श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 7–9, कुन्ती स्तुति और भीष्म उपदेश
श्रीमद्भागवत महापुराण
प्रथम स्कन्ध • भाग ३ • अध्याय ७–९
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करुणा, शरणागति और अन्तिम स्मरण
इस भाग का आरम्भ व्यासजी की समाधि और भागवत की रचना से होता है। फिर अश्वत्थामा के अपराध पर द्रौपदी की करुणा, उत्तरा के गर्भ की रक्षा और कुन्तीजी की भक्तिपूर्ण प्रार्थना आती है। अन्त में शरशय्या पर भीष्मजी का धर्मोपदेश, श्रीकृष्ण की स्तुति और भगवान में एकाग्र होकर उनका देहत्याग वर्णित है।
यहाँ अध्याय 7 के 58, अध्याय 8 के 52 और अध्याय 9 के 49 श्लोक—कुल 159 श्लोक—मूल क्रम में दिए हैं। हर श्लोक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ है।
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 7
भागवत की रचना, अश्वत्थामा और द्रौपदी की करुणा
श्लोक 7.1
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी बोले—हे सूतजी! नारदजी के चले जाने पर उनका अभिप्राय सुन चुके भगवान व्यासजी ने आगे क्या किया?
श्लोक 7.2
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—पवित्र सरस्वती नदी के पश्चिम तट पर शम्याप्रास नामक आश्रम है, जहाँ ऋषियों के यज्ञ और साधना सम्पन्न होते हैं।
श्लोक 7.3
सरल हिंदी भावार्थ: बेर के वृक्षों से सुशोभित अपने उसी आश्रम में व्यासजी बैठे। जल से आचमन करके उन्होंने अपने मन को एकाग्र किया।
श्लोक 7.4
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तियोग से निर्मल और पूर्ण एकाग्र हुए मन में उन्होंने आदिपुरुष भगवान तथा उनके आश्रय में रहने वाली माया का दर्शन किया।
श्लोक 7.5
सरल हिंदी भावार्थ: माया से मोहित जीव गुणों से परे होते हुए भी स्वयं को त्रिगुणमय शरीर मान लेता है और इस भ्रम से उत्पन्न दुःखों को भोगता है।
श्लोक 7.6
सरल हिंदी भावार्थ: इन अनर्थों की सीधी निवृत्ति अधोक्षज भगवान के भक्तियोग से होती है। लोक इस उपाय को नहीं जानता, इसलिए विद्वान व्यासजी ने सात्वत संहिता श्रीमद्भागवत की रचना की।
श्लोक 7.7
सरल हिंदी भावार्थ: इस संहिता को सुनने से परम पुरुष श्रीकृष्ण में ऐसी भक्ति उत्पन्न होती है, जो शोक, मोह और भय दूर करती है।
श्लोक 7.8
सरल हिंदी भावार्थ: भागवत संहिता की रचना और व्यवस्था करके व्यास मुनि ने निवृत्ति में रमे अपने पुत्र शुकदेव को उसका अध्ययन कराया।
श्लोक 7.9
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—शुकदेव तो आत्मानन्द में रमे, निवृत्तिपरायण और अन्य सभी विषयों के प्रति उदासीन थे। उन्होंने इस विशाल ग्रंथ का अध्ययन किसलिए किया?
श्लोक 7.10
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—आत्माराम और बन्धनों से मुक्त मुनि भी भगवान में निष्काम भक्ति करते हैं; हरि के गुण इतने आकर्षक और अद्भुत हैं।
श्लोक 7.11
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के गुणों से आकर्षित होकर व्यासपुत्र शुकदेव ने इस महान आख्यान का अध्ययन किया। वे भगवान विष्णु के भक्तों को सदा प्रिय हैं।
श्लोक 7.12
सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं भगवान की कथा से सम्बद्ध राजर्षि परीक्षित के जन्म-कर्म और पाण्डवों के शोक तथा उनकी अन्तिम गति का वर्णन करूँगा।
श्लोक 7.13
सरल हिंदी भावार्थ: कौरवों और सृञ्जयों के युद्ध में वीर योद्धा वीरगति पा चुके थे। धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन की जाँघें भीम की गदा के प्रहार से टूट गई थीं।
श्लोक 7.14
सरल हिंदी भावार्थ: तब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने अपने स्वामी को प्रसन्न करने की आशा में सोते हुए द्रौपदी-पुत्रों के सिर काटकर अर्पित किए। यह निन्दनीय कर्म दुर्योधन को भी प्रिय नहीं लगा।
श्लोक 7.15
सरल हिंदी भावार्थ: अपने बालक पुत्रों का वध सुनकर उनकी माता द्रौपदी घोर शोक से रो पड़ीं। आँसुओं से भरे नेत्रों वाली द्रौपदी को अर्जुन ने सान्त्वना दी।
श्लोक 7.16
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन बोले—हे भद्रे! जब मैं गाण्डीव के बाणों से उस आततायी का सिर लाकर तुम्हारे सामने रखूँगा और पुत्रों का अन्त्येष्टि-स्नान होगा, तब तुम्हारा शोक दूर करूँगा।
श्लोक 7.17
सरल हिंदी भावार्थ: इन सान्त्वना के वचनों से पत्नी को धीरज देकर कपिध्वज अर्जुन कवच और धनुष धारण करके रथ से गुरुपुत्र का पीछा करने चले। उनके मित्र श्रीकृष्ण सारथि थे।
श्लोक 7.18
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन को दूर से आते देखकर बालकों का हत्यारा अश्वत्थामा घबरा गया। प्राण बचाने के लिए रथ पर भागा, जैसे रुद्र के भय से सूर्य भागे थे।
