते हैं; इसलिए उनके महान अवतारों और चरित्रों का वर्णन कीजिए।
श्लोक 5.22
सरल हिंदी भावार्थ: विद्वानों ने तप, शास्त्राध्ययन, यज्ञ, उत्तम वचन, बुद्धि और दान का अचूक फल यही बताया है कि उनसे उत्तमश्लोक भगवान के गुणों का वर्णन हो।
श्लोक 5.23
सरल हिंदी भावार्थ: हे मुने! एक पूर्वजन्म में मैं वेदज्ञ ब्राह्मणों की सेवा करने वाली एक दासी का पुत्र था। वर्षाकाल में एक स्थान पर ठहरे योगियों की सेवा में मुझे बाल्यावस्था में ही लगाया गया था।
श्लोक 5.24
सरल हिंदी भावार्थ: वे मुनि समदर्शी थे, फिर भी चंचलता से रहित, संयमी, खेल-कूद में अनासक्त, आज्ञाकारी और कम बोलने वाले सेवाभावी बालक के रूप में मुझ पर उन्होंने विशेष कृपा की।
श्लोक 5.25
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों की अनुमति से मैंने एक बार उनका बचा हुआ प्रसाद ग्रहण किया। इससे मेरे दोष दूर हुए और शुद्ध होते चित्त में उनके धर्म और साधना के प्रति रुचि उत्पन्न हुई।
श्लोक 5.26
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कृपा से मैं प्रतिदिन उनके मुख से मनोहर श्रीकृष्ण-कथाएँ सुनता था। श्रद्धापूर्वक लगातार सुनते-सुनते भगवान की कथा के प्रति मेरे भीतर प्रेम और रुचि बढ़ी।
श्लोक 5.27
सरल हिंदी भावार्थ: हे महामुने! भगवान में रुचि होने से मेरी बुद्धि उनमें अचल हुई। उसी से मैं समझने लगा कि स्थूल-सूक्ष्म जगत आत्मस्वरूप पर माया से आरोपित है।
श्लोक 5.28
सरल हिंदी भावार्थ: वर्षा और शरद—इन दोनों ऋतुओं में महात्माओं द्वारा गाए गए हरि के निर्मल यश को निरन्तर सुनने से मेरे भीतर रज और तम के दोषों को दूर करने वाली भक्ति प्रकट हुई।
श्लोक 5.29
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार मैं उन संतों से प्रेम करने वाला, विनम्र, पापों से शुद्ध होता हुआ, श्रद्धालु, संयमी और उनकी सेवा में लगा बालक था।
श्लोक 5.30
सरल हिंदी भावार्थ: तब दीनों पर करुणा करने वाले उन महात्माओं ने जाते समय कृपापूर्वक मुझे वह परम गोपनीय ज्ञान बताया, जिसका उपदेश स्वयं भगवान ने दिया है।
श्लोक 5.31
सरल हिंदी भावार्थ: उसी ज्ञान से मैंने जगत के स्रष्टा भगवान वासुदेव की माया की शक्ति को समझा। उसके द्वारा साधक भगवान के परम पद को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 5.32
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! मैंने आपको तीन प्रकार के दुःखों की चिकित्सा का संकेत बताया है—अपने कर्मों को परम ब्रह्म भगवान की प्रसन्नता के लिए समर्पित कर देना।
श्लोक 5.33
सरल हिंदी भावार्थ: हे सुव्रत! जिस पदार्थ से रोग उत्पन्न होता है, वही उचित उपचार और परिवर्तन से औषधि बनकर उस रोग को दूर भी कर सकता है।
श्लोक 5.34
सरल हिंदी भावार्थ: इसी प्रकार मनुष्यों के कर्म सामान्यतः संसार-बन्धन का कारण बनते हैं; पर वही कर्म परमात्मा को अर्पित होने पर उस बन्धन को मिटाने में सहायक हो जाते हैं।
श्लोक 5.35
सरल हिंदी भावार्थ: यहाँ भगवान को प्रसन्न करने के लिए किया जाने वाला कर्म भक्तियोग से युक्त होता है। उससे सम्बन्धित ज्ञान भी उसी भगवदर्पण भाव के अधीन रहता है।
श्लोक 5.36
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शिक्षा के अनुसार निरन्तर कर्म करते हुए साधक श्रीकृष्ण के नाम और गुणों का गान करते हैं तथा उनका स्मरण बनाए रखते हैं।
श्लोक 5.37
