श्री शनि चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Shani Chalisa

🪔 श्री शनि चालीसा

श्री शनि चालीसा सूर्यपुत्र शनिदेव की महिमा, न्यायप्रिय स्वरूप और भक्त की प्रार्थना का भक्तिपूर्ण वर्णन करती है। नीचे प्रचलित श्री शनि चालीसा सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल।
दीनन के दुःख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

अर्थ: प्रथम श्रीगणेश जी को प्रणाम कर भक्त सूर्यपुत्र शनिदेव से अपनी प्रार्थना सुनने और कृपा करने की विनती करता है।

जयति जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

अर्थ: दयालु शनिदेव की जय हो। भक्त उन्हें अपने शरणागतों की रक्षा करने वाले प्रभु के रूप में प्रणाम करता है।

चारि भुजा तनु श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

अर्थ: शनिदेव के श्यामवर्ण दिव्य स्वरूप, चार भुजाओं और रत्नजड़ित मुकुट का वर्णन किया गया है।

परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

अर्थ: शनिदेव का विशाल मस्तक और गंभीर दृष्टि उनके तेजस्वी तथा न्यायपूर्ण स्वरूप का प्रतीक मानी गई है।

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके।
हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

अर्थ: उनके कानों में कुण्डल और हृदय पर मणि-मुक्ताओं की माला शोभित है।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

अर्थ: शनिदेव के हाथों में दिव्य आयुध उनके अधर्म और अन्याय का दमन करने वाले स्वरूप का संकेत देते हैं।

पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
यम कोणस्थ रौद्र दुःखभंजन॥

अर्थ: इस पद में शनिदेव के विभिन्न पारंपरिक नामों और स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

सौरी मन्द शनी दश नामा।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

अर्थ: शनि, सौरी, मन्द आदि नामों से सूर्यपुत्र शनिदेव का स्मरण और पूजन किया जाता है।

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं।
रंकहुं राव करैं क्षण माहीं॥

अर्थ: चालीसा में शनिदेव की कृपा को जीवन में बड़ा परिवर्तन लाने वाली शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।

पर्वतहु तृण होइ निहारत।
तृणहू को पर्वत करि डारत॥

अर्थ: इस पद में शनिदेव के प्रभाव की विशालता को रूपक के माध्यम से व्यक्त किया गया है।

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो।
कैकेईहुं की मति हरि लीन्हयो॥

अर्थ: यहाँ रामकथा के वनवास प्रसंग को समय, कर्म और नियति के प्रभाव से जोड़कर स्मरण किया गया है।

वनहूं में मृग कपट दिखाई।
मातु जानकी गई चुराई॥

अर्थ: श्रीराम के वनवास के दौरान मारीच के स्वर्णमृग और माता सीता के हरण की कथा का स्मरण है।

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा।
मचिगा दल में हाहाकारा॥

अर्थ: रामायण युद्ध में लक्ष्मण जी के घायल होने और सेना में उत्पन्न चिंता का वर्णन किया गया है।

रावण की गति-मति बौराई।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

अर्थ: रावण के अहंकार और श्रीराम से वैर के कारण उसके विनाश की दिशा में बढ़ने का संकेत है।

दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग वीर की डंका॥

अर्थ: स्वर्णमयी लंका के विनाश और हनुमान जी के महान पराक्रम का स्मरण किया गया है।

नृप विक्रम पर तुहिं पगु धारा।
चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

अर्थ: राजा विक्रमादित्य से जुड़ी प्रचलित शनि-कथा के एक प्रसंग का यहाँ वर्णन है।

हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी॥

अर्थ: प्रचलित कथा में राजा विक्रमादित्य पर चोरी का आरोप और उनके कठिन समय का वर्णन मिलता है।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

अर्थ: राजा विक्रमादित्य की कथा में उनके अत्यंत कठिन समय और संघर्ष का वर्णन किया गया है।

विनय राग दीपक महं कीन्हयों।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

अर्थ: प्रार्थना और विनम्रता के बाद शनिदेव के प्रसन्न होने तथा परिस्थितियों में सुधार का भाव व्यक्त किया गया है।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी॥

अर्थ: सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के कठिन संघर्ष और सत्य के प्रति उनकी दृढ़ता का प्रसंग स्मरण किया गया है।

तैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी मीन कूद गई पानी॥

अर्थ: राजा नल से जुड़ी प्रचलित कथा के माध्यम से जीवन में आने वाले कठिन समय का वर्णन किया गया है।