श्लोक 7.19
सरल हिंदी भावार्थ: घोड़ों के थक जाने और कोई आश्रय न मिलने पर द्रोणपुत्र ने प्राणरक्षा का उपाय ब्रह्मशिर अस्त्र को ही समझा।
श्लोक 7.20
सरल हिंदी भावार्थ: प्राणसंकट देखकर उसने आचमन किया और ध्यानपूर्वक अस्त्र का संधान किया, यद्यपि वह उसे वापस लेने की विधि नहीं जानता था।
श्लोक 7.21
सरल हिंदी भावार्थ: उससे सब दिशाओं में प्रचण्ड तेज फैल गया। प्राणों पर संकट देखकर विजयी अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा।
श्लोक 7.22
सरल हिंदी भावार्थ: हे कृष्ण! हे महाभाग! आप भक्तों को अभय देने वाले हैं। संसार के ताप में जलते जीवों के लिए आप ही एकमात्र मुक्ति और आश्रय हैं।
श्लोक 7.23
सरल हिंदी भावार्थ: आप प्रकृति से परे साक्षात आदिपुरुष ईश्वर हैं। अपनी चैतन्यशक्ति से माया को दूर रखकर आप अपने अद्वितीय स्वरूप में स्थित हैं।
श्लोक 7.24
सरल हिंदी भावार्थ: आप ही माया से मोहित जीवों के लिए अपनी शक्ति से धर्म आदि कल्याणकारी मार्गों की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक 7.25
सरल हिंदी भावार्थ: आपका यह अवतार पृथ्वी का भार उतारने और एकनिष्ठ भक्तों को निरन्तर ध्यान तथा स्मरण का अवसर देने के लिए है।
श्लोक 7.26
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवदेव! सब ओर से आता हुआ यह अत्यन्त भयंकर तेज क्या है और कहाँ से उत्पन्न हुआ है, मैं नहीं जानता।
श्लोक 7.27
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—यह द्रोणपुत्र का चलाया ब्रह्मास्त्र है। प्राणसंकट में उसने इसे छोड़ा है, पर इसके उपसंहार की विधि नहीं जानता।
श्लोक 7.28
सरल हिंदी भावार्थ: इसे निष्प्रभावी करने वाला कोई दूसरा साधारण अस्त्र नहीं है। तुम अस्त्रविद्या जानते हो; अपने ब्रह्मास्त्र के तेज से इसके बढ़े हुए तेज को रोको।
श्लोक 7.29
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—भगवान का निर्देश सुनकर अर्जुन ने आचमन किया, उनकी परिक्रमा की और ब्रह्मास्त्र के विरुद्ध अपना ब्रह्मास्त्र संधान किया।
श्लोक 7.30
सरल हिंदी भावार्थ: दोनों बाणों में स्थित अस्त्रों के तेज आपस में मिले और पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं को ढकते हुए सूर्य और अग्नि की तरह बढ़ने लगे।
श्लोक 7.31
सरल हिंदी भावार्थ: दोनों अस्त्रों का महान तेज तीनों लोकों को जलाने लगा। उससे पीड़ित प्रजा ने उसे प्रलयकाल की अग्नि समझा।
श्लोक 7.32
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा का उपद्रव, लोकव्यवस्था की हानि और भगवान वासुदेव की इच्छा देखकर अर्जुन ने दोनों अस्त्रों को वापस समेट लिया।
श्लोक 7.33
सरल हिंदी भावार्थ: फिर क्रोध से लाल नेत्रों वाले अर्जुन ने शीघ्र उस क्रूर गौतमीपुत्र अश्वत्थामा को पकड़कर रस्सी से बाँध लिया, जैसे पशु बाँधा जाता है।
श्लोक 7.34
सरल हिंदी भावार्थ: जब अर्जुन बँधे हुए शत्रु को शिविर ले जाना चाहते थे, तब कमलनयन भगवान ने क्रोधपूर्ण वचन कहे।
श्लोक 7.35
सरल हिंदी भावार्थ: हे पार्थ! इस ब्राह्मण-कुल में जन्मे अधर्मी की रक्षा मत करो। इसने रात में सोते हुए निर्दोष बालकों का वध किया है।
श्लोक 7.36
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ पुरुष मदहोश, असावधान, उन्मत्त, सोए हुए, बालक, स्त्री, असहाय, शरणागत, रथहीन अथवा भयभीत शत्रु का वध नहीं करता।
श्लोक 7.37
सरल हिंदी भावार्थ: जो निर्दयी दुष्ट दूसरों के प्राण लेकर अपने प्राण बचाता है, उसके अपराध का दण्ड उसे अधोगति के दोष से रोकने वाला माना गया है।
श्लोक 7.38
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मेरे सामने द्रौपदी को प्रतिज्ञा की थी—हे मानिनि! तुम्हारे पुत्रों के हत्यारे का सिर मैं लाऊँगा।
श्लोक 7.39
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए हे वीर! स्वजनों का हत्यारा और कुल को कलंकित करने वाला यह पापी आततायी दण्ड का पात्र है। इसने अपने स्वामी का भी अनिष्ट किया है।
श्लोक 7.40
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के धर्मविवेक की परीक्षा कर रहे थे। उनके प्रेरित करने पर भी उदार अर्जुन अपने पुत्रों के हत्यारे गुरुपुत्र को मारना नहीं चाहते थे।
श्लोक 7.41
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान गोविन्द को प्रिय सारथि रूप में पाकर अर्जुन शिविर पहुँचे और मारे गए पुत्रों के लिए शोक करती पत्नी के सामने अश्वत्थामा को प्रस्तुत किया।
श्लोक 7.42
सरल हिंदी भावार्थ: अपने अपकृत्य से लज्जित, सिर झुकाए और पशु की तरह बँधे गुरुपुत्र को देखकर कोमल स्वभाव वाली द्रौपदी ने दयावश उसे प्रणाम किया।
