लंका दहन की संपूर्ण कथा | जब हनुमान जी ने रावण की स्वर्ण लंका जला दी

🚩 श्री हनुमान भक्ति

लंका दहन की संपूर्ण कथा

जब श्री हनुमान जी ने रावण की स्वर्ण लंका जला दी

सुंदरकांड का लंका दहन प्रसंग श्री हनुमान जी के साहस, बुद्धि, श्रीराम-भक्ति और अद्भुत पराक्रम का अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है।

माता सीता की खोज करते हुए श्री हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे। अशोक वाटिका में माता सीता से मिलकर उन्होंने श्रीराम की मुद्रिका दी और प्रभु का संदेश सुनाया।

इसके बाद हनुमान जी ने अशोक वाटिका उजाड़कर रावण की शक्ति को चुनौती दी। अनेक राक्षसों को परास्त करने के बाद उन्हें रावण की सभा में ले जाया गया। वहीं से आगे वह प्रसंग शुरू होता है जिसे हम लंका दहन के नाम से जानते हैं।

रावण की सभा में हनुमान जी

रावण की सभा में भी हनुमान जी तनिक भयभीत नहीं हुए। उन्होंने स्वयं को भगवान श्रीराम का दूत बताया और रावण को समझाया कि वह माता सीता को सम्मानपूर्वक श्रीराम के पास लौटा दे।

लेकिन अहंकार से भरे रावण ने हनुमान जी की बात स्वीकार नहीं की। वह श्रीराम के सामर्थ्य और हनुमान जी की चेतावनी को समझने के बजाय क्रोधित हो गया।

रावण ने पूँछ में आग लगाने का आदेश क्यों दिया?

श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में वर्णन आता है कि रावण ने हनुमान जी की पूँछ का अपमान करने का विचार किया। उसने राक्षसों से कहा कि पूँछ पर कपड़ा लपेटकर उसे तेल में भिगोया जाए और फिर उसमें अग्नि लगा दी जाए।

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥

हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढ़ानी शुरू कर दी

राक्षस कपड़े लाते गए, तेल और घी लगाते गए, लेकिन हनुमान जी अपनी पूँछ बढ़ाते गए। रामचरितमानस में इस प्रसंग को हनुमान जी की लीला के रूप में वर्णित किया गया है।

रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
भाव: पूँछ लपेटने में इतना कपड़ा, घी और तेल लगाया गया कि नगर में उनकी कमी हो गई।

राक्षसों ने हनुमान जी की पूँछ में आग लगा दी

राक्षस हनुमान जी को नगर में घुमाते हुए उनका उपहास करने लगे। इसके बाद उनकी पूँछ में अग्नि लगा दी गई।

लेकिन जिस अग्नि को रावण ने हनुमान जी का अपमान समझा, वही कुछ ही क्षणों बाद उसके अहंकार और स्वर्ण लंका के विनाश का कारण बन गई।

हनुमान जी ने धारण किया लघुरूप

पूँछ में आग लगते ही हनुमान जी ने तुरंत अत्यंत छोटा रूप धारण किया और अपने बंधनों से निकल गए। इसके बाद वे लंका की स्वर्ण अटारियों पर जा चढ़े।

पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥

आरंभ हुआ लंका दहन

अब हनुमान जी एक भवन से दूसरे भवन पर छलाँग लगाने लगे। उनकी जलती हुई पूँछ से लंका के भवनों में अग्नि फैलने लगी।

देखते ही देखते स्वर्ण से चमकती लंका चारों ओर अग्नि की लपटों से घिर गई। जिस लंका के वैभव और शक्ति पर रावण को इतना अहंकार था, वही नगरी एक अकेले श्रीरामदूत के पराक्रम के सामने असहाय दिखाई देने लगी।

🚩 विभीषण का घर

रामचरितमानस की परंपरा में वर्णन मिलता है कि लंका दहन के समय धर्मनिष्ठ विभीषण का घर सुरक्षित रहा। विभीषण रावण के भाई होते हुए भी उसके अधर्म से सहमत नहीं थे और उनके हृदय में श्रीराम के प्रति श्रद्धा थी।

चारों ओर मच गया हाहाकार

अग्नि फैलते ही लंका में भय और अफरा-तफरी मच गई। हनुमान जी भवन से भवन और अटारी से अटारी पर पहुँचते गए।

रामचरितमानस इस प्रसंग में हनुमान जी के पराक्रम के साथ दैवी सहायता का भी वर्णन करता है। लंका का वह सामर्थ्य, जिस पर रावण को अपार गर्व था, श्रीरामदूत के सामने टिक नहीं सका।

अग्नि हनुमान जी को क्यों नहीं जला सकी?

सुंदरकांड के वर्णन में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि हनुमान जी उस प्रभु के दूत हैं जिन्होंने स्वयं अग्नि की रचना की है, इसलिए अग्नि उन्हें हानि नहीं पहुँचा सकी।

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥

पूरी लंका जलाकर समुद्र में कूदे हनुमान जी

लंका दहन पूरा करने के बाद हनुमान जी समुद्र की ओर गए और जलती हुई पूँछ की अग्नि को समुद्र के जल में शांत किया।

उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥

लंका जलाने के बाद हनुमान जी कहाँ गए?

पूँछ की अग्नि बुझाने के बाद हनुमान जी ने फिर छोटा रूप धारण किया और माता सीता के सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हुए।

उनका उद्देश्य केवल लंका का विनाश करना नहीं था। उनका मुख्य कार्य माता सीता का पता लगाना, उन्हें श्रीराम का संदेश देना और फिर श्रीराम तक उनका समाचार पहुँचाना था।

लंका दहन का आध्यात्मिक संदेश

🔥 अहंकार का अंत
रावण की स्वर्ण लंका उसके वैभव और अहंकार का प्रतीक थी। कथा हमें सिखाती है कि अधर्म पर आधारित सामर्थ्य स्थायी नहीं रहता।
🚩 प्रभु पर विश्वास
हनुमान जी प्रत्येक कठिन परिस्थिति में श्रीराम के कार्य को सर्वोपरि रखते हैं।
🙏 शक्ति के साथ विवेक
हनुमान जी केवल बलवान ही नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुसार रूप और रणनीति बदलने वाले अत्यंत बुद्धिमान योद्धा भी हैं।
🌺 सेवा ही महानता
इतने महान पराक्रम के बाद भी हनुमान जी स्वयं को श्रीराम का सेवक और दूत ही मानते हैं।

सुंदरकांड में लंका दहन क्यों महत्वपूर्ण है?

लंका दहन सुंदरकांड के सबसे प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है। यह केवल विनाश का वर्णन नहीं, बल्कि श्रीराम के दूत की निर्भयता और रावण के अहंकार के पतन की शुरुआत का संकेत भी है।

माता सीता की खोज पूरी हो चुकी थी, रावण को चेतावनी मिल चुकी थी और अब लंका ने प्रत्यक्ष रूप से श्रीरामदूत के सामर्थ्य को देख लिया था।

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