श्री गायत्री चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Gayatri Chalisa

☀️ श्री गायत्री चालीसा

वेदमाता गायत्री को ज्ञान, सद्बुद्धि, आध्यात्मिक प्रकाश और पवित्र चेतना का दिव्य स्वरूप माना जाता है। श्री गायत्री चालीसा में माता की महिमा, शक्ति और भक्त की प्रार्थना का सुंदर वर्णन मिलता है। नीचे श्री गायत्री चालीसा सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड।
शान्ति कान्ति जागृत प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥

जगत जननी मंगल करनि, गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥

अर्थ: माता गायत्री को ज्ञान, प्रकाश, शांति, जागृति और अखंड सृजनशक्ति का स्वरूप मानकर प्रणाम किया गया है। वे जगत की माता और मंगल प्रदान करने वाली हैं।

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥

अर्थ: हे गायत्री माता! आप भूः, भुवः और स्वः तीनों लोकों की जननी हैं तथा अज्ञान और अधर्मरूपी मल को दूर करने वाली हैं।

अक्षर चौविस परम पुनीता।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥

अर्थ: गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों को अत्यंत पवित्र माना गया है और उनमें धर्म तथा ज्ञान का गहरा भाव निहित माना जाता है।

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥

हंसारूढ़ सिताम्बर धारी।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥

अर्थ: माता को सत्य, सात्त्विकता और सनातन चेतना का स्वरूप बताया गया है। उनका उज्ज्वल, पवित्र और दिव्य स्वरूप हंस पर विराजमान बताया गया है।

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥

अर्थ: माता के हाथों में ज्ञान की पुस्तक, पुष्प, कमंडल और जपमाला शोभित हैं। उनका उज्ज्वल स्वरूप ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक है।

ध्यान धरत पुलकित हित होई।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥

अर्थ: श्रद्धापूर्वक माता का ध्यान मन में प्रसन्नता, शांति और सद्बुद्धि उत्पन्न करने की प्रेरणा देता है।

कामधेनु तुम सुर तरु छाया।
निराकार की अद्भुत माया॥

अर्थ: माता को कामधेनु और कल्पवृक्ष की भाँति कल्याणकारी तथा निराकार परमात्मा की अद्भुत शक्ति कहा गया है।

तुम्हरी शरण गहै जो कोई।
तरै सकल संकट सों सोई॥

अर्थ: जो भक्त श्रद्धा के साथ माता की शरण ग्रहण करता है, वह जीवन की कठिनाइयों में उनसे मार्गदर्शन और शक्ति की प्रार्थना करता है।

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥

अर्थ: सरस्वती, लक्ष्मी और काली जैसे देवी स्वरूपों की मूल दिव्य शक्ति के रूप में गायत्री माता का स्तवन किया गया है।

तुम्हरी महिमा पार न पावैं।
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥

अर्थ: माता की महिमा इतनी विशाल बताई गई है कि उसका पूर्ण वर्णन करना संभव नहीं है।

चार वेद की मात पुनीता।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥

अर्थ: माता गायत्री को वेदमाता और ब्रह्माणी, गौरी तथा सीता आदि देवी रूपों में विद्यमान शक्ति माना गया है।

महामन्त्र जितने जग माहीं।
कोई गायत्री सम नाहीं॥

अर्थ: इस स्तुति में गायत्री मंत्र को अत्यंत महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ वैदिक मंत्र के रूप में सम्मान दिया गया है।

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।
आलस पाप अविद्या नासै॥

अर्थ: माता का स्मरण ज्ञान, जागरूकता और सद्बुद्धि बढ़ाने तथा आलस्य और अज्ञान से दूर होने की प्रेरणा देता है।

सृष्टि बीज जग जननि भवानी।
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥

अर्थ: गायत्री माता को सृष्टि की आदि शक्ति, जगतजननी और कल्याण प्रदान करने वाली देवी के रूप में प्रणाम किया गया है।

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।
तुम सों पावें सुरता तेते॥

अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, शिव और अन्य देवताओं की दिव्यता को भी आदि शक्ति से जुड़ा हुआ बताया गया है।

तुम भक्तन की भकत तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥

अर्थ: माता और भक्त का संबंध माँ और संतान जैसा प्रेमपूर्ण बताया गया है।

महिमा अपरम्पार तुम्हारी।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥

अर्थ: तीन चरणों वाली गायत्री माता की अनंत महिमा और भय दूर करने वाले स्वरूप की जय बोली गई है।

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक न जग में आना॥

अर्थ: माता को ज्ञान और विज्ञान की मूल प्रेरणाशक्ति के रूप में स्तुति की गई है।

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।
तुमहिं पाय कछु रहै न कलेसा॥

अर्थ: परम ज्ञान की अनुभूति के बाद अज्ञान का अंत और मन को आध्यात्मिक शांति मिलने का भाव व्यक्त हुआ है।