श्लोक 7.43
सरल हिंदी भावार्थ: उसके बन्धन और इस प्रकार लाए जाने को सहन न कर सकीं द्रौपदी बोलीं—इसे छोड़ दीजिए, छोड़ दीजिए। यह ब्राह्मण और हमारे गुरु का प्रतिनिधि है।
श्लोक 7.44
सरल हिंदी भावार्थ: इन्हीं के पिता की कृपा से आपने रहस्यों सहित धनुर्वेद, अस्त्र छोड़ने और वापस लेने की विधि तथा विविध अस्त्रों की शिक्षा पाई है।
श्लोक 7.45
सरल हिंदी भावार्थ: गुरु द्रोण ही पुत्र के रूप में उपस्थित हैं। वीरमाता कृपी उनकी पत्नी और अर्धांगिनी हैं; वे पुत्र के कारण पति की मृत्यु के बाद जीवित रहीं।
श्लोक 7.46
सरल हिंदी भावार्थ: हे धर्मज्ञ महाभागो! बार-बार पूजने और सम्मान करने योग्य इस गुरु-परिवार को आपकी ओर से दुःख नहीं मिलना चाहिए।
श्लोक 7.47
सरल हिंदी भावार्थ: इसकी पतिव्रता माता कृपी अपने पुत्र के लिए वैसे न रोएँ, जैसे मैं पुत्रों को खोकर दुःखी और आँसुओं से भरी बार-बार रो रही हूँ।
श्लोक 7.48
सरल हिंदी भावार्थ: जो असंयमी शासक ब्राह्मण-कुल को क्रोधित और शोकाकुल करते हैं, वह शोक उनके परिवार को भी सम्बन्धियों सहित विनाश की ओर ले जा सकता है।
श्लोक 7.49
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—हे विप्रो! धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने रानी के धर्मपूर्ण, न्यायोचित, करुणामय, निष्कपट, समतापूर्ण और उदार वचनों की प्रशंसा की।
श्लोक 7.50
सरल हिंदी भावार्थ: नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन, देवकीनन्दन भगवान तथा वहाँ उपस्थित अन्य स्त्री-पुरुष भी उनके कथन से सहमत हुए।
श्लोक 7.51
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोधित भीम ने कहा—इसका वध ही उचित है। इसने न अपने स्वामी के हित में, न अपनी रक्षा के लिए, बल्कि व्यर्थ ही सोते बालकों को मारा है।
श्लोक 7.52
सरल हिंदी भावार्थ: भीम और द्रौपदी की बातें सुनकर चतुर्भुज भगवान ने अपने सखा अर्जुन का मुख देखा और मुस्कराते हुए कहा।
श्लोक 7.53
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण बोले—ब्राह्मण-कुल में जन्मे व्यक्ति का वध नहीं करना चाहिए और आततायी दण्डनीय है। मैंने दोनों निर्देश बताए हैं; ऐसा उपाय करो कि दोनों की मर्यादा रहे।
श्लोक 7.54
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी को सान्त्वना देते समय की गई अपनी प्रतिज्ञा भी सत्य करो और भीम, द्रौपदी तथा मुझे भी प्रसन्न करो।
श्लोक 7.55
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—अर्जुन तुरन्त भगवान का अभिप्राय समझ गए। उन्होंने तलवार से अश्वत्थामा के सिर की मणि उसके बालों सहित उतार ली।
श्लोक 7.56
सरल हिंदी भावार्थ: बालहत्या से जिसकी प्रतिष्ठा नष्ट हो चुकी थी, उस अश्वत्थामा को मणि और तेज से रहित करके अर्जुन ने बन्धन खोले और शिविर से निकाल दिया।
श्लोक 7.57
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे ब्रह्मबन्धु के लिए मुण्डन, सम्पत्ति का हरण और स्थान से निष्कासन सामाजिक वध के समान दण्ड बताया गया है; यहाँ शारीरिक वध नहीं किया गया।
श्लोक 7.58
सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद पुत्रशोक से व्याकुल सभी पाण्डवों ने द्रौपदी के साथ अपने मृत सम्बन्धियों के अन्त्येष्टि आदि आवश्यक संस्कार किए।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 8
परीक्षित की गर्भरक्षा, कुन्ती स्तुति और युधिष्ठिर का शोक
श्लोक 8.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—इसके बाद पाण्डव श्रीकृष्ण और द्रौपदी सहित, स्त्रियों को आगे करके मृत सम्बन्धियों को जलाञ्जलि देने गंगा के तट पर गए।
श्लोक 8.2
सरल हिंदी भावार्थ: सभी ने जलाञ्जलि दी, अत्यन्त विलाप किया और भगवान के चरणरज से पवित्र गंगाजल में स्नान किया।
श्लोक 8.3
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ धृतराष्ट्र, उनके छोटे भाई विदुर, पुत्रशोक से व्याकुल गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदी बैठे हुए थे।
श्लोक 8.4
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण ने मुनियों के साथ उन शोकग्रस्त स्वजन-विहीन लोगों को सान्त्वना दी और प्राणियों पर काल की अपरिहार्य गति समझाई।
श्लोक 8.5
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कपट से छीना गया युधिष्ठिर का राज्य वापस दिलाया और द्रौपदी के केशों का अपमान करने वाले अधर्मी राजाओं का विनाश कराया।
श्लोक 8.6
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने युधिष्ठिर से उत्तम विधि के तीन अश्वमेध यज्ञ कराए और इन्द्र के समान उनका पवित्र यश दिशाओं में फैलाया।
