श्री गंगा चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Ganga Chalisa

🌊 श्री गंगा चालीसा

श्री गंगा चालीसा पतित-पावनी माँ गंगा की महिमा, राजा भागीरथ की तपस्या, भगवान शिव की जटाओं से उनके पृथ्वी पर अवतरण और पवित्र तीर्थों का भक्तिपूर्ण वर्णन करती है। नीचे संपूर्ण प्रचलित गंगा चालीसा सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥

अर्थ: समस्त जगत को पवित्र करने वाली देव नदी माँ गंगा की जय हो। भगवान शिव की जटाओं में निवास करने वाली दिव्य तरंगों वाली माता को प्रणाम है।

जय जग जननि हरण अघ खानी।
आनन्द करनि गंग महारानी॥

अर्थ: संसार की माता और दोषों को दूर करने वाली आनंददायिनी गंगा महारानी की जय हो।

जय भागीरथि सुरसरि माता।
कलिमल मूल दलनि विख्याता॥

अर्थ: भागीरथी और सुरसरि नाम से प्रसिद्ध माँ गंगा को कलियुग के दोषों को दूर करने वाली कहा गया है।

जय जय जाह्नु सुता अघ हननी।
भीष्म की माता जग जननी॥

अर्थ: जाह्नवी नाम से प्रसिद्ध तथा भीष्म पितामह की माता गंगा को जगतजननी के रूप में प्रणाम किया गया है।

धवल कमल दल मम तनु साजे।
लखि शत शरद चन्द्र छवि लाजे॥

अर्थ: माता का उज्ज्वल स्वरूप सफेद कमल के समान बताया गया है, जिसकी शोभा के सामने अनेक पूर्ण चंद्रमा भी फीके लगें।

वाहन मकर विमल शुचि सोहै।
अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥

अर्थ: माता का वाहन मकर है और उनके हाथ में अमृत कलश सुशोभित है।

जड़ित रत्न कंचन आभूषण।
हिय मणि हार, हरणि तम दूषण॥

अर्थ: माता रत्न और स्वर्ण आभूषणों से सुसज्जित हैं और उनका प्रकाश अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करने का प्रतीक है।

जग पावनि त्रय ताप नसावनि।
तरल तरंग तंग मन भावनि॥

अर्थ: माँ गंगा को संसार को पवित्र करने वाली और जीवन के कष्टों से मुक्ति की प्रार्थना का आश्रय माना गया है।

जो गणपति अति पूज्य प्रधाना।
तिहूँ ते प्रथम गंग अस्नाना॥

अर्थ: धार्मिक परंपरा में गंगा स्नान और गंगाजल को अनेक शुभ कार्यों से पहले पवित्रता के प्रतीक के रूप में महत्व दिया गया है।

ब्रह्म कमण्डल वासिनी देवी।
श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवी॥

अर्थ: माँ गंगा को ब्रह्मा के कमंडल और भगवान विष्णु के चरणों से संबंधित दिव्य नदी के रूप में स्मरण किया गया है।

साठि सहस्र सगर सुत तारयो।
गंगा सागर तीरथ धारयो॥

अर्थ: राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के उद्धार की प्रसिद्ध कथा और गंगासागर तीर्थ का स्मरण किया गया है।

अगम तरंग उठयो मन भावन।
लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥

अर्थ: माँ गंगा की सुंदर तरंगों और पवित्र हरिद्वार तीर्थ की महिमा का वर्णन है।

तीरथ राज प्रयाग अक्षयवट।
धरयौ मातु पुनि काशी करवट॥

अर्थ: प्रयागराज, अक्षयवट और काशी जैसे गंगा से जुड़े पवित्र तीर्थों का स्मरण किया गया है।

धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढ़ी।
तारणि अमित पितृ पद पीढ़ी॥

अर्थ: माँ गंगा को पूर्वजों के कल्याण और आध्यात्मिक मुक्ति से जुड़ी दिव्य नदी माना गया है।