जानत तुमहिं तुमहिं है जाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥

अर्थ: जैसे पारस के स्पर्श से साधारण धातु मूल्यवान बनती है, वैसे ही दिव्य ज्ञान मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौर समाई॥

अर्थ: माता की दिव्य शक्ति को सृष्टि के प्रत्येक स्थान में विद्यमान माना गया है।

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥

अर्थ: समस्त ग्रह, नक्षत्र और ब्रह्मांड की गति को परम दिव्य व्यवस्था का भाग बताया गया है।

सकल सृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥

अर्थ: माता को सृष्टि के जीवन, पालन, परिवर्तन और संरक्षण की मूल शक्ति के रूप में नमन किया गया है।

मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पातकी भारी॥

अर्थ: दयामयी माता की शरण लेकर मनुष्य अपने दोषों को सुधारने और धर्ममय जीवन अपनाने की प्रार्थना करता है।

जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥

अर्थ: माता की कृपा प्राप्त भक्त के जीवन में प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता बढ़ने का भाव व्यक्त किया गया है।

मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित हो जावें॥

अर्थ: फलश्रुति में माता से बुद्धि, मानसिक शक्ति और आरोग्य की धार्मिक प्रार्थना की गई है।

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥

अर्थ: भक्त माता से जीवन की कठिनाइयों, अभाव और भय को दूर करने की प्रार्थना करता है।

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥

अर्थ: पारिवारिक तनाव और चिंता के समय गायत्री माता का स्मरण मन को धैर्य और शांति देने की आध्यात्मिक प्रेरणा माना गया है।

सन्तति हीन सुसन्तति पावें।
सुख सम्पति युत मोद मनावें॥

अर्थ: यहाँ भक्त परिवार के कल्याण, संतान-सुख और सुख-समृद्धि की धार्मिक कामना माता के सामने रखता है।

भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥

अर्थ: यह पंक्तियाँ भक्त के मन से भय दूर होने और माता की शरण में सुरक्षा का अनुभव करने का धार्मिक भाव प्रकट करती हैं।

जे सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा शुभदाई॥

अर्थ: इस फलश्रुति में विवाहित स्त्रियों द्वारा श्रद्धापूर्वक माता का स्मरण करते हुए परिवार के मंगल की कामना का वर्णन है।

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥

अर्थ: अलग-अलग जीवन परिस्थितियों में सत्य, संयम और माता के प्रति श्रद्धा बनाए रखने का भाव व्यक्त किया गया है।

जयति जयति जगदम्ब भवानी।
तुम सम और दयालु न दानी॥

अर्थ: दयामयी जगदम्बा गायत्री की बारंबार जय बोली गई है।

जो सद्गुरु सो दीक्षा पावे।
सो साधन को सफल बनावे॥

अर्थ: योग्य गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करके अनुशासनपूर्वक आध्यात्मिक साधना करने का महत्व बताया गया है।

सुमिरन करे सुरुचि बड़भागी।
लहै मनोरथ गृही विरागी॥

अर्थ: गृहस्थ हो या विरक्त, श्रद्धापूर्वक माता का स्मरण करने वाला भक्त आध्यात्मिक कल्याण की कामना करता है।

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।
सब समर्थ गायत्री माता॥

अर्थ: गायत्री माता को समस्त दिव्य सामर्थ्य और आध्यात्मिक संपदा प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में प्रणाम किया गया है।

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥

अर्थ: ऋषि, मुनि, योगी और सामान्य भक्त—सभी माता की शरण में अपनी प्रार्थना रखते हैं।

जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥

अर्थ: माता की शरण लेने वाला भक्त अपनी शुभ इच्छाओं और कल्याण की प्रार्थना उनके चरणों में समर्पित करता है।

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।
धन वैभव यश तेज उछाउ॥

अर्थ: भक्त माता से बल, बुद्धि, विद्या, अच्छा स्वभाव, सम्मान और जीवन में उन्नति की प्रार्थना करता है।

सकल बढ़ें उपजें सुख नाना।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥

अर्थ: श्रद्धा और ध्यान के साथ पाठ करने वाले भक्त के जीवन में सद्गुण, ज्ञान और सुख बढ़ें—ऐसी प्रार्थना की गई है।

॥ समापन दोहा ॥
यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोई।
ता पर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥

अर्थ: जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ गायत्री चालीसा का पाठ करता है, वह गायत्री माता की कृपा और आध्यात्मिक प्रेरणा की प्रार्थना करता है।

🌼 भक्ति भावना

माँ गायत्री की उपासना का मूल भाव सद्बुद्धि, ज्ञान, आत्मचिंतन और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देना है। पाठ श्रद्धा, शुद्ध भाव और एकाग्र मन से करें।

जय माँ गायत्री ☀️
वेदमाता गायत्री की जय 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

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