श्लोक 8.7
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों से विदा लेकर श्रीकृष्ण सात्यकि और उद्धव के साथ चले। उन्होंने व्यास आदि ब्राह्मणों का आदर किया और उनसे सम्मान पाया।
श्लोक 8.8
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! द्वारका जाने के लिए भगवान रथ पर बैठ चुके थे। तभी उन्होंने भय से व्याकुल उत्तरा को दौड़ती हुई आते देखा।
श्लोक 8.9
सरल हिंदी भावार्थ: उत्तरा बोलीं—हे महायोगी, देवदेव और जगत्पति! मेरी रक्षा कीजिए। जहाँ जीव एक-दूसरे की मृत्यु का कारण बनते हैं, वहाँ आपके अतिरिक्त कोई निर्भय आश्रय नहीं दिखता।
श्लोक 8.10
सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभो! तपे हुए लोहे के समान तेजस्वी बाण मेरी ओर आ रहा है। वह मुझे जला दे तो भी कोई बात नहीं, पर मेरे गर्भ का नाश न हो।
श्लोक 8.11
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—भक्तवत्सल भगवान ने उनकी बात सुनकर जान लिया कि पाण्डववंश मिटाने के लिए अश्वत्थामा ने यह अस्त्र छोड़ा है।
श्लोक 8.12
सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनिश्रेष्ठ! उसी समय पाँचों पाण्डवों ने अपनी ओर आते हुए पाँच प्रज्वलित बाण देखे और अपने-अपने अस्त्र उठा लिए।
श्लोक 8.13
सरल हिंदी भावार्थ: केवल उन्हीं का आश्रय रखने वाले भक्तों पर संकट देखकर भगवान ने अपने सुदर्शन अस्त्र से उनकी रक्षा की।
श्लोक 8.14
सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों में अन्तर्यामी रूप से स्थित योगेश्वर हरि ने कुरुवंश की रक्षा के लिए अपनी शक्ति से विराट-पुत्री उत्तरा के गर्भ को आवृत कर लिया।
श्लोक 8.15
सरल हिंदी भावार्थ: हे भृगुवंशी! ब्रह्मशिर अस्त्र अमोघ और अजेय माना जाता है, फिर भी भगवान विष्णु के तेज के सामने वह शान्त हो गया।
श्लोक 8.16
सरल हिंदी भावार्थ: इसे अच्युत की कोई असम्भव बात न समझिए। वे अजन्मा प्रभु अपनी दिव्य माया से समस्त जगत की सृष्टि, रक्षा और संहार करते हैं।
श्लोक 8.17
सरल हिंदी भावार्थ: अपने पुत्रों और द्रौपदी के ब्रह्मास्त्र से मुक्त होने पर कुन्तीजी ने प्रस्थान को तैयार श्रीकृष्ण से यह प्रार्थना की।
श्लोक 8.18
सरल हिंदी भावार्थ: कुन्तीजी बोलीं—मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप आदिपुरुष, प्रकृति से परे ईश्वर और सब प्राणियों के भीतर-बाहर स्थित होकर भी अदृश्य हैं।
श्लोक 8.19
सरल हिंदी भावार्थ: आप माया के परदे से ढके, इन्द्रियों से परे और अविनाशी हैं। अज्ञानपूर्ण दृष्टि आपको नहीं पहचानती, जैसे नाट्यवेश धारण किए अभिनेता को कोई अपरिचित व्यक्ति नहीं पहचानता।
श्लोक 8.20
सरल हिंदी भावार्थ: आप निर्मल हृदय वाले परमहंस मुनियों में भक्तियोग प्रकट करने के लिए आते हैं। फिर हम अल्पज्ञ स्त्रियाँ आपका यथार्थ दर्शन कैसे कर सकती हैं—इस प्रकार कुन्ती विनय करती हैं।
श्लोक 8.21
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण, वसुदेव के पुत्र, देवकीनन्दन, नन्दगोप के कुमार और गोविन्द—आपको बारम्बार नमस्कार है।
श्लोक 8.22
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाभि, कमलमाला धारण करने वाले, कमलनयन और कमल के समान चरणों वाले प्रभो! आपको नमस्कार है।
श्लोक 8.23
सरल हिंदी भावार्थ: हे हृषीकेश! जैसे आपने कंस द्वारा कारागार में बन्द और दुःखित देवकी को मुक्त किया, वैसे ही अपने पुत्रों सहित मेरी भी अनेक संकटों से बार-बार रक्षा की।
श्लोक 8.24
सरल हिंदी भावार्थ: हे हरि! विष, भीषण अग्नि, नरभक्षी राक्षस, अन्यायपूर्ण सभा, वनवास की कठिनाई, अनेक युद्धों के महारथियों के अस्त्र और अश्वत्थामा के अस्त्र से आपने हमारी रक्षा की।
श्लोक 8.25
सरल हिंदी भावार्थ: हे जगद्गुरु! ऐसी विपत्तियाँ बार-बार भी आएँ, जिनमें आपका दर्शन होता रहे; क्योंकि आपका दर्शन संसार में पुनः जन्म लेने के प्रवाह को रोकने वाला है।
श्लोक 8.26
सरल हिंदी भावार्थ: ऊँचे जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और सौन्दर्य से जिसका अभिमान बढ़ता है, वह आपका निष्कपट नाम लेने का अधिकारी भाव नहीं पा सकता। आप अकिञ्चन भक्त के आश्रय हैं।
श्लोक 8.27
सरल हिंदी भावार्थ: अकिञ्चनों के धन, गुणों की वृत्तियों से परे, आत्मानन्द में रमण करने वाले, परम शान्त और मोक्ष के स्वामी प्रभो! आपको नमस्कार है।
श्लोक 8.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैं आपको आदि-अन्त से रहित, सर्वव्यापक और सब पर समान रूप से प्रभावी कालस्वरूप ईश्वर मानती हूँ। जीवों के आपसी विरोध में भी आपकी कालशक्ति कार्य करती है।
श्लोक 8.29