भागीरथ तप कियो अपारा।
दियो ब्रह्म तब सुरसरि धारा॥

अर्थ: राजा भागीरथ ने कठोर तप किया, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने गंगा को पृथ्वी की ओर भेजने की अनुमति दी।

जब जग जननी चल्यो लहराई।
शंभु जटा महँ रह्यो समाई॥

अर्थ: जब गंगा प्रचंड वेग से पृथ्वी की ओर आईं, भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में धारण किया।

वर्ष पर्यन्त गंग महारानी।
रहीं शंभु के जटा भुलानी॥

अर्थ: कथा में गंगा महारानी के भगवान शिव की जटाओं में रहने का वर्णन किया गया है।

मुनि भागीरथ शंभुहिं ध्यायो।
तब इक बून्द जटा से पायो॥

अर्थ: भागीरथ की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपनी जटाओं से गंगा की धारा पृथ्वी की ओर प्रवाहित की।

ताते मातु भई त्रय धारा।
मृत्यु लोक, नभ अरु पाताला॥

अर्थ: गंगा की दिव्य धारा को पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल—तीनों लोकों से जुड़ा हुआ बताया गया है।

गई पाताल प्रभावति नामा।
मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥

अर्थ: गंगा के अलग-अलग लोकों में अलग नामों से प्रवाहित होने की धार्मिक परंपरा का वर्णन है।

मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि।
कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥

अर्थ: पृथ्वी पर माँ गंगा को जाह्नवी नाम से भी जाना जाता है और उन्हें पवित्रता का दिव्य प्रतीक माना गया है।

धनि मइया तव महिमा भारी।
धर्म धुरि कलि कलुष कुठारी॥

अर्थ: माता की महान महिमा को धर्म और सदाचार की रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में स्तुति की गई है।

मातु प्रभावति धनि मन्दाकिनी।
धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥

अर्थ: प्रभावती, मंदाकिनी और सुरसरि जैसे नामों से माँ गंगा के दिव्य स्वरूप की प्रशंसा की गई है।

पान करत निर्मल गंगाजल।
पावत मन इच्छित अनन्त फल॥

अर्थ: धार्मिक परंपरा में गंगाजल को पवित्र माना जाता है और भक्त इसका उपयोग श्रद्धा तथा पूजा में करते हैं।

जो नर हरि सम्पति चाह करई।
निशदिन तव सेवा वह करई॥

अर्थ: जो भक्त भगवान की कृपा और आध्यात्मिक संपदा चाहता है, वह श्रद्धापूर्वक माँ गंगा का स्मरण करता है।

जई पगु सुरसरि हेतु उठावहिं।
तई जगि अश्वमेध फल पावहिं॥

अर्थ: तीर्थयात्रा की ओर श्रद्धा से उठाए गए प्रत्येक कदम को धार्मिक परंपरा में पुण्यकारी माना गया है।

महा पतित जिन काहु न तारे।
तिन तारे इक नाम तिहारे॥

अर्थ: गंगा नाम के स्मरण को आत्मशुद्धि, पश्चात्ताप और ईश्वर की शरण में लौटने के भाव से जोड़ा गया है।

शत योजनहू से जो ध्यावहिं।
निश्चय विष्णु लोक पद पावहिं॥

अर्थ: माता का स्मरण स्थान की दूरी से नहीं बल्कि श्रद्धा के भाव से जुड़ा बताया गया है।

नाम भजत अगणित अघ नाशै।
विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥

अर्थ: माँ गंगा का नाम-स्मरण मन को शुद्ध करने और ज्ञान, विवेक तथा आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने की प्रेरणा देता है।

जिमि धन मूल धर्म अरु दाना।
धर्म मूल गंगाजल पाना॥

अर्थ: इस पद में गंगाजल की पवित्रता और धार्मिक जीवन में उसके पारंपरिक महत्व का गुणगान किया गया है।

