श्री राम रक्षा स्तोत्र अर्थ सहित | सम्पूर्ण Ram Raksha Stotra in Hindi

॥ श्रीसीतारामचन्द्राभ्यां नमः ॥

श्री राम रक्षा स्तोत्र

सम्पूर्ण संस्कृत पाठ • सरल हिंदी भावार्थ
श्री राम रक्षा स्तोत्र भगवान श्रीराम की स्तुति और शरणागति से जुड़ा प्रसिद्ध संस्कृत स्तोत्र है।

इसमें श्रीराम के विविध नामों और स्वरूपों का स्मरण करते हुए मस्तक से लेकर सम्पूर्ण शरीर तक प्रभु की कृपा और संरक्षण की प्रार्थना की गई है।

परंपरा में इसका ऋषि बुधकौशिक माना गया है। नीचे विनियोग, ध्यान और सभी 38 श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित दिए गए हैं।

॥ विनियोग ॥

॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।
श्रीसीतारामचन्द्रो देवता । अनुष्टुप् छन्दः ।
सीता शक्तिः । श्रीमद् हनुमान कीलकम् ।
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

सरल भावार्थ
इस स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, आराध्य श्रीसीतारामचन्द्र हैं, सीता जी इसकी शक्ति और श्रीहनुमान जी कीलक माने गए हैं। इसका पाठ श्रीरामचन्द्र की प्रसन्नता और भक्ति के भाव से किया जाता है।

॥ ध्यानम् ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढसीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम् ॥

सरल भावार्थ
ऐसे श्रीराम का ध्यान करें जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लंबी हैं, जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, पीताम्बर पहने हैं, कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले और प्रसन्न हैं। उनके साथ माता सीता विराजमान हैं और उनका श्यामल स्वरूप दिव्य आभूषणों से सुशोभित है।

॥ श्री राम रक्षा स्तोत्र ॥

॥ श्लोक 1–3 ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तञ्चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥

सरल भावार्थ
श्रीरघुनाथ का चरित्र अत्यंत विशाल और पवित्र है। कमलनयन, नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले, माता जानकी और लक्ष्मण जी सहित विराजमान श्रीराम का ध्यान किया जाता है। वे धनुष-बाण धारण करके धर्म की रक्षा और दुष्टता के विनाश के लिए प्रकट हुए हैं।
॥ श्लोक 4–5 ॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥

सरल भावार्थ
भक्त श्रीराम से प्रार्थना करता है— राघव मेरे मस्तक की, दशरथनंदन मेरे ललाट की, कौसल्यापुत्र मेरे नेत्रों की और विश्वामित्रप्रिय मेरे कानों की रक्षा करें। यज्ञों की रक्षा करने वाले प्रभु मेरी नासिका और लक्ष्मण से प्रेम करने वाले श्रीराम मेरे मुख की रक्षा करें।
॥ श्लोक 6–9 ॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥8॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्घे दशमुखान्तकः ।
पादौ बिभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥9॥

सरल भावार्थ
इन श्लोकों में भक्त अपने शरीर के प्रत्येक अंग को श्रीराम के अलग-अलग दिव्य नाम और चरित्र से जोड़कर प्रभु की कृपा माँगता है। सीतापति, सुग्रीव के स्वामी, हनुमान जी के प्रभु, सेतु बनाने वाले और रावण का अंत करने वाले श्रीराम सम्पूर्ण शरीर की रक्षा करें—यही प्रार्थना है।
॥ श्लोक 10–15 ॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥

पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम् ॥14॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥

सरल भावार्थ
इन श्लोकों में रामनाम और रामरक्षा की महिमा का वर्णन है। भक्ति-परंपरा में इसके पाठ को कल्याण, विनय और आध्यात्मिक साहस से जोड़ा गया है।

श्लोक 15 में कहा गया है कि बुधकौशिक ने स्वप्न में भगवान शिव की प्रेरणा से इस रामरक्षा को जाना और जागने पर इसे लिखा।
॥ श्लोक 16–19 ॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान् स नः प्रभुः ॥16॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥

सरल भावार्थ
श्रीराम को तीनों लोकों के आनंद और संकटों को शांत करने वाले प्रभु के रूप में स्मरण किया गया है। राम और लक्ष्मण सुंदर, पराक्रमी, संयमी और तपस्वी स्वरूप वाले दशरथनंदन हैं। भक्त उनसे अपने जीवन में धर्म और सद्बुद्धि की रक्षा करने की प्रार्थना करता है।
॥ श्लोक 20–21 ॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥20॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥

सरल भावार्थ
भक्त भाव करता है कि धनुष-बाण धारण किए श्रीराम और लक्ष्मण जीवन के मार्ग पर उसके आगे-आगे चलकर उसे धर्म के पथ पर बनाए रखें।
॥ श्लोक 22–24 ॥

रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

सरल भावार्थ
यहाँ श्रीराम के अनेक दिव्य नामों और गुणों का स्मरण है— दशरथपुत्र, कौसल्यापुत्र, रघुकुलश्रेष्ठ, जानकीवल्लभ और अप्रमेय पराक्रमी। भक्ति-परंपरा में श्रद्धापूर्वक इन नामों के स्मरण की बड़ी महिमा कही गई है।
॥ श्लोक 25–27 ॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥25॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥

सरल भावार्थ
श्यामवर्ण, कमलनयन, पीताम्बरधारी श्रीराम का स्मरण किया गया है। वे करुणा के सागर, गुणों के भंडार, सत्यप्रतिज्ञ और माता सीता के स्वामी हैं। भक्त राम, रामभद्र, रामचन्द्र और रघुनाथ नामों से उन्हें बार-बार प्रणाम करता है।
॥ श्लोक 28 ॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥

सरल भावार्थ
हे रघुनंदन श्रीराम! हे भरत के बड़े भाई! हे रण में पराक्रमी प्रभु! आप ही मेरी शरण हैं—यही भक्त की पूर्ण शरणागति है।
॥ श्लोक 29–31 ॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः
स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु-
र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥30॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥

सरल भावार्थ
भक्त मन, वाणी और मस्तक से श्रीराम के चरणों का स्मरण और प्रणाम करता है।

वह कहता है—श्रीराम ही मेरे माता-पिता, स्वामी, मित्र और सर्वस्व हैं। जिनके दाहिने लक्ष्मण, बाईं ओर माता सीता और सामने हनुमान जी हैं, उन रघुनंदन को मैं प्रणाम करता हूँ।
॥ श्लोक 32–33 ॥

लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं
राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं
श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥

सरल भावार्थ
पहले करुणामय और कमलनयन श्रीराम की शरण ली गई है।

फिर मन के समान तेज, वायु के समान वेगवान, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामदूत हनुमान जी की शरण का भाव व्यक्त किया गया है।
॥ श्लोक 34–36 ॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥

सरल भावार्थ
महर्षि वाल्मीकि को कविता रूपी वृक्ष पर बैठे कोकिल के समान प्रणाम किया गया है, जो मधुर रामनाम का गान करते हैं।

श्रीराम को संकट दूर करने वाले और कल्याण प्रदान करने वाले प्रभु के रूप में बार-बार प्रणाम किया गया है। रामनाम को संसार के भय से ऊपर उठाने वाला आध्यात्मिक आश्रय बताया गया है।
॥ श्लोक 37 ॥

रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥37॥

सरल भावार्थ
श्रीराम सदा विजयशाली हों। मैं उन्हीं प्रभु श्रीराम का भजन करता हूँ। मैं स्वयं को श्रीराम का सेवक मानता हूँ। मेरा मन सदा उनके चरणों में लगा रहे—भक्त की यही प्रार्थना है।
॥ अंतिम श्लोक 38 ॥

रामरामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— मैं “राम, राम, राम” नाम में ही रमण करता हूँ। रामनाम का स्मरण अत्यंत महान और पवित्र माना गया है।

॥ इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ श्रीसीतारामचन्द्रार्पणमस्तु ॥

🌺 श्री राम रक्षा स्तोत्र का मूल भाव

राम रक्षा स्तोत्र का केंद्र केवल बाहरी रक्षा की प्रार्थना नहीं, बल्कि मनुष्य के मन को श्रीराम की शरण, मर्यादा और धर्म से जोड़ना भी है।

इसमें श्रीराम के अनेक नामों और रामायण के प्रसंगों का स्मरण करते हुए भक्त अपने जीवन को प्रभु के चरणों में समर्पित करता है।

“माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः” का भाव यही है कि भक्त श्रीराम को अपने जीवन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक आश्रय मानता है।

पाठ संबंधी टिप्पणी: राम रक्षा स्तोत्र के कुछ प्रकाशित संस्करणों में संधि, वर्तनी तथा कुछ शब्दों में छोटे पाठभेद मिलते हैं। यहाँ प्रचलित संस्कृत पाठ को प्रमाणिक डिजिटल पाठों से मिलाकर प्रस्तुत किया गया है।

धार्मिक सूचना: स्तोत्र-पाठ श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना का विषय है। इसे किसी बीमारी, आर्थिक समस्या या अन्य व्यावहारिक कठिनाई के निश्चित समाधान की गारंटी न समझें।
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॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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