सरल हिंदी भावार्थ: हे भगवान! मनुष्यों जैसी लीला करते हुए आपका वास्तविक अभिप्राय कोई नहीं जान सकता। आपका न कोई विशेष प्रिय है, न द्वेषपात्र; भेदभाव तो मनुष्यों की बुद्धि में है।
श्लोक 8.30
सरल हिंदी भावार्थ: हे विश्वात्मन्! आप अजन्मा और अकर्ता होकर भी पशु, मनुष्य, ऋषि तथा जलचर आदि रूपों में जन्म और कर्म प्रकट करते हैं; यह अत्यन्त आश्चर्यमयी लीला है।
श्लोक 8.31
सरल हिंदी भावार्थ: आपसे स्वयं भय भी डरता है, फिर भी यशोदाजी को रस्सी उठाते देखकर आपका मुख झुक गया, काजल और आँसुओं से आँखें भर आईं तथा आप भयभीत बालक की तरह खड़े हुए। यह लीला मुझे विस्मित करती है।
श्लोक 8.32
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ लोग कहते हैं कि जैसे मलय पर्वत में चन्दन शोभता है, वैसे अपने प्रिय पुण्यश्लोक यदु के वंश का यश बढ़ाने के लिए आप अजन्मा होकर जन्म लेते हैं।
श्लोक 8.33
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य कहते हैं कि वसुदेव और देवकी की प्रार्थना स्वीकार करके आप जगत की रक्षा तथा देवद्रोहियों के विनाश के लिए प्रकट हुए।
श्लोक 8.34
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ कहते हैं कि भारी बोझ से जल में डूबती नौका जैसी पीड़ित पृथ्वी का भार उतारने के लिए ब्रह्माजी की प्रार्थना पर आपका अवतार हुआ।
श्लोक 8.35
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ का कथन है कि अज्ञान, इच्छा और कर्म से दुःखित जीवों के लिए सुनने तथा स्मरण करने योग्य पावन लीलाएँ करने के उद्देश्य से आप प्रकट हुए।
श्लोक 8.36
सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग आपकी लीलाएँ बार-बार सुनते, गाते, कहते, स्मरण करते और उनमें आनन्द लेते हैं, वे शीघ्र आपके उन चरणकमलों का दर्शन पाते हैं, जो संसार-प्रवाह को रोक देते हैं।
श्लोक 8.37
सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभो! आपने ही हमारे हित के कार्य किए हैं। अब क्या आप अपने इन आश्रित स्वजनों को छोड़कर जा रहे हैं, जिनका राजाओं से विरोध है और आपके चरणों के सिवा कोई सहारा नहीं?
श्लोक 8.38
सरल हिंदी भावार्थ: आपके दर्शन और सान्निध्य के बिना यदुवंशी और हम पाण्डवों के नाम-रूप का क्या मूल्य है? हमारी दशा नियन्ता चेतना के बिना इन्द्रियों जैसी हो जाएगी।
श्लोक 8.39
सरल हिंदी भावार्थ: हे गदाधर! आपके विशिष्ट चिह्नों वाले चरणों से अंकित यह भूमि अभी जैसी शोभित है, आपके चले जाने पर वैसी नहीं रहेगी।
श्लोक 8.40
सरल हिंदी भावार्थ: समृद्ध जनपद, पके अन्न और औषधियाँ, वन, पर्वत, नदियाँ और समुद्र—ये सब आपकी कृपादृष्टि से फलते-फूलते हैं।
श्लोक 8.41
सरल हिंदी भावार्थ: हे विश्वेश्वर, विश्वात्मा और विश्वमूर्ति! पाण्डवों तथा वृष्णिवंश के अपने स्वजनों में बँधी मेरी इस दृढ़ आसक्ति की गाँठ काट दीजिए।
श्लोक 8.42
सरल हिंदी भावार्थ: हे मधुपति! जैसे गंगा का प्रवाह निरन्तर समुद्र की ओर बहता है, वैसे मेरी बुद्धि किसी अन्य विषय की ओर न जाकर केवल आपमें प्रेम के साथ निरन्तर लगी रहे।
श्लोक 8.43
सरल हिंदी भावार्थ: हे श्रीकृष्ण, अर्जुन के सखा, वृष्णिश्रेष्ठ और पृथ्वी के द्रोही राजवंशों के विनाशक! आपकी शक्ति मुक्तिदायिनी है। गोविन्द, गौ-ब्राह्मण-देवताओं की पीड़ा हरने वाले अवतार, योगेश्वर और जगद्गुरु भगवान! आपको नमस्कार है।
श्लोक 8.44
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—कुन्ती के मधुर वचनों से इस प्रकार स्तुति किए जाने पर समस्त मंगलों के उदयस्थान वैकुण्ठनाथ अपनी मायामयी लीला में मन्द मुस्कराए।
श्लोक 8.45
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान हस्तिनापुर में आए। फिर जब अपने नगर जाने लगे, तो प्रेमवश राजा युधिष्ठिर ने उन्हें रोक लिया।
श्लोक 8.46
सरल हिंदी भावार्थ: व्यास आदि भगवान का अभिप्राय जानने वाले मुनियों और अद्भुत कर्म करने वाले श्रीकृष्ण ने इतिहासों के उदाहरणों से समझाया, फिर भी शोकग्रस्त युधिष्ठिर को शान्ति नहीं मिली।
श्लोक 8.47
सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रो! स्वजनों के वध का विचार करते हुए धर्मपुत्र युधिष्ठिर देहसम्बन्धी स्नेह और मोह से प्रभावित होकर कहने लगे।
श्लोक 8.48
सरल हिंदी भावार्थ: देखिए, मेरे हृदय में कितना अज्ञान जम गया है! दूसरों का आहार बनने वाले इस नश्वर शरीर के लिए मैंने अनेक अक्षौहिणी सेनाओं का विनाश करा दिया।
श्लोक 8.49
सरल हिंदी भावार्थ: बालकों, ब्राह्मणों, सम्बन्धियों, मित्रों, पितरों, भाइयों और गुरुजनों के अनिष्ट का कारण बनने पर मुझे असंख्य वर्षों में भी नरक से मुक्ति कैसे मिलेगी?