तव गुण गुणन करत सुख भाजत।
गृह गृह सम्पत्ति सुमति विराजत॥

अर्थ: माता के गुणों का स्मरण परिवार में सद्बुद्धि, संतोष और मंगल की प्रार्थना के साथ किया जाता है।

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत।
दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत॥

अर्थ: नियमित भक्ति और आत्मचिंतन मनुष्य को अपने व्यवहार में सुधार लाकर सदाचार की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

बुद्धिहीन विद्या बल पावै।
रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥

अर्थ: यह फलश्रुति ज्ञान, शक्ति और आरोग्य की धार्मिक प्रार्थना व्यक्त करती है। बीमारी में उचित चिकित्सकीय उपचार भी आवश्यक है।

गंगा गंगा जो नर कहहीं।
भूखे नंगे कबहुँ न रहहीं॥

अर्थ: फलश्रुति में माँ गंगा के नाम का स्मरण करने वाले भक्त के जीवन-निर्वाह और कल्याण की कामना की गई है।

निकसत ही मुख गंगा माई।
श्रवण दाबि यम चलहिं पराई॥

अर्थ: यह काव्यात्मक फलश्रुति गंगा नाम की महान आध्यात्मिक महिमा को व्यक्त करती है।

महा अघिन अधमन कहँ तारें।
भए नर्क के बन्द किवारे॥

अर्थ: माता की शरण को पश्चात्ताप, आत्मशुद्धि और गलत मार्ग से वापस धर्म की ओर आने का प्रतीक माना गया है।

जो नर जपै गंग शत नामा।
सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥

अर्थ: गंगा के पवित्र नामों का श्रद्धापूर्वक जप करने वाला भक्त अपने शुभ कार्यों और आध्यात्मिक प्रगति की प्रार्थना करता है।

सब सुख भोग परम पद पावहीं।
आवागमन रहित ह्वै जावहीं॥

अर्थ: फलश्रुति में सांसारिक कल्याण के साथ अंततः परम आध्यात्मिक मुक्ति की कामना की गई है।

धनि मइया सुरसरि सुखदैनी।
धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥

अर्थ: सुख प्रदान करने वाली माँ गंगा और प्रयागराज के पवित्र त्रिवेणी संगम की महिमा का गुणगान किया गया है।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा।
सुन्दरदास गंगा कर दासा॥

अर्थ: इस पद में रचनाकार सुंदरदास स्वयं को माँ गंगा का सेवक बताते हैं।

जो यह पढ़ै गंगा चालीसा।
मिलै भक्ति अविरल वागीसा॥

अर्थ: समापन में श्रद्धापूर्वक गंगा चालीसा पढ़ने वाले भक्त के लिए अखंड भक्ति और ईश्वर-कृपा की प्रार्थना की गई है।

॥ समापन दोहा ॥
नित नव सुख सम्पत्ति लहैं, धरैं गंग का ध्यान।
अन्त समय सुरपुर बसै, सादर बैठि विमान॥

सम्वत् भुज नभ दिशि, राम जन्म दिन चैत्र।
पूर्ण चालीसा कियो, हरि भक्तन हित नैत्र॥

अर्थ: समापन में माँ गंगा का नियमित ध्यान करने वाले भक्त के कल्याण और परम गति की प्रार्थना की गई है। अंतिम पंक्तियों में चालीसा की रचना पूर्ण होने का पारंपरिक उल्लेख मिलता है।

🌼 भक्ति भावना

माँ गंगा की उपासना केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि जल की पवित्रता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है। गंगा और अन्य नदियों को स्वच्छ रखना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

हर हर गंगे 🌊
जय माँ गंगा 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57

श्री हनुमान आरती: आरती कीजै हनुमान लला की, अर्थ सहित | Hanuman Aarti

सुंदरकांड भाग 21: श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, नल-नील का उपाय और सुंदरकांड समापन | दोहा 58–60