सरल हिंदी भावार्थ: हे भगवान वासुदेव! आपको नमस्कार है; हम आपका ध्यान करते हैं। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और सङ्कर्षण स्वरूपों में भी आपको बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 5.38
सरल हिंदी भावार्थ: जो इस प्रकार भगवान के स्वरूपों के नामों से उस प्राकृत आकार से परे, मन्त्रों में प्रकट होने वाले यज्ञपुरुष की उपासना करता है, वह यथार्थ दृष्टि वाला मनुष्य है।
श्लोक 5.39
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! भगवान के इस उपदेश का मैंने आचरण किया। उससे प्रसन्न होकर केशव ने मुझे तत्त्वज्ञान, आध्यात्मिक सामर्थ्य और अपने प्रति प्रेम प्रदान किया।
श्लोक 5.40
सरल हिंदी भावार्थ: आप भी भगवान की व्यापक रूप से सुनी और गाई जाने वाली महिमा का वर्णन कीजिए, जिससे ज्ञानीजनों की जिज्ञासा पूर्ण होती है। बार-बार दुःख से पीड़ित मनुष्यों के क्लेशों की वास्तविक निवृत्ति महात्मा इसी में देखते हैं।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 6
नारदजी की साधना, भगवद्दर्शन और देवर्षि स्वरूप
श्लोक 6.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—हे ब्रह्मन्! देवर्षि के पूर्वजन्म और कर्मों की यह कथा सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी ने उनसे फिर पूछा।
श्लोक 6.2
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी बोले—जिन संतों ने आपको तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया था, उनके चले जाने के बाद उस बाल्यावस्था में आपने क्या किया?
श्लोक 6.3
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्माजी के पुत्र! इसके बाद आपका जीवन किस प्रकार बीता? समय आने पर आपने वह शरीर कैसे छोड़ा?
श्लोक 6.4
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवश्रेष्ठ! पूर्वकल्प की यह स्मृति आपको कैसे बनी रही? सब स्मृतियों का नाश करने वाला काल इसे क्यों नहीं मिटा सका?
श्लोक 6.5
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—मुझे तत्त्वज्ञान देने वाले उन महात्माओं के चले जाने पर बाल्यावस्था में मैंने इस प्रकार जीवन बिताया।
श्लोक 6.6
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी माता दूसरों की सेवा करने वाली साधारण स्त्री थीं और मैं उनका इकलौता पुत्र था। उनका और कोई सहारा न होने से वे मुझसे बहुत स्नेह करती थीं।
श्लोक 6.7
सरल हिंदी भावार्थ: वे मेरा पालन-पोषण चाहती थीं, पर स्वयं पराधीन होने से सब कुछ कर सकने में समर्थ नहीं थीं। जगत ईश्वर के अधीन है, जैसे काठ की कठपुतली संचालक के अधीन रहती है।
श्लोक 6.8
सरल हिंदी भावार्थ: माता के स्नेह के कारण मैं उसी ब्राह्मण-परिवार में रहा। उस समय मेरी आयु पाँच वर्ष थी और मुझे दिशा, देश तथा समय का विशेष ज्ञान नहीं था।
श्लोक 6.9
सरल हिंदी भावार्थ: एक रात माता गाय दुहने के लिए घर से बाहर निकलीं। मार्ग में उनके पैर से छू जाने पर कालप्रेरित सर्प ने उन्हें काट लिया।
श्लोक 6.10
सरल हिंदी भावार्थ: तब मैंने इस घटना में भी भक्तों का कल्याण चाहने वाले ईश्वर की कृपा समझी और उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।
श्लोक 6.11
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में मैंने समृद्ध जनपद, नगर, गाँव, गोपालों की बस्तियाँ, खदानें, छोटी बस्तियाँ, उद्यान, वन और उपवन पार किए।
श्लोक 6.12
सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न रंगों की धातुओं वाले पर्वत, हाथियों द्वारा तोड़ी गई वृक्षशाखाएँ, निर्मल जलाशय और देवताओं के योग्य सुन्दर कमलिनियाँ देखीं।