श्लोक 8.50
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की रक्षा करने वाले राजा को धर्मयुद्ध में शत्रुओं का वध करने से पाप नहीं लगता—शास्त्र का यह वचन भी मेरे मन को आश्वस्त नहीं कर पा रहा।
श्लोक 8.51
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे द्वारा जिनके सम्बन्धी मारे गए, उन स्त्रियों के मन में जो दुःख और आक्रोश उत्पन्न हुआ है, उसे गृहस्थ के कर्मकाण्डों से मिटा सकना मुझे सम्भव नहीं लगता।
श्लोक 8.52
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे कीचड़ से कीचड़युक्त जल और मदिरा से मदिराजनित अशुद्धि नहीं धुलती, वैसे ही हिंसा से हुई हत्या को हिंसामिश्रित यज्ञों से मिटाने का विचार उचित नहीं लगता—यह युधिष्ठिर की शोकपूर्ण मनोदशा है।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 9
भीष्म का धर्मोपदेश, श्रीकृष्ण-स्तुति और परम गति
श्लोक 9.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—प्रजा के प्रति अपराध की आशंका और सभी धर्मों को जानने की इच्छा से युधिष्ठिर उस कुरुक्षेत्र में गए, जहाँ देवव्रत भीष्म शरशय्या पर पड़े थे।
श्लोक 9.2
सरल हिंदी भावार्थ: उनके सभी भाई सुन्दर घोड़ों वाले स्वर्णभूषित रथों पर पीछे चले। व्यास, धौम्य आदि ब्राह्मण भी साथ थे।
श्लोक 9.3
सरल हिंदी भावार्थ: हे विप्रर्षि! भगवान श्रीकृष्ण भी अर्जुन के साथ रथ पर गए। उन सबके बीच युधिष्ठिर ऐसे शोभित थे, जैसे यक्षों के बीच कुबेर।
श्लोक 9.4
सरल हिंदी भावार्थ: धरती पर स्वर्ग से उतरे देवता जैसे पड़े भीष्मजी को देखकर पाण्डवों ने अनुचरों और चक्रधारी श्रीकृष्ण सहित प्रणाम किया।
श्लोक 9.5
सरल हिंदी भावार्थ: हे श्रेष्ठ! भरतवंश के महान भीष्म को देखने वहाँ ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि एकत्र हुए थे।
श्लोक 9.6
सरल हिंदी भावार्थ: पर्वत, नारद, धौम्य, भगवान व्यास, बृहदश्व, भरद्वाज तथा शिष्यों सहित परशुरामजी भी वहाँ आए।
श्लोक 9.7
सरल हिंदी भावार्थ: वसिष्ठ, इन्द्रप्रमद, त्रित, गृत्समद, असित, कक्षीवान, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र और सुदर्शन भी उपस्थित थे।
श्लोक 9.8
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्रह्मन्! शुकदेव आदि निर्मल मुनि तथा कश्यप और अङ्गिरा आदि ऋषि भी अपने शिष्यों के साथ पहुँचे।
श्लोक 9.9
सरल हिंदी भावार्थ: देश-काल की मर्यादा जानने वाले धर्मज्ञ वसुश्रेष्ठ भीष्म ने उन महाभाग अतिथियों को देखकर यथायोग्य उनका सम्मान किया।
श्लोक 9.10
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म भगवान की महिमा जानते थे। उन्होंने अपने हृदय में सदा स्थित और अपनी शक्ति से साकार रूप धारण करके सामने बैठे जगदीश्वर श्रीकृष्ण की पूजा की।
श्लोक 9.11
सरल हिंदी भावार्थ: समीप बैठे विनम्र और प्रेमपूर्ण पाण्डवों को देखकर भीष्म के नेत्र स्नेहाश्रुओं से भर गए। वे उनसे इस प्रकार बोले।
श्लोक 9.12
सरल हिंदी भावार्थ: अहो! यह कितना कष्ट और अन्याय जैसा प्रतीत होता है कि ब्राह्मणों, धर्म और अच्युत का आश्रय रखने वाले आप धर्मपुत्रों को इतना दुःख सहना पड़ा।
श्लोक 9.13
सरल हिंदी भावार्थ: महारथी पाण्डु के निधन पर युवा कुन्ती छोटे बालकों की माता थीं। उन्होंने आप सबके पालन के लिए बार-बार अनेक क्लेश सहन किए।
श्लोक 9.14
सरल हिंदी भावार्थ: आपके जीवन में जो अप्रिय हुआ, उसे मैं काल का प्रभाव मानता हूँ। रक्षकों सहित संसार उसी के वश में है, जैसे बादलों की पंक्तियाँ वायु के वश में रहती हैं।
श्लोक 9.15
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ धर्मपुत्र राजा, गदाधारी भीम, महान धनुर्धर अर्जुन और गाण्डीव हों तथा श्रीकृष्ण सखा हों, वहाँ भी विपत्ति आ गई!