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई।
पार्वती को सती कराई॥

अर्थ: शिव-पार्वती से संबंधित एक पारंपरिक कथा-प्रसंग के माध्यम से शनिदेव के प्रभाव का उल्लेख है।

तनिक विलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

अर्थ: माता गौरी के पुत्र से संबंधित एक प्रचलित कथा में शनिदेव की दृष्टि के प्रभाव का वर्णन मिलता है।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी।
बची द्रौपदी होत उघारी॥

अर्थ: महाभारत के पाण्डवों के कठिन समय और द्रौपदी की रक्षा के प्रसंग का यहाँ स्मरण है।

कौरव के भी गति मति मारी।
युद्ध महाभारत करि डारी॥

अर्थ: कौरवों के अहंकार और महाभारत युद्ध की घटनाओं को कर्म तथा अधर्म के परिणाम से जोड़ा गया है।

रवि कहुँ मुख महुँ धरि तत्काला।
लेकर कूदि परयो पाताला॥

अर्थ: इस पद में सूर्यदेव से संबंधित एक पौराणिक प्रसंग का वर्णन किया गया है।

शेष देव लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

अर्थ: देवताओं की प्रार्थना के बाद सूर्यदेव के मुक्त होने का भाव इस कथा में व्यक्त हुआ है।

वाहन प्रभु के सात सुजाना।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

अर्थ: परंपरागत ज्योतिषीय वर्णन में शनिदेव के विभिन्न वाहनों का उल्लेख मिलता है।

जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

अर्थ: पारंपरिक ज्योतिष में शनिदेव के अलग-अलग वाहनों से प्रतीकात्मक फल जोड़े गए हैं।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥

अर्थ: पारंपरिक मान्यता में गज और अश्व जैसे वाहनों को शुभता और समृद्धि के प्रतीकों से जोड़ा गया है।

गर्दभ हानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

अर्थ: इस पद में अलग-अलग वाहनों के प्रतीकात्मक शुभ-अशुभ फल का पारंपरिक वर्णन किया गया है।

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

अर्थ: यह भी ज्योतिषीय परंपरा में बताए गए प्रतीकात्मक फल का वर्णन है, न कि निश्चित भविष्यवाणी।

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी॥

अर्थ: पारंपरिक मान्यता में स्वान वाहन से सावधानी और संभावित कठिनाई का प्रतीकात्मक संकेत जोड़ा गया है।

तैसहि चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

अर्थ: शनि की पारंपरिक ज्योतिषीय अवस्थाओं को स्वर्ण, लौह, चाँदी और ताम्र चरण जैसे नामों से भी वर्णित किया गया है।

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

अर्थ: परंपरागत फलित ज्योतिष में लौह चरण को चुनौतीपूर्ण समय के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है।

समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

अर्थ: ताम्र, रजत और स्वर्ण चरणों को परंपरागत रूप से अलग-अलग शुभ फल के प्रतीक के रूप में बताया गया है।

जो यह शनि चरित्र नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

अर्थ: फलश्रुति में श्रद्धापूर्वक शनिदेव का स्मरण करने वाले भक्त के कल्याण की कामना की गई है।

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्रु के नाशि बलि ढीला॥

अर्थ: भक्त शनिदेव से जीवन की बाधाओं और विरोधी परिस्थितियों को दूर करने की प्रार्थना करता है।

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

अर्थ: इस पद में पारंपरिक धार्मिक रीति से शनि-शांति पूजा कराने का उल्लेख किया गया है।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत॥

अर्थ: शनिवार को पीपल के समीप जल अर्पित करने और दीपदान जैसी पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं का उल्लेख किया गया है।

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

अर्थ: रचनाकार रामसुन्दर कहते हैं कि शनिदेव का श्रद्धापूर्वक स्मरण मन में आशा, विश्वास और भक्ति का प्रकाश उत्पन्न करता है।

॥ समापन दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों भक्त तैयार।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

अर्थ: समापन में भक्त को नियमित श्रद्धापूर्वक शनिदेव का स्मरण और पाठ करने की प्रेरणा दी गई है तथा आध्यात्मिक कल्याण की प्रार्थना की गई है।

🌼 भक्ति भावना

श्री शनि चालीसा का पाठ भय के भाव से नहीं, बल्कि श्रद्धा, आत्मचिंतन और सद्कर्म के भाव से करें। शनिदेव को धार्मिक परंपरा में न्याय और कर्मफल से जोड़ा जाता है; इसलिए सत्य, अनुशासन और अच्छे कर्मों को भी उनकी आराधना का महत्वपूर्ण भाव माना जाता है।

जय शनिदेव महाराज 🪔
ॐ शं शनैश्चराय नमः 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

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