श्लोक 6.13
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पक्षी विविध मधुर स्वर कर रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे। आगे नरकट, बाँस, सरकण्डे, कुश और कीचक आदि से भरे घने प्रदेश मिले।
श्लोक 6.14
सरल हिंदी भावार्थ: अकेला चलते हुए मैं एक विशाल, घोर और भयावह वन में पहुँचा, जहाँ सर्प, उल्लू और गीदड़ आदि रहते थे।
श्लोक 6.15
सरल हिंदी भावार्थ: थकान, भूख और प्यास से मेरी इन्द्रियाँ और शरीर शिथिल हो गए थे। नदी के जलाशय में स्नान करके जल पिया और आचमन किया, जिससे थकान दूर हुई।
श्लोक 6.16
सरल हिंदी भावार्थ: उस निर्जन वन में पीपल के नीचे बैठकर मैंने महात्माओं से जैसा सुना था, उसी प्रकार अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान किया।
श्लोक 6.17
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से वश हुए मन द्वारा भगवान के चरणकमलों का ध्यान करते हुए मेरे नेत्रों में उत्कण्ठा के आँसू आए। धीरे-धीरे भगवान हरि मेरे हृदय में प्रकट हुए।
श्लोक 6.18
सरल हिंदी भावार्थ: अत्यधिक प्रेम से मेरा शरीर रोमाञ्चित हो उठा और मैं परम आनन्द में डूब गया। हे मुने! उस समय मुझे अपने और बाहरी जगत का भान नहीं रहा।
श्लोक 6.19
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का वह मनोहर और शोक दूर करने वाला रूप सहसा अदृश्य हो गया। उसे न देखकर मैं व्याकुल होकर उठ खड़ा हुआ, जैसे कोई प्रिय वस्तु खोकर दुःखी हो।
श्लोक 6.20
सरल हिंदी भावार्थ: उस रूप को फिर देखने की इच्छा से मैंने मन को हृदय में एकाग्र किया, पर बहुत देखने पर भी दर्शन नहीं हुआ। अतृप्त और विरहाकुल मन से मैं व्यथित हो गया।
श्लोक 6.21
सरल हिंदी भावार्थ: निर्जन स्थान में इस प्रकार प्रयत्न करते हुए मुझसे वाणी की पहुँच से परे भगवान ने गम्भीर और मधुर स्वर में कहा, मानो मेरा शोक शान्त कर रहे हों।
श्लोक 6.22
सरल हिंदी भावार्थ: हे बालक! इस जन्म में तुम मेरा फिर दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनके अन्तःकरण के संस्कार और दोष पूरी तरह परिपक्व होकर शान्त नहीं हुए, उन अपूर्ण योगियों को मेरा दर्शन दुर्लभ है।
श्लोक 6.23
सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप! तुम्हारे भीतर मेरी प्राप्ति की उत्कट इच्छा जगाने के लिए मैंने एक बार अपना रूप दिखाया है। मुझे चाहने वाला साधक धीरे-धीरे हृदय की अन्य सभी कामनाएँ छोड़ देता है।
श्लोक 6.24
सरल हिंदी भावार्थ: थोड़े समय की संतसेवा से ही तुम्हारी बुद्धि मुझमें दृढ़ हुई है। इस दोषयुक्त संसार की देह छोड़कर तुम मेरे पार्षदों के समुदाय में आओगे।
श्लोक 6.25
सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें लगी हुई तुम्हारी यह बुद्धि कभी नष्ट नहीं होगी। मेरी कृपा से सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय के समय भी तुम्हारी स्मृति बनी रहेगी।
श्लोक 6.26
सरल हिंदी भावार्थ: इतना कहकर वह महान, रूपातीत ईश्वर आकाशवाणी के रूप में बोलना बन्द कर गया। उनकी कृपा पाकर मैंने उन महानतम भगवान को सिर झुकाकर प्रणाम किया।
श्लोक 6.27
सरल हिंदी भावार्थ: फिर मैं संकोच छोड़कर अनन्त भगवान के नाम गाता, उनकी गूढ़ और मंगलकारी लीलाएँ स्मरण करता हुआ पृथ्वी पर घूमता रहा। मेरा मन सन्तुष्ट, इच्छारहित, अभिमान और ईर्ष्या से मुक्त था; मैं देहत्याग के समय की प्रतीक्षा करता था।
श्लोक 6.28