श्लोक 9.16
सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्! भगवान क्या करना चाहते हैं, इसे कोई पूरी तरह नहीं जानता। उनके अभिप्राय की खोज में बड़े विद्वान भी चकित और मोहित हो जाते हैं।
श्लोक 9.17
सरल हिंदी भावार्थ: हे भरतश्रेष्ठ! इसलिए इसे दैवी व्यवस्था के अधीन जानकर उसके अनुकूल अपने कर्तव्य का पालन कीजिए। हे नाथ! अब अनाथ हुई प्रजा की रक्षा कीजिए।
श्लोक 9.18
सरल हिंदी भावार्थ: ये श्रीकृष्ण साक्षात आदिपुरुष भगवान नारायण हैं। अपनी माया से लोगों को मोहित करते हुए वृष्णिवंश में अपना परम स्वरूप छिपाकर विचरते हैं।
श्लोक 9.19
सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्! इनकी अत्यन्त गूढ़ महिमा को भगवान शिव, देवर्षि नारद और भगवान कपिल जानते हैं।
श्लोक 9.20
सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें तुम अपने मामा के पुत्र, प्रिय मित्र और परम हितैषी मानते हो, उन्हीं को स्नेहवश तुमने मन्त्री, दूत और सारथि बनाया है।
श्लोक 9.21
सरल हिंदी भावार्थ: वे सबके आत्मा, समदर्शी, अद्वय और अहंकार से रहित हैं। उनके लिए ये सेवाकार्य किसी प्रकार की हीनता या पक्षपात का कारण नहीं हैं।
श्लोक 9.22
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी हे राजन्! एकनिष्ठ भक्तों पर उनकी कृपा देखिए—मेरे प्राण छोड़ने के समय वे स्वयं दर्शन देने आए हैं।
श्लोक 9.23
सरल हिंदी भावार्थ: भक्ति से जिनमें मन लगाकर और वाणी से जिनका नाम गाते हुए योगी शरीर छोड़ता है, वह कामनाओं तथा कर्मबन्धन से मुक्त होता है।
श्लोक 9.24
सरल हिंदी भावार्थ: वे देवदेव भगवान मेरे शरीर छोड़ने तक सामने रहें। उनका प्रसन्न हास और अरुण नेत्रों से उज्ज्वल मुखकमल तथा चतुर्भुज स्वरूप मेरे ध्यान में स्थिर रहे।
श्लोक 9.25
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—यह सुनकर युधिष्ठिर ने शरशय्या पर लेटे भीष्म से अनेक धर्मों के विषय में पूछा। ऋषिगण भी उनके उत्तर सुन रहे थे।
श्लोक 9.26
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म ने मनुष्य के स्वभाव, वर्ण और आश्रम के अनुसार कर्तव्यों तथा आसक्ति और वैराग्य से सम्बद्ध प्रवृत्ति-निवृत्ति के दोनों मार्गों का निरूपण किया।
श्लोक 9.27
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म और भागवतधर्म को अलग-अलग, कहीं संक्षेप में और कहीं विस्तार से समझाया।
श्लोक 9.28
सरल हिंदी भावार्थ: हे मुने! तत्त्वज्ञ भीष्म ने विविध आख्यानों और इतिहासों के माध्यम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा उनकी प्राप्ति के उपायों का वर्णन किया।
श्लोक 9.29
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म का उपदेश देते हुए भीष्म के सामने उत्तरायण का वह समय आ पहुँचा, जिसकी प्रतीक्षा इच्छामृत्यु वाले योगी करते हैं।
श्लोक 9.30
सरल हिंदी भावार्थ: तब उन्होंने अपने विस्तृत उपदेश को विराम दिया। आसक्ति से रहित मन को सामने पीताम्बर धारण किए चतुर्भुज श्रीकृष्ण में स्थिर करके उन्हें अपलक देखने लगे।
श्लोक 9.31
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध धारणा से उनके अन्तःकरण के अशुभ मिट गए। भगवान की दृष्टि से अस्त्रों की पीड़ा दूर हुई और इन्द्रियों की चंचलता शान्त हो गई। शरीर छोड़ते हुए वे जनार्दन की स्तुति करने लगे।
श्लोक 9.32
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म बोले—अब मेरी तृष्णारहित बुद्धि सर्वव्यापक, सात्वतश्रेष्ठ भगवान को समर्पित है। वे अपने आनन्द में पूर्ण होकर भी कभी लीला के लिए प्रकृति का आश्रय लेते हैं, जिससे सृष्टि का प्रवाह चलता है।
श्लोक 9.33
सरल हिंदी भावार्थ: तीनों लोकों को मोहित करने वाले तमाल जैसे श्याम वर्ण, सूर्यकिरणों जैसे उज्ज्वल पीताम्बर और घुँघराले बालों से घिरे मुखकमल वाले अर्जुनसखा में मेरा निर्मल प्रेम हो।
श्लोक 9.34
सरल हिंदी भावार्थ: युद्ध में घोड़ों की धूल से धूसरित, बिखरे केशों और पसीने से सुशोभित मुख वाले श्रीकृष्ण को मैं स्मरण करता हूँ। मेरे तीक्ष्ण बाणों से घायल त्वचा और चमकते कवच वाले उन्हीं प्रभु में मेरा चित्त रहे।
श्लोक 9.35
सरल हिंदी भावार्थ: सखा के कहने पर जिन्होंने दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा किया और अपनी दृष्टि से विपक्षी योद्धाओं की आयु हर ली, उन पार्थसखा में मेरी प्रीति बनी रहे।
श्लोक 9.36
सरल हिंदी भावार्थ: सामने खड़े स्वजनों को देखकर उन्हें मारने को पाप समझते हुए विचलित अर्जुन का मोह जिन्होंने आत्मविद्या से दूर किया, उन परम प्रभु के चरणों में मेरी भक्ति हो।
श्लोक 9.37
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी प्रतिज्ञा सत्य करने के लिए उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा की उपेक्षा की और रथ से कूदकर चक्र उठा लिया। उत्तरीय गिराते हुए वे मेरी ओर ऐसे दौड़े, जैसे सिंह हाथी पर झपटता है।
श्लोक 9.38
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे बाणों से जिनका कवच छिन्न और शरीर रक्तरंजित हो गया था, वे मुझे मारने के लिए बलपूर्वक आगे बढ़े। वही भगवान मुकुन्द मेरी परम गति हों।
श्लोक 9.39
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन के रथ की रक्षा और संचालन करते, हाथ में चाबुक और घोड़ों की लगाम लिए मनोहर भगवान में मरणकाल में मेरा प्रेम रहे। रणभूमि में उन्हें देखते हुए प्राण छोड़ने वाले वीरों ने उनके समान दिव्य स्वरूप पाया।
श्लोक 9.40
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी सुन्दर चाल, लीलामय हास और प्रेमपूर्ण दृष्टि ने गोपियों को गौरव और आनन्द दिया, वे प्रेमविह्वल होकर उनकी लीलाओं का अनुकरण करते हुए उनके भाव में तन्मय हो गईं।
श्लोक 9.41
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में मुनियों और श्रेष्ठ राजाओं से भरी सभा में जिन्होंने अग्रपूजा पाई थी, वही दर्शनीय परमात्मा आज मेरे सामने प्रत्यक्ष हैं।
श्लोक 9.42
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे एक सूर्य अनेक देखने वालों को अलग-अलग दिखाई देता है, वैसे ही एक अजन्मा भगवान अपनी रची देहों के प्रत्येक हृदय में स्थित हैं। अब भेद का मोह मिटाकर मैंने उन्हीं को जान लिया है।
श्लोक 9.43
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—इस प्रकार भीष्म ने मन, वाणी और दृष्टि की सभी वृत्तियाँ आत्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण में लगा दीं। उनका श्वास भीतर ही शान्त हो गया।
श्लोक 9.44
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म को निष्कल ब्रह्म में प्रतिष्ठित होते जानकर सब लोग मौन हो गए, जैसे दिन समाप्त होने पर पक्षी शान्त हो जाते हैं।
श्लोक 9.45
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ देवताओं और मनुष्यों के बजाए दुन्दुभि गूँज उठे। सज्जनों ने भीष्म की प्रशंसा की और आकाश से पुष्पवर्षा हुई।
श्लोक 9.46
सरल हिंदी भावार्थ: हे भार्गव! युधिष्ठिर ने दिवंगत भीष्म के अन्त्येष्टि आदि संस्कार कराए और कुछ समय तक दुःखित रहे।
श्लोक 9.47
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न मुनियों ने भगवान के गूढ़ नामों से उनकी स्तुति की। फिर श्रीकृष्ण में हृदय लगाए अपने-अपने आश्रमों को लौट गए।
श्लोक 9.48
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के साथ हस्तिनापुर पहुँचे और धृतराष्ट्र तथा तपस्विनी गान्धारी को सान्त्वना दी।
श्लोक 9.49
सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र की अनुमति और भगवान वासुदेव की स्वीकृति से समर्थ राजा युधिष्ठिर ने अपने पिता-पितामहों के राज्य का धर्मपूर्वक शासन किया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥
भक्ति का प्रवाह भगवान की ओर
द्रौपदी की करुणा प्रतिशोध के बीच विवेक की याद दिलाती है। कुन्तीजी की प्रार्थना में संसार की आसक्ति से ऊपर उठकर गंगा की धारा जैसी अखण्ड भगवत्प्रीति की इच्छा है। भीष्मजी का अन्तिम स्मरण बताता है कि जीवनभर का ज्ञान और धर्म अन्ततः भगवान के चरणों में समर्पित हो सकता है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। आधार में अध्याय 9 के श्लोक 31 पर “गतायुधव्यथः/श्रमः” विकल्प दिए हैं; यहाँ पहला पाठ “गतायुधव्यथः” रखा गया है। विकल्प के कोष्ठकीय पाठान्तर मुख्य श्लोकों में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। यह प्रथम स्कन्ध का क्रमिक तीसरा भाग है।
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