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! इस प्रकार श्रीकृष्ण में मन लगाए, अनासक्त और शुद्धचित्त रहते हुए समय आने पर मृत्यु बिजली की चमक की तरह अकस्मात उपस्थित हुई।
श्लोक 6.29
सरल हिंदी भावार्थ: जब मुझे भगवान की सेवा के योग्य शुद्ध पार्षद-देह प्राप्त हुई, तब प्रारब्ध कर्म समाप्त होने से मेरा पञ्चभौतिक शरीर गिर पड़ा।
श्लोक 6.30
सरल हिंदी भावार्थ: कल्प के अन्त में भगवान इस जगत को अपने में समेटकर प्रलयजल में शयन करने लगे। तब ब्रह्माजी के विश्राम के समय मैं भी उनके प्राण के साथ भीतर प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 6.31
सरल हिंदी भावार्थ: एक हजार युगों की अवधि के बाद ब्रह्माजी जब उठे और फिर सृष्टि करना चाहा, तब उनके प्राणों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ मैं भी प्रकट हुआ।
श्लोक 6.32
सरल हिंदी भावार्थ: महाविष्णु की कृपा से अब मैं अपने व्रत को अक्षुण्ण रखते हुए तीनों लोकों के भीतर और बाहर विचरता हूँ। मेरी गति कहीं बाधित नहीं होती।
श्लोक 6.33
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान से प्राप्त और स्वरब्रह्म से सुशोभित इस वीणा को बजाकर मैं हरिकथा का गान करता हुआ घूमता रहता हूँ।
श्लोक 6.34
सरल हिंदी भावार्थ: जब मैं भगवान के पराक्रम गाता हूँ, तब पवित्र चरणों वाले और मधुर कीर्तिवाले वे प्रभु बुलाए गए की तरह शीघ्र मेरे चित्त में दर्शन देते हैं।
श्लोक 6.35
सरल हिंदी भावार्थ: जिनका मन विषयों के सुख की इच्छा से बार-बार व्याकुल होता है, उनके लिए भगवान की लीलाओं का गान और वर्णन संसार-सागर से पार कराने वाली नौका के समान देखा गया है।
श्लोक 6.36
सरल हिंदी भावार्थ: काम और लोभ से बार-बार पीड़ित मन यम आदि योगसाधनों से उतनी सहज शान्ति नहीं पाता, जितनी मुकुन्द की सेवा से प्राप्त करता है।
श्लोक 6.37
सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप व्यासजी! आपने जो पूछा था, वह सब मैंने कह दिया—मेरे जन्म और कर्मों का रहस्य तथा आपके आत्मसन्तोष का उपाय भी।
श्लोक 6.38
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—सत्यवती के पुत्र व्यासजी से इस प्रकार बात करके भगवान नारद ने विदा ली। वे स्वतंत्र विचरण करने वाले मुनि अपनी वीणा बजाते हुए चले गए।
श्लोक 6.39
सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि नारद धन्य हैं! वे शार्ङ्गधारी भगवान की कीर्ति गाते हुए आनन्द में मग्न रहते हैं और वीणा के स्वर से दुःखित जगत को आनन्द प्रदान करते हैं।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥
श्रवण से भक्ति की ओर
नारदजी की कथा में संतों की सेवा, कथा में श्रद्धा, नामस्मरण और निष्कपट समर्पण का क्रम दिखाई देता है। जीवन का साधारण कर्म भी भगवान की प्रसन्नता के लिए अर्पित हो, तो वही साधना का आधार बन सकता है। व्यासजी को मिला उपदेश बताता है कि ज्ञान और रचना की पूर्णता हृदय में भगवत्प्रेम जगाने से होती है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। अध्याय 5 के अन्तिम श्लोक और अध्याय 6 की श्लोक-संख्या का संस्कृत विकिस्रोत से भी मिलान किया गया है। आधार-पाठ में अध्याय 5 के श्लोक 40 पर “आख्याहि/प्रख्याहि” विकल्प हैं; यहाँ पहला पाठ “आख्याहि” रखा गया है। विकल्प के रूप में दिए गए कोष्ठकीय पाठान्तर मुख्य पाठ में